chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

307 Posts

13097 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2711 postid : 43

भीख दे अपाहिज नहीं समर्थ बनायें

Posted On: 20 Sep, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

बचपन में एक कहानी पढी थी “हार की जीत” कहानी के प्रमुख पात्र बाबा भारती नामक एक संत थे जिनके पास एक बलिष्ट,तीव्रगामी अश्व था जिसको वे बहुत प्रेम करते थे.एक डाकू की नज़र उस घोड़े पर थी अनेक प्रयास करने पर भी वह संत से घोडा नहीं ले सका.उसने बाबा को चेतावनी दी कि घोडा उनके पास नहीं रहने देगा.एक दी प्रात बाबा घोड़े पर सवार घूमने जा रहे थे,एक घायल,अपंग भिखारी कि पुकार सुन रुके .भिखारी ने याचना की कि बाबा उसको उसके गंतव्य तक पहुंचा दें.दयालु संत ने उसको घोड़े पर बैठाया तथा स्वयं रास पकड़ चलने लगे, अचानक ही भिखारी ने एक झटके से रस्सी छुड़ाई तथा घोडा ले भागा बाबा दुखी तो बहुत हुए परन्तु उन्होंने डाकू को पुकार कहा “घोडा ले जाओ पर ये घटना किसी को बताना नहीं,अन्यथा लोग जरूरतमंदों पर विश्वास करना छोड़ देंगें”.डाकू का हृदय परिवर्तन हुआ,अंतत वह रात को उनका घोडा अस्तबल में बंधकर चला गया.
इस कहानी के माध्यम से मेरा उद्देश्य प्रबुद्ध जनों का ध्यान देश कि एक समस्या भिक्षावृत्तिकी ओर आकृष्ट करना है. आज ऐसे डाकुओं का कोई अंत नहीं है.आप किसी धर्मस्थल पर जाएँ,भीड़ वाले चोराहे पर हो,नया नए रूप में मांगते लोग दीखते हैं.धर्मस्थलों पर तो कोई अंत ही नहीं दिखाई देता.नित नए तरीके ढूंढ ,घरों में भीख मांगने वालों और अवसर मिलते ही लूटमार की घटनाएँ प्राय सुनने को मिलती हैं. कभी बीमारी के नाम पर ,कभी भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होने के नाम पर,कभी धर्म का नाम लेकर मांगने वालों की सीमा नहीं.सर्दी में ठिठुरते पूरे परिवार के साथ याचना करते भिखारी को आप यथाशक्ति दें और जरा सा आगे चलते ही वह उसी रूप में पुनः मांगने लगे तो विश्वास तो उठेगा ही .आखिर किस पर विश्वास किया जाये?
वास्तविकता तो ये है कि भिक्षावृत्ति एक व्यवसाय बन चुका है.इसकी आड़ में समाजविरोधी कार्य होते हैं.बच्चों को चुराकर अपंग बना कर भीख मंगवाना इस व्यवसाय का एक अंग है.भीख मांगने के अतिरिक्त गलत से गलत काम कराना चाहे वो नशे का सामान का व्यापार हो या तस्करी.सरकार किस प्रकार इस समस्या का अंत कर सकती है ये तो चिंतन का विषय है ही स्वयं भी सावधान रहना आवश्यक है.
मेरे कहने का अभिप्राय ये नहीं कि हम संवेदनहीन हो किसी की सहायता न करें. परन्तु इस समस्या से मुक्ति पाना है तो सोचविचार ही काम करना होगाजिससे .सहायता का दुरूपयोग न हो सके.तथा अपराध को भी रोका जा सके.

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

19 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
April 1, 2012

यह आपकी पहली रचना पढी;अच्छी लगी,पर इस मंच ने आपको परिस्कृत करने में एक अहम् भूमिका निभाई है,यह मैंने शिद्दत से एहसास किया और जागरण मंच को इसके लिए शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ जो अप्रत्यक्ष रूप से उस शिल्पकार का कार्य कर रहा है जिसके जन्म के बिना न जाने कितने प्रस्तर मात्र राह के पत्थर ही रह जाते उन्हें कभी भी उपास्य मूर्ती बनने का सौभाग्य न मिल पता. आपकी सभी रचनाएँ मैं अवश्य पढूंगी,१५ पृष्ठ से शुरुआत की है.

