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एक जिज्ञासा छोटी सी

Posted On: 28 Sep, 2010 Others में

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एक आम हिन्दू की भांति मेरी प्रभु राम तथा रामचरितमानस में सम्पूर्ण आस्था है.परिवार में प्रतिदिन रामचरितमानस का पाठ होता है.कुछ पंक्तियों को लेकर मेरे हृदय में ये जानने की जिज्ञासा रही है,परन्तु पहले तो बुजुर्ग लोग अपनी तरह से समझा कर चुप कर देते थे.फिर अन्यत्र स्पष्ट करने का प्रयास किया तो भी संतुष्ट न हो सकी मैं.चूँकि जागरण से प्रबुद्ध वर्ग जुड़ा हुआ है,तो आशा है कि मेरी जिज्ञासा शांत हो सकेगी.
रामचरितमानस में कहा गया है,
“ढोर गंवार शुद्र पशु नारी,ये सब ताडन के अधिकारी.”
मेरे विचार से ताडनशब्द के २ अर्थ हैं (१) मारना या प्रताड़ना
(देखना )
तुलसी जिन्होने आदर्श की उच्चतम पराकाष्टा प्रस्तुत की है,नारी के लिए ऐसे शब्दों को प्रयोग करते हुए पशु गंवार या निम्न श्रेणी में कैसे रख सकते हैं.
मेरा आप सभी विद्वत जनों से अनुरोध है कि इन पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट करते हुए मेरी जिज्ञासा शांत करें.

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Adam Rudisell के द्वारा
March 28, 2017

Такие средства как Алкопрост и Алкобарьер позволяют воздействовать на организм комплексно. Они позволяют полностью побороть тягу к алкоголю. pronews24.ru

Jenise Scharr के द्वारा
March 23, 2017

Ouchhh don’t judge her for the messy Kitchen! thats how it is :)

ravish के द्वारा
May 16, 2014

“ढोर गवार शुद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी।” तुलसी दास जी द्वारा रचित इस पंक्ति का भावार्थ क्या है मित्रो ? कभी इस पर गौर किया है किसी ने ? अक्सर अच्छे अच्छे विद्वानो को हमने इस पंक्ति की व्याख्या करते हुए सुना है और तुलसीदास जी हवाला दे कर नारी को ताड़ना देने का पक्ष लेते हुए वो नारी को भी सिर्फ एक विषय भोग कि वस्तु प्रमाणित करते है । किन्तु क्या आप सोचते है कि तुलसीदास जी इतने गिरे हुए विचारो के हो सकते हैं ? जिनहोने रामायण मे सीता माँ, सुलोचना , मंदोदरी, तारा इत्यादि नारियो को महान बताते हुए इन्हे प्रातः स्मरणीय बताया है वो तुलसीदास जी नारी का ऐसा अपमान कैसे कर सकते है ? तो मित्रो यहा गलती तुलसीदास जी कि नहीं है, गलती है गलत अर्थ लगाने वालों की, स्वयं कि संकीर्ण विचारधारा को विद्वानो के मत्थे मढ़ने वालों की। अब आपको मई इसका सटीक अर्थ बताता हूँ : “ढोर गवार शुद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी।” 1) इस मे ढ़ोर का अर्थ है ढ़ोल, बजने वाला ढ़ोल । ढ़ोल को बजाने से पहले उसको कसना पड़ता है तभी उसमे ध्वनि मधुर बजेगी । यहा ताड़ना शब्द का अर्थ कठोरता से है ना कि मारना या पीटना से है। 2) इसके बाद है “गँवार शूद्र” । यहा गंवार और शूद्र अलग अलग नहीं है, ये एक साथ है। अर्थात ऐसा शूद्र जो गंवार हो जो सभ्य नहीं हो । ऐसे गंवार सेवक को कठोरता से काम मे लेना चाहिए वरना वो अपनी दुर्बुद्दि से कार्य को बिगाड़ सकता है । यहा भी ताड़ना शब्द का अर्थ कठोर व्यवहार से है ना कि मारना या पीटना से है। 2) पशु नारी: अर्थात वो नारी जो पशुवत व्यवहार करती है, पशुवत व्यवहार मे व्याभिचार भी आता है क्यो कि पशुओ मे रिश्तो कि कोई मर्यादा नहीं होती है । सो ऐसी नारी जो पशुओ के समान कई लोगो से संबंध रखती है । ऐसी नारी से भी कठोर व्यवहार करना चाहिए एवं उसे समाज से दूर रखना चाहिए ताकि वो समाज को गंदा न कर सके। तो मित्रो यहा 3 ही चीजे है 5 नहीं । अगर इन्हे 5 मानते है तो एक बात सोचिए जो धर्म हर प्राणी के प्रति दया की भावना रखने कि शिक्षा देता है वो पशुओ को मारने या ताड़ना देने की बात कैसे कर सकता है ? किसी गंवार को सिर्फ इसलिए कि उसमे ज्ञान नहीं है उसे ताड़ना कैसे दे सकता है ? शूद्र का अर्थ यहा सेवक से है ना कि शूद्र जाती से । शूद्र सेवा करने वालों को ही कहा जाता है । और सेवक मे भी वो सेवक जो गंवार हो उस से कठोर व्यवहार करना । पशु का यहा नारी के साथ प्रयोग किया गया है सो अलग करने पर अर्थ गलत हो जाता है । न तो पशु और न ही नारी किसी ताड़ना कि अधिकारी है । पशुवत व्यवहार करने वाली नारी ताड़ना कि अधिकारी है ।

ashishgonda के द्वारा
September 22, 2012

आदरणीय माँ जी! सादर चरण स्पर्श….. जैसा की मैं तो काफी बाद में प्रतिक्रिया कर रहा हूँ, मुझसे पहले काफी लोगों ने अपनी बार कह दी. मैं तो आपको कोई अर्थ नहीं बता सकता परन्तु मेरे लेख “सीता-परित्याग, राजधर्म या राजमोह” पर अजय कुमार यादव जी की प्रतिक्रिया मुझे ठीक जान पड़ती है. कृपया पढ़ें http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/09/20/%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%AF%E0%A4%BE/

bharodiya के द्वारा
September 22, 2012

निशाबहन नमस्कार विडंबना ये है भक्त आगे बढ गये और धर्म पिछे रह गये हैं । जब आदमी बिलकुल अनपढ था, तब शास्त्र लिखे गये है । आज के आदमी को अपना मन खोलना होगा । जो लिखा गया है हमारे लिए नही गया है । वो लिखने वाले आज के एक विद्वान लेखक पास कुछ नही थे, उन को कहां पढाई का या ज्ञान अर्जित करने का मौका मिला था । वो हमारे पुरखे थे या संस्क्रुत मे लिखते थे तो ईस बात पर महान नही बन जाते । हमारा अहोभाव ही उन को महान बनाते हैं । और उन का लिखा हर शब्द पकड के रखते हैं । धर्मों में बहुत सी बातें खराब तरिके से लिखी गई है । वो बातें अब तक हअटा देनी चाहिए थी अबतक । आदमी अपडेट हो गया धर्म अपडेट ना हुआ ये कैसे हो गया ?

yamunapathak के द्वारा
April 1, 2012

आज आपकी यह प्रारम्भिक तीसरी रचना मैंने पढी चूँकि मैं अवधी भाषा से बचपन से जुडी हूँ इसलिए इस शब्द को ‘समझने’ के अर्थ में प्रयुक्त होते देखा है अर्थात “ये वर्ग समझने के योग्य हैं. जैसे अरे भैया!हमार बात ताड़ गया की न ?मतलब हमारी बात समझे की नहीं?

मंसूर के द्वारा
September 30, 2010

   एक निवेदन और । रामायण का रोज पाठ होना अच्‍छी बात है। लेकिन इससे बहुत काम नहीं बनता। जैसे धूप- अगर जलाने से घर को विषाणु- कीटाणु मुक्‍त रखने में मदद तो मिलती है लेकिन इतने से ही घर की स्‍वच्‍छता-शुद्धता का अभीष्‍ट पूरा नहीं होता। रामायण को समझना राम को समझना है। हृदय में उतारना पडता है । रामायण का ही दर्शन गीता में है। दोनों में किसी को समझ लेने से और कुछ पढने की आवश्‍यकता नहीं रह जाती। कुरान के मुख्‍य दार्शनिक सिद्धांत रामायण- गीता के ही हैं। तीनों का उद्देश्‍य भी समाज को दिशा दिखाना ही रहा है। रामायण का एक प्रसंग महिलाओं का महत्‍व व स्‍थान दिखाने को काफी है। सती अनुसूया मां सीता को नारिधर्म की सीख देते हुए कहती हैं- धीरज धर्म मित्र अरु नारी ,आपद काल परिखिअहिं चारी।  सभी धर्मों – ग्रंथों में धर्म को सर्वोपरि महत्‍व दिया गया है। धर्मनिष्‍ठ को धैर्यवान होना चाहिए। धैर्य के बिना धर्म टिक ही नहीं सकता। मित्र को राम ने बहुत महत्‍व दिया है। वह तो वनवास में घूम घूम कर मित्र – सखा ही बनाते रहे।धर्म के समकक्ष ही स्‍त्री को माना गया है जिसमें धैर्य भी होता है और धर्म भी। जो धरती की तरह धैर्यवान होती है।

    nishamittal के द्वारा
    October 1, 2010

    मंसूर भाई,आपका अध्ययन बहुत गहन है,वही गंभीरता आपके विचारों में परिलक्षित होती है.प्रथम प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद. आपका कथन पूर्णरूपें खरा है कि प्रतिदिन रामचरितमानस का पाठ होना प्रयाप्त नहीं.जो हम पढ़ते हैं यदि उसको गुनते नहीं तो पठन-पाठन निरर्थक है.परन्तु एक धारणा मेरी ये भी है कि करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान यदि पुनः पुनः पढेंगें तो संभवतः ग्रहण करने को भी बल मिलता है,साथ ही ज्ञान कोष में वृद्धि होती है.

