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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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इनका जीवन खुशियों से भर दें.(जीवन का अधिकार दें )

Posted On: 12 Oct, 2010 Others में

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एक बार पुनः नवरात्र तथा विजय दशमी की मंगलकामनाएँ.आजकल सम्पूर्ण देश में किसी न किसी रूप में नवरात्र पर्व धूम धाम से मनाया जा रहा है.घर घर में जगत जननी का आहवान,स्थापना पूजा पाठ,मंगल कलश की स्थापना आदि चल रहे हैं.स्वरुप भले ही भिन्न हो परन्तु ये दिन बहुत पवित्र माने जाते हैं . नवरात्र के दिनों में माँ के नव रूपों की पूजा अर्चना होती है.तद्पश्चात .कन्या पूजन कर,यथा शक्ति अपनी श्रद्धा समर्पित कर माँ की कृपा प्राप्त करते हैं.

एक ओर तो माँ की आराधना करते हैं हम कन्या के रूप में.और दूसरी ओर उस कन्या को जन्म ही नहीं लेने देते या फिर जन्म ग्रहण करने के बाद व्याध बन उसकी हत्या कर देते हैं,शिक्षा,अच्छे खानपान से बंचित रखते हैं.हर स्तर पर लड़के की तुलना में उसके साथ भेद भाव होता है.यहाँ एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि संभवतः शहरी परिवारों मेंऐसे उदहारण आपको कुछ कम मिलें,(यद्यपि iये संख्या भी बहुत कम है क्योंकि अधिकांश परिवारों में पुत्रमोह किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान है) परन्तु समस्या तो हमारी उस मानसिकता को लेकर है जिसके चलते कन्या की महत्ता को तो स्वीकार करते हैं,उसकी पूजा तो कर सकते हैं उसको देवी बनाकर,कन्या दान का महत्त्व जो हमारे शास्त्रों में वर्णित है,उसकी भी चर्चा तो कर सकते हैं,विशिष्ट अवसरों पर दान दक्षिणा के रूप में (परिवारों में कोई भी शुभ कार्य होने पर ) उसको धन वस्त्र आदि देते हैं परन्तु कामना पुत्र की करतें हैं ,तारनहार पुत्र को ही मानते हैं.
बहुत विचार करने पर अन्य सम्बंधित जनों से चर्चा करने पर जो कारण सामने आये उनके अनुसार आज की इस भयावह,घृणित,जघन्य कन्या भ्रूण हत्या या फिर कन्या हत्या या फिर दुसरे शब्दों में पुत्र की ही कामना करने के पीछे प्रमुख कारण निम्नांकित हैं;
(१) हमारी मूल मानसिकता ,जिसके अनुसार पुत्र के बिना मुक्ति नहीं होती क्योंकि लोक परलोक की सदगति पुत्र से ही संभव है)
(२) देश के कुछ भागों में संपत्ति के बंटवारे को लेकर बने हुए कायदे कानून.
(३)माता पिता को पुत्री की सुरक्षा की चिंता जिसके अनुसार लडकी के किसी भी प्रकार का शारीरिक शोषण आदि का शिकार होने पर पुत्री का भविष्य अंधकारमय हो जाता है तथा परिवार की बदनामी होती है.
(४)दान दहेज़ का कोढ़ तथा विवाह संस्कारों में होने वाला बेतहाशा अपव्यय .
(५)पुत्री को शिक्षित करने के पश्चात् भी उसके विवाह की चिंता………..(६)..उनका भरण पोषण करने की जिम्मेदारी से बचना भी एक कारण है क्योंकि वो कमाऊ सदस्य नहीं हैं ……
(७ )परिवारों का घटता आकार भी इस समस्या का एक कारण है.
हाँ,एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि मेरा विरोध पुत्र से नहीं है अपितु कन्या हत्या से या फिर उसको संसार में आनेसे रोकनेको लेकर है.
( उपरोक्त कारणों का समाधान खोजना,मानसिकता में परिवर्तन लाना दूसरा विषय है अतः उस पर विचार दुसरे आलेख में करना उत्तम होगा)
इन्ही कारणों से आज स्तिथी यहाँ तक पहुँच गयी है कि लड़कियों का जन्म अनुपात दिनोदिन लड़कों की तुलना में घटता जा रहा है जिसके चलते समाज में असंतुलन बढ़ता जा रहा है.ये असंतुलन कितनी नयी समस्याओं को जन्म देगा इसका अंदाजा लगाना ही रोंगटे खड़ा कर देने वाला है.महिलाओं की असुरक्षा में और अधिक वृद्धि,लड़कों की विवाह की समस्या और इसके चलते कुंठाएं,यौन अपराध बढेंगें समाज का ढांचा और विकृत होगा और न जाने ………………
कन्या भ्रूण हत्या की समस्या तथा कन्या बध जैसी कुप्रथाएँ ग्रामीण भागों में तो और भी अधिक हैं अभी कल ही मेरी हरयाणा की एक महिला अधिकारी से बात हो रही थी जिसने बताया कि पुत्र न होने पर पति का दूसरा विवाह निश्चित है.यदि प्रथम संतान पुत्री है तो दूसरी संतान के समय ultrasound या सोनोग्राफी आदि टेस्ट के माध्यम से लिंग ज्ञात करके लडकी होने पर गर्भपात कराया जाना निश्चित है.सारे नियम कानूनों को तक पर रखकर उपरोक्त टेस्ट धड़ल्ले से होते हैं.यहाँ तक की गर्भपात करते समय महिला के जीवन को भी खतरे में डाल दिया जाता है
इस समस्या को समाप्त करना दुरूह तो है असंभव नहीं.स्वयंसेवी संघटनों द्वारा युद्ध स्तर पर अभियान चलाया जाना,सरकारी कानूनों को कठोरतम बना उनका ईमानदारी से पालन कराया जाना,हमारा स्वयं में ईमानदार हो अन्यों को प्रेरित करना आदि के माध्यम से यदि प्रयास किया जाये तो सफलता भी मिलेगी ही..
यदि हम वास्तव में माँ जगत्जननी की आराधना कर रहे हैं.माँ के स्वरूपों की सच्ची पूजा तो यही है कि हम उन कन्याओं को जन्म लेने के अधिकार से वंचित न करें.उनको ससम्मान यथाशक्ति सम्पूर्ण साधन उपलब्ध करा आत्मनिर्भर बनने दें.यही हमारा माँ को प्रस्सन करने का उपयुक्त मार्ग है,यही सरस्वती,दुर्गा व माँ लक्ष्मी की उपासना है.

