chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

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एक अविस्मरनीय प्रेरक घटना

Posted On: 21 Sep, 2011 Others में

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यह प्रसंग काफी समय पूर्व मंच पर प्रकाशित किया किया था ऐसे प्रसंग जीवन को एक नयी दिशा प्रदान करते हैं और कुछ शिक्षा भी देते हैं,कि संकटग्रस्त के लिए की गयी आपकी छोटी सी सहायता उस व्यक्ति के लिए कितनी महत्पूर्ण हो सकती है.मंच पर उस समय वर्तमान सदस्यों में से बहुत जन नए हैं,अतः कुछ संशोधन के साथ पुनः प्रकाशित कर रही हूँ
प्रेरक प्रसंग का नाम दूं ,चिर स्मरणीय घटना कहूं,प्रभु कृपा का एक स्वरुप या एक संस्मरण जिंदगी का समझ नहीं पा रही हूँ पर मेरे जीवन में घटित ये घटना सदा प्रेरणा देती है.
वर्षों पुरानी घटना है अपने पति के साथ दक्षिण भारत के ट्रिप पर जाने का कार्यक्रम बना.इतनी लम्बी रेल यात्रा का प्रथम अवसर था.मन में उत्साह,नूतन देखने की उत्कंठा पर सब कुल मिला कर बहुत अच्छा लग रहा था. हमारे अनुभव की कमी के कारण सयुंक्त परिवार में सभी लोग अपने अपने स्तर से हमें सुझाव दे रहे थे.- “कोई कुछ दे तो कुछ खाना नहीं,किसी पर विश्वास नहीं करना,रात्रि में सोते समय सामान का ध्यान रखना,हर स्टेशन पर उतरना नहीं,पैसे अलग अलग जगह पर रखना”( उस समय आज की भांति क्रेडिट कार्ड,डेबिट कार्ड ATM जैसी बैंकिंग व्यवस्थाएं व सैलफोन जैसी सुविधाएँ नहीं थी. .) आदि……….प्रोग्राम के अनुरूप बस से दिल्ली पहुंचे रात्री में ट्रेन थी.सब हिदायतों को ध्यान रखते हुए कन्याकुमारी,रामेश्वरम त्रिवेंद्रम,मदुरई तथा मैसूर,बंगलोर व कुछ अन्य स्थानों का भ्रमण करते हुए हम ,यात्रा का आनंद ले रहे थे. अब हमारा वापस दिल्ली पहुँचने का कार्यक्रम था
जोलारपेट नामक स्थान से ट्रेन पकडनी थी अत स्टेशन पर वेटिंग रूम में प्रतीक्षा में बैठे थे .एक सज्जन ने हमसे पानी माँगा , .पानी उनको दे दिया.ट्रेन आने के बाद पुनः वापसी यात्रा प्रारंभ हुई अब सीधा दिल्ली पहुंचना था अतः ट्रेन में बैठने के बाद सारा सामान एक साथ मेरे बड़े पर्स में रख दिया.टिकट,सारे पैसे,ज्यूलरी,घडी अन्य बहुत सी वस्तुएं. आदि .अचानक ही आंध्रप्रदेशमें विजयवाडा पहुँचने पर पता चला कि मेरा पर्स गायब है.हमारे होश उड़ गए, जब पता चला अन्य सहयात्रियों से,कि रेल के (उस समय) नियमानुसार यदि टिकट मांगने पर टिकेट चेकर को नहीं दिखाया तो हमको वो उतार सकता है.हम बहुत घबराये हुए थे,अपने इष्ट का ध्यान कर रहे थे पर मन परेशां था.हमारे पास ५पैसे भी नहीं थे यात्रा अभी दो दिन की शेष थी.