Siddhish के द्वारा
September 20, 2010

अति सुंदर ब्लॉग. शायद ब्लॉग पर प्रतिक्रिया देने की मुझमे सामर्थ्य नहीं है, सिर्फ इतना ही कहूँगा की यह पढ़कर बहुत प्रेरणा मिलती है खुद लिखने की. तो प्रेरणा बनने के लिए धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2010

    वास्तविकता तो ये की तुम्हारे प्रयासों व प्रेरणा से थोडा काम प्रारंभ हो सका है.धन्यवाद.हाँ तुम्हारे आलेख की प्रतीक्षा रहेगी.शुभकामनाएँ.

s p singh के द्वारा
September 20, 2010

निशाजी बधाई एक सामाजिक बुराई की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए, जहाँ तक मै समझता हूँ कि भीख मांगना और भीख देना दोनों अलग अलग हैं | क्योंकि सड़कों पर जब माँगने वाला किसी से मांगता है तो याचक होता है और उस समय देने वाला अपने को दानवीर कर्ण से कम नहीं समजता और फ़ौरन ही जेब से पैसा निकल कर देदेता इस अहशास में कि चलो आज उसने अपनी कमाई में से कुछ दान करके पुण्य कम लिया वह यह नहीं सोचता कि मांगने वाला उस पैसे का क्या करेगा — यह नजारा आप कहीं भी देख सकतें हैं —बस , रेल, बाजार , मंदिर मस्जिद, गुरूद्वारे के आसपास —-इस प्रकार का भीख मांगना और भीख देना सामाजिक दृष्टि से अपराध ही है —-महमान मालवीय जी तो एक युग पुरूष हुए हैं जिन्होंने विश्विधालय की स्थापना ही कर दी भिक्षा लेकर —- आज भी ऐसे पुरुष हैं जो समाज कि भलाई के लिए निरंतर भिक्षा मांग कर समाज सेवा कर रहे हैं उनमे से जोधपुर के कैलाश मानव जी भी एक है जो कि विकलांगों कि सेवा-श्रुषा लगातार कार्य कर रहे है —सवाल एक जागरूकता का है कि हम विविध रूप/स्वांग भरकर माँगने वालों को किस प्रकार समाप्त करे.

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2010

    आदरनिये सिंह साहब, आपकी प्रथम प्रतिक्रिया पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. किसी भी मांगते व्यक्ति को देख कर एकदम पैसे देना इस कुप्रवृत्ति को बढ़ावा देना है.यही कारण है एकदम स्वस्थ,अच्छे भले दिखने वाले लोग जब भीख मांगते हैं,तो लज्जाजनक तो है ही,उनको पैसा देकर हम उनको अपंग बनाते हैं. आचार्य विनोवा भावे ने भी घर घर जाकर भूदान आन्दोलन के लिए भिक्षा माँगी थी ,जैसा किआपने श्रधेय श्री जैन साहब के विषय में बताया ऐसी पुण्यात्माओं के कारण ही ये धरती टिकी है.समाज का कोई भी अच्छा काम संपन्न करने हेतु सहयोग वांछित है.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
September 20, 2010

निशा जी, एक अच्छी पोस्ट के लिए बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2010

    उत्साहवर्धन हेतु धन्यवाद .

आर.एन. शाही के द्वारा
September 20, 2010

निशा जी एक उल्लेखनीय सामाजिक बुराई की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट करने के लिये साधुवाद । इस प्रकार की वृत्तियां परम्पराओं से पोषित होती हैं, जिनके प्रतिकार के लिये सामाजिक उत्थान ही एकमात्र रास्ता है ।

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2010

    मान्यवर शाही जी,हार्दिक धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए.आपके माध्यम से यदि अपनी त्रुटी पता चलती है तो मेरा ज्ञानवर्धन होता है.जो अच्छा लगता है. 

atharvavedamanoj के द्वारा
September 20, 2010

निशा जी सादर वन्देमातरम आपकी बात सोलहों आने सच है…भीख मांगने से ब्रम्ह तेज की हानि होती है और निर्भरता की भावना बढती है फिर क्या कारण है की प्राचीन भारत में और आज भी उपनयन के समय बालक भिक्षा मांगता है …क्योंकि इससे उसके मन संसार और समाज के प्रति निर्भरता की भावना का विकाश होता है …और वह अपने आपको परिपूर्ण समझने के स्थान पर सामाजिक सहयोग की और अग्रसर होता है …तुलसी वे नर मर चुके जो कहूं मागन जाय. उनसे पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाय…निसंदेह आज समाज में भिक्षा वृत्ति एक व्यवसाय बन चूका है …किन्तु प्राचीन काल में इसी भिक्षावृत्ति ने महान से महान कार्य संपादित किये हैं …मैं तो मालवीय नाम के एक महाभिक्षुक के ही संसथान में पढ़ा हुआ हूँ …जिनका कहना था की अपने लिए मागना एक मौत से कम नहीं किन्तु समाज के लिए माँगने में मुझे कोई लाज नहीं आती …मैं एक अयाचक ब्रह्मण हूँ .किन्तु जब भी सामाजिकता की बात आती है भीख मांगने में बहुत आगे रहता हूँ ….एक अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई …मैंने केवल आपके कहे शब्दों का विस्तार मात्र किया है …मै आपसे पूरी तरह सहमत हूँ . वन्देमातरम