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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 13, 2010

आदरणीय निशा मित्‍तल जी, धन्‍यवाद, बहुत ही अच्‍छा विषय चुना है। कन्या भ्रूण हत्या आज के आधुनिक समाज में एक सामाजिक कलंक तो है ही क्‍योंकि इतना शिक्षत होने के बाद भी इन्‍सान कुछ दकियानूसी विचारों के कारण पुत्र पाने की अपनी लालसा नहीं छोड़ पाता है। औरो के विषम में नही तो मैं अपने ही विषय में कहुंगा मै अपने माता पिता कि अकेली संतान हूं। मेरी तीन बेटीयां है, एक 23 साल की एक 19 साल और तीसरी 7 साल की। दो बेटीयों के होने के बाद भी मैं खुश था। किन्‍तु बड़े बुजुर्गो के दबाव आदि में आकर मैने एक बार फिर प्रयास किया और अल्‍ट्रासाउंड मे भी पता चल गया की तीसरी लड़की है पर मेरी पत्‍नी नही मानी के हम हत्‍या नहीं करेंगे। जो है वह भगवान की मर्जी है। आज वह दोनो बेटीयों से भी ज्‍यादा लाडली है। मेरे कई नजदीकी मित्र एव सहकर्मी एसे है जिन के केवल एक ही लड़की है और वह उसी से संतुष्‍ट है। तो देख कर लगता है शायद लोगों को आज समझ आ रही है।

