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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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नेता है भगवन नहीं

Posted On: 22 Sep, 2010 Others में

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पुरानी घटना है,एक ग्राम में एक अनपढ़,निर्धन अल्प विकसित बुद्धि युक्त व्यक्ति रहता था.गाँव के लोग उसको परसा परसा पुकारते और वह बेचारा तुरंत हाजिर हो जाता.जैसा की गाँव में चलन है सब के छोटे छोटे काम वह कर देता था,और बदले में उसको अनाज,वस्त्र तथा अन्य जीवनोपयोगी वस्तुएं मिल जाती थी.इसी प्रकार उसका जीवनयापन हो रहा था.गांववाले परसा केसाथ और परसा गांववालों के साथ खुश था.
अचानक ही परसा का कोई संपन्न रिश्तेदार गाँव में आया और अपने साथ परसा को ले गया शहर .कुछ शहर की हवा,कुछ संपन्न रिश्तेदार के यहाँ रह कर थोडा रहनसहन बदल गया परसा का.रिश्तेदार कुछ नेता टाइप व्यक्ति था अतः थोड़ी बहुत दुनियादारी भी सीख गया.कुछ दिन बाद परसा को पुनः गाँव आना पड़ा.पहले की तुलना में उसके स्तर में सुधार आ गया था अतः गाँव वाले उसको परसी कह कर बुलाने लगे.
समय ने करवट बदली ,कुछ भाग्य और कुछ रिश्तेदार नेता के जुगाड़ से परसी का भी भाग्य पलटा और वह कुछ राजनीतिक उलटफेर से वह ग्रामप्रधान बन गया .अब क्या था वोही गाववाले जो कल तक उसको फालतू समझते थे उन्होंने ही उसको पुष्पहारों से लाद दिया.हर कोई tउसके आगे पीछे घूमने लगा.और अब वो परसराम जी बन गया.तभी से ये कहावत चली आरही है,”दौलत तेरे तीन नाम परसा, परसी परसराम”
इस छोटी घटना का उल्लेख करने के पीछे वास्तविक उद्देश्य उस तथ्य की और ध्यान आकृष्ट करना है,जब हमारे कर्णधार ऐसे लोग बनते हैं,जिनको राजनीती,प्रशासन ,देश कल की परिस्तिथितियों के विषय में कुछ पता नहीं होता और राजनीतिक जोड़तोड़,या किसी अन्य तिकड़म के आधार पर सत्ता धारी बन जाते हैं.(यहाँ एक बात मुझे स्पष्ट करनी है किमेरे कहने का अभिप्राय ये बिलकुल नहीं है,कि पढ़े लिखे लोग सभी समझदार और अनपढ़ ज्ञान रहित होते हैं,ऐसा बिलकुल नहीं है.न ही मेरे कहने का अर्थ ये है कि छोटे स्तर से उठकर किसी का ऊँचाई पर पहुंचना गलत है.ऐसे बहुत से उद्धरण हैं जब कि ऐसी पृष्ठभूमि के लोग बहुत ही कुशल व योग्य नेता सिद्ध हुए ) लेकिन हमारी संवेधानिक व्यवस्था में शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य नहीं रखा गया.यही कारण है कि हमारा यहाँ सत्ता ऐसेऐसे लोगों के हाथ में केन्द्रित हो जाती है जिनको भाषण देते समय ये भी नहीं पता होता कि उनको किस विषय पर बोलना है और समस्या क्या.है .तो हम कैसे आशा कर सकते हैं कि वो देश संभालेंगे या देश की समस्याओं का समाधान कर सकेंगे अपने विवेक से.वो वही करते हैं जो उनके मंत्रालय या अधिकारी निर्धारित कर देते हैं सरकार कि नीतियों के अनुसार. ग्रामपंचायतों के चुनाव में तो और भी हास्यास्पद स्तिथि है जहाँ आरक्षण के कारण चुनाव लडती हैं महिलाएं अपने नाम पर.सारी व्यवस्था व कमान उनके पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों के हाथ में रहती है.और पति प्रधानपति कहलाते हैं.यहाँ तक कि मीटिंग्स भी उनके पति ही भाग लेते हैं.उनका काम केवल अंगूठा लगाना या टूटे फूटे हस्ताक्षर करना होता है..मंत्रिमंडल में अपराधियों कि भरमार रहती हैं.विधानमंडल या संसद में मार पिटाई धक्कामुक्की,गली गलोज सब होती है.ऐसे में देश के समग्र विकास कि आशा कैसे कर सकते हैं.क्या इस व्यवस्था का कोई विकल्प खोजना जरूरी नहीं?
ऐसे कर्णधारों के हाथों में कैसे निश्चिन्त हुआ जा सकता है देश सोंप कर.
एक कहावत है’ कोढ़ में खाज”ऐसे कर्णधारों की हमारे यहाँ खूब वंदना भी होती है ,उनको विद्वान और न जाना क्या क्या बताया जाता है.

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 22, 2010

आपके इस लेख पर सिवाए आपके विचारों पर सहमती प्रस्तुत करने के कुछ कहने को शेष नहीं है………. इस लेख के लिए हार्दिक बधाई …………….

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2010

    धन्यवाद,कहिये नहीं बस व्यवस्था में सुधार कैसे होगा.ये विचार करने का काम भी केवल बुद्धिजीवी वर्ग ही कर सकता है.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
September 22, 2010

निशा जी आपने बहुत सही बात कही है मई भी २-३ बार ऐसे नेताओं के सामने पद चूका हु जो बोलना शुरू कर देते है तो माइक हटाने की नौबत आ जाती है … ऐसे ऐसे बेतुके विषय उठा देते है जिनपे बोलने का कोई तुक ही नहीं होता.. ..लेकिन वो कहते है न “”"समरथ को नहीं दोष गोसाई “‘ बस वही स्थिति है

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2010

    आखिर जागना तो बुद्धिजीवी वर्ग रहेंगे.को ही होगा .कब तक आखिर कब तक उनको समर्थ मान हम मूर्ख बनते रहेंगे.

Ramesh bajpai के द्वारा
September 22, 2010

जिनको राजनीती,प्रशासन ,देश कल की परिस्तिथितियों के विषय में कुछ पता नहीं होता और राजनीतिक जोड़तोड़,या किसी अन्य तिकड़म के आधार पर सत्ता धारी बन जाते हैं निशा जी लोक तंत्र की परिभाषा ही अब यही हो गयी है जिसके हाथ लाठी भैस उसी की .

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2010

    मान्यवर बाजपाई जी,इन तिकड़मी बहरुपियों को कब तक लोकतंत्र का पर्याय मानें.आप सदृश प्रबुद्ध जनों को बीड़ा तो उठाना होगा.देश,समाज के कल्याण का.

abodhbaalak के द्वारा
September 22, 2010

निशाजी सारी व्यवस्था ही ऐसे लोगोंके हाथ में है, मुझे याद है कुछ साल पहले एक टीवी चैनल वालो ने एक प्रोग्राम किया था जिसमे कुछ नेताओं का जन मन गन सुनाने के लिए कहा गया था, उनमे से ९०% नेता को ये भी नहीं याद था की राष्ट्र गीत क्या है और राष्ट्रगान क्या होता है. आज राजनीती केवल धन कमाने का एक रास्ता हो गया है, देश सेवा बस कोरी बकवास है, आप देखलें कितने नेता है जिन्होंने कुछ ही समय में कितना धन जमा कर लिया है. क्या उनको सजा होती है. व्यवस्था ही करप्ट है निशा जी. अच्छा लेख, बधाई हो

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2010

    अबोध तो आप नहीं हैं,देश काल की चिंता करने वाला बुद्धिजीवी होता है.पर चिंता करेंगे तभी तो हल सोचेंगे.

आर.एन. शाही के द्वारा
September 22, 2010

व्यवस्था को जंग लगा हुआ है निशा जी । आसानी से छूटने वाला नहीं है । फ़िर भी निरन्तर प्रयासों से ही कुछ हो पाएगा । अच्छी पोस्ट के लिये बधाई ।

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2010

    मान्यवर शाही जी आप तो एक प्रबुद्ध विचारक हैं.यदि आप जंग लगी व्यवस्था को देख कर शांति से बैठेंगे तो हमारा मार्ग दर्शन कौन करेगा.

roshni के द्वारा
September 22, 2010

निशा जी ये नेता अपने आप को भगवन ही नहीं भगवन से भी ऊँची चीज़ समझते है और समझे भी क्यों न हम लोगो ही तो उने कुर्सी दिलवाते है … क्यों नहीं हम एक सही आदमी देश के लिए चुन पाते? क्यों हम गलत इंसान को , गलत पार्टी को वोट देते है?? जिस दिन जनता जागेगी ये शेतान रुपी भगवन देश से गायब हो जायेगे.. बस अब जनता के हाथ में है इसे कब तक सोना है…………

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2010

    रौशनी जी बिलकुल सही कहा आपने.चिंतन तो करना ही होगा.कुछ अच्छा करने के लिए दृढ निश्चय तो करना होगा तभी तो देश को एक नयी रौशनी की किरण दिखाई देगी.धन्यवाद


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