शंभू दयाल वाजपेयी के द्वारा
September 30, 2010

    आदरणीया निशा जी,  मुझे तो नहीं लगता कि आपको इन पंक्तियों का अर्थ नहीं मालूम। शायद आपकी मंशा इस बहाने और लोगों का भ्रम दूर करने की होगी। मैं रामायण का जानकार- विद्वान तो नहीं हूं , राम- रामायण में बढ कर दिलचस्‍पी एकांगी हो जाए , इस पर कुछ रुचि जरूर है। बहती गंगा में हाथ धोने का आपने मौका दिया है तो फिर मैं पीछे क्‍यों रहूं। मैं इस विचार- निष्‍ठा का हूं कि- 1- प्रश्‍न गत पंक्ति का कथन गोस्‍वामी जी का नहीं है। गोस्‍वामी जी प्रकांड पंडित और कुशल कवि होने के बावजूद मूलत: और पूर्णत: संत थे। संतत्‍व का अनिवार्य गुण  सम होना होता है।स्‍वयं गोस्‍वामी जी ही यह कहते हैं:  अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध करि दोउ। इस न्‍याय से वह ऐसी विषम बात वह कह ही नहीं सकते थे। 2- गोस्‍वामी रामायण के लेखक नहीं हैं…..रचि महेश निज मानस राखा। या .;संभु कीन्‍ह यह चरित सुहावा ।उन्‍हों ने इसे \’भाषा बद्ध (जन भाषा में) किया है। वह भी स्‍वांत: सुखाय। केवल एक उद्देश्‍य राम और उनसे भी ज्‍यादा नाम की महिमा मति अनुसार बखान करना। उनका आद्योपांत एकसूत्री और अंतिम प्रतिपाद्य है- बारि मथे घृत होइ पुनि सिकता ते बरु तेल, बिनु हरि ीाजन न भव तरहिं यह सिद्धांत अपेल। 3- गोस्‍वामी जी ने अपनी तरफ से रामायण में जो कुछ कहा या जोडा है उस पर किसी प्रकार के विवाद- सवाल की कोई गुंजाइस ही नहीं है। सद् वृत्तियों के प्रतीक भगवान राम ,भरत,वशिष्‍ठ , सीता,कौशल्‍या, शिव,सुग्रीव, विभीषण ,हनुमान जनक , गुह मंदोदरी  जैसे संतों आदि के माध्‍यम से शास्‍वत सत्‍य  के सूत्र कहलाये गये हैं। उनमें भी कुछ नानुकुर की स्थिति नहीं आती। 4- जगत त्रैगुणी है। अम्‍बुपति -समुद्र देवता है।सुविधा भेगी रजोगुणी है। रावण-सूर्पणखा वगैरह तमोगुण प्रधान हैं जो ज्ञानवान तो हैं पर – पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।उन्‍हों ने ज्ञान को आचरण में नहीं उतारा। 5- समुद्र और रावण दोनों ईश्‍वर की भी परवाह न करने वाले हैं। दोनों स्त्रियों के बारे में प्राय: एक सी बात कहते हैं। एक आत्‍म रक्षा में घबडा और गिडगिडा कर अपनी ही भर्त्‍सना करते हुए यह सोच कर कहता है कि शायद यह सुन कर मारने को अग्नि बाण ताने खडे श्री राम प्रशन्‍न हो जायें। वह कहता है – ढोल गंवार सूद्र पसु नारी , ये सब ताडन के अधिकारी। फिर स्‍पष्‍ट कर दूं कि यह कथन समुद्र  का है। बचाव में आर्त समुद्र ( और, आरत काह न करै कुकर्मू) अपने बारे में कहता है- गगन समीर अनल जल धरनी, इनकै नाथ सहज जड करनी। समुद्र जल का देवता , अधिष्‍ठान है। सामंतवादी ब्‍यक्ति अपनी सुविधा के लिए स्त्रियों के बारे में ऐसी मान्‍यता देता आया है जो समुद्र के माध्‍यम से अभिव्‍यक्‍त हुईं हैं। ईसाई और इस्‍लामी इतिहास के अध्‍ययन में भी ऐसी बातें मिलती हैं। लेकिन ये मान्‍यतायें विवेक व धर्मसम्‍मत नहीं मानी गयीं।यही रामायण -महाभारत का संघर्ष है।इसी में रामायण – गीता की उपादेयता है। 6-समुद्र का व्‍यवहार देखिये- भगवान राम धनुषबाण छोड कर समुद्र के पास जाते हैं । प्रणाम कर अपने हाथों आसन बिछाते हैं और मौन रह कर तीन दिन तक अनशन व्रत करते हुए विनती करते हैं।समुद के न प्रकट होने पर चौथे दिन क्रोध में लक्ष्‍मण से धनुषबाण मांगते हैं। इसे चेतावनी को भी समुद्र अनसुना कार देता है। जब राम अग्निबाण चढा लेते हैं और समुद्र के जीव जंतु जलने -अकुलाने लगते हैं तब वह विप्र वेश में डर कर आता है। वह सठ कुटिल,कृपण,लोभी,क्रोधी, और कामी है। ढोल,गंवार… कहता है तो आश्‍चर्य क्‍या  ? रावण भी तो मंदोदरी जैसी विदुषी वेदज्ञ -भक्‍त से कहता है – नारि सुभाउ सत्‍य सब कहहीं ,अवगुन आठ सदा उर रहहीं।साहस अनृत चपलता माया, भय अविवेक असौच अदाया। लेकिन पूरी रामायण में राम के पक्ष का कोई ऐसी बात कहता नहीं मिलेगा। वैसे कुछ लोग कहत हैं के अवधी में \’\’ ताडन\’\’ का अर्थ देखना, नजर रखना , देख रेख करना होता है।

