chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

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nishamittal


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आईये अपनी हिंदी को जन जन तक पहुंचाएं (हिंदी दिवस पर

Posted On: 11 Sep, 2016  
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शिक्षक ही है राष्ट्र निर्माता पर…………….

Posted On: 2 Sep, 2016  
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शत्रुता निज जीवन से (अंतर्राष्ट्रीय तम्बाखू दिवस 31 मई)

Posted On: 30 May, 2016  
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व्यथित धरती माता (विश्व पृथ्वी दिवस २२ अप्रैल पर )

Posted On: 19 Apr, 2016  
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शार्टकट जिन्दगी में ! ,शार्ट बनी जिन्दगी

Posted On: 7 Apr, 2016  
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जल अनमोल ,जान लो इसका मोल (विश्व जल दिवस )

Posted On: 20 Mar, 2016  
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क्या सत्ता तक पहुंचेगी मेरी पुकार ?

Posted On: 12 Feb, 2016  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

" जीवित्पुत्रिका या ‘जिउतिया’ व्रत का विशेष महत्व है। माताएं अपने संतान के दीर्घायुष्य की कामना से ये व्रत करतीं हैं। जैसे की इसके नाम से स्पष्ट है ये पुत्र को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। यह व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष के प्रदोष काल में किया जाता हैं। "

के द्वारा:

जय श्री  राम निशा जी बहुत अच्छा लेख लेकिन आधुनिकता  और भौतिकवादी  संस्कृति में आज  सब कुछ बदल रहा है शिक्षा की दुर्दशा और गिरावट अंग्रेजो ने शुरू किया था जब गुरुकुलो शिक्षा को अवैध करार कर दिया था आजादी के बाद भी शिक्षा में बदलाव नहीं आया माँ प्राथन शिक्षक होती लेकिन ज्यादातर माँ ये ज़िम्मेदारी निर्वाह नहीं कर पाती शिक्षा का व्यवशाहीकारन हो गया जिससे टीचर्स और विद्यार्थियो में वह संबंध ख़तम हो गए आज पैसे के लिए सब अनैतिक कार्य दोनों तरफ से होते एक दिन शिक्षक दिवस की खानापूर्ती से कुछ नहीं होगा.सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में फिर से सुधार कर पुब्लिक स्कूलों पर निर्भरता कम करनी पदेही टीचर्स को हड़ताल अदि जाने से रोका जाए जिससे वे पढाई पर ध्यान दे इसमें अमूल चूल परिवर्तन की जरूरत लेकिन वोटो की राजनीती के कारन कुछ नहीं होगा.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आदरणीया निशा महोदया, सादर अभिवादन! आपको याद होगा, प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा पहले नियमित जगर पर लिखते थे टिप्पणी भी देते थे, उन्होंने आपकी प्रेरणा से सिगरेट पीना छोड़ दिया है. उन्होंने इसकी घोषणा फेसबुक पर भी की थी. शायद २०१३ से ही सिगरेट पीना छोड़ चुके हैं. उनकी पत्नी भी उन्हें छुड़ाने का हर सम्भव प्रयास करती थीं. मैंने देखा है, हमारे कई मित्र अपनी पत्नी या बेटी के डर से ही सिगरेट छोड़ पाये हैं. मई ऐसे लोगों को भी जानता हूँ की पति के सिगरेट पीने से पत्नी को कैंसर हुआ. वो कहते हैं न की एक्टिव स्मोकिंग से ज्यादा पैसिव स्मोकिंग खतरनाक है. आप हमेशा प्रेरणादायी आलेख लिखती हैं फेसबुक पर भी आपके सन्देश सार्थक ए प्रेरणादायी होते हैं. सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

निशाजी , नमस्कार ! आपने बीड़ी सिगरेट , पान तम्बाकू मशाले और अन्य नशीली वस्तुओं पर प्रतिबन्ध लगाने और देश की युवा पीढ़ी को मार्ग दर्शन समबन्धित लेख लिखकर कहियों की सुपत पडी आत्मा को जगा दिया है ! मैं सुबह सुबह पार्क में जाता हूँ, वहां बहुत से सर फिरे सिगरेट बीड़ी पीते मिलते हैं ! एक दिन १२ घंटे ड्यूटी देने वाले गार्ड से मैंने पूछा की "अगर तुम जितने बीड़ी पी जाते हो उतने ही पैसों का फल अपने नन्हें बच्चों को खिलाएगा तो उन्हें कैसे लगेगा" ? बोला सर, अगर बीड़ी नहीं पियूँगा तो १२ घंटे की ड्यूटी नहीं दे पाउँगा, रात को सो जाउङ्गा और पगार से भी हाथ धो बैठूंगा ! समाज को जगाने का आपके प्रयस्स को मैं सलूट करता हूँ ! जागते रहो !

के द्वारा: harirawat harirawat

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: rafe rafe

बिलकुल सही कहा आपने सिंह साहब,विकास चाहिए तो विनाश तो होगा क्योंकि हमारे यहाँ जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है और साधन उस अनुपात में नही बढ़ सकते ,परन्तु जहाँ चाह वहाँ राह,.जिस प्रकार रेजिडेंशियल बिल्डिंग्स का जंगल बढ़ रहा है,उसमें यदि ये मानक तय किये जाएँ कि उसके एक निश्चित क्षेत्र में पेड़ लगाना ,उनकी देखभाल करना आवश्यक है.मेरी एक मित्र ने बताया था कि पंजाब में जालन्धर शहर में कोई भी मकान का नक्षा पारित करवाते समय ये अनिवार्य शर्त है.वहां हर मालिक को निश्चित जगह छोडनी अनिवार्य है ,जहाँ पेड़ प्रशासन लगा कर देता है,और उसको हर भरा रखने का उत्तरदायित्व मालिक का होता है,ऐसे नियम अन्यत्र होंगे भी साथ ही बनाये जा सकते हैं,और उससे भी अधिक आवश्यक है जागरूकता .जनसंख्या नियंत्रण जिस दिन लागू होगा उसी दिन यहाँ साम्प्रदायिकता का मुद्दा पुनः बोतल से बाहर निकलेगा और रुदालियाँ विलाप करने लगेगी

के द्वारा: nishamittal nishamittal

सिंह साहब धन्यवाद लेख पूरा पढने के लिए .प्रत्युषा या अन्य ऐसे सभी व्यक्तित्व जो ऐसी विडम्बनाओं के शिकार होते हैं ,सहानुभूति हर संवेदनशील व्यक्ति को होगी ,मुझको भी है.आपके राज्य,जिले से उसका सम्बन्ध था,उसका अभिनय आपको पसंद था तो जुड़ाव स्वाभाविक ही है. मेरा कथन मात्र इतना है,यदि आप प्रत्युषा के ही केस को देखें तो प्राप्त जानकारी के अनुसार शराब का सेवन करना विवाहित अविवाहित बॉय फ्रेंड्स की कतार, उनके साथ झगड़े शीश पर पलों में पहुँचने की अति महत्वाकांक्षा,हताशा,अवसाद आदि आदि कारण ही उसकी दुखद मौत के मूल में है,चाहे वो हत्या थी या आत्महत्या ये तो सदा रहस्य ही बने रहते हैं.रुपहली ग्लेमर की दुनिया के सच प्राय बहुत विडम्बनापूर्ण ही होते हैं

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मैंने दुर्गा भाभी के निधन का समाचार 16 अक्तूबर, 1999 को हिन्दी के एक समाचार-पत्र के एक छोटे से कॉलम में पढ़ा था । उसके उपरांत ही उनके बारे में पढ़ने और जानने की जिज्ञासा प्रबल हुई । हाल ही में मनोज कुमार को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है । 1965 में बनी अमर हिन्दी फ़िल्म 'शहीद' में मनोज कुमार ने भगत सिंह का चरित्र निभाया था और निरुपा रॉय ने दुर्गा भाभी का । 2006 में बनी प्रशंसनीय फ़िल्म 'रंग दे बसंती' में भी दुर्गा भाभी के चरित्र को उत्तम ढंग से प्रस्तुत किया गया था । महान मराठी लेखिका मृणालिनी जोशी ने भगत सिंह तथा अन्य क्रांतिकारियों की जीवन गाथा पर एक वृहत उपन्यास 'इनक़लाब' लिखा है जिसे लिखने के लिए वे न केवल भगत सिंह की माताजी विद्यावती देवी से बल्कि दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी जैसी क्रांतिकारी महिलाओं से भी मिली थीं ताकि वे जो भी लिखें, वह प्रामाणिक हो । दुर्गा भाभी भारतीय नारियों के लिए ही नहीं वरन सभी देशप्रेमी स्त्री-पुरुषों के लिए सदा प्रेरणा-स्रोत बनी रहेंगी । मैंने भी अपने हिन्दी एकांकी 'चिराग-ए-सहर' में दुर्गा भाभी के चरित्र का उल्लेख किया है । आपने अपने इस पाँच वर्ष पुराने अत्यंत उत्कृष्ट लेख को पुनः हमारे समक्ष रखकर मुझ जैसे नए सदस्यों पर बड़ा ही उपकार किया है निशा जी । आभार एवं साधुवाद ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

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के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: harirawat harirawat

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के द्वारा: Sushil Kumar Sushil Kumar

आदरणीय निशा जी, सादर प्रणाम.  बहुत दिनों बाद ब्लाग पर आ सका और आपकी पोस्ट पढ़ी। आपके विचारों से सहमत हैं। महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश में  भी कहा करते थे कि उनकी बातों को न लिखा जाए। न जाने  भविष्य में उनकी बातों का लोग किस प्रकार से समझ सकेंगे।  महापुरूषों के जन्म दिन पर छुट्टी से उन्हें निश्चित ही अपमानित  करने से अधिक नहीं है। अब तो खुद लोगों को चाहिए कि अपने  जीवन काल में ही घोषणा कर दें निधन के बाद छुट्टी  न दी जाए।    वैसे निशा जी, यह सब 2047 तक चलने की उम्मीद है।  इसके बाद व्यवस्था बदलेगी और लगाई गई अधिकांश मूतियां  टूटेंगी और लोगों के जन्म दिन की छुट्टी भी खत्म होंगी। शेष फिर कभी..प्रमोद 