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2010

    आपकी पत्नी को मेरा नमन. ऐसे लोग बहुत कम है जो अपनी सोच व्यापक बना सके हैं.यद्यपि उदहारण बहुत कम हैं परन्तु श्री गणेश होगा तो यात्रा आगे भी जायेगी ,अतः आशावादी बने रहिये समय बदलेगा कभी न कभी.

s.p.singh के द्वारा
October 13, 2010

निशाजी एक अच्छे विषय पर ध्यान आकर्षित करने के लिए धन्यवाद , इस विषय में मेरा तो यह मानना है कि कन्या भ्रूण हत्या एक सामाजिक कलंक तो है ही पर इस अपराध को करने वालों को जब सजा नहीं मिलती तो उनका उत्साह और बढ़ जाता है – और इसमें सबसे बड़ा दोष तो उन महिलाओं का ही है जो पुत्र कि चाह में अपने परिवार या अपने पति के अपराध में शामिल हो जाती है और अपनी भावी अनुकृति को जन्म लेने से पहले ही समाप्त कर देतीं हैं | मेरी समझ से कन्यायों/स्त्रियों कि उपेक्षा का एक बड़ा कारण हमारी सामाजिक संरचना भी है क्योंकि हमें यही सब सिखाया जाता है कि” कन्या तो पराया धन है ” ” एक दिन इसे ससुराल ही जाना है ” मैंने तो बहुत से घरों में यहाँ तक देखा है लडके/पुत्र के लिए अच्छा भोजन अच्छे कपडे आदि कि सुचारू व्यस्था कि जाती है वहीँ कन्याओं की उपेक्षा कि जाती है- जैसे की इस पुरुष प्रधान देश में जब संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात आई तो कुछ नेताओं का आचरण सब लोगो ने देखा है | लेकिन वर्तमान में इसमें कुछ कमी भी दिखती है – जो कि परिलक्षित भी हो रही है जहाँ हमारे देश में ये सबकुछ हो रहा है वहीँ दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में राष्ट्रपति, स्पीकर, यु पी ए कि चेयर परसन विपक्ष की नेता सब की सब स्त्रियाँ ही है जो एक गर्व की बात है – अभी यह पोस्ट लिखते समय समाचार पात्र पर नजर पड़ी उसमे छपा था मध्य प्रदेश की एक ३४ वर्षीया महिला प्रीति ने मुंबई महानगर की जीवन “रेखा लोकल ट्रेन ” रेल विभाग में चालक बन गई और चर्च गेट से बोरीवली तक ट्रेन चला रही है., है न गर्व की बात – धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2010

    परिवर्तन तो है परन्तु समाज पुरुष प्रधान है और नारी स्वयं अपनी सोच नहीं बदल पाती. कभी कभी तो वह विवश होती है परन्तु ऐसा भी देखा गया है की इस कृत्य में उसकी भी भागीदारी होती है.प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

roshni के द्वारा
October 12, 2010

निशा जी मै तो इतना कहुगी की जो लोग कन्या हत्या करते है उन्हें समाज से निष्काषित कर देना चाहिए……. यु तू देवी दुर्गा को पूजते है पर जीते जागते इंसान को मारते है , .. माँ दुर्गा सब को सदबुधि दे .. मेरी तो यही प्राथना है .. आभार सहित

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2010

    यही विडंबना है कि देवी माँ का स्वरुप मान कर भी हम कन्या को जीवन का अधिकार ही नहीं देते.प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

