chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

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अधिकार अधिकार अधिकार

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आज एक छोटी सी पुरानी कथा से अपनी बात को शुरू करती हूँ.कथा कुछ इस प्रकार है,एक वृद्धा और उसके बुढ़ापे की लाठी उसका एकमात्र पुत्र गरीबी में अपना जीवन निर्वाह करते थे.अभावग्रस्त जीवन होने पर भी खुश थे,उनके जीवन की गाडी चल रही थी,संतोषी जीव थे.बेटा लकड़ियाँ काट कर उनको बेच कर कमाए गए धन को घर लाता था.माँ घर की व्यवस्था किसी न किसी प्रकार चला लेती थी.माँ अपने बेटे की मंगल कामना करते हुए कोई व्रत रखती थी,जिसमे कुछ मीठा बनाकर वो व्रत संपन्न करती थी. ईर्शयालू पडोसिओं से ये सहन नहीं हुआ,और जैसा की आम कहानिओं में कोई न कोई खलनायक अपने कुचक्रों से परिवार की शांति भंग करने में सफल हो जाता है. पडोसिओं ने लड़के के कान भर दिए कि तू इतने परिश्रम से धन कमाता है और तेरी माँ मिष्ठान्न खा कर सब उड़ा देती है.बुराई में सदा आकर्षण होता है.लड़के को भी ये बात बुरी लगी और उसने माँ को बुरा भला कह अपनी कमाई पर अपना अधिकार जताया.माँ तो आखिर माँ है बेटे का अमंगल कैसे सोच सकती है.उसने भूखे ही उपवास करना प्रारंभ कर दिया.कुछ समय बाद उस राज्य पर कोई संकट आयातो उसके निवारणार्थ राजा के सैनिक वृद्धा के पुत्र को घर से जबरन उठा कर ले जाने लगे.राजाज्ञा का उल्लंघन करना असंभव था अतः बुढिया ने उनको कुछ देर रुकने को कहा तथा वही मीठा पकवान जिससे वह अपना व्रत समाप्त करती थी,उसको बना कर उसको दिया और स्वयम उसके लिए प्रार्थना करने लगी.संयोग से उस दिन वही त्यौहार था.अंतत वृद्धा का पुत्र सही सलामत अपने घर वापस आ गया.
ये कथा तो पौराणिक है, परन्तु इसके उल्लेख के पीछे मेरा उद्देश्य एक बिंदु की और ध्यान आकृष्ट करना है और वह है,अधिकारजिस प्रकार वृद्धा का बेटा अपनी कमाई पर तो अपना अधिकार जताता है,परन्तु माँ के प्रति मेरा भी दायित्व है,ये भूल जाता है..आज हर व्यक्ति अपने अधिकारों को लेकर (वैध या अवैध )मरने मारने को उतारू है.यद्यपि अधिकारों के प्रति जागरूक होना भी चाहिए.जन्म ग्रहण करने से पूर्व ही व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित हो जाते हैं.माता के गर्भ से संसार में आने से पूर्व ही माता की ममता,देखभाल पर बच्चे का अधिकार होता है.तद्पश्चात परिवार के सभी सदस्यों का लाड प्यार,सामाजिक सुरक्षा,पैत्रिक संपत्ति पर अधिकार,शिक्षा-दीक्षा …………………….आदि
समाज में अधिकार व्यक्ति को स्वयं ही मिल जाते हैं.उन अधिकारों को उपभोग हम स्वत ही करते है और इतने आदि हो जाते हैं कि जरा सी बाधा आने पर तोड़ फोड़ और कुछ भी हानि पहुचाने को तैयार हो जाते हैं.
अधिकारों की इसी श्रृंखला में आते हैं संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार.ये अधिकार वें अधिकार हैं जो हमें अनिवार्य रूप से संविधान द्वारा प्रदत्त हैं इन अधिकारों में राज्य भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता.और इनकी रक्षा का उत्तरदायित्व सर्वोच्च न्यायलय को दिया गया है.ये अधिकार बिना किसी भेद भाव के सबको समान रूप से प्राप्त हैं तथा इनमे परिवर्तन भी संविधान संशोधन प्रक्रिया के द्वारा संभव है.
