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समाज को मुक्ति दिलाएं इस असाध्य रोग से (दहेज़)

Posted On: 14 Oct, 2010 Others में

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” एक माँ ने अपनी ३ बेटिओं के साथ जहर का सेवन कर लिया बेटिओं ने दहेज़ की व्यवस्था के अभाव में विवाह न होने के kaaran आत्महत्या कर ली,विवाहिता ने कीटनाशक का सेवन कर लिया,ससुराल वालों की प्रताड़ना से परेशां हो कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी” ऐसे समाचार आये हमें दिन टी.वी.,समाचार पत्रों के माध्यम से .ज्ञात होते हैं,पढ़ कर दुःख भी होता है जब ये पता चलता है कि इन सब का मूल है दहेज़ प्रथा .
दहेज़ प्रथा क्या है, हमारे समाज में किस प्रकार अस्तित्व में आयी,इसका स्वरुप किस प्रकार विकृत हुआ इन बिन्दुओं पर थोडा विचार करना अनिवार्य है.
दहेज़ प्रथा किसी न किसी रूप में हर समाज में विद्यमान रही है यूं तो राजा महाराजाओं के सन्दर्भ में पुत्री को विवाह के समय दान दहेज़ कि परम्परा पौराणिक कल से चली आ रही है,अपने राज्य का कुछ भाग,घोड़े, हाथी,आभूषण,वस्त्रालंकार,दास दासियाँ आदि पुत्री को विवाह के समय कन्या दान व दहेज़ के रूप में देने का उल्लेख मिलता है.परन्तु जन सामान्य में इस प्रथा का कोई उल्लेख नहीं मिलता.(यदि आपकी दृष्टि में ऐसा कोई विवरण हो तो कृपया बताएं )
रामचरित मानस में शिव विवाह के अवसर पर कहा गया है;
“दासी दास तुरग रथ नागा. धेनु वसन मणि बस्तु बिभागा.
अन्न कनकभाजन भरी जाना.दाईज दीन्ह न जाई बखाना.”
इसी प्रकार श्री राम सीता विवाह के अवसर पर भी वर्णन है;
” कही न जाई कछु दाईज भूरी. रहा कनक मणि मंडप पूरी.”
इसके पश्चात भी कुलीन परिवारों में दान दहेज़ दिए जानने का उल्लेख है.चूँकि हमारे यहाँ कन्या दान की परंपरा रही है अतः अधिकतर समाजों में किसी न किसी रूप में विवाह के अवसर पर पुत्री को यथाशक्ति वस्त्र आभूषण गृह उपयोगी सामान माता पिता स्वेच्छा से देते थे.इसके अतिरिक्त पहले पुत्री का संपत्ति में कोई भाग नहीं होता था .अतः विवाह के अवसर पर तथा अन्य विशिष्ट अवसरों पर,त्योहारों पर कन्या को अवश्य दिया जाता था.
दहेज़ प्रथा का मौलिक स्वरुप अपने आप में एक आदर्श था हमारी संस्कृति के अनुसार.किस प्रकार एक अच्छी व्यवस्था विकृत हो आज एक असाध्य रोग बन चुकी है.दहेज़ के अभाव में सुशिक्षित कन्याओं का विवाह न हो पाने के कारण माता-पिता का दुःख,स्वयं लड़कियों का नैराश्य ,भ्रष्टाचार को बढ़ावा आदि अनगिनत समस्याएँ दिनोदिन बढ़ रही हैं.
दहेज़ प्रथा के सन्दर्भ में एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि वही माता -पिता जो .पुत्री के विवाह के अवसर पर दहेज़ को कोसते हैं,पुत्र के विवाह के अवसर पर उनके स्वर बदले हुए होते हैं.
आज जब लड़कों की बोलियाँ लगती हैं,लड़के की पोस्ट ,आर्थिक स्तिथी के अनुरूप ये राशि बढ़ती है. ये समस्या विकराल होती जा रही है मध्यमवर्गीय परिवारों में,जहाँ इतने दहेज़ की व्यवस्था करना बूते से बाहर की बात है.विडंबना तो ये कि लड़के के माँ-पिता की दलील दहेज़ मांगने के पीछे ये रहती है कि उन्होंने अपने लड़के को योग्य बंनाने में व्यापार करने में पैसा लगाया है अतः उनको उसकी कीमत चाहिए. प्रश्न तो यह है कि आज जितने शिक्षित लड़के हैं उतनी ही शिक्षित लड़कियां भी,जितनी आय लड़के की है उतनी ही लडकी की भी.यहाँ तक कि लड़का लडकी दोनों M D डॉक्टर हैं परन्तु दहेज़ देगा लडकी वाला.उनके जीवन के ऐशो-आराम की व्यवस्था दहेज़ से होगी.बेशर्मी का चरम तो तब दिखाई देता है जब रिश्ते की बात प्रारम्भ होने पर पहले तो अपनी डिमांड बता दी जाती है उस पर सौदेबाजी होती है.