chaatak के द्वारा
October 12, 2010

आदरणीय निशा जी, आपके लेख में लिखी हुई समस्याएं निःसंदेह भयावह है और लिंग-भेद ने जिस दुश्चरित्र समाज को जन्म दिया है उसकी सही तस्वीर भी प्रस्तुत करती है लेकिन विश्लेषण में एक स्थान पर काफी बड़ी अध्ययन और विश्लेषण की गुंजायश शेष है मैं कहूंगा कि आप जैसे कुछ स्पस्ट वक्ता और स्पष्ट सोच वाली स्त्रियाँ इस सन्दर्भ में संज्ञान लें | कन्या भ्रूण हत्या आज भी कम पढ़े-लिखे, दकियानूसी और देहाती कहे जाने वाले समाज में न के बराबर हैं | इनकी संख्या अपने आपको आधुनिक कहने वाले और प्रबुद्ध वर्ग में अधिक है | गर्भपात जैसे अपराध और अंधाधुंध दहेज़ की मांग से लेकर दहेज़ हत्या तक में समाज का अभिजन वर्ग अग्रिणी है | सर्कार और समाज सुधारकों के द्वारा किया जाने वाला प्रयास असफल इसीलिए हो रहा है क्योंकि उसका ध्यान पूरी तरह से मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग पर केन्द्रित हैं जबकि इस बीमारी से पीड़ित पक्ष उच्च वर्ग और नव-धनाढ्य वर्ग है | अच्छे और सार्थक लेखन पर बधाई!

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2010

    चातक जी, आपने सही कहा कि उपरोक्त समस्या तथाकथित आधुनिक व प्रबुद्ध वर्ग में अधिक है परन्तु ये मैंने साथ ही लिखा है. लेकिन शायद इस पॉइंट को अधिक highlight न करने के कारण थोडा भ्रम है आपके सुझाव के अनुसार अपनी अग्रिम पोस्ट में स्पष्ट करने का प्रयास करूंगी परामर्श हेतु धन्यवाद.इस मंच पर चर्चा का औचित्य ही यही है कि कुछ राष्ट्र,समाजोपयोगी तथ्य सामने आयें तथा समाधान निकले.

daniel के द्वारा
October 12, 2010

निशा जी ! समस्या के सात कारण आपने गिनाये है ! आठवां मैं और जोड़ना चाहूँगा :~ पुत्र प्राप्ति पर जो मानसिक संतुष्टि माता – पिता आदि को मिलती है , वह पुत्री के जन्म पर नहीं मिलती ! कई पुत्रों के माता पिता अनेक पुत्रों के कारण स्वयं को गौरवान्वित महूस करते है, परन्तु पुत्रियों की स्थिति में ऐसा नहीं होता !! मैंने अपने अनुभव में यह पाया है कि यह आठवां कारण वहां भी उपस्थित होता है, जहाँ आप द्वारा गिनाये गए सातों कारणों में से कोई भी न हो, और यह अत्यंत आश्चर्य जनक है !!!

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2010

    डेनिएल जी, समाज में संतुलन बनाये रखने हेतु दोनों (लड़का -लड़की) का महत्त्व समान है.मानसिकता बदलने के लिए जाग्रति तो समाज में लानी होगी.कारण चाहे जो भी हों अबोध कन्या की हत्या करते समय उनका दिल या हाथ नहीं कांपते?आश्चर्य है. पुत्र से संतुष्टि मिलती है पुत्री से नहीं ऐसा है,परन्तु सोच बदलनी तो चाहिए न.प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 12, 2010

आदरणीया निशा जी,बिलकुल सही है यह बात आज समाज के काफी बदल जाने के बाद भी कही न कही ये भेद भाव जरुर दिख जाता है,और दान दहेज़ वाली समस्या ये तो………………..एक ज्ञानवर्धक पोस्ट,बधाई!

    nishamittal के द्वारा
    October 12, 2010

    दहेज़ पर अब जल्दी ही पोस्ट मिलेगी.प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

aftabazmat के द्वारा
October 12, 2010

निशाजी आपने बिलकुल सच्ची पोस्ट लिखी है. हम आज भले ही कितनी भी बड़ी बड़ी बातें करें लेकिन ये सच्ची है की आज भी बेटे के होने पर ही जश्न मनाया जाता है. बधाई..aftabazmat.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 12, 2010

    धन्यवाद आफ़ताब भाई आपकी प्रथम प्रतिक्रिया हेतु.