थोड़े समय पश्चात् वही सज्जन जिन्होंने हमसे पानी लिया था हमारे डिब्बे में आये,उनको बातों बातो में पता चल गया कि हम इस समय टिकट सहित सब सामान खो चुके हैं पहले उन्होंने पर्स खोजने का भी प्रयास किया,परन्तु वो मिलने के लिए नहीं खोया था.उन्होंने हमको धैर्य व साहस से काम लेने को कहा.साथ ही बताया कि किसी को पता न चलने दो कि आपका सारा सामान खो गया है.उन्होंने हमको अपने ईश्वर का स्मरण करने को कहा.हमारी चाय भोजन आदि की व्यवस्था अपनी ओर से (आगे के लिए ) करवाई.पता चला कि वो सेना में सिपाही थे.शरफुद्दीन उनका नाम था.पूरे समय हमारी हिम्मत बंधाते हमारी जरूरतों का ध्यान रखा.टी टी ने टिकट चेक किया उस समय हमारी स्थिति बहुत दयनीय थी,हम हनुमान चालीसा का जाप कर रहे थे. और प्रभुकृपा से हमारा टिकट बिना चेक किये टिकट चैकर आगे चला गया.
तद्पश्चात उन्होंने हमसे ट्रेन से उतरने के बाद आगे के सफ़र की जानकारी ली तथा पुछा कितने धन में आप अपने घर पहुँच सकते हैं.हिसाब लगाकर पचीस रु उन्होंने हमें दिए उस समय २५ रु बहुत छोटी राशि नहीं थी और जरूरत के समय तो डूबते को तिनके का सहारा के सामान थी वो राशि..उनके पास सेना का पास था पर हमारा सामान स्टेशन से बाहर निकलने की व्यवस्था स्वयं की हमको प्लेटफार्म टिकट ला कर दिए,फिर उनको जम्मू की ट्रेन पकडनी थी.अतः इस निवेदन के साथ कि आप ये धन वापस मत भेजना उन्होंने हमसे विदा ली उनको अपने बच्चों के लिए पेठा, पेड़े आदि कुछ सामान भी खरीदना था परन्तु उनकी जेब में सीमित धनराशी थी.अतः उन्होंने कुछ नहीं खरीदा.
हम अपने गंतव्य तक पहुँच गए.लेकिन उस अमूल्य सहायता को क्या हम कभी भुला सकते हैं.इस घटना ने बहुत सारे अनुभव दिए.हिन्दू मुस्लिम नहीं सच्ची मानवता थी ये. यदि हमारे पास बहुत सारा धन है और उसमें से हम कुछ राशि से किसी की सहायता करते हैं वो इतनी महत्पूर्ण नहीं, जितना कि अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण लगाकर सहायता करना. वास्तव में वो अपने विद्यार्थी जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्य भी रह चुके थे , और सेना में बहादुरी दिखने का पुरस्कार भी उनको मिला था. वास्तविक सैनिक धर्म का निर्वाह किया था उन्होंने. हमको ये सबक सिखाया था कि हम सबसे पहले इंसान बने,आपद्ग्रस्त की यथासंभव सहायता करें.आप क्या नाम देंगे इस वृतांत को .