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2010

    मान्यवर महोदय ,आपने एक ऐसे तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित गया जो छूट गया था,हार्दिक आभार.हमारे शास्त्रों, के अनुसार उपनयन संस्कार या गुरु के आश्रम में रहते हुए भिक्षा की व्यवस्था है जो एक आदर्श व्यवस्था है ये व्यवस्था बालक को समाज से जोड़ने तथा समानता की भावना का बीजारोपण करने के लिए की गयी थी.समाजोपयोगी किसी भी सत्कार्य के लिए समाज का सहयोग लेना ही पड़ता है.समाज या राष्ट्रोत्थान के लिए महात्मा विनोवा भावे,मह्रिषी दयानंद,स्वामी विवेकानंद सदृश अनगिनत उदहारण हमारे यहाँ है.यदि आप इसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे तो आप एक आदर्श हैं तथा साधुवाद आपके लिए. मेरा उद्देश्य समर्थ ,सक्षम लोगों से है जो काम करना नहीं चाहते.उनको सही निर्देशन के माध्यम से स्वावलंबी बनाया जाना आवश्यक है. जहाँ तक मुझको ज्ञात है ये पंक्तियाँ रहीम की हैं,तुलसी की नहीं.यदि मै गलत हूँ तो क्षमा करें.सही क्या है कृपया मुझको भी बता दें.(रहिमन ते नर)

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 21, 2010

    आदरणीय निशा जी वन्देमातरम त्रुटी के क्षमा प्रार्थी हूँ…तुलसी और रहीम दोनों हमारे लिए पूज्य हैं…उक्त पंक्तियाँ रहीम ने ही कही थी जो भूलवश तुलसी हो गया…इसके लिए खेद है वन्दे matram

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2010

    ये खेद प्रकट करने की ओपचारिकता न करें.मैं भी थोडा संशय में आ गयी थी इसलिए पुछा था.

rkpandey के द्वारा
September 20, 2010

निशा जी, सबसे पहले तो एक अच्छी पोस्ट के लिए बधाई. किंतु मैं कहना चाहुंगा कि कई बार कोई भिखारी खुद ही नहीं बन जाता बल्कि उसकी परिस्थिति ही उसे इस बात के लिए बाध्य करती है. यदि हम अपनी संवेदना उनके साथ ना रखें तो असमय कितने काल के ग्रास बन जाएंगे. यकीनन इसका फायदा कई आपराधिक तत्व उठाते हैं लेकिन जब तक नीति नियंता इसके लिए कोई उचित कदम ना उठाएं तब तक जनता को भिखारियों के प्रति सहृदयता तो दिखानी ही होगी.

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2010

    स्वयं मेरा ये मानना है कि सहायता अवश्य करें लेकिन परख कर.सह्रदयता मानव में सदा बनी रहे ऐसी मेरी ईश्वरसे प्रार्थना है. भारतीय संस्कृति में मेरी अटूट आस्था है,जिसके अनुसार द्वार से पशु पक्षी भी भी निराश नहीं लौटना चाहिए .यदि शारीरिक रूप से समर्थ कोई व्यक्ति किसी भी मानवीय सहायता से समर्थ बनता है तो इससे श्रेष्ट कार्य समाज के लिए क्या हो सकता है.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 20, 2010

नमस्कार निशा जी, बहुत ही अछे तरीके से चेताया है लोगों को आपने,एक अच्छा लेख,बधाई

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2010

    उत्साह वर्धन हेतु हार्दिक धन्यवाद.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 20, 2010

बहुत सही विषय पर ध्यानाकर्षित किया है आपने……… इस विषय पर मेरे पास भी कुछ है जो में अपने अगले लेख में प्रस्तुत करूँगा…………. एक अच्छे व महत्वपूर्ण लेख के लिए हार्दिक बधाई………..

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2010

    प्रतीक्षा रहेगी आपके सुंदर समाजोपयोगी विचारों की.धन्यवाद.


topic of the week



latest from jagran