chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

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सच तो सच है

Posted On: 1 Oct, 2010 Others में

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तनातनी का माहौल चल रहा था
, आशंकाओं के बादल घिर रहे थे,
दिलों में विचारतो कुछ दुसरे थे,
जवान पे शब्द आ बदल रहे थे.
मंदिर बन जाये वहां बोलते थे,
मस्जिद सेगुरेज न कर रहे थे,
ये शब्द बोलने ओ लिखने के थे,
मन राम रहीम की जय बोलते थे.
जन्मभू राम की है जज बोले थे,
आशाओं के पुष्प खिल गए थे,
मन मयूर नाच उठे सबके थे,
मिठाई बाँट खाने में जुटे थे.
आज प्रश्न मन में मेरे उठे थे,,
क्यूँ खुल कर बोले न थे तब
घुमा फिराकर बात करते थे,
सच बोलने में क्यूँ डर रहे थे.
ये टूटी फूटी पंक्तियाँ प्रस्तुत करते समय एक बात स्पष्ट कर दूं न तो मै कविता लिखती हूँ न ही मुझको कविता रचने के नियमों का ज्ञान है.अतः त्रुटियों पर न जा मेरे उन विचारों पर मंथन करें,जिनकी प्रष्टभूमि ये है,कई दिन से जो गहमागहमी सर्वत्र चल रही थी,भय व्याप्त था,मीडिया,सरकार,जनता,आम आदमी,बुद्धिजीवी सब की चर्चा का विषय एक ही था अयोध्या.आश्चर्य इस बात का था जब सब के बीच बात होती थी ,तो सब कहते दीखते थे अरे इश्वर,अल्लाह सब एक ही हैं शांति रहनी चाहिए,कल जब फैसला आया तो सब के सुर बदल रहे थे.तब लगा कि हमारी छवि न बिगड़े इसलिए सब ये जानते हुए भी कि सच क्या है,बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे .तब मन में ये विचार आया कि पढ़े लिखे होने के बाद भी दूसरा आवरण क्यों चढ़ाये रखते हैं.धर्म निरपेक्ष विचार रखना अलग बात है और सच का सामना करना वो सबके बस का नहीं.
ये निर्विवाद सत्य है कि ईश्वर एक है,अपने अपने रास्ते पर चलते हुए दुसरे के रास्ते में रोढा न बने.स्वयं भी शांति से रहें और अन्यों को भी शांती प्रेम से रहने दें. जय भारत

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
April 3, 2012

आपके इस आलेख ने मुझे १९९२ की आँखों देखी अयोध्या के जलजले की याद दिला दी.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 5, 2010

निशा जी … प्रणाम , कविता नहीं न सही … मगर इस अभिव्यक्ति ने आपके मन में कही छुपे कवि के भावो को अभिव्यक्त कर दिया है… क्योकि यह कवि मन ही होता है जिसकी संवेदना ऐसे मौको पर बहुत मुखरित होती है.. अच्छी रचना है ..

    nishamittal के द्वारा
    October 6, 2010

    धन्यवाद निखिल जी,प्रोत्साहन हेतु.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 1, 2010

आदरणीया निशा जी नमस्कार……दिलों में विचारतो कुछ दुसरे थे, जवान पे शब्द आ बदल रहे थे……….बहुत सुन्दर सन्देश देती कविता,धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    October 1, 2010

    धन्यवाद तिवारी जी,कविता लिखनी नहीं आती परन्तु थोडा अलग लिखने का मन था.प्रोत्साहन हेतु धन्यवाद.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 1, 2010

सर्वग्राही और विवेकशील संदेश के लिये साधुवाद निशा जी ।

    nishamittal के द्वारा
    October 1, 2010

    शाही जी,प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.यदि आप कमियों की ओर ध्यान दिलाएं तो प्रोत्साहन लाभदायी भी सिद्ध होगा.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
October 1, 2010

निशा जी………. वास्तव में यहाँ इंसान ने दुहरा चरित्र अपना रखा है……… मंच पर गाँधी का नाम लेने वाले नेता भी अपनी हिफाजत के लिए सुरक्षा कर्मियों के बाद खुद भी बन्दुक रखते हैं ………. जबकि उनको शायद कोई खतरा भी न हो…………. तो भी …………. अच्छे विषय पर लिखने के लिए हार्दिक बधाई ……………..

    nishamittal के द्वारा
    October 1, 2010

    धन्यवाद पीयूष जी,प्रोत्साहन हेतु.


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