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54 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

test4hemen के द्वारा
January 30, 2012

nice story

syeds के द्वारा
September 30, 2011

आदरणीय निशा जी, बेशक इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है.. प्रेरणादायक लेख… http://syeds.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 4, 2011

    धन्यवाद सैय्यद बंधु.प्रतिक्रिया का उत्तर विलम्ब से देने का कारण नेट पर न आ सकना था.

abodhbaalak के द्वारा
September 29, 2011

आदरणीय निशा जी मई ने सदा ही कहा है की धर्म, केवल मानवता है, बाकी तो ल….. इस प्रेरणात्मक …………मई आपका आभारी हूँ की इस तरह के .. अपने मंच पर रखा .. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 4, 2011

    आभार आपकी प्रतिक्रिया हेतु

shiromanisampoorna के द्वारा
September 29, 2011

आदरणीय निशाजी,ॐ न मो नारायण आपकी यह सत्य कथा ने रोम रोम पुलकित कर दिया/देश की भूमि में अनुकरणीय उदहारण मिलते हैं तो उन्हें सलामी देने का मन करता हैं/

    nishamittal के द्वारा
    October 4, 2011

    धन्यवाद शिरोमणि जी बहुत दिन पश्चात आपकी सुखद प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.

A. R. के द्वारा
September 24, 2011

aaj jab ISlam hattyaon ke liye badnaam hai tab Islam ke sacche roop ko saamne lane ki jaroorat bahut jyada hai…….

    nishamittal के द्वारा
    September 24, 2011

    मान्यवर महोदय ,आपकी प्रथम प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.धन्यवाद आपका ब्लॉग पढने व कमेन्ट देने के लिए.परन्तु मैं आपके उत्तर में यह कहना चाहूंगी,की उन सज्जन ने हमारी जो मदद की वो हिन्दू-मुस्लिम के दृष्टिकोण से नहीं की आप उनके योगदान का महत्व देखें.मानवता में धर्म कभी आड़े नहीं आता .वो एक मानव के साथ सच्चे सैनिक की दृष्टि से भी मदद के लिए भी आगे आये थे.इस्लाम हो या हिन्दू धर्म या कोई अन्य सभी के अनुयायी यदि कोई भी हत्या आतंकवाद या मानवताविरोधी कार्य करते हैं तो उनकी आलोचना होनी आवश्यक है.मेरी दृष्टि में राष्ट्र धर्म सबसे बड़ा है और जो अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने की भावना रखता है वो महान है.हर हिन्दू वीर अब्दुल हमीद को नमन करता है.प्राकृतिक आपदाओं के समय,दुर्घटनाओं के समय हिन्दू मुस्लिम एक दुसरे की सहायता करते हैं.आपके सकारात्मक विचारों का स्वागत है.

jlsingh के द्वारा
September 23, 2011

निशा जी, नमस्कार! आपकी रचनाएँ प्रेरक और चिंतनीय तो होती ही है, पर एक सच्ची घटना को जितना मार्मिक ढंग से आपने प्रस्तुत किया है- उसके लिए शब्द नहीं है हमारे पास. हालाँकि ऐसी घटनाएं हमारी जिन्दगी में लगभग हर्किसी के साथ घटती रहती है, पर हम भला उसे याद कहाँ रख पाते है.पर, यदि हमारे पास बहुत सारा धन है और उसमें से हम कुछ राशि से किसी की सहायता करते हैं वो इतनी महत्पूर्ण नहीं, जितना कि अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण लगाकर सहायता करना. बहुत ही महत्वपूर्ण पंक्ति है. साभार – जवाहर!

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    सिंह साहब मेरा मानना ये है कि यदि किसी ने निस्वार्थ भाव से हमारी सहायता की है तो उसके साथ तो उपरोक्त परिस्थितियों में वही व्यवहार संभव नहीं(विशेष रूप से आवश्यक नहीं कि पुनः भेंट हो और ईश्वर न करे वही परिस्थिति हो) परन्तु किसी अन्य व्यक्ति की सहायता कर तथा अन्यों को प्रोत्साहित करना भी एक प्रकार से अच्छा विकल्प है.धन्यवाद आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए.

संदीप कौशिक के द्वारा
September 22, 2011

यकीनन एक बहुत ही प्रेरणादायक प्रसंग है निशा जी….! बहुत ही अच्छा लगा पढ़कर । कुछ पंक्तियाँ…..सिर्फ इसी के लिए मेरी ओर से….. . न तो बेज़ुबान बनकर रहें, न ही अंजान बनकर रहें, न हम हिन्दू और न ही मुसलमान बनकर रहें ॥ हर मंदिर में ख़ुदा और मस्जिद में भगवान है शायद, इंसान हैं हम अगर, तो क्यूँ न इंसान बनकर रहें !! . बहुत बहुत आभार आपका । :) :)

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    बहुत सुन्दर प्रेरक पंक्तियाँ संदीप प्रसंग की प्रतिक्रिया में धन्यवाद.

akraktale के द्वारा
September 22, 2011

निशाजी नमस्कार. मैने आलेख तो कल ही पढ लिया था किन्तु समयाभाव के कारण प्रतिक्रया आज दे रहा हूं. बहूत ही प्रेरक प्रसंग है. हम शहीदों की कहानियां बार बार सुनते हैं. ऐ मेरे प्यारे वतन….. गीत आज भी हममें वही वतन पर मिटने का जज्बा भर देता है.मैने तो पहली ही बार पढा है किन्तु बार बार भी पढता रहूंगा  तो हर बार मुझे ये प्रसंग प्रेरणा ही देगा.