संविधान में व्यापक रूप से इनका उल्लेख है.संविधान के तृतीय भाग में ये वर्णित हैं.संविधान के २३ अनुच्छेदों (१२से ३० तथा ३२ से ३५ तक )इनको विस्तृत रूप से स्थान दिया गया है.हाँ इतना अवश्य है कि अधिकारों को निरंकुश नहीं बनाया गया है और विशेष परिस्तिथियों में इन पर प्रतिबंधों की व्यवस्था भी की गयी है.ये सभी अधिकार व्यवहारिक तथा समाजोपयोगी हैं वर्तमान व्यवस्था में इन मौलिक अधिकारों की संख्या ७ है.ये अधिकार (१) समानता का अधिकार,(२)स्वतंत्रता का अधिकार,(३)शोषण के विरुद्ध अधिकार,(४)धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार,(५)संस्कृति तथा शिक्षा का अधिकार (६)संवैधानिक उपचारों का अधिकार,(७)निशुल्क प्राथमिक शिक्षा का अधिकार.
इन अधिकारों के सन्दर्भ में सम्पूर्ण विवरण यहाँ प्रस्तुत करना संभव नहीं वैसे भी ये सभी संविधान में उल्लिखित हैं.इनमे समय समय पर संशोधनों द्वारा क्या नया जोड़ा या घटाया गया इसका उल्लेख भी यहाँ नहीं किया जा रहा है.हमारा संविधान २६ जनवरी १९५० को लागू हुआ. परन्तु जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है,.अधिकार तो हमको दे दिए गए लेकिन हम समाज, देश के प्रति अपने कर्तव्यों के विषय में कुछ न सोच सके.शायद हमारे संविधान निर्माताओं को हमारी मेधा,कर्तव्यनिष्ठा पर अधिक विश्वास था कि उन्होंने ये भूला दिया कि अधिकार और कर्तव्य तो एक दुसरे से जुड़े हुए हैं.अतः अधिकारों की मांग तो समय समय पात्र उठती रही परन्तु राष्ट्र के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य भी है,ये हम सोच ही नहीं सके.अंतत २६ वर्षों पश्चात इस आवश्यकता का अनुभव किया गया तथा व्यापक संशोधनों के साथ इन मूल कर्तव्यों का समावेश कर दिया गया.
इन कर्तव्यों की विवेचना भी मैं यहाँ संक्षेप में कर रही हूँ.इन मूल कर्तव्यों के अनुसार संविधान का पालन,आदर्शों,राष्ट्रप्रतीकों का सम्मान,देश की सम्प्रभ्ता,अखंडता व् एकता की रक्षा,आवश्यकता होने पर राष्ट्र की सेवा,संस्कृति,पर्यावरण की रक्षा व् संवर्धन,सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा तथा हिंसा से दूर रहना एवं व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से राष्ट्र की उन्नति का प्रयास आदि है.
परन्तु “भय बिनु होई न प्रीति” ये कर्त्तव्य कागजी बन कर रह गए हैं आज जब मानव अपने उन माता पिता या परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने में ही च्युत हो रहा है जिनके कारण उसका अस्तित्व है.वो गुरुजन जो उसका भविष्य संवारते हैं, जिस समाज में ढेरों अधिकारों का उपभोग करते हुए वह आगे बढ़ता है उनको देना भी है ये वह भूल जाता है.राष्ट्र के प्रति वह अपने कर्तव्यों का पालन करेगा ऐसी आशा करना तो बेमानी है.हमारे संविधान में कर्तव्यों का समावेश तो कर दिया गया परन्तु उनका पालन करने की कोई बाध्यता नहीं रखी गयी.यही कारण है कि संविधान का, राष्ट्र प्रतीकों का अपमान अनेक अवसरों पर होता है.राष्ट्रीय संपत्ति बसों,रेलों,सार्वजनिक भवनों को जला कर तोड़ कर करोड़ों अरबों रूपये बर्बाद कर दिए जाते हैं.नदियों को प्रदूषित करा जा रहा है,जिसके परिणामस्वरुप हमारी जीवन दायिनी नदियों का जल पीने योग्य ही नहीं रहा.वृक्षों का अंधाधुन्द कटान गंदगी,प्रदुषण के मानकों का उल्लंघन ………. अचानक ही बंद,सडकें रेलों कारोकना,चक्का जाम हमारी अर्थव्यवस्था को खोखला कर देते हैं.
मेरे विचार से कर्तव्यों का पालन अनिवार्य होना चाहिए एवं न मानने पर दंड का प्रावधान होना भी आवश्यक हो.हमको ये नहीं भूलना चाहिए की परिवार,समाज व् देश सभी क्षेत्रों में give एंड take का सिद्धांत लागू होता है.जितना हम लेते हैं उससे से अधिक भी संभव न हो तो उतना दिए बिना सर्वांगीण विकास संभव नहीं.अतः कर्तव्यपालन करते हुए अपने सभी अधिकारों का उपभोग करिए. जय भारत.

