chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

307 Posts

13097 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2711 postid : 100

सच्ची श्रद्धांजली बापू को,अवकाश नहीं काम.

Posted On: 2 Oct, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

आज जो विषय आप सबसे साझा करना है ,शायद अधिकांश जनों विशेष रूप से सरकारी सेवारत कर्मचारिओं को पसंद न आये,परन्तु मेरे मस्तिष्क में क्रोंध रहाहै अतः जागरण के माध्यम से आप सब के समक्ष प्रस्तुत है.
हमारे देश विशेष रूप से उत्तरप्रदेश में ये परम्परा है,महापुरुषों के जन्मदिवस पर अवकाश की. सत्ता में आते ही सभी दल या राजनेता अपने अपने वर्ग को संतुष्ट रखने के लिए अवकाश की घोषणा को अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं.धीरे धीरे ये सूची बढ़ती जा रही है,पर इसको रोकना बिल्ली के गले में घंटी बांधना है अतः कोई आसार नज़र नहीं आते कि इस पर लगाम लग सकेगी.
आज समाचार पत्र में पढ़ा कि महात्मा गांधी ने पुनः पुनः इस तथ्य पर बल दिया था कि उनके जन्मदिवस को अवकाश न घोषित किया जाए.उनका कथन था कि न तो मेरे जन्मदिवस को अवकाश घोषित किया जाए न ही मेरी प्रतिमा चौराहे पर लगाई जाएँ.उनके विचार से ऐसा होनेपर उनको घोर निराशा होगी.परन्तु हमने उनके विचारों का खुले आम तिरिस्कार करते हुए धड़ल्ले से प्रतिमाएं भी लगवाईं तथा राष्ट्रिय अवकाश भी घोषित किया.ये अलग तथ्य है कि कभी किसीनेता आदि के आगमन पर उसकी धुल झड जाती हो अन्यथा प्रतिमाओं की दुर्गति आप अपने नगरों में स्वयं देख सकतें हैं.(अपवाद गण्य नहीं होते )
क्या अवकाश घोषित कर महापुरुषों के प्रति हम विशेष सम्मान प्रर्दर्शित करते हैं.हमारे अग्रगण्य महापुरुषों ने संघर्ष किया या बलिदान दिए देश को स्वतंत्र करने हेतु या देश कि समस्याओं का समाधान कर विकास के पथ पर अग्रसर करने हेतु.उनके महान कार्यों के प्रति हम सदा नतमस्तक हैं,.कभी ऊरिन नहीं हो सकते.सम्मान प्रर्दर्शन हेतु अन्य माध्यम भी खोज सकते हैं.अवकाश घोषित करनेसे जितने working hours की हानि होती है क्या ये देश को विकास मार्ग पर ले जा सकता है ?और इसी प्रकार तो ये सूची इतनी बढ़ जायेगी कि अवकाश ज्यादा और कार्य घंटे कम होंगें महापुरुष तो विश्व में सभी देशों में रहे हैं,परन्तु विचार करिए क्या इस प्रकार अवकाश के माध्यम से वहां राष्ट्रीय विकास को बाधित किया जा रहा है? राष्ट्रीय विकास बाधित होने से हमारे महापुरुषों की आत्मा को शान्ति मिलेगी?
ये तो रही जन्मदिन पर अवकाश घोषणा, इसी क्रम में यदि हम विचार करें तो अवकाश के नाम पर हमारे देश में सर्वप्रथम प्रभावित होती है विद्यालयों, महाविद्यालयों का शिक्षण.चुनाव हो तो अवकाश,गत कुछ वर्षों से चुनाव ड्यूटी के कारण विद्यालयों में अवकाश घोषित हो जाता है शिक्षण संस्थाओं में चुनाव के लिए सैनिक अर्धसैनिक बल रूकने के नाम पर लम्बी छुटी घोषित हो जाती है.क्यूंकि चुनाव कई चरणों में होते हैं,अतः पूरे समय बाधित होती है पढाई राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोमन वेल्थ खेलों के नाम पर इतना अवकाश यही दर्शाता है कि हम अपने विकास,अपनी शिक्षा के नाम पर कितने गंभीर हैं.
वास्तविक अर्थों में राष्ट्र को आगे ले जाने के लिए अपने निहित स्वार्थों,से ऊपर उठकर राजनेताओं,स्वयं जनता को आगे आना होगा. विकास को प्राथमिकता देनी होगी.यही संकल्प यदि हम आज ले सकें तो पूज्य बापू के जन्मदिवस पर सर्वश्रेष्ट श्र्द्धाजली होगी.जय भारत.

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

5 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
April 3, 2012

कितने आवश्यक विषयों पर आपने लेखनी चलाई है शुक्रिया निशाजी.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 2, 2010

निशा जी कभी कहीं पढ़ा था कि भारत देश के विकास के अवरोध में यहां की छुट्टियां भी प्रमुख कारक हैं, वह बिल्कुल सत्य है । इस व्यवस्था की जनक भी सभी बुराइयों की तरह राजनीति ही है । जिसने जब सत्ता संभाली अपनी निष्ठा प्रमाणित करने के लिये छुट्टियां बढ़ाते चले गए । इसमें कटौती का प्रयास भी कभी कोई नहीं करने वाला, क्योंकि हर छुट्टी के साथ किसी पार्टी, किसी वर्ग या किसी समुदाय की कथित भावनाएं जुड़ी हुई हैं, जिनसे खेलकर कोई अपने जनाधार पर पंगा नहीं मोल लेगा । इन्हीं बातों में भारत उलझा रहा है, और उलझा रहेगा । बधाई ।

    nishamittal के द्वारा
    October 2, 2010

    सत्ता की राजनीती देश को विकास के मार्ग पर कैसे ले जायगी ,प्रश्न तो यही है शाहीजी.,स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए, देश की चिंता वर्तमान में किसी राजनेता को नहीं .ऐसा ही प्रतीत होताहै.प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

abodhbaalak के द्वारा
October 2, 2010

निशाजी आज इस तरह के अवकाश केवल ढकोसला रह गए हैं, हम गाँधी जी की दी हुई शिक्षा को तो भूल गए हैं बस उनके जन्म दिन को खाना पूर्ती का माध्यम बना कर रख दिया है. आपने सही कहा है की अगर हम विकास को प्राथमिकता देन तो बापू को येही सही श्रधांजलि होगी पर क्या आजके वातावरण में ये संभव है? http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 2, 2010

    आशावादी बनते हुए तो यही आशा करनी चाहिए की ऐसा हो ,परन्तु यथार्थ में कोई भी सरकार ये जोखिम उठाने का साहस करेगी नहीं लगता.यदि ऐसा हो सका तो देश को विकास के मार्ग पर ले जाने में मील का पत्थर सिद्ध होगा.प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद.


topic of the week



latest from jagran