के द्वारा: pramod chaubey pramod chaubey

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वर्तमान में (नेट से उपलब्ध जानकारी के आधार पर ) 50000 के लगभग हिंदी ब्लागर्स हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने में जुटे हैं तथा अरबों की संख्या में हिंदी ब्लाग्स उपलब्ध हैं..निश्चित रूप से यह संख्या आंग्ल भाषा ब्लाग्स से तुलना करने पर अपेक्षाकृत बहुत कम है परन्तु यह हताश होने वाला कारण नहीं ,मेरे विचार से इसके प्रधान कारण हैं अभी भी नेट सुविधा और कम्प्यूटर आदि साधन घर घर न होना .वैसे भी अंग्रेजी ब्लागिंग को प्रारम्भ हुए तो लम्बा समय हो चुका है.जापानी,चीनी ब्लागर्स की संख्या भी हिंदी ब्लागर्स से अधिक होने का कारण उन देशों के विकसित होने के कारण ही है . हिंदी भाषी भारत में अन्य क्षेत्रों की तरह ब्लागिंग विकास शील अवस्था में है .निश्चित रूप से हिंदी ब्लागिंग का भविष्य उज्जवल है,क्योंकि साइट्स पर विज्ञापन और अन्य माध्यमों से धनार्जन के साधन भी ढूंढ लिए गये हैं,प्रचार –प्रसार बढ़ रहा है.सर्वाधिक सुखद है युवा पीढी का हिंदी ब्लागिंग में सक्रिय होना.जागरण तथा अन्य ब्लागिंग साइट्स पर युवा पीढी की ब्लॉग लेखन में बढ़ती सक्रियता शुभ संकेत है .जागरण साईट पर इतने सारे युवाओं को हिंदी लेखन में सक्रिय देखना बहुत सुखद लगता है. सच कहूँ तो ये जानकारी मेरे लिए बिलकुल नईऔर सुखद एहसास कराने वाली है ! कभी सोचा ही नही किइतने ब्लोग्गेर्स इस दुनिया में हैं जो हिंदी में ब्लॉगिंग करते हैं ! बालेन्दु जी हिंदी ब्लॉगिंग के पितामह हैं , सच कहूँ तो उन्होंने हिंदी ब्लॉगिंग को बहुत कुछ दिया है ! बेहतरीन आलेख लिखा है आपने आदरणीय निशा जी मित्तल ! हिंदी दिवस कि असीम बधाइयां !!

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

वर्तमान में (नेट से उपलब्ध जानकारी के आधार पर ) 50000 के लगभग हिंदी ब्लागर्स हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने में जुटे हैं तथा अरबों की संख्या में हिंदी ब्लाग्स उपलब्ध हैं..निश्चित रूप से यह संख्या आंग्ल भाषा ब्लाग्स से तुलना करने पर अपेक्षाकृत बहुत कम है परन्तु यह हताश होने वाला कारण नहीं ,मेरे विचार से इसके प्रधान कारण हैं अभी भी नेट सुविधा और कम्प्यूटर आदि साधन घर घर न होना .वैसे भी अंग्रेजी ब्लागिंग को प्रारम्भ हुए तो लम्बा समय हो चुका है.जापानी,चीनी ब्लागर्स की संख्या भी हिंदी ब्लागर्स से अधिक होने का कारण उन देशों के विकसित होने के कारण ही है . हिंदी भाषी भारत में अन्य क्षेत्रों की तरह ब्लागिंग विकास शील अवस्था में है .निश्चित रूप से हिंदी ब्लागिंग का भविष्य उज्जवल है,क्योंकि साइट्स पर विज्ञापन और अन्य माध्यमों से धनार्जन के साधन भी ढूंढ लिए गये हैं,प्रचार –प्रसार बढ़ रहा है.सर्वाधिक सुखद है युवा पीढी का हिंदी ब्लागिंग में सक्रिय होना.जागरण तथा अन्य ब्लागिंग साइट्स पर युवा पीढी की ब्लॉग लेखन में बढ़ती सक्रियता शुभ संकेत है .जागरण साईट पर इतने सारे युवाओं को हिंदी लेखन में सक्रिय देखना बहुत सुखद लगता है. सच कहूँ तो ये जानकारी मेरे लिए बिलकुल नईऔर सुखद एहसास कराने वाली है ! कभी सोचा ही नही किइतने ब्लोग्गेर्स इस दुनिया में हैं जो हिंदी में ब्लॉगिंग करते हैं ! बालेन्दु जी हिंदी ब्लॉगिंग के पितामह हैं , सच कहूँ तो उन्होंने हिंदी ब्लॉगिंग को बहुत कुछ दिया है ! बेहतरीन आलेख लिखा है आपने आदरणीय निशा जी मित्तल ! हिंदी दिवस कि असीम बधाइयां

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अतः आदरनीय प्रधानमंत्री जी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना ही प्राथमिकता बनानी होगी आपको .भ्रष्टाचार निवारण अभियान का प्रारम्भ कीजिये और उसको क्रियावित कीजिये जोर अविलम्ब ,बहुत सारी समस्याएं तो स्वतः समाप्त हो जायेंगी .वाही पुराना जोरदार स्टाइल ! अपनी बात को स्पष्ट और दमदार शब्दों में तथ्यों के साथ रखना ! आदरणीय निशा जी मोदी जी एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो आशाओं का इतना बोझ लेकर चल रहे हैं जितना उनसे पहले शायद किसी भी प्रधानमंत्री के पास नही रहा ! जिम्मेदार व्यक्ति से उम्मीदें और ज्यादा बढ़ जाती हैं ! बहुत बहुत बधाई आपको , पुनः इस मंच पर आने और फिर से सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर होने के लिए !! और शुभकामनाएं !!

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अतः आदरनीय प्रधानमंत्री जी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना ही प्राथमिकता बनानी होगी आपको .भ्रष्टाचार निवारण अभियान का प्रारम्भ कीजिये और उसको क्रियावित कीजिये जोर अविलम्ब ,बहुत सारी समस्याएं तो स्वतः समाप्त हो जायेंगी .वाही पुराना जोरदार स्टाइल ! अपनी बात को स्पष्ट और दमदार शब्दों में तथ्यों के साथ रखना ! आदरणीय निशा जी मोदी जी एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो आशाओं का इतना बोझ लेकर चल रहे हैं जितना उनसे पहले शायद किसी भी प्रधानमंत्री के पास नही रहा ! जिम्मेदार व्यक्ति से उम्मीदें और ज्यादा बढ़ जाती हैं ! बहुत बहुत बधाई आपको , पुनः इस मंच पर आने और फिर से सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर होने के लिए !!

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प्रिय निशा जी मैं आपके लेख पर अपने विचार रख चुकी थी परन्तु आपका लेख बेस्ट ब्लागर आफ दा वीक पर देखा आप अब तक ३०० लेख लिख चुकी हैं मैं आप के वही लेख पढ़ पाई जब से मैं ब्लॉग का हिस्सा बनी मैं उन लोगों मैं से हूँ जिन्हें आपके लेख बेहद पसंद आते हैं आप बहुत मेहनत से तथ्यों के आधार पर अपनी बात कहती हैं बहुत मेहनत करतीं हैं ऐसे और भी लेखक हैं परन्तु कुछ लोग अब ब्लॉग में दिखाई नहीं देते मेरा अपना विचार है आपने मेहनत से लेख में अपनी बात कहीं अगर कुछ ने ही पढ़ा उन्होंने उसकी प्रशंसा की या कमी निकाली आपका उद्देश्य पूरा होगया इस लिए मैं लिखती रहती हूँ और भी जगह लिखती हूँ आपको ईश्वर स्वस्थ रखे हमारे लिए और लिखने की इच्छा दे ईश्वर से यही प्रार्थना है आप ऐसे ही हमारे लिए लिखती रहना मैदान पर डटे रहना

के द्वारा: Shobha Shobha

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आदरणीया निशा महोदया, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम आपके तीन सौवें ब्लॉग के लिए हार्दिक अभिनंदन! पुराने ब्लोग्गर्स में से आप ही हैं जो लगातार अपना विचार रखती हैं. अन्यथा अभी जो इस मंच की ब्यवस्था है वह अत्यंत ही सोचनीय है. जे जे एक मर्यादित मंच है पर आजकल इसका प्रबंधन और तकनीकी वर्ग शायद ठीक से मैनेज नहीं कर पा रहा है. फिर भी हम सभी क्रियाशील हैं अपने विचारों को जन जन तक पहुचाने के लिए. आपका यह ब्लॉग सार गर्भित है और प्रधान मंत्री के नाम एक पत्र भी है. मोदी जी से देश को बहुत आशाएं हैं. अगर वे सक्षम न हुए तो आज कोई तीसरा विकल्प नहीं दीख रहा है. उम्मीद है वे अपने प्रयासों में सफल हों, भ्र्ष्टाचार पर लगाम लगे ... डायरेक्ट कॅश बेनिफिट से कुछ हद तह यह सम्भव हुआ है. फिर भी काम पढ़े लिखे लोगों को बरगलाकर उनसे रुपये ऐंठने वाली खबरें भी उत्तर प्रदेश से ही आती रहती हैं. अभी बहुत सुधर करना बाकी है. शिक्षा का पोरर्न प्रचार-प्रसार करना है और कानून ब्यवस्था का राज कायम करना है. महिलाओं पर अत्यचार तो हो ही रहे हैं दिन दहाड़े लूट और हत्या की घटनाओं में भी कहीं कोई कमी नहीं दीखती. आम नागरिक भी जागरूक नहीं हो रहा. जुल्म को देखता हुआ भी सर नहीं उठता. बाकी आप सब समझती है. आपका पुन: अभिनंदन ! आप आगे भी बेहतरीन विचार प्रस्तुत करती रहेंगी इसी आशा के साथ...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीया निशा मित्तल जी ! सबसे पहले तो ३०० सार्थक, विचारणीय और पठनीय ब्लॉग मंच पर प्रस्तुत करने के लिए आपका बहुत बहुत अभिनन्दन और हार्दिक बधाई ! ये सभी ब्लॉग मंच के लिए, देश के लिए और हम सब के लिए बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं ! आपकी उपस्थिति हम सभी ब्लॉगरों को प्रोत्साहित और गौरवान्वित करती है ! इस पोस्ट में आपने बिलकुल सही कहा है कि योजनाओं की घोषणा होती है, देर-सबेर लागू भी होतीं हैं, पर ठीक से वास्तविक रूप में क्रियान्वित नहीं हो पाती हैं ! मोदीजी यदि ६७ सालों की इस कमी को दूर कर सके तो वो निसंदेह अबतक के सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री कहलायेंगे ! आज लाल किले पर सबकुछ अच्छा था, परन्तु न्यूज चैनलों पर 'वन रैंक वन पेंशन' के लिए पूर्व सैनिकों को प्रदर्शन और नारेबाजी करते हुए देखना बहुत दुखद और क्षुब्ध करने वाला था ! पिछले १५ अगस्त को आपने 'वन रैंक वन पेंशन' देने की घोषणा की थी और आज तक लागू नहीं कर पाये ! अभी तक आप सैनिक संगठनों से बातचीत ही कर रहे हैं ! इस मसले को हल कर आपको ये बताना चाहिए था कि आप पिछले प्रधानमंत्रियों से अलग हैं ! काले धन की उगाही आप अपने ही देश में ठीक से नहीं कर पा रहे हैं तो विदेशों से क्या करेंगे ! सार्थक और विचारणीय पोस्ट प्रस्तुत करने हेतु सादर आभार ! शुभेक्षा और शुभकामनाओं सहित !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