विवाह के अवसर पर फेरों जैसे प्रमुख अवसर पर अपनी मांग प्रस्तुत कर देना एक और वज्रपात कर देता है लडकी के माता-पिता पर.जहाँ अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए कन्या पक्ष विवश होता है उनकी मांग पूरेरे करने के लिए.
दहेज़ समस्या का एक पक्ष और भी है,जहाँ कुछ आदर्श लोग दहेज़ के विरोधी होते है दहेज़ नहीं लेते परन्तु कन्या पक्ष अपनी प्रतिष्ठा,दिखावे के लिए किसी न किसी रूप में देता है,यही कारण है किदिखावे के चलते वो तर्क प्रस्तुत करते हैं कि हम स्वेच्छा से दे रहे हैं.इसमें बुराई भले ही न हो लेकिन इस तरह समस्या समाप्त होना कठिन है . एक पहलू और जो दहेज़ को बढ़ावा को देता है कुछ परिवारों में स्वयं लड़कियों की इच्छा कि हम स्वयं अधिक से अधिक सामान ,वस्त्र आभूषण लेकर जाएँ जिससे
ससुराल में जरा रोब रहे.अतः वो अधिक से अधिक खरीदारी करती हैं.
अंतत समस्या बढ़ती जा रही है,जिन समाजों में ये व्यवस्था नहीं थी वहां भी प्रारम्भ होती जा रही है.यही कारण है कि दहेज़ निरोधक कानून लागू होने के बाद भी खुले आम दहेज़ की मांग बढ़ रही है,दहेज़ लेकर कानून का मज़ाक बन रहा है.
दहेज़ के साथ जुडी एक समस्या आज विवाह के समय वैभव प्रदर्शन तथा दिखावे में जो धन पानी की भांति बहाया जाता है समस्या को बढाता है.वर तथा कन्या पक्ष दोनों ही इस दिखावे से बच नहीं पाते और रोग बढ़ता जा रहा है.यही कारण कि कन्या जन्म को माता-पिता एक अभिशाप मान रहे हैं.
इतना सब होने के बाद भी विवाह के पश्चात भी दहेज़ को लेकर जो काण्ड होते हैं उनसे तो लड़कियों का जीवन ही संकट में पड़ जाता है.और अपनी पालित पोषित पुत्री से माता-पिता हाथ धो बैठते हैं.
ये है समस्या ,जिसका निदान असंभव तो नहीं पर कठिन अवश्य है.सरकारी कानून तो कठोर हैं परन्तु इतने पेचीदा हैं कि दहेज़ लेना प्रमाणित नहीं हो पाता और सजा या तो मिलती नहीं यदि मिलती भी है तो ऊपरी अदालत से छूट जाते हैं.अतः इस व्यवस्था में सुधार होना आवश्यक है.
प्रेम विवाह तथा अंतरजातीय प्रेम विवाह दहेज़ प्रथा पर रोक लगाने का मेरे विचार से एक सशक्त माध्यम हो सकता है.
हमारी मानसिकता बदलना भी जरूरी है.ऐसा नहीं कि माता पिता ही दहेज़ मांगते हैं स्वयं लड़के विक्रय के लिए उपलब्ध रहते हैं.अतः प्रतिवर्ष शिक्षण संस्थाओं में इस प्रकार के शपथ पत्र भरवाए जाएँ कि वो आत्मनिर्भर होने पर ही दहेज़ रहित विवाह करेंगें.नियुक्ति आदि के समय भी ऐसे प्रावधान लागू किये जाएँ तथा उनका सख्ती से पालन हो.यदि कुछ प्रतिशत भी सफलता इस कदम से मिलती है तो अन्यों को प्रोत्साहन मिलेगा.
सर्वाधिक आवश्यक है लड़कियों को पूर्ण शिक्षित कर आत्मनिर्भर बना कर ही विवाह करना जिससे वो किसी पर आश्रित न रहें.
लड़कियों में आत्मविश्वास बढ़ाना जिससे वो अन्याय का सामना कर सकेंउनके माता-पिता उनके साथ है वो अकेली नहीं.
. स्वयं सेवी संघठन भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं.दहेज़ रहित विवाह के लिए प्रोत्साहन देने के अतिरिक्त ऐसे युगलों का सम्मान किया जाना भी एक तरीका हो सकता है.
सर्वोपरि है मानसिकता में बदलाव यदि युवा पीढी कृतसंकल्प हो तो कोई शक्ति नहीं कि समस्या का निदान न हो सके.
कभी कभी दहेज़ कि आड़ में झूठे मुकदमे में फंसा कर भी प्रताड़ित किया जाता है कुछ लोगों द्वारा. ऐसी परिस्तिथी में निष्पक्ष जांच के बाद ही कदम उठाया जाना चाहिए.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 15, 2010