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2010

    श्रद्धेय बाजपाई जी,आपकी विद्वत्ता व् रामजी तथा रामचरितमानस के गहन ज्ञान को मेरा सादर प्रणाम.मेरा ज्ञान अत्यल्प है ,अतेव मेरे द्वारा अपनी जिज्ञासा आप सदृश महानुभावों के समक्ष प्रस्तुत की गयी.परन्तु आपकी विषद,गहन सुन्दर व्याख्या से मैं बहुत लाभान्वित हो सकी.हार्दिक धन्यवाद.अन्य सभी जिज्ञासु जन भी अपना ज्ञानवर्धन कर सकेंगे.हार्दिक आभार.

    Ramesh bajpai के द्वारा
    October 1, 2010

    परम विद्वान मानस मर्मग्य आदरणीय श्री बाजपेयी जी मेरा प्रणाम स्वविकार करे .यह हम सब का सौभाग्य है की आपने उदारता के साथ इस प्रशंग को परिभाषित किया है . इस से पहले भी इस मंच पर यह प्रश्न उठा था . इस बार आपकी व्याख्या ने सारे संसय दूर कर दिए है . हार्दिक आभार . आशीर्वाद की आकांक्षा सहित

    आर एन शाही के द्वारा
    October 1, 2010

    एस डी वाजपेयी सर, प्रणाम! निशा जी के हम आभारी हैं, जिनके लेख ने आपको इस पृष्ठ पर आकर हमें अभिसिंचित करने के लिये बाध्य किया । सचमुच आपके इस मार्गदर्शन से यहां पहुंचने वाले हर पाठक का भला होने वाला है । आपकी टिप्पणी अकेले ही सत्संग सभा का महत्व रखती है । साभार ।

    nishamittal के द्वारा
    October 1, 2010

    एक बार पुनः आपसे निवेदन है,कि आपने अपने नाम तथा वर्ण (ब्रह्मण) के अनुरूप मेरे साथ अन्य पाठकों का भी ज्ञान वर्धन किया है,जैसा कि आप को शाहीजीव् रमेश बाजपाई जी की प्रतिक्रिया से ज्ञात हो गया होगा. एक प्रश्न और,मुझे आपका कोई आलेख जागरण में उपलब्ध न हो सका,यदि है तो कृपया बताने की अनुकम्पा करें.पुनः धन्यवाद.

samta gupta kota के द्वारा
September 30, 2010

निशा जी,मेरे विचार से गंवार [मूढ़] विशेषण आया है शुद्र,पशु,और नारी तीनो के लिए,चूँकि ढोल तो मूढ़ होगा कैसे और यह विशेषण आया भी ढोल के बाद है,?इसलिए मूढ़ तो कोई भी हो ताड़न का अधिकारी माना है तुलसीदास जी ने,

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2010

    आपका विचार भी मेरे समक्ष है,देखते हैं,कुछ और हल निकलता है क्या?बहुत धन्यवाद.

Ramesh bajpai के द्वारा
September 29, 2010

बहन निशा जी [ ढोल गवार शूद्र पशु नारी , सकल ताड़ना के अधिकारी ] काफी लोगो ने इस पर आपने विचार दिए है यह प्रसंग उस समय का है जब श्री राम ने लंका जाने के लिए समुद्र से विनय पूर्वक मार्ग देने को कहा था .तीन दिनों तक विनय करने के बाद भी उनकी बात को समुद्र ने नहीं सुना तब श्री राम ने क्रोध कर धनुष बाण लेकर समुद्र को सोखने का उपक्रम किया . तब समुद्र ने विनय करते हुए श्री राम से कहा प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही , मरजाद पुनि तुम्हरी कीन्ही , ढोल गवार शूद्र पशु नारी , सकल ताड़ना के अधिकारी प्रभु प्रताप मै जाब सुखाई , उतरही कटकु न मोरी बडाई

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    आदरणीय बाजपाई जी,ये प्रसंग सुन्दरकाण्ड के अंत में आता है,ये मैं जानती हूँ.परन्तु मेरा प्रश्न दूसरा है आशा है आप उस पर प्रकाश डाल सकते हैं.धन्यवाद.