Anita Paul के द्वारा
October 12, 2010

निशा जी, आप नारी हैं इसलिए नारी दुख को बेहतर समझ सकती हैं. अभी मैंने अपनी भी व्यथा लिखी है और चाहुंगी कि आप जरूर मेरा ब्लॉग पढ़े और अपनी राय जाहिर करें. यकीनन पुरुषों की दुनियां में हम नारियां किस तरह से शोषित हो रही हैं ये हमें पता है फिर भी अगर कोई आवाज उठाए तो उसे दोषी बनाने में सारे पुरुष एकमत हो जाते हैं.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 12, 2010

दान-दहेज़ की समस्या का आपने उल्लेख किया है । एक लाइन में है इसलिये ध्यान नहीं गया ।

आर.एन. शाही के द्वारा
October 12, 2010

निशा जी आपकी चिन्ता और कारणों का विश्लेषण दोनों ही वाज़िब हैं । इसमें परम्परागत मान्यताओं और रूढ़िवाद के अतिरिक्त और किसी को दोष दिया भी नहीं जा सकता । एक जो सबसे बड़ी समस्या कन्या भ्रूण हत्या के प्रति जवाबदेह है, उसका आपने उल्लेख छोड़ दिया । वह दहेज की समस्या है, जो भारत के कुछ कुनबों को छोड़कर लगभग पूरे भारत में अपने निकृष्टतम स्वरूप में सामने है । शहरों में वास्तव में सोचविचार का थोड़ा बदलाव दृष्टिगोचर हो रहा है । यदि कन्या अच्छी नौकरी से लग जा रही है, तब तो थोड़ा आसान हो जा रहा है, अन्यथा पढ़ाई-लिखाई के बावज़ूद दहेज़लोलुपता पर कोई असर नहीं हो रहा । अकेले इस कारण से ही दहेज़ के भय से दहल जाने वाले माँ-बाप लड़की की पैदाइश से ही पीछा छुड़ाना अधिक आसान रास्ता समझते हैं । शेष सारी बातें परम्परागत और आज की व्यावसायिक मानसिकता से संबद्ध हैं । समाज कन्या को सिरदर्द और पुत्र को बुढ़ापे का सहारा मानकर आरम्भ से ही चलता आ रहा है । समाधान समय के हवाले है । आंदोलन तो चलते ही रहते हैं । आंदोलनों के झंडाबरदार ही सबसे अधिक दहेज मांगने के दोषी होते हैं । धन्यवाद ।

    nishamittal के द्वारा
    October 12, 2010

    मान्यवर शाही जी,आपने दहेज़ की जिस समस्या को आपने छोड़ने की बात कही है वह सत्य है परन्तु मुझको लगा कि दहेज़ के विषय में पृथक से लिखना बेहतर होगा क्यों कि दहेज़ की समस्या अपने आप में इतनी विकराल है यहाँ उसको विस्तृत रूप में प्रस्तुत करने से शायद ये विषय दहेज़ पर ही केन्द्रित हो जायेगा.बहुत शीघ्र मेरे छोटा सा लेख दहेज़ पर आएगा आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप शायद .

    nishamittal के द्वारा
    October 12, 2010

    शाही जी,वैसे मैंने समस्या के मूल कारणों को गिनाते हुए लिखा है कि कारणों पर विचार पृथक से करूंगी.

abodhbaalak के द्वारा
October 12, 2010

निशा जी, इस विषय को आपने बहुत ही सच्चाई के साथ लिखा है, वास्तव में हमें मिल कर इसके लिए कदम उठाना होगा, तब ही जा कर हम सफल हो पाएंगे, केवल दूसरों पर दोषारोपण से कुछ लाभ नहीं होगा, सराहनीय और प्रासंगिक लेख, बधाई होगा, http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 12, 2010

    धन्यवाद ,कोई भी संस्था,व्यक्ति या सरकार द्वारा अकेले किसी समस्या का समाधान करना संभव नहीं.सामूहिक प्रयास ही सफलता दिला सकते हैं.


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