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
April 3, 2012

सारगर्भित लेख,वाडे के अनुसार आज तीन लेख पढने हैं

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
October 1, 2010

क्षमा चाहता हूँ………. की अभी तक इसको नहीं पढ़ा था…. कुछ व्यस्तता रही तो मंच पर आना नहीं हो पाया……. आपकी कहानी वास्तव में सही प्रश्न उठती है……..की हमलोग अपने माता पिता की जीवन भर की कुर्बानियों को तत्क्षण भुला देते हैं जैसे ही हम समर्थ होते हैं…………………… अच्छा लेख बधाई……….

    nishamittal के द्वारा
    October 2, 2010

    पीयूष जी अपने अमूल्य समयसे कुछ पल प्रतिक्रिया के लिए निकालने हेतु.हार्दिक धन्यवाद.

rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 30, 2010

निशा जी ; आपका उपोरोक्त विचार पढ़कर बहुत अच्छा लगा l इस लेख तथा पौराणिक कथा के जरिये आपने अधिकार और कर्तव्य के बारे में सुन्दर वर्णन दिया है l अपने माता-पिता ,बच्चे ,समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य तथा राष्ट्रिय सम्पति की रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य हैं l अच्छी पोस्ट के लिए बधाई l

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2010

    धन्यवाद रीता जी,आकी प्रथम प्रतिक्रिया हेतु .यदि कर्तव्यपालन को प्राथमिकता दी जाये तो हम परिवार,समाज देश की बहुत सी समस्याओं का समाधान करने में समर्थ हो सकेंगे.

मंसूर के द्वारा
September 30, 2010

 कृपया ‘ एक जिज्ञासा छोटी सी में ‘ मेरा मंतव्‍य देखिए।  कल ‘धर्म’ के बारे में जागरण जंक्‍शन पर एक प्रयास करूंगा। आपकी सम्‍मति मेरे लिए हितकारी  हो सकती है।

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2010

    मंसूर भाई,आपकी कोई भी प्रतिक्रिया मुझको प्राप्त नहीं हो सकी. कृपया देखें.वैसे इस योग्य मैं नहीं हूँ तथापि आपकी कोई सहयता इस सन्दर्भ में कर मुझको अच्छा प्रतीत होगा.हाँ आपकी प्रतिक्रिया जो मुझे नहीं प्राप्त हो सकी पुनः भेजने का कष्ट करें.dhanyavad

omprakash pareek के द्वारा
September 30, 2010

निशा मित्तल्जी, अधिकारों के बारे में आपका विस्तृत विश्लेषण प्रशंसनीय है. बधाई. oppareek43

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2010

    धन्यवाद पारीक जी.

आर.एन. शाही के द्वारा
September 30, 2010

निशा जी एकबार फ़िर बेहतरीन विषय के चुनाव के लिये बधाइयां स्वीकार करें । ऐसा लगता है कि अधिकार और कर्त्तव्य की ये विसमता अनादिकाल से चलती आ रही है । हर काल में व्यक्ति की सामाजिक आर्थिक एवं शासकीय हैसियत के आधार पर उसके अधिकार तो फ़िक्स किये जाते रहे, परन्तु कर्त्तव्य हमेशा लुप्त संहिताओं के ही हवाले रहे । मात्र व्यावहारिक कर्त्तव्यों की विवेचना की गई, नैतिक कर्त्तव्यों को नहीं छुआ गया, व्यक्ति के विवेक और संस्कारों पर छोड़ दिया गया कि वह खुद परिभाषित कर नैतिक कर्त्तव्यों का पालन करे । हो सकता है इसके पीछे मनीषियों की यह सोच रही हो कि नैतिक कर्त्तव्यों की कोई सीमा तो होती नहीं । किसी विकलांग व्यक्ति की सहायता करना व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है, परन्तु अलग-अलग लोग उसकी सहायता अपनी-अपनी क्षमता और सोचविचार के आधार पर ही तो करेंगे? उन्हें किसी विशेष बिन्दु पर एकसाथ कैसे बांधा जा सकता है? बधाई ।

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2010

    संभवतः इसी मंतव्य को ध्यान में रखते हुए कर्तव्यों को नहीं छुआ गया.परन्तु अब ये समझ लेने के बाद,कि देने में नहीं आज हमारी सोच केवल मात्र ग्रहण करने में है.कर्तव्यों को महत्त्व दिया जाना आवश्यक है.


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