आदरणीया निशा जी,, दहेज़ पर आपका ये लेख बहुत ही अच्छा है..मेरा तो मानना है की जो व्यक्ति दहेज़ देते समय इकदम परेशान हो जाता है,और टूट जाता है वही व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से दहेज़ कैसे ले लेता है..क्या उसे अपना दर्द याद नहीं आता…बहुत सी विषमताएं है हमारे समाज में…. अच्छे और गम्भीर लेख पर आपको ढेर सारी बधाई….. आकाश तिवारी

    nishamittal के द्वारा
    October 15, 2010

    धन्यवाद तिवारी जी, लेख आपको अच्छा लगा धन्यवाद.विचार करिए इस अभियान को प्रभावशाली कैसे बनाया जाये.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 15, 2010

आदरणीया निशा जी,दहेज़ यह वाक्य्यी में वो दीमक है जो अन्दर ही अन्दर समाज को खोखला करता जा रहा है,समाज के लिए रोशनी स्वरुप ये आपका लेख,धन्यवाद!

    nishamittal के द्वारा
    October 15, 2010

    प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद यदि इस यज्ञ में कोई योगदान आपका भी हो चाहे छोटा ही हो. एक छोटी सी सफलता दिखाई देगी .

आर.एन. शाही के द्वारा
October 14, 2010

निशा जी दहेज़ समस्या पर विस्तृत लेखन के लिये बहुत-बहुत बधाइयां । आप ने सही विवेचना की है । दहेज़ का मौलिक स्वरूप बहुत पवित्र भावनाओं के साथ गठित किया गया होगा । बेटी से सदा के लिये अलग होते समय परिजनों को कुछ भी भेंट स्वरूप देने में एक आत्मिक प्रसन्नता होती होगी । उस प्रथा को विकृत कर कालांतर में समाज ने खुद अपने गले में फ़ांस डाल ली है, और मरे हुए सांप की तरह गर्दन में लटकाए सभी घूम रहे हैं । यदि इस सांप को उतार कर न फ़ेंका गया, तो दहेज़ की बलिबेदी न जाने कितने घरों को उजाड़ती रहेगी, बेटियों को लीलती रहेगी । धन्यवाद ।

    nishamittal के द्वारा
    October 15, 2010

    धन्यवाद शाहीजी,दहेज़ पर अपने विचार व्यक्त करने का मेरी ओर से प्रयास किया गया है,पता नहीं सबको ये पसंद नहीं आया या इतने महत्वपूर्ण सामाजिक विषय पर किसी ने प्रतिक्रिया क्यों व्यक्त नहीं की मुझको आश्चर्य हो रहा है.


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