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 30, 2010

    क्षमाँ चाहता हु निशा बहन कल बिजली के कारण पोस्ट अधूरी रही आज शाम तक कमेन्ट पूरा होगा देरहो रही है

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 30, 2010

    बहन निशा जी यह कथन समुद्र का है . अतह यहाँ पर तुलसी दास जी ने सागर के कथन कों ही लिखा है इस तरह यह विचार तुलसी दास का नहीं है निशा जी राम चरित मानश में तमाम लोगो का जिक्र हुवा है उनके संवाद है विचार है रावण की अपनी सोच थी विभीषण का रास्ता धर्म का था उत्तर कांड दोहा no ९८ अशुभ भेष भूषन धरे , भच्छा भच्छ जे खाहि , तेई जोगी तेई सिद्ध नर पूज्य ते कलजुग माहि . यह कलि काल का प्रताप है की ढोगियो की भी पूजा होती है .यहाँ तुलसी ने कलि की महिमा भर लिखी है न की इनको पूजने कों कहा है [अपनी मति के अनुसार जो बना बताया बाकि आपकी मर्जी ]

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2010

    मान्यवर महोदय,सादर अभिवादन,आपने लिखा है कि शायद मुझे इन पंक्तियों का अर्थ ज्ञात है.ऐसा नहीं,मेरा ज्ञान अत्यल्प है. अतेव मैं जानने को उत्सुक थी,इसलिए आप सदृश महानुभावों से जानना चाहती थी.आपने जितनी विस्तृत,स्पष्ट व्याख्या की है उसने तो मुझको बहुत लाभान्वित किया.हार्दिक आभार.

आर.एन. शाही के द्वारा
September 29, 2010

एक अच्छा प्रश्न पटल पर लाने के लिये साधुवाद निशा जी । मैं समीक्षा की हैसियत नहीं रखता, लेकिन सहमत हूं कि इतने बड़े विद्वान रचयिता की सोच इतनी संकुचित नहीं हो सकती । ताड़ना शब्द तारने के अर्थ से संबंधित भी हो सकता है । अपनी फ़ोटो डालने के लिये भी धन्यवाद स्वीकार करें, अच्छा लगा ।

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    शाहीजी, वैसे अपनी विचारधारा के अनुरूप ही व्याख्या हो सकती है परन्तु तुलसीदास जी का स्पष्टीकरण कौन मूर्धन्य विद्वान करेंगे ये तो समय बताएगा परन्तु प्रतीक्षा है ,अभी ………………….

NIKHIL PANDEY के द्वारा
September 28, 2010

निशा जी ,,, यहाँ पियूष जी ही सही व्याख्या कर सके है.. बहुत सामान्य सी बात है जो हमें समझनी चाहिए..ये असंभव सी बात है की वह तुलसी दास जिन्होंने समाज में उच्चतम आदर्शो की स्थापना के लिए राम के चरित्र को जन जन तक पहुचाया वह नारी की महानता से अनभिज्ञ हो.और वह उसके लिए पशु या मारने जैसे शब्द प्रयोग करे .. और वह भी तब जब रामायण के रचयिता वाल्मीकि जी स्वयं सीता के वनवास के समय उनके आश्रय दाता रहे और लवकुश को उनकी माँ का अधिकार दिलाने के लिए प्रयास करने को प्रेरित किया , मानस में लगभग सभी अलंकारों का प्रयोग तुलसी दास जी ने किया है ….ताड़ना का एक अर्थ ये भी बताया गया है.. की ध्यान देना . या ध्यान रखना (केयर करना) …ढोल को ताड़ना अर्थात मारना ………. गंवार को ताड़ना मतलब सुसंस्कारी बनाना……… शुद्र को ताड़ना अर्थात उसको ऊपर उठाना ………. और नारी को ताड़ना ध्यान देना ,ध्यान रखना …(हलाकि आजकल इस शब्द का बिगड़ते बिगड़ते घटिया मजाकिया शब्द बना दिया गया है ) वैसे ये बढ़िया प्रश्न उठाया है आपने …………. उम्मीद है लोगो को इस विषय पर भ्रम ख़त्म होगा … क्योकि तुलसी जैसे महां कवि नारी के लिए अपमानजनक शब्द कभी नहीं प्रयोग करेंगे