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के द्वारा: Shobha Shobha

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वास्तव में अधिकांश अंगेरजी गवर्नर जनरल की नीति देश हड़पने की थी,अर्थात देसी जागीरदारों द्वारा राजस्व नहीं चुकाया गया तो जागीर हड़प ली गयी,,इसी प्रकार रियासतों को भी कभी उतराधिकारी न होने के नाम पर,कभी उत्तराधिकारी अवयस्क होने के नाम पर तथा कभी शासक अयोग्य होने का बहाना बनाकर अपनी साम्राज्यवादी नीति का परिचय देते हुए ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया.अतः आर्थिक, राजनैतिक शोषण,साम्राज्यवादी नीति के रूप में अंग्रेजों ने अपने चक्रव्यहू में देश को उलझा दिया. ऐसे में विवश जागीरदारों तथा रियासतों के स्वामियों में असंतोष बढ़ रहा था.1757 -1857 के मध्य कम्पनी की सेनाओं ऩे 20 से अधिक युद्ध लड़े और मैसूर,महाराष्ट्र,कर्नाटक,तंजौर ,बुंदेलखंड रूहेलखंड ,हरियाणा पंजाब आदि राज्यों को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया.बेहतरीन और ज्ञानवर्धक आलेख लिखा है आपने आदरणीय निशा जी ! इस बार महापुरुषों के चित्र लगाकर और उनके विषय में विस्तृत लिखकर आलेख को और भी बेहतर कर दिया है !

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आदरणीया निशा मित्तल जी ! सादर अभिनन्दन ! करवाचौथ पर ये विशेष लेख बहुत अच्छा लगा ! इस विचारणीय और पठनीय रचना के सृजन के लिए आपको बहुत बहुत बधाई ! आपने इस मंच पर एक बहुत कड़वा और सत्यतापूर्ण विषय विचार के लिए प्रस्तुत किया है ! मैंने भी बहुत सी तलाकशुदा,पति के खिलाफ केस लड़ रहीं और कई सालों से पति से दूर स्त्रियों के मुंह के सुना है कि वे अब भी अपने बेवफा पति के लिए करवाचौथ का निर्जल उपवास रखती हैं ! इसे भावनात्मक लगाव कहें या फिर से मिलन होने की झूठी आस,परन्तु कुछ तो है ! भारत में विवाह स्त्री के लिए अब भी एक जुआ है ! सौभाग्य से पति अच्छा मिला तो ठीक,नहीं तो झेलो उम्रभर ! ये स्थिति धीरे धीरे बदलेगी,परन्तु अभी काफी समय लगेगा !

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शुरुआत जिस तरह से करी है आपने ! वो एक अद्वितीय बात है ! परन्तु अचानक ही उसको याद आ गया कि 14 सितम्बर है अतः हिंदी दिवस मनाया जा रहा है .साथ चलती अंग्रेजी ने कुछ व्यंग्यात्मक शैली में दृष्टि उठाई और बोली ,बधाई हो आज तुम्हारा ही दिन है.ये लोग तुम्हारे ही कारण यहाँ एकत्र हुए हैं.तुम्हारी जय जय कार कर रहे हैं तुम्हें अपनाने की कसमें खा रहे हैं ! लेकिन क्या हम दूसरे पक्ष को देख रहे हैं ? पॉजिटिव सोच से अगर सोचा जाए तो मुझे लगता है की हिंदी के इतने बुरे दिन नहीं हैं ! टीवी , बॉलीवुड , गाने , और मोदी ने हिंदी को अगर उसका उचित स्थान नहीं दिला पाया है तो भी एक सम्मानित स्थान जरूर दिलाया है ! बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय निशा जी मित्तल , बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए ! भगवान से प्रार्थना है की आप सदैव यूँ ही लिखती रहें !

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आदरणीय डाक्टर साहब ,आप सदृश विद्वान अग्रज कृपया ये कह कर लज्जित न करें कि आप नहीं लिख सकते ,हम सब आप सदृश अनुभवी जनों से ही सीख पाते हैं और सीखते रहेंगें . विदेशों में हिंदी की स्थिति पर आपने सुखद जानकारी दी निश्चित रूप से यदि हमारे नेता अपना रुख बाजपेयी जी या वर्तमान में मोदी जी जैसा रखें (जो संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित करने जा रहे हैं ) जो असंभव नहीं तो अधिक उपयोगी रहेगा साथ ही कर्नाटक ,तमिल नाडु.केरल तथा अन्य राज्यों में कम से कम प्रमुख साइन बोर्ड्स आदि पर स्थानीय भाषा,अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी लिखना अनिवार्य किया जाय तो सोने में सुहागा होगा साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं में भी विशेष ध्यान रखा जाय.पुनः आभार आपका

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आदरणीया निशा जी, सादर नमस्कार. हिंदी भाषा के राजभाषा या राष्ट्रभाषा के स्वरुप को लेकर हम सभी चिंतिति हैं. आप का लेख अत्यंत उत्कृष्ट है. मैं स्वयं हिंदी की समस्यापर लिखना चाहता था लेकिन जबसे आपका लेख पढ़ा मुझे लगा इतना अच्छा लिख पाना मेरी क्षमता से बाहर है. या कारण कुछ छोटी छोटी बातें लिख रह हूँ. मेरी युवावस्था में जब मैं बीएससी का छात्र (सं डा लोहिया का कहना था की देश में १९६०-६१ ) था तब सौभाग्यवश मुझे डाक्टर राम मनोहर लोहिया के संपर्क में आने का सुअवसर मिला .डा लोहिया का कहना था की देश में इंग्लिश जानने वालों की संख्या ३ % के अस पास थी. लेकिन ये ३ % इंग्लिश जानने वाले लोग ही देश के ९७ % IAS, IPS पदों पर कब्ज़ा किये हुए थे. ऐसी स्थिति में गांवों का किसान मजदूर का बीटा कहीं पहुँच नहीं सकता था. . यही स्थिति आज भी है. डा लोहिया चाटे थे की शिक्षा का माध्यम हिंदी और राजयबाषाएं हो. . भारत में हिंदी का विरोध जो राजनितिक कारणों से था अब कम होने लगा है हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है. विदेशों में भी मैं रहा हूँ. मैनें पाया की पाकिस्तानियों, बांग्लादेशियों, नेपालियों तथा कई अन्य देशवासियों से हिंदी में बात करना सहज लगता है. हिंदी का प्रचार प्रसार BADH रहा है. यह हिंदी साहीत्यिक, अखबारी हिंदी से अलग होगी. हिंदी एक NAYA SWARUP AKHTIYAAR KAREGI. यही बात इंग्लिश के SATH भी है LANDAN में BOLI JANEWALI इंग्लिश BBC और QUEEN'S इंग्लिश से अलग है. बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर बहुत बहुत बधाई.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

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आभार तिवारी जी ब्लॉग पर आने के लिए ,गांधी या मोदी कोई भी सम्मान हिंदी को दिला पायेंगें ,उसका गौरव लौटा सकेंगें ,इतना सरल नहीं .जैसा कि लिखा है,हमारी मानसिकता गुलामी सहते सहते ऐसी ही बन चुकी है, स्वाधीनता के बाद भी नेताओं द्वारा राजनीति की चालों ने इस विषय को विवाद के चरम पर पहुंचा दिया है ,स्थिति यहाँ तक है कि आज गरीब व्यक्ति भी अपने बच्चों को कर्जा ले कर भी अंग्रेजी माध्यम में इसलिए शिक्षा दिलाता है कि उसके बच्चे अंग्रेजी बोलें और ये मानसिकता रक्त में समा चुकी है .हमारी मानसिकता ही कुछ सकारात्मक भूमिका का निर्वाह कर सकती है परन्तु आज राष्ट्र के लिए सोचने की फुर्सत कम ही लोगों के पास है.प्रयास जारी रखने होंगें

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हिंदी की दुर्दशा, उपेक्षा या अपमान - जो भी कहना चाहें कह सकते हैं इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है क्योंकि यह एक ही स्थिति के लिए अलग - अलग शब्द हैं, अग्रतर, हम इस सम्बन्ध में चाहे जितने अच्छी भाषा शैली में अपनी बात कह लें कोई लाभ नहीं होने वाला है सिवाय इस आत्म-संतुष्टि के कि हमने अपने विचार अच्छी प्रकार से बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर दिए. अगर शब्दों से काम चल सकता होता तो अब तक हमारे देश से भ्र्ष्टाचार कब का समाप्त हो चूका होता, शिक्षा प्रणाली में सुधार हो चुका होता, राजनैतिक जीवन में शुद्धता आ चुकी होती, चीन से हमें अपनी जमीन वापस मिल चुकी होती आदि-आदि. आज आवश्यकता शब्द रूपी आंसू बहाने से आगे निकल कर कुछ ठोस कदम उठाने की है जिसमें सरकार का सहयोग बहुत आवश्यक है. हालाँकि वर्तमान सरकार हिंदी को बढ़ावा देने की मंशा रखती है लेकिन राजनैतिक स्तर पर हिंदी का इतना विरोध होना शुरू हो जाता है कि सरकार को अपने कदम पीछे खीचने पड़ते हैं. संघ लोक सेवा आयोग, देश में विश्वविद्यालयों में हिंदी को पढ़ाये जाने के निर्णय आदि का कितना विरोध हुआ यह तो सर्वविदित ही है. इससे भी बहुत कड़वा सच यह है कि हम हिंदी भाषी भी हिंदी की काम उपेक्षा नहीं कर रहे हैं. कुछ मुठी भर हिंदी प्रेमी, जिन्हे भाषा का अच्छा ज्ञान है वही ज्यादा चिंतित प्रतीत होते हैं वह भी व्यक्तिगत स्तर पर- उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी हिंदी भाषा से उतना ही लगाव हो यह आवश्यक नहीं. अब तो हिंदी का भवन ही मालिक है- शायद कभी कोई गांधी पैदा हो जो हिंदी को अंग्रेजी की बड़ियों से मुक्ति दिल सके. थोड़ा लिखा, समझना बहुत. नमस्कार

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आदरणीय निशा जी, आपका यह लेख वर्तमान में प्रत्येक भारतवासी को यह सोचने को मजबूर करता है कि बिना हिंदी को उचित सम्मान दिए हुए हम अपनी संस्कृति को कैसे सहेज सकेंगे? मुझे अभी तक यह गुमान था कि हिंदी हमारे देश कि राष्ट्रभाषा है, मुझे ही क्या देश के बहुत से लोगो को यही गलतफहमी थी. आश्चर्य हुआ मुझे कल यह ज्ञात हुआ कि हमारे देश में तो कोई राष्ट्रभाषा है ही नहीं. हमारे सविधान में राष्ट्रभाषा का कहीं उल्लेख ही नहीं है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि कुछ नेताओं की राजनीतिक लालसा ने देश को न केवल राष्ट्रभाषा अपनाने से वंचित कर दिया वरन हमारी संस्कृति को हमारी पहचान को भी मिटने की कोशिश करने का काम किया है. आज जब सच्चाई हमारे सामने है एकजुट होकर अपनी संस्कृति को बचाने के लिए हमें हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाना ही होगा. सभी पाठकों से अनुरोध है कि वे माननीय प्रधान मंत्री जी को इस सम्बन्ध में पत्र लिखें.

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निशा जी, सादर नमन. हिंदी को लेकर तमाम चिंताएं हम प्रकट कर चुके हैं. लेकिन प्रश्न ये है के हिंदी को उसका हक़ आखिर मिलेगा कैसे ? अंग्रेजी का वर्चस्व कम होने के बजाये बढ़ता ही जा रहा है. जब हम माध्यमिक स्तर के विद्यार्थी थे तो अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने वाले विद्यालयों की संख्या ना के बराबर थी. पर आज हिंदी माध्यम से पढ़ाने वाले विद्यालय ना के बराबर हैं. ये दृश्य तो मध्यम दर्जे के नगरों की है. बड़े नगरों में तो अंग्रेजी का ही बोलबाला है. निशा जी, मैं अक्सर सोचता हूँ के क्या कभी ऐसा होगा के चिकित्सक हिंदी में परचा लिखे. न्यायालयों के निर्णय हिंदी में हों. हमारे फ़िल्मी नायक हिंदी में बोलें. लेकिन ये भी सत्य है के अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी की ताकत भी बढ़ी है. निशा जी, हिंदी को उसका हक़ दिलाने के लिए हम सभी को ये प्रण लेना होगा के जहाँ तक सम्भव हो काम हिंदी में करें. तभी हिंदी बढ़ेगी. बेहतरीन लेख के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

"परन्तु उदारमना हिंदी देशवासियों की इस विवशता को समझते हुए कि आज केवल न्यायिक ही नहीं प्रशासकीय,प्रतियोगी परीक्षाओं ,किसी भी अच्छी नौकरी के लिए अंग्रेजी के वर्चस्व वाले ही आगे रहते हैं.(अतः अंग्रेजी के पीछे भागना तो उनकी विवशता है,)बुझे मन से उनको क्षमा करने के लिए विवश थी." ये पंक्तियाँ आपके उत्कृष्ट लेख का सार लगीं ! आदरणीया निशा मित्तल जी,इस सार्थक,शिक्षाप्रद और उपयोगी जानकारियों से भरे लेख के सृजन के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! पूरा लेख मैंने बहुत ध्यान से पढ़ा ! बहुत अच्छा लगा ! हिंदी के विकास और उसे अपनाने का ऐतिहासिक और यथार्थ चित्रण ! इस बार जागरण जंक्शन परिवार हिंदी दिवस के अवसर पर खामोश है ! आप की जागरूकता और हिंदी के प्रति प्रेम अनुपम है ! इस मंच पर आपकी शिक्षाप्रद वैचारिक उपस्थिति हम सभी ब्लागरों को अच्छा और उपयोगी साहित्य लिखने के लिए प्रेरित करती है ! इस अनुपम रचना को मंच पर प्रस्तुत करने लिए सादर आभार !

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आदरणीय निशा जी आपका आलेख आज़ादी की वास्तविकता से देश को रूबरू करने वाला है. डोमोनिक लेपियर एवं लेरी कोलिन्स द्वारा लिखित पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट के अनुसार बंगाल में विभाजन के उपरान्त फैले दंगो को रोकने के लिए नेहरु और माउन्ट बेटन के आग्रह पर गाँधी जी वहां गए थे. हो सकता है की ट्रान्सफर ऑफ़ पावर एग्रीमेंट पर गाँधी जी कोई विरोध ना करे इसलिए नेहरु और माउन्ट बेटन ने उन्हें वहां भेज दिया हो.  श्री लंका जैसे छोटे से देश ने अंग्रेजों के दिए नाम सीलोन से मुक्ति पा ली किन्तु हम अभी भी इंडिया से पीछा नही छुड़ा पा रहे.  देश को वास्तविक आज़ादी तब मिलेगी जब देशवासी देश के प्रति अपने कर्तव्य जानेंगे.  गंभीर एवं विचारशील आलेख के लिए साधुवाद. सादर राजीव वार्ष्णेय

के द्वारा: Rajeev Varshney Rajeev Varshney

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भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था ।क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे ।(नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था असल बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही था) और 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई …. ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में । इतिहास भी उसी तरह से लिखा गया या ये कहा जाये की लिखवाया गया ! तो फिर सच कैसे सामने आ सकता था और किसी में उनकी सरकार के रहते इतनी हिम्मत भी नही हुई की प्रमाणित रूप से कोई ये कह सके की नेहरू ने सिर्फ प्रधानमन्त्त्री बन्नने के लिए इतना बड़ा खेल खेला था ! वन्देमातरम वाली बात बहुत नयी जानकारी देती है ! बहुत ही सटीक और ज्ञानवर्धक आलेख आदरणीय निशा जी मित्तल !

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निशा जी, स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं. निशा जी, राजीव जी, के विचार हर भारतीय को सोचने के लिए विवश करते हैं. लेकिन जो बातें आपने राजीव जी की यहाँ रखी हैं, उनका ये अर्थ निकालना के भारत को पूर्ण आजादी नहीं मिली उचित नहीं होगा. जब कोई व्यक्ति ये दुनिया छोड़ कर जाता है तो उससे पहले वह कोशिश करता है के वो कोई निशानी इस दुनिया में छोड़ जाए. इसका मतलब ये तो नहीं के वो दुबारा हमारे बीच आ जाएगा. इसी प्रकार अंग्रेजों के लिए भारत छोड़ना एक कठिन निर्णय था. ये उनकी भारत में मौत थी. ऊपर जो भी चिंताएं राजीव जी ने रखी हैं वो एक मर चुके शासन की निशानी मात्र हैं. उनके होने और न होने से भारत की स्वतंत्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. भारत सरकार यदि चाहे तो इन्हें कभी भी समाप्त कर सकती है. ये भारत की इच्छाशक्ति के ऊपर है. बेहद विचारणीय लेख के लिए आपको बधाई. "अक्षर" पर भी आपकी प्रतीक्षा रहेगी.

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" इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा और ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा ! " ये बात सही लगती है ! “Bharat that was India ” ये सही वाक्य दर्ज करने के लिए सरकार संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करे ! यथार्थ जानकारी से भरा बहुत विचारणीय लेख ! मैंने भी स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के कई लेख पढ़ें हैं ! वे देश में स्वदेशी भावना का जागरण करने वाले एक बड़े क्रन्तिकारी थे ! देश का दुर्भाग्य है कि उन्हें सरकार द्वारा कोई महत्व नहीं दिया गया ! यदि सरकारी स्तर पर उनकी बात सुनी गई होती तो देश में एक बहुत बड़ी स्वदेशी क्रांति हो गई होती ! ये लेख स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी को एक श्रद्धांजलि अर्पण भी है ! बहुत बहुत धन्यवाद !

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मुझे याद नही आ पा रहा , लेकिन मैंने या तो डिस्कवरी या नेशनल जियोग्राफिक चैनल पर ये प्रोग्राम देखा था ! जैसा की आपने लिखा , जापान पहला देश था जिसने परमानुं बम की विनाशलीला को झेला है ! उसी देश ने अपने आपको कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया है , ये भी गौर करने की बात है ! हिरोशिमा का 6 .7 किलोमीटर का क्षेत्रफल बिलकुल ख़त्म हो गया था इस हमले में ! हालाँकि इसकी बरसी कल ही निकली है , जब जापान के लोगों और वहां के प्रधानमन्त्री ने बारिश में खड़े रहकर इस हमले में मरने वालों के लिओए प्रार्थना करी और १ मिनट का मौन रखा ! उम्मीद करनी चाहिए की ऐसे हमले फिर दुनिया में कहीं न हों लेकिन लगता है की अगर कैसे भी ये हथियार पाकिस्तान के अलगाव वादियों के हाथ लग गए तो क्या होगा ? खैर ! एक अच्छी बात ये भी है कि जापान जैसे शक्ति शाली और आर्थिक रूप से मजबूत देश के साथ भारत के बहुत मजबूत समबन्ध हैं और वहां के राजा ट्वीटर पर केवल तीन लोगों को फॉलो करते हैं - एक अपनी पत्नी , दूसरा जापान का कोई पत्रकार और तीसरा नरेंद्र मोदी !

