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श्राद्ध मनाना ढकोसला नहीं.i

Posted On: 19 Sep, 2010 Others में

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श्रद्धा के पर्व श्राद्ध का आगमन हो रहा है.भाद्रपद माह की पूर्णिमा (आश्विन माह की प्रतिपदा )से श्राद्ध प्रारंभ होते हैं,तथा आश्विन की अमावस्या को श्राद्ध समाप्त हो जाते हैं.यद्यपि श्राद्ध को लेकर विभिन्न मत हैं,परन्तु किसी ना किसी रूप में श्राद्ध मानाने की परम्परा हिन्दू समाज में विद्यमान है.हमारे शास्त्रों में श्राद्ध का उल्लेख है.मान्यता है कि इन दिवसों में हमारे पूर्वज हमसे (उनके प्रति )श्रद्धा कि आशा रखते हैं. इसी आधार पर जिन आदरणीय का शरीरांत जिस तिथी को हुआ था उसी दिन किसी ब्राहमण को भोजन करा दान दक्षिणा दी जाती है
इन समस्त कार्यों को करना शास्त्र के अनुरूप है,तथा मानने वाले यथाशक्ति संपन्न करते हैं.मेरे विचार से अपने पूर्वजों का स्मरण करना कोई ढकोसला नहीं माना जाना चाहिए.यूँ तो वर्ष में कभी भी स्मरण किया जा सकता है परन्तु व्यस्तता के कारण संभवता ये व्यवस्था कि गयी होगी.हाँ स्मरणीय तथ्य ये है कि हम पूर्वजों कि स्मृति बनाये रखने के लिए भोजन या दान आदि सत्पात्रों को भी यथाशक्ति दे सकें तो अधिक अच्छा होगा.इसी प्रकार उनके श्रेष्ट विचारों को क्रियान्वित कर हम उनके प्रति श्रध्हा सुमन अर्पित कर सकते हैं.और इस सबसे महत्वपूर्ण ये है कि उनके जीवन काल में उनका यथोचित सेवा,सत्कार कर हम उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे.प्राय परिवारों में (अपवाद को छोड़ दें)बुजुर्गों के जीवन काल में उनकी अवहेलना होती है तथा मरणोपरांत उनके पसंद का भोजन बना ,वस्त्रादि का दान दिया जाता है.मेरे विचार से यदि उनके जीवन काल में भी उनको सम्मान मिले तो उनकी आत्मा अधिक प्रसन्न होगी साथ ही आगामी पीढी भी शिक्षा ग्रहण करेगी. अन्यथा’ पेड़ बोये बबूल के आम कहाँ से खाएं” वाली कहावत चरितार्थ होती है.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

samta gupta kota के द्वारा
September 20, 2010

निशा जी,श्राद्ध ढकोसला कतई नहीं है,मगर अपने बुजुर्गों को हम जीते जी भी पर्याप्त सम्मान दें यही हमारी परंपरा भी रही है,भले ही बढ़ती भौतिकवादी सोच ने इसमें कमी की हो, अच्छा लेख बधाई,

Ramesh bajpai के द्वारा
September 19, 2010

निशा जी ……. ..इन समस्त कार्यों को करना शास्त्र के अनुरूप है,तथा मानने वाले यथाशक्ति संपन्न करते हैं.मेरे विचार से अपने पूर्वजों का स्मरण करना कोई ढकोसला नहीं माना जाना चाहिए.यूँ तो वर्ष में कभी भी ……. बहुत अच्छी तरह से आपने पितृ पक्ष व श्राद्ध पर प्रकाश डाला है” गरुण पुराण “में इस विषय पर बिस्तृत व्याख्या की गयी है . बहुत ही सार्थक पोस्ट की बधाई

    nishamittal के द्वारा
    September 19, 2010

    आदरनिये बाजपाई जी, उत्साह वर्धन हेतु धन्यवाद

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 19, 2010

निशा जी ……….. इन श्राद्धों का महत्व तभी है जब जीवित रहते में हम उनको पूरा सम्मान दे सकें…… अन्यथा जीवन भर उनको तिरस्कार देकर उनके श्राद्ध में पकवान बटने से कोई लाभ नहीं होने वाला…… ये अच्छा सन्देश देते इस लेख के लिए आप बधाई की पत्र हैं………….. धन्यवाद……..

    nishamittal के द्वारा
    September 19, 2010

    यद्यपि पौराणिक मान्यताओं के अनुरूप बहुत सी व्यवस्थाएं दी गयी हैं,परन्तु मेरा मानना यही है कि सच्चे मन से श्रद्धा के साथ जो भी यथाशक्ति,यथापरिस्तिथी कर सकें वही उत्तम है na कि दिखावा हो.

nishamittal के द्वारा
September 19, 2010

श्राद्ध से सम्बंधित पोस्ट में एक महत्वपूर्ण उल्लेख करना चाहती हूँ,प्राय ये व्यवस्था है कि श्राद्ध के दिनों में नयी खरीदारी नहीं करनी चाहिए .मेरे विचार से कोई पूर्वज अपनी संतान की खुशी समृद्धी देख रुष्ट नहीं हो सकता.


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