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    आपने जिज्ञासा को शांत करने हेतु समय निकाला धन्यवाद निखिल जी.मेरा मन भी ये स्वीकार नहीं करता इसीलिये जिज्ञासा व्यक्त की थी.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 28, 2010

निशा जी ………..सर्वप्रथम यहाँ पर श्लेष अलंकार है………… और इसकी सही व्याख्या इस तरह है की ढोल को ताड़ना अर्थात मारना ………. गंवार को ताड़ना मतलब सुसंस्कारी बनाना……… शुद्र को ताड़ना अर्थात उसको ऊपर उठाना ………. और नारी को ताड़ना अर्थात अपने अनुसार ढाल लेना है……….. किसी ज्ञानी ने मुझे ऐसा ही बताया है………..

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    मेरे विचार से भी तुलसी जैसे कवि जिन्होंने सीताजी,माता सुमित्रा,माता कौशल्या,तपस्विनी अनुसूया,शबरी अरुंधती यहाँ तक कि मंदोदरी तक का भी आदर्श चरित्र प्रस्तुत किया है,नारी के लिए अपनी लेखनी के लिए संभवतः ऐसा नहीं लिख सकते थे.धन्यवाद

div81 के द्वारा
September 28, 2010

pareek जी ये सच है वहां पशु सामान नारी की ही बात की गयी है मगर एक बात समझ नहीं आई जो पुरुष पशु सामान हो उन के विषय में क्यूँ नहीं कुछ कहा

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    पुरुष का घृणित कर्म भी हमारे समाज में क्षम्य है. नारी के साथ यदि दुर्घटनावश भी कुछ अनहोनी होती है तो भी वह दोषी मणि जाती है प्राय.

omprakash pareek के द्वारा
September 28, 2010

मित्तलजी, एक सज्जन ने मुझे आपके प्रश्न का उत्तर तो बताया पर थोडा अटपटा सा है शायद विस्वसनीय न लगे पर इस प्रकार है, यहाँ पशु और नारी को अलग अलग न पढ़ कर पशु शब्द को नारी शब्द के सात जुड़ा विशेषण माने. याने जो नारी पशुवत व्यवहार करे वही ताड़न की अधिकारी है ना कि समस्त नारी जाती के लिए ऐसा कहा गया है. अब इस मंतव्य को मनाना न मानना आप पर निर्भर है.

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    पारीक जी,यद्यपि अस्पष्ट कथन की व्याख्याएँ अपनी व विचारधारा के अनुसार होती हैं,फिर भी तुलसीदास जी ने तो छोटे से छोटे प्रसंग की व्याख्या इतनी विस्तृत दी है ,इसलिए आप सब के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखी है.

roshni के द्वारा
September 28, 2010

निशा मित्तल जी आपने तो मेरी जिज्ञासा को शब्द दे दिए … रामचरिमानस मे ये सब पढकर मन विचलित हो जाता है.. जहाँ एक और हिन्दू धर्म मे कहा जाता है नारी पुजनिए है वही दूसरी तरफ ताडन की अधिकारी … क्यों ??? ऐसे विचार क्यों लिखे गए ? नारी जो की भगवन के बाद दूसरी सृष्टि रचियता है उसे पशु गंवार या निम्न श्रेणी मे रख क्र क्या सिद्ध किया गया है… मे भी इस प्रश्न के उत्तर के इंतज़ार में हूँ …

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    फ़िलहाल तो आप भी प्रतिक्रियाएँ पढ़िए फिर विचार करने का अवसर मिलेगा.


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