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रैगिंग को लेकर नकारात्मक माहौल बना दिया गया है आदरणीय निशा जी ! क्यूंकि मैंने इसे देखा है , झेला है , सहा है , यानी मैं इसका भुक्तभोगी हूँ तो समझ सकता हूँ की क्या होता है और कैसे होता है ! हर जगह आपको हर चीज के दो पहलु मिल जाते हैं ऐसे ही रैगिंग के भी दो पहलु हैं , एक स्याह और एक उजला ! स्याह की बात आप कर चुके हैं , उजले पक्ष की बात मैं कर देता हूँ ! रैगिंग से एक दूसरे के प्रति जानकारी बढ़ती है , एक दूसरे के प्रति सीनियर होने के बाद प्यार और सम्मान बढ़ता है , और एक ऐसा रिश्ता बन जाता है जो सगे भाइयों में भी नहीं होता ! एक दूसरे को और समाज को समझने , समस्यों को समझने और उन्हें हल करने के सलीके समझ आते हैं , जिंदगी को समझ पाना आसान हो जाता है ! मेरी जिंदगी के हॉस्टल वाले दिन मुझे आज भी मजबूत बनाये रखते हैं ! और सबसे बड़ी बात , रैगिंग की वजह से ही एक दूसरे से परिचित हुए दोस्त अपने जूनियर्स की नौकरी लगाने में भी सहायक होते हैं !

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आदरणीया निशा मित्तल जी ! सादर अभिनन्दन ! हिरोशिमा और नागासाकी दिवस पर आपने द्वितीय विश्व युद्ध के भयानक विध्वंश की बहुत विस्तृत जानकारी प्रदान की है ! इसके लिए हम सबलोग ह्रदय से आभारी हैं ! आपने सही कहा है कि-"यथार्थ तो यह है कि इस परमाणु आक्रमण के पीछे अमेरिका का उद्देश्य विश्व में स्वयम को सर्वोपरि सिद्ध करते हुए अपनी चौधराहट स्थापित करनी थी." लेख के अंत में आपने आज के समय की सच्चाई बयां की है-"दुर्भाग्य तो यह है कि इतने बड़े विनाश के बाद भी कोई शिक्षा नहीं ली गयी और आज भी विश्व के छोटे -बड़े देश अपनी भूखी नंगी जनता की आवश्यकताओं की कीमत पर परमाणु अस्त्रों के संग्रह में लगे हैं." एक जगह पर मुझे एक छोटी सी त्रुटि लगी-" जापान के 14 अगस्त को पराजय स्वीकार की.लेकिन युद्ध का अंत होते होते मई ने दस्तक दे दी थी.." मेरे पढ़ने में गलती हुई हो तो क्षमा कीजियेगा ! इतने उपयोगी लेख के सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई !

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निशा जी, रैगिंग पर अच्छा लिखा है और आपके सुझाव भी महत्वपूर्ण हैं । वैसे मेरा यह भी मानना है कि यह सब और इस सीमा तक वही बच्चे कर पाते हैं जिन्हें घर से कभी भी सामाजिक संस्कार नही दिए गये । दूसरे बच्चे तो इनका साथ सहपाठी होने के कारण देते हैं ।जिन्हें अपने परिवारों से अच्छी सीख मिली होती है वह एक हद से आगे नही बढ पाते । ऐसे मां-बाप अपने बच्चे को क्या सिखायेंगे जो स्कूल या कालेज मे बच्चे दवारा की गई खराब हरकत का बचाव करने जाते हैं और उल्टा सीधा आरोप कालेज पर ही लगा देते हैं लेकिन अपने ' लाडले ' को कुछ नही कहते आगे चल कर इन परिवारों के बच्चे समाज के लिए परेशानी खडी करते हैं । पैसे का बढता प्रभाव व बद्ले सामाजिक मूल्य इस तरह की समस्याओं को न्योता दे रहे हैं । कानून भी कुछ ऐसे बन रहे हैं जो नई पीढी के लाडलो के पक्ष मे ही जाते हैं ऐसे मे जानते-समझते हुए भी कई लोग बेवजह झंझट से बचना चाहते हैं । जिस देश मे किसी गुरू का अपने शिष्य पर , उसकी भलाई के लिए जरा भी सख्ती करना गैरकानूनी हो उस देश मे यही स्थितियां बनेंगी । ......इस विषय पर लिख्ने के लिए आपको बधाई ।

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

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यमुना जी बड़ा विचित्र सा परिदृश्य है.मीडिया का रोल जितना सकारात्मक होना चाहिए उतना होता नहीं और कभी कभी तो बहुत ही पक्षपात पूर्ण दीखता है कारण चैनल्स की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा .प्रतिस्पर्धा यद्यपि विकास के लिए आवश्यक है परन्तु दुर्भाग्य से यहाँ VAH प्रतिस्पर्धा देखने को नहीं मिलती.दूसरी ओर कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ताओं का पक्षपात पूर्ण रुख.शायद आपको स्मरण होगा की चुनाव से पूर्व आशु तोष जो कि स्वयं एक पार्टी विशेष से जुड़ेहोने के कारण उनका सम्पूर्ण फोकस उसी पार्टी के पक्ष में केंद्रित होता था. विकास संबंधित कार्यों को दिखाना अनुचित मेरे विचार से नहीं ,बशर्ते वो सटीक और यथार्थ पर आधारित हों क्योंकि जिस जनता ने चुना है उसको ज्ञात होना चाहिए कि उनकी आशाएं और आकांक्षाएं किस सीमा तक पूरी हो रही हैं.धन्यवाद

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पढ़ते पढ़ते वापस आपके लेख पर आ गया आदरणीय निशा जी , और कमल जी की प्रतिक्रिया देखि ! कमल जी , मुजफ्फरनगर में जो हुआ बहुत ही सुनियोजित था और बहुत दर्दनाक भी ! ये सिर्फ मुजफ्फर नगर तक सीमित नहीं है , ये बीमारी हिंदुस्तान से लेकर अफगानिस्तान , इराक , लीबिया से लेकर इस्रायल तक है ! हमारे उत्तर प्रदेश की सरकार ने जब अपनी आँखें बंद कर ली हों तब ऐसे लोगों को और भी ज्यादा प्रोत्साहन मिलता है ! मैं सहमत हूँ आपसे की नरेंद्र मोदी को भारत की जनता ने पूर्ण बहुमत भारत में बदलाव के लिए दिया है लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नजर नहीं आता , फिर भी मैं भरोसे के साथ कह सकता हूँ की पांच साल बाद जब उनकी सरकार की विवेचना होगी तब शायद मनमोहन सरकार की तरह आपको और मुझे निराशा नहीं होगी !

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आदरणीय कमल त्यागी जी ,आपकी सहमति हेतु आभारी हूँ ,आपका आक्रोश आपकी पीड़ा को अभिव्यक्त करता है .निश्चित रूप से जहाँ आशा अधिक होती है,अपेक्षाएं बढ़ती हैं और अपेक्षा पूर्ण होने पर आक्रोश उपजता है.मेरा विश्वास तो भंग नहीं हुआ ,क्योंकि मेरा मानना है कि शायद मोदी जी कहीं दूर की सोच रहे हों जहाँ तक मेरी बुद्धि की पहुँच न हो,क्योंकि जो व्यक्ति इतनी बड़ी बाज़ी जीत सकता है ,वो आम जनता जिन्होंने उनको सर आँखों पर बैठाया उनकी चिंता से वो परिचित हों ऐसा संभवतः नहीं होगा. हाँ इतना अवश्य है कि दीर्घ कालीन योजनाओं को पूर्ण करने में समय लगेगा अवश्य लेकिन जो समस्याएं तुरंत एक्शन लेने की और एक कड़ा सन्देश देने की हैं उन पर कार्यवाही और कार्यवाही का प्रयास परमावश्यक है.आपका आभार,हमारी आपकी सभी की आकांक्षाएं पूर्ण हों ऐसी पर्भु से प्रार्थना

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ये न्यूज़ आर्टिकल जिस भी महान लेखिका ने लिखा है मैं उनकी उच्च सराहना करता हूँ जिन्होंने इतनी अच्छी बात इतने शालीन तरीके से कही है मैं यहाँ उल्लेख करना चाहता हूँ कि मैं खुद बचपन से भाजपा का अनन्य जन्मजात समर्थक रहा हूँ जबकि मैं कोई राजनैतिक व्यक्ति नही हूँ बल्कि अपने देश में कांग्रेस और उससे उत्पन्न उसी तरह की मुस्लिम तुस्टीकरण राजनीति करने वाली पार्टियों से मैं व्यथित था इसलिए राष्ट्रवादी भाजपा मुझे पसंद थी पर अब तो यही पार्टी पूर्ण बहुमत में राष्ट्र की केंद्रीय सत्ता पर विराजमान है उसमें भी नरेंद्र मोदी स्वयं प्रधानमंत्री है तब फिर आखिर क्या समस्या है उस नीच पाकिस्तान और चीन के क्या हिम्मत जो आज और ऐसी मजबूत परिस्थितियों में भी मेरे देश मेरे भारत पर बुरी नजर से देख रहें हैं उस हराम देश ने मेरे ही देश के सैनिको को बिना किसी पूर्व मन मुटाव के बिना कोई युद्धः छेड़े कैसे सियारों की तरह मार दिया और फिर कैसे मेरे प्रिय भारतवर्ष के ताकतवर प्रधानमंत्री अचानक कमजोर बन गए जो ऐसे आक्रांता को दंड नही दिया इस लेख को पढ़ने वाले कृपया विशिष्ट ध्यान दे मैं उसी मुज़फ्फरनगर का रहने वाला हूँ जहाँ के कवाल गांव में इसी तरह की मानसिकता से प्रेरित होकर उद्दंड मुसलामानों ने जाटों के लड़कियों के हाथ पकड़ कर छेड़खानी की कोशिश की थी याद रहे की मुज़फ्फरनगर लोकसभा सीट से भाजपा २०१४ से पहले इतने विशाल अंतर नही जीती है जितनी की इस बार २०१४ के आम चुनाव में जबकि खुद मेरी माँ भी एक स्त्री होते हुए दो वोट डालकर आई थी लेकिन देश की इससे अधिक परम दुर्भाग्य और क्या होगा कि अब तो इस देश को मुज़फ्फरनगर दंगों से पीड़ित हिन्दुओं को उनके हे देश में न्याय नही मिला अब तो बेचारे हिन्दुओं को भगवान कृष्णा ही बचा सकते है जिन्होंने अकेले अपने समय पर शक्तिशाली कौरवो को अनीति का पालन करने का दंड दिया था हे मेरे प्रभु श्री कृष्ण यदि मैंने आपकी सच्ची भक्ति के हो ,यदि मैं सच्चा भारतवासी हूँ और यदि मैं सच्चा हिन्दू हूँ तो प्रभु रक्षा करो जिस देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा जैसी पूर्ण राष्ट्रवादी पार्टी और संगठन हों उस पर भी वही पार्टी जब पूर्ण बहुमत के साथ केंद्रीय नेतृत्व में हो और तब भी उस देश उस जगद्गुरु भारतवर्ष में ऐसा हो तब तो स्वयं भगवांन ही एकमात्र रक्षक हैं. धन्यवाद कथन- मैं साहसी लेखिका सहित समस्त दैनिक जागरण टीम को भी विशिष्ट साधुवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने इतना क्रांतिकारी आर्टिकल अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया.फिलहाल मैं आपके इस अभिनंदनीय लेख पर प्रतिक्रिया स्वरूप अपना ये सन्देश भेज रहा हूँ.मेरा दैनिक जागरण की समस्त सम्मानित टीम से सविनय विनम्र निवेदन है कि आप राष्ट्रहित में भारतमाता की पुकार पर मेरे इस सन्देश एवं प्रतिक्रिया को कृपा करके अपनी वेबसाइट और आपके सम्मानित समाचार पत्र में अवश्य निकालें.आपके अति कृपा होगी. विशिष्ट अनुरोध- समस्त सम्माननीय पाठकगणों ये उपरोक्त सन्देश इ-मेल मैं कॉपी पेस्ट करके भाजपा ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दाल को उनके आधिकारिक इ-मेल आई डी पर भेज रहा हूँ यदि आज इस सन्देश को भी पढ कर भाजपा और संघ नही चेता तो फिर इस देश में मैं या सम्बंधित लेख की लेखिका श्रीमती निशा मित्तल जी तो क्या कोई भी राष्ट्रवादी भाजपा को वोट नही देगा.क्योंकि भाजपा की आलावा तो हमारे देश में कोई पूर्ण राष्ट्रवादी पार्टी है ही नही और जब भाजपा से लोई कुछ नही बोला तो कोई दूसरा क्यों कुछ कहेगा.उत्तराखंड की विधान सभा के हालिया उपचुनाव भाजपा के लिए खतरे के जबरदस्त घंटी हैं क्योंकि यहाँ हिन्दू जनाधिक्य है अगर यहाँ भी पार्टी ऐसा प्रदर्शन करेगी तो उत्तर प्रदेश आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में क्या होगा मेरा सविनय आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया विचार करें. धन्यवाद. आपका, कमल त्यागी. यदि इस सन्देश को पढने वाले कोई भी सम्मानित पाठकगण मुझसे संपर्क करना चाहते हों तो कृपया संपर्क करें- फ़ोन नंबर- 08532809719,09152265559. मेरी इ-मेल आई डी-त्यागी.कमल१९०@जीमेल.com

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आदरणीया निशा जी, यह पत्र अत्यंत आवश्यक, समय- सापेक्ष और उपयुक्त है | यह देश की दशा के अनुसार पूर्णत: संवेदनात्मक, आशा-निराशा के अनुरूप भावों-विचारों, तथ्यों आदि का संवाहक तथा मर्मवेधी है | गंगा-आरती का जैसा जलवा विभिन्न चैनलों से प्रसारित किया गया था और वादों आदि से जैसा लगा था कि कम-से-कम महिलाओं के साथ दुराचार-बलात्कार, आम सड़कों पर चोरी-छिनताई, देश के भीतर आतंकवादियों का नंगा नाच, सीमा पर पाकिस्तान और चीन की दादागीरी, बढ़ती महंगाई आदि पर काफी-कुछ अंकुश लग जाएगा, वैसा कुछ नहीं हुआ और नकारात्मक शक्तियाँ अपने-अपने धंधे में उसी तरह सक्रिय हैं | ... पीड़ित-लाचार जनता के दर्द-आह भरे संदेशों को बेहतरीन तरीके से इस चिट्ठी में व्यक्त करने के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

माँ-बहिने पूर्व की भांति असुरक्षित ही हैं .आपकी सरकार से उनको जिन तारणहार कृष्ण की आशा थी ,वहा कोई भी कृष्ण नहीं, धृतराष्ट्र से भी बढ़कर गांधारी के समान अपनी आँखों पर पट्टी बाधें हैं,इतना ही नहीं उनकी तो वाणी को भी सत्ता की शहद मलाई ने चिपका दिया है, किसी के पास इतना समय ही नहीं कि पीड़ितों से मिल सके ,उनके घावों पर मरहम लगा सके यहाँ तक कि दो बोल भी बोल सके .उन नेताओं को सबक सीखा सकें जो कहते हैं उत्तरप्रदेश में बलात्कार कम होते हैं.बहुत कुछ है कहने को , आदरणीय निशा जी मित्तल ! लेकिन लोग रोक देते हैं की बदलाव जरूर आएगा , थोड़ा इंतज़ार करो ! हथेली पर सरसों नही उगाई जा सकती , सच बात है ! उम्मीद मुझे भी है और दिल के किसी कोने में आपके और अन्य लोगों के भी ये बात है की मोदी कुछ करेगा जरूर लेकिन कुछ ऐसे विषय हैं , जीनो आपने भी उठाया है , जहां तत्काल निर्णय लिए जाने चाहिए जैसे महिला सुरक्षा और महंगाई ! ठीक बात है की हमें एटॉमिक एनर्जी की जरुरत है लेकिन ये लम्बे वक्त की योजना है , ठीक है हमें आर्थिक स्थिति सुधारनी है लेकिन अभी ये भी लम्बी अवधि की बात है , तो जो काम समय में किया जा सकता है , उसे करना ही चाहिए ! सैम सामायिक और सभी लोगों की चिंताओं को शामिल करता बेहतरीन आलेख !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीया, सादर अभिवादन! आपने सब के मन की बात कह दी है ...आशा है सोसल मीडिया को महत्व देने वाले प्रधान मंत्री इस तरह के आलेखों, टिप्पणियों पर ध्यान देते होंगे या विदेश यात्रा में अपने सूट बूट का प्रभाव जमाने में कामयाबी दिखला रहे होने. ब्रिक्स बैंक की स्थापना, और विश्व बैंक से कर्ज तो मिले ही हैं. स्विस बैंक से कालाधन तो आने से रहा.. कल भाजपा के ही सांसद निशिकांत दुबे ने सांसद में वित्त मंत्री के सामने ही खुलासा कर दिया. धर्म के नाम पर विद्वेष फ़ैलाने की कोशिशें जारी है ...जनता तो हमेशा से ठगी जाती रही है, यह कोई पहली बार तो नहीं हुआ है... योगी जी के साथ आपका भी आक्रोश झलका है, और झलकना/छलकना भी चाहिए. ..सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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बलात्‍कार जैसे घृणित कृत्‍यों के अपराधियों को कठोर से कठोर और जल्‍दी से जल्‍दी सजा मिलनी चाहिए, ऐसे घृणित कार्य करने वालो को फांसी की सजा आम चौराहों पर देनी चाहिए, साथ ही महिलाओं को आत्मनिर्भरता और साहस के साथ ऐसे दुराचारियों को सामना करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए, कि ऐसे खतरों का सामना वो स्वयं कर सकें, तथा महिलाओं को भी डटकर उनका विरोध करना चाहिए, किसी व्‍यक्ति द्वारा ऐसे अपराधियों को बिलकुल भी सहयोग नहीं करना चाहिए फिर चाहे वो कोई भी रिश्‍तेदार ही क्‍यों न हो। कभी कभी आरोप मिथ्‍या भी लगते हैं, ऐसी परिस्थ्‍ितियों में उनको भी सजा मिलनी चाहिए । साथ ही बच्‍चो को सकारात्मक संस्कार भी दिए जाएँ ।

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रश्न उत्पन्न होता है कि धार्मिक आस्था से जुड़े इस पर्व और यात्रा को मनाने के लिए क्या व्यस्थाएं की जाएँ कि कठिनाई से राहत मिले और जनजीवन भी ठप्प न हो.मेरे विचार से एक निर्धारित मार्ग कांवड़ यात्रा के लिए होना चाहिए(यद्यपि प्रतिवर्ष ऐसी घोषणा की जाती है की जाती है),केवल उसी मार्ग से उनके जाने की यदि व्यवस्था रहेगी तो जन सामान्य को तो कठिनाई से बचाया जा सकता है,स्कूल ,कालेज बंद होने के कारण विद्यार्थियों की पढाई में व्यवधान से भी बचा जा सकता है. स्थान स्थान पर चैकिंग की व्यवस्था से असमाजिक तथा आतंकवादी गतिविधियों से भी रक्षा हो सकती है.गत वर्ष समाचार पत्र से पता चला था कि मेरठ के किसी व्यवसायी को २ करोड़ रु का प्रस्ताव ईरान से दिया गया है बम विस्फोट कराने के लिए.निश्चित रूप से लाखों लोगों की भावना से जुड़े इस आयोजन में बाधा डालकर रक्त रंजित होली खेलने के इन कुत्सित मंसूबों को ध्वस्त किया जाना जरूरी है. बहुत से लोग विदेशों से पैसे लेकर भारतीय संस्कृति को ख़त्म करने और मुगलिया संस्कृति को लागू करने के लिए तैयार बैठे हैं , लेकिन हज़ारों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को , जब ये अब तक नहीं ख़त्म कर सके तो अब तो हम और भी ज्यादा ताकतवर , समझदार और हिम्मत वाले हो गए हैं , अब इनका कोई मंसूबा काम नहीं करने वाला ! बहुत ही ज्ञानवर्धक और विस्तृत लेखन ! इसमें मुझे लगता है , झारखण्ड के देवघर की भी चर्चा होती तो और भी ज्यादा बेहतर होता !