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद अशोक जी,प्रेरक [प्रसंग इससे लिए शेयर किये जाते हैं कि हम उनसे प्रेरणा ग्रहण कर सकें.

Amita Srivastava के द्वारा
September 22, 2011

निशा दी , बहुत प्रेरक प्रसंग , आज हमारे देश को ऐसे ही इंसानों की जरूरत है | ऐसे नेक बन्दे को मै जेजे मंच की ओर से सलाम करती हूँ | धन्यवाद ..

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद अमिता जी आपके विचारों के लिए.

Deepak Dwivedi age 27 के द्वारा
September 22, 2011

नमस्कार प्रेरक प्रसंग के लिए धन्यवाद् .

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद दीपक जी.

Santosh Kumar के द्वारा
September 22, 2011

आदरणीय निशाजी ,.सादर प्रणाम बहुत प्रेरक और मानवीय सन्देश देता आलेख ,..निशा जी मैं एक बात कहना चाहता हूँ कि लगभग हर मुसीबत में कोई ना कोई भगवान का बंदा हमारी सहायता जरूर करता है ,.इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान हम सबके अन्दर है ,…कभी दाता के रूप में तो कभी याचक के ….मैं मानता हूँ कि हमारा देश और समाज एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है ,..उज्जवल भविष्य के लिए हमें धर्म का पालन अवश्य करना चाहिए ,…सर्व विदित है ..परहित सरिस धर्म नहि भाई … प्रेरणादायक आलेख के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    आपसे पूर्णतया सहमत हूँ संतोष जी,सही कहा,परन्तु आपद्ग्रस्त की सहायता कर व्यक्ति को एक बहुत ही आत्मतोष का अनुभव होता है.बहुत बहुत धन्यवाद आपके सकारात्मक विचारों के लिए.

alkargupta1 के द्वारा
September 21, 2011

निशा जी , कहीं न कहीं आज भी इंसानियत और मानवता बची हुई है लोगों को अच्छा सन्देश व प्रेरणा देता हुआ बढ़िया आलेख !

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद अलका जी ,इस इंसानियत के सहारे ही दुनिया टिकी है.

surendra shukl bhramar5 के द्वारा
September 21, 2011

बहुत अच्छी रही आप की अविस्मरनीय घटना निशा जी ..ऐसा होता है ..कोई भगवन बन मिल जाते हैं ….तभी तो हमारा बोया हुआ एक बीज सैकड़ों दे जाता है ….अति सुन्दर यदि हमारे पास बहुत सारा धन है और उसमें से हम कुछ राशि से किसी की सहायता करते हैं वो इतनी महत्पूर्ण नहीं, जितना कि अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण लगाकर सहायता करना भ्रमर ५ .

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद शुक्ल जी बहुत समय बाद आपका प्रतिक्रिया देना सुखद लगा.

UMASHANKAR RAHI के द्वारा
September 21, 2011

आदरणीय दीदी नमन प्रेरनादायी प्रसंग पढकर अच्छा लगा

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद उमाशंकर जी.

chaatak के द्वारा
September 21, 2011

यूनान मिस्र रोमां सब मिट गए जहां से, लेकिन अभी है बाकी नामो निशाँ हमारा, कुछ ख़ास है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, गो कि रहा है दुश्मन दौरे-जहाँ हमारा; हिन्दुस्तान में इंसानियत किसी न किसी रूप में हमेशा जिंदा रहती है और यही हमें इस बात का अहसास कराती रहती है कि अभी भी यहाँ इंसान रहते हैं.

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद चातक जी,ईश्वर करे ये भावना सदा हमारे हृदयों में रहे.

Vinita Shukla के द्वारा
September 21, 2011

इस प्रसंग को पढकर बहुत अच्छा लगा. इससे पता चलता है कि संसार में अब भी कुछ अच्छे लोग बचे हैं.

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद विनीता जी,आपