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अमेरिका चीन की मजबूरी है पाक

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आखिर फिर चलायी दादागिरी अमेरिका ने अपनी”.मुख में राम बगल में छुरी “को चरितार्थ करते हुए अपने छोटे पियादे पाकिस्तान को’ अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी’ का अध्यक्ष बना कर.
प्रश्न ये नहीं कि पाक को अध्यक्ष क्यों बनाया गया,आखिर सदस्यों में से ही अध्यक्ष,सचिव चुने जाते हैं. संस्था का मूल उद्देश्य आणविक ऊर्जा के सैन्य दुरूपयोग को रोकनातथा शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना है.संस्था का गठन १९५७ में हुआ था.आक्रोश जिस मुद्दे को लेकर उत्पन्न होता है ,वह है
संस्था के उद्देश्यों को पाकिस्तान कितना पूरा कर रहा है,क्या ये तथ्य अमेरिका की दृष्टि से छुपा हुआ है?.परमाणु तस्करी के आरोपों को जो कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर प्रमाणित हैं,पाक का आका अमेरिका उससे अनभिग है?कादिर महोदय की कारगुजारियां सब क्षम्य हैं?भारत को दी जाने वाली धमकियाँ ,प्रायोजित आतंकवाद दिखाई नहीं दे रहा?पाकिस्तान द्वारा एकत्रित धन(सहायता के नाम पर ) कहाँ खपाया जा रहा है,ये सब अमेरिका को नहीं पता ये स्वीकारना तो असंभव है.
> ये सब तथ्य अमेरिका जानते हुए भी अनजान बनता है तो इसका कारण उसका स्वार्थ ही है,जिसके पीछे चीन से हाथ मिलाने में उसे कोई गुरेज नहीं.आखिर “शत्रु का शत्रु ही आपका दोस्त है.”इसी नीति पर चलते हुए एक ओर चीन ने पाकिस्तान को गोद ले लिया है तो दूसरी ओर अमेरिका हमको अपने वाकजाल में उलझा कर एक तरफ तो पाकिस्तान को झूठ-मूठ में डांटता है और दूसरी ओर उसकी पीठं पर थपथपाता रहता है बहकावे में आ जाते है हम, जो सब कुछ जानते हुए भी फिर उसी की ओर तकते हैं.सदा अमेरिका से सचिव,मंत्री पहले भारत आते हैं,और तुरंत पहुँचते हैं इस्लामाबाद,पाकिस्तान को मनाने के लिए अरे हम तो भारत वैसे ही चले गए थे,असली मित्र तो हम तुम्हारे ही हैं
और फिर वही होता है,एक मोटी धनराशी पाकिस्तान पहुँच जाती है विकास के लिए ,और विकास फटे हाल पाकिस्तानी जनता का नहीं परमाणु कार्यक्रम और आतंकवाद का होता है,जिससे सर्वाधिक हानि पहुँचाई जाती है हमको.रहा चीन और अमेरिका,पाकिस्तान को अपनी शरण में रख भारत को आगे न आने देना उनका एकमात्र लक्ष्य है.क्योंकि उनकी संप्रभुता को चुनौती देने वाला भारत ही है.शक्ति संतुलन बनाये रखने के लिए तथा अपनी दादागिरी को बनाये रखने के लिए चीन और अमेरिका पाक के मित्र हैं और शायद बने रहेंगे. आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उनकी अंगुली पकड़ कर चलना छोड़ अपने साधन स्वयं बढ़ाएं .जय भारत

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

atharvavedamanoj के द्वारा
September 29, 2010

आदरणीय निशा जी, सादर वन्देमातरम सत्य लिखा है आपने…वस्तुतः इस पूरे विश्व मंच पर हिंदुस्तान अकेला है …चीन,उस,पाकिस्तान,अरब के लगभग सारे देश,हमारा पडोसी नेपाल और म्यामार तथा बंगलादेश सरीखे छोटे देश भी भारत विरोधी उदाहरणों से भरे पड़े हैं…एक सामयिक और विचारोत्तेजक प्रस्तुति…धन्यवाद

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 29, 2010

    उस को usa पढ़ा जाय

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    धन्यवाद मनोज जी,मेरे विचार से पड़ोसी देशों से मधुर सम्बन्ध होना किसी देश की सफल विदेश नीति का परिणाम का परिचायक है.परन्तु कई बार अधिक शक्तिशाली देश अपना उल्लू सीधा करने के लिए साम,दाम,दंड भेद का सहारा लेकर ऐसी चालें चलते हैं कि सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं इसका निदान अपने संसाधनों का लाभ उठाते हुए स्वयं समर्थ बनना है मेरे विचार से.

samta gupta kota के द्वारा
September 29, 2010

निशा जी,विश्व-राजनीति जमीनी हकीकत पर चलती है,भावनाओं पर नहीं,महान वैज्ञानिक एवं भारत माँ के सच्चे सपूत हमारे पूर्व राष्ट्रपति महोदय अब्दुल कलम साहब ने कहा था,’power recognises power and strength respects strength’वो शक्ति आर्थिक हो,सामरिक हो या सैन्य हो,मुद्दा यह है की चीन,पाकिस्तान या अमेरिका तो हमारे प्रतिद्वंदी हैं वो हमें पीछे धकेलने के लिए सब कुछ करेंगे लेकिन हम आगे रहने के लिए क्या कर रहे हैं?भ्रष्टाचार,गैर-जिम्मेदारी,ओछी विभाजक राजनीति,मैडम विश्व राजनीति में डार्विन का ’struggle for existance’ और ’survival of the fittest’ के सिद्धांत अपने वास्तविक रूप में लागू होते हैं,बात उसी की सुनी जाती है जो उसे मनवाने की ताकत रखता है,

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    आपने शायद यदि ध्यान दिया हो तो मेरे विचारानुसार भी हमको अमेरिका या अन्य किसी भी महा शक्ति का सहारा लेना बंद करना होगा.अपने साधनों के बल पर विश्वपटल पर अपनी श्रेष्टता सिद्ध करनी होगी.मेरा उद्देश्य अमेरिका की दोगली नीति तथा स्वयं को निष्पक्ष मानने के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करना था न कि अपने देश को defend करना.प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु धन्यवाद.क्या आप अपने subject के विषय में बतायेंगी.

आर.एन. शाही के द्वारा
September 29, 2010

अमेरिका के लिये कागज़ी उद्देश्य कभी मायने नहीं रखते निशा जी । उसका आर्थिक कूटनीतिक फ़ायदा जहां दिखता है, वहां आलोचनाएं सहते हुए भी हमेशा न्याय के औचित्य को ठुकराता आया है ।

    nishamittal के द्वारा
    September 29, 2010

    आपका विचार पूर्णरूपें सत्य है,कि अमेरिका केवल अपना व्यवहारिक लाभ देखता है. उसकी पूर्ति के लिए चाहे उसे किसी भी हद तक जाना पड़े.


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