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आदरणीया, आपने दोनों पक्ष को रक्खा है. मुझे भी भगवान भोले बाबा में आस्था है. भोलेनाथ और उनके अंशावतार हनुमान जी बहुत जल्दी प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मुराद पूरी करते हैं ऐसी आस्था हम सबके मन में रहती है.श्रावण मास के चुनाव के प्रति वैज्ञानिक और पर्यावरण भी हो सकते हैं ...मैदानी इलाके में शिवालयों में जाने में उतनी कठिनाई नहीं है पर केदार नाथ का पिछले साल हादशा ह्रदय विदारक था. इस साल भी अति बृष्टि से भूस्खलन हो रहा है ...बाबा रामदेव भी अपने शिष्यों के साथ फंसे हैं...हदशों से कुछ तो सबक लेनी चाहिए.भगवान सर्वत्र विराजमान हैं मंदिरों की भी कमी नहीं है ...और ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता सावधानी जरूरी है असामाजिक तत्व हर जगह विराजमान रहते हैं.... आप हर समय और दिन के अनुसार अच्छे आलेख प्रस्तुत करती रही हैं ...आगे भी अवश्य लिखेंगी और हम सबका ज्ञान वर्धन करती रहेंगी. सादर ...जय भोलेनाथ!

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, प्रिय हाय यह तुम बैठक खुशी है, मैं एन बेन हूँ, मैं अमेरिका के संयुक्त राज्य से, एक संयुक्त राज्य सेना अधिकारी हूँ सहायक और देखभाल कर रहा हूँ, एक अच्छा दोस्त पाने के लिए इंतजार कर रही है, मेरी निजी ईमेल बॉक्स के माध्यम से हमारी बातचीत जारी है कृपया, यहाँ मेरा ईमेल पता (annben1@hotmail.com) मैं अपने आप को बेहतर शुरू करने और मैं आपके मेल प्राप्त होते ही मेरी तस्वीर भेज देंगे. , मैं आप के साथ संपर्क में आते हैं और मैं वास्तव में कारण मेरा कर्तव्य तुम्हारा की हालत को मेल लिखने के लिए मैं हमेशा उपलब्ध नहीं हूँ, हालांकि मेरी रुचि इंगित करने के लिए इच्छा एन. Hi dear, It is my pleasure meeting you, I am Ann Ben, I am a United State Army officer, from united state of America, am supportive and caring, looking forward to get a nice friend,Please let continue our conversation through my private email box, Here is my email address ( annben1@hotmail.com ) I will introduce myself better and send you my picture as soon as i receive your mail. I come in contact with you and I really wish to indicate my interest although i'm not always available to write mail due to the condition of my duty Yours, Ann.

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"ढोर गवार शुद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी।" तुलसी दास जी द्वारा रचित इस पंक्ति का भावार्थ क्या है मित्रो ? कभी इस पर गौर किया है किसी ने ? अक्सर अच्छे अच्छे विद्वानो को हमने इस पंक्ति की व्याख्या करते हुए सुना है और तुलसीदास जी हवाला दे कर नारी को ताड़ना देने का पक्ष लेते हुए वो नारी को भी सिर्फ एक विषय भोग कि वस्तु प्रमाणित करते है । किन्तु क्या आप सोचते है कि तुलसीदास जी इतने गिरे हुए विचारो के हो सकते हैं ? जिनहोने रामायण मे सीता माँ, सुलोचना , मंदोदरी, तारा इत्यादि नारियो को महान बताते हुए इन्हे प्रातः स्मरणीय बताया है वो तुलसीदास जी नारी का ऐसा अपमान कैसे कर सकते है ? तो मित्रो यहा गलती तुलसीदास जी कि नहीं है, गलती है गलत अर्थ लगाने वालों की, स्वयं कि संकीर्ण विचारधारा को विद्वानो के मत्थे मढ़ने वालों की। अब आपको मई इसका सटीक अर्थ बताता हूँ : "ढोर गवार शुद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी।" 1) इस मे ढ़ोर का अर्थ है ढ़ोल, बजने वाला ढ़ोल । ढ़ोल को बजाने से पहले उसको कसना पड़ता है तभी उसमे ध्वनि मधुर बजेगी । यहा ताड़ना शब्द का अर्थ कठोरता से है ना कि मारना या पीटना से है। 2) इसके बाद है "गँवार शूद्र" । यहा गंवार और शूद्र अलग अलग नहीं है, ये एक साथ है। अर्थात ऐसा शूद्र जो गंवार हो जो सभ्य नहीं हो । ऐसे गंवार सेवक को कठोरता से काम मे लेना चाहिए वरना वो अपनी दुर्बुद्दि से कार्य को बिगाड़ सकता है । यहा भी ताड़ना शब्द का अर्थ कठोर व्यवहार से है ना कि मारना या पीटना से है। 2) पशु नारी: अर्थात वो नारी जो पशुवत व्यवहार करती है, पशुवत व्यवहार मे व्याभिचार भी आता है क्यो कि पशुओ मे रिश्तो कि कोई मर्यादा नहीं होती है । सो ऐसी नारी जो पशुओ के समान कई लोगो से संबंध रखती है । ऐसी नारी से भी कठोर व्यवहार करना चाहिए एवं उसे समाज से दूर रखना चाहिए ताकि वो समाज को गंदा न कर सके। तो मित्रो यहा 3 ही चीजे है 5 नहीं । अगर इन्हे 5 मानते है तो एक बात सोचिए जो धर्म हर प्राणी के प्रति दया की भावना रखने कि शिक्षा देता है वो पशुओ को मारने या ताड़ना देने की बात कैसे कर सकता है ? किसी गंवार को सिर्फ इसलिए कि उसमे ज्ञान नहीं है उसे ताड़ना कैसे दे सकता है ? शूद्र का अर्थ यहा सेवक से है ना कि शूद्र जाती से । शूद्र सेवा करने वालों को ही कहा जाता है । और सेवक मे भी वो सेवक जो गंवार हो उस से कठोर व्यवहार करना । पशु का यहा नारी के साथ प्रयोग किया गया है सो अलग करने पर अर्थ गलत हो जाता है । न तो पशु और न ही नारी किसी ताड़ना कि अधिकारी है । पशुवत व्यवहार करने वाली नारी ताड़ना कि अधिकारी है ।

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मजदूर दिवस मनाने की परम्परा का प्रारम्भ संयुक्त राज्य अमेरिका से हुआ जब वहां 1866 में ये मांग रखी गयी कि मजदूरों के कार्य करने के घंटे 8 (प्रतिदिन)से अधिक न हों,क्योंकि मजदूरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है.धीरे धीरे ये आन्दोलन सम्पूर्ण अमेरिका में फैलता गया.1886 में शिकागो में मजदूरों ने व्यापक रूप से प्रदर्शन किया.प्रदर्शन में नारों के कारण बौखलाई वहां की सरकार ने दमन चक्र चला दिया ,परिणाम स्वरूप 6 मजदूर मर गये और लगभग 40 मजदूर घायल हो गये.इस रक्तपात ने मजदूरों को जोश से परिपूरित कर दिया और एक कपडे को इसी रक्त से लाल बनाकर ध्वज के रूप में मान लिया ,तभी से मजदूरों के संगठनों के झंडे लाल होते हैं ! सुन्दर जानकारी देता लेख ! आदरणीय निशा जी मित्तल , ये दिवस सिर्फ मनाने के लिए होते हैं कुछ देने के लिए नहीं , कुछ सार्थक करने के लिए नहीं ! एक बेहतरीन लेख देने के लिए बधाई आपको ! उम्मीद है अब जागरण सुधर रहा है , आपके लेख निरंतर पढ़ने को मिलेंगे !

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पूरा आलेख पढ़ा ... सरदार पूर्ण सिंह का निबंध अपनी पाठ्यपुस्तक में मैंने भी पढ़ी थी. एक शिकायत मुझे तथाकथित नेताओं से है जो वोट के लिए दिनरात प्रयत्नशील बड़े नेताओं के मुख से दो शब्द न सुनकर थोड़ी निराशा हुई...लगता है, उन्हें मजदूरों का मत नहीं चाहिए स्थानीय ट्रेड यूनियन के नेताओं का ही निराशाजनक बयान पढ़ा......मेरे विचार से अगर हर हाथ को काम और उचित मजदूरी मिल जाय तो नक्सल समस्या अपने आप समाप्त हो जाएगी क्योंकि जो युवक बेरोजगार और निराश होते हैं वही नक्सल बन जाते हैं ऐसा मेरा मानना है ...खनिज और वन सम्पदा से भरपूर इलाके के लोगों का उचित विकास नहीं होने के कारन ही वे नक्सल बन जाते हैंगलत लोगों बहकावे में आकर!

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के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

(राष्ट्र निर्माण में महिलाओं का योगदान) . जब भारतीय ऋषियों ने अथर्ववेद में ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ (अर्थात भूमि मेरी माता है और हम इस धरा के पुत्र हैं।) की प्रतिष्ठा की तभी सम्पूर्ण विश्व में नारी-महिमा का उद्घोष हो गया था। नेपोलियन बोनापार्ट ने नारी की महत्ता को बताते हुए कहा था कि -‘‘ मुझे एक योग्य माता दे दो, मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूँगा।’’ भारतीय जन-जीवन की मूल धुरी नारी (माता) है। यदि यह कहा जाय कि संस्कृति, परम्परा या धरोहर नारी के कारण ही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती रही है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब-जब समाज में जड़ता आयी है नारी शक्ति ने ही उसे जगाने के लिए, उससे जूझने के लिए अपनी सन्तति को तैयार करके, आगे बढ़ने का संकल्प दिया है। कौन भूल सकता है माता जीजाबाई को, जिसकी शिक्षा-दीक्षा ने शिवाजी को महान देशभक्त और कुशल योद्धा बनाया। कौन भूल सकता है पन्ना धाय के बलिदान को पन्नाधाय का उत्कृष्ट त्याग एवं आदर्श इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वह उच्च कोटि की कत्र्तव्य परायणता थी। अपने बच्चे का बलिदान देकर राजकुमार का जीवन बचाना सामान्य कार्य नहीं। हाड़ी रानी के त्याग एवं बलिदान की कहानी तो भारत के घर-घर में गायी जाती है। रानी लक्ष्मीबाई, रजिया सुल्ताना, पद्मिनी और मीरा के शौर्य एवं जौहर एवं भक्ति ने मध्यकाल की विकट परिस्थितियों में भी अपनी सुकीर्ति का झण्डा फहराया। कैसे कोई स्मरण न करे उस विद्यावती का जिसका पुत्र फाँसी के तख्ते पर खड़ा था और माँ की आँखों में आँसू देखकर पत्रकारों ने पूछा कि एक शहीद की माँ होकर आप रो रही हैं तो विद्यावती का उत्तर था कि ‘‘ मैं अपने पुत्र की शहीदी पर नहीं रो रही, कदाचित् अपनी कोख पर रो रही हूँ कि काश मेरी कोख ने एक और भगत सिंह पैदा किया होता, तो मैं उसे भी देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर देती।’’ ऐसा था भारतीय माताओं का आदर्श। ऐसी थी उनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा। परिवार के केन्द्र में नारी है। परिवार के सारे घटक उसी के चतुर्दिक घूमते हैं, वहीं पोषण पाते हैं और विश्राम। वही सबको एक माला में पिरोये रखने का प्रयास करती है। किसी भी समाज का स्वरूप वहाँ की नारी की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि उसकी स्थिति सुदृढ़ एवं सम्मानजनक है तो समाज भी सुदृढ़ एवं मजबूत होगा। भारतीय महिला सृष्टि के आरंभ से अनन्त गुणों की आगार रही है। पृथ्वी की सी सहनशीलता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र की गम्भीरता, पुष्पों जैसा मोहक सौन्दर्य, कोमलता और चन्द्रमा जैसी शीतलता महिला में विद्यमान है। वह दया, करूणा, ममता, सहिष्णुता और प्रेम की पवित्र मूर्ति है। नारी का त्याग और बलिदान भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है। बाल्यावस्था से लेकर मृत्युपर्यन्त वह हमारी संरक्षिका बनी रहती है । सीता, सावित्री, गार्गी, मैत्रेयी जैसी महान् नारियों ने इस देश को अलंकृत किया है। निश्चित ही महिला इस सृष्टि की सबसे सुन्दर कृति तो है ही, साथ ही एक समर्थ अस्तित्व भी है। वह जननी है, अतः मातृत्व महिमा से मंडित है। वह सहचरी है, इसलिए अद्र्धांगिनी के सौभाग्य से शृंगारित है। वह गृहस्वामिनी है, इसलिए अन्नपूर्णा के ऐश्वर्य से अलंकृत है। वह शिशु की प्रथम शिक्षिका है, इसलिए गुरु की गरिमा से गौरवान्वित है। महिला घर, समाज और राष्ट्र का आदर्श है। कोई पुण्य कार्य, यज्ञ, अनुष्ठान, निर्माण आदि महिला के बिना पूर्ण नहीं होता है। सशक्त महिला सशक्त समाज की आधारशिला है। महिला सृष्टि का उत्सव, मानव की जननी, बालक की पहली गुरु तथा पुरूष की प्रेरणा है। यदि महिला को श्रद्धा की भावना अर्पित की जाए तो वह विश्व के कण-कण को स्वर्गिक भावनाओं से ओतप्रोत कर सकती है। महिला एक सनातन शक्ति है। वह आदिकाल से उन सामाजिक दायित्वों को अपने कन्धों पर उठाए आ रही है, जिन्हंे अगर पुरुषों के कन्धे पर डाल दिया गया होता, तो वह कब का लड़खड़ा गया होता। पुरातन कालीन भारत में महिलाओं को उच्च स्थान प्राप्त था। पुरूषों के समान ही उन्हें सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक कृत्यों में भाग लेने का अधिकार था। वे रणक्षेत्र में भी पति को सहयोग देती थी। देवासुर संग्राम में कैकेयी ने अपने अद्वितीय रणकौशल से महाराज दशरथ को चकित कर दिया था। याज्ञवल्क्य की सहधर्मिणी गार्गी ने आध्यात्मिक धन के समक्ष सांसारिक धन तुच्छ है, सिद्ध करके समाज में अपना आदरणीय स्थान प्राप्त किया था। विद्योत्तमा की भूमिका सराहनीय है, जिसने कालिदास को संस्कृत का प्रकाण्ड पंडित बनाने में सफलता प्राप्त की। तुलसीदास जी के जीवन को आध्यात्मिक चेतना देने में उनकी पत्नी का ही बुद्धि चातुर्य था। मिथिला के महापंडित मंडनमिश्र की धर्मपत्नी विदुषी भारती ने शंकराचार्य जैसे महाज्ञानी व्यक्तित्व को भी शास्त्रार्थ में पराजित किया था। लेकिन चूँकि भारत के अस्सी प्रतिशत से अधिक तथाकथित विद्वान गौतमबुद्धोत्तरकालीन भारत को ही जानते पहचानते हैं और उनमें भी प्रतिष्ठा की धुरी पर बैठे लोग, पाश्चात्य विद्वानों द्वारा अंग्रेजी में लिखे गं्रथों से ही, भारत का अनुभव एवं मूल्यांकन करते हैं, अतः नारी विषयक आर्ष-अवधारणा तक वे पहुँच ही नहीं पाते। उन्हें केवल वह नारी दिखाई पड़ती है जिसे देवदासी बनने को बाध्य किया जाता था, जो नगरवधू बनती थी अथवा विषकन्या के रूप में प्रयुक्त की जाती थी। महिमामयी नारी के इन संकीर्ण रूपों से इंकार तो नहीं किया जा सकता। परंतु हमें यह समझना चाहिए कि वे नारी के संकटकालीन रूप थे, शाश्वत नहीं । हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि रोमन साम्राज्य (इसाई जगत, इस्लाम जगत) तथा अन्यान्य प्राचीन संस्कृतियों में नारी की जो अवमानना, दुर्दशा एवं लांछना हुई है- जिसके प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध हैं, वैसा भारतवर्ष मंे कम से कम, मालवेश्वर भोजदेव के शासन काल तक कभी नहीं हुआ। इस्लामिक आक्रमणों के अनन्तर भारत का सारा परिदृश्य ही बदल गया। मलिक काफूर, अलाउद्दीन तथा औरंगजेब-सरीखे आततायियों ने तो मनुष्यता की परिभाषा को ही झुठला दिया। सल्तनत-काल के इसी नैतिकता-विहीन वातावरण में नारियों के साथ भी अपरिमित अत्याचार हुए। उसके पास विजेता की भोग्या बन जाने अथवा आत्मघात कर लेने के अतिरिक्त और उपाय ही क्या था? फलतः असहाय नारियाँ आक्रांताओं की भोग्या बनती रही। लेकिन यह ध्यान रहे कि यह भारत की पराधीनता के काल थे, स्वाधीनता के नहीं। अब हम स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड को देखें तो हम देखते हैं कि भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में महिलाओं ने जितनी बड़ी संख्या में भाग लिया, उससे सिद्ध होता है कि समय आने पर महिलाएँ प्रेम की पुकार को विद्रोह की हुंकार में तब्दील कर राष्ट्रीय अखण्डता को अक्षुण्ण बनाने में अपना सर्वस्व समर्पित कर सकती हैं। रानी लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू, मादाम भिखाजी कामा, अरुणा आसफ अली, एनी-बेसेन्ट, भगिनी निवेदिता, सुचेता कृपलानी, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, दुर्गा भाभी एवं क्रांतिकारियों को सहयोग देने वाली अनेक महिलाएँ भारत में अवतरित हुईं, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इतिहास साक्षी है जब-जब समाज या राष्ट्र ने नारी को अवसर तथा अधिकार दिया है, तब-तब नारी ने विश्व के समक्ष श्रेष्ठ उदाहरण ही प्रस्तुत किया है। मैत्रेयी, गार्गी, विश्ववारा, घोषा, अपाला, विदुषी भारती आदि विदुषी स्त्रियाँ शिक्षा के क्षेत्र में अपने बहुमूल्य योगदान के लिए आज भी पूजनीय हैं। आधुनिक काल में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम आदि स्त्रियों ने साहित्य तथा राष्ट्र की प्रगति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। कला के क्षेत्र में लता मंगेश्कर, देविका रानी, वैजयन्ती माला, सोनाल मानसिंह आदि का योगदान वास्तव मे प्रशंसनीय है। वर्तमान में महिलाएँ समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र-उत्थान के अनेक कार्यों में लगी हैं। महिलाओं ने अपनी कर्तव्य परायणता से यह सिद्ध किया है कि वे किसी भी स्तर पर पुरूषों से कम नहीं हैं। बल्कि उन्होंने तो राष्ट्र निर्माण में अपनी श्रेष्ठता ही प्रदर्शित की है। शारीरिक एवं मानसिक कोमलता के कारण महिलाओं को रक्षा सम्बन्धी सेवाओं के उपयुक्त नहीं माना जाता था, किंतु भारत की पहली महिला ‘आई0पी0एस0’ श्रीमती किरण बेदी ने ही अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया। अत्यंत ही हर्ष का विषय है, कि अब महिला जगत का बहुत बड़ा भाग अपनी संवादहीनता, भीरूता एवं संकोचशीलता से मुक्त होकर सुदृढ़ समाज के सृजन में अपनी भागीदारी के लिए प्रस्तुत है। समस्त सामाजिक संदर्भों से जुड़ी महिलाओं की सक्रियता को अब न केवल पुरूष वरन् परिवार, समाज एवं राष्ट्र ने भी सगर्व स्वीकारा है। वर्तमान में नारी शक्ति का फैलाव इतना घनीभूत हो गया है कि कोई भी क्षेत्र इनके सम्पर्क से अछूता नहीं है। आज नारी पुरूषों के समान ही सुशिक्षित, सक्षम एवं सफल है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, साहित्य, चिकित्सा, सेना, पुलिस, प्रशासन, व्यापार, समाज सुधार, पत्रकारिता, मीडिया एवं कला का क्षेत्र हो, नारी की उपस्थिति, योग्यता एवं उपलब्धियाँ स्वयं अपना प्रत्यक्ष परिचय प्रस्तुत कर रही है। घर परिवार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक उसकी कृति पताका लहरा रही है। दोहरे दायित्वों से लदी महिलाओं ने अपनी दोगुनी शक्ति का प्रदर्शन कर सिद्ध कर दिया है कि समाज की उन्नति आज केवल पुरूषों के कन्धे पर नहीं, अपितु उनके हाथों का सहारा लेकर भी ऊँचाईयों की ओर अग्रसर होती है। उन्नत राष्ट्र की कल्पना तभी यथार्थ का रूप धारण कर सकती है, जब महिला सशक्त होकर राष्ट्र को सशक्त करें। महिला स्वयं सिद्धा है, वह गुणों की सम्पदा हैं। आवश्यकता है इन शक्तियों को महज प्रोत्साहन देने की। यही समय की माँग है। नाम -गुंजेश गौतम झा राजनीति विज्ञान विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी- 221005, उ0 प्र0 सम्पर्क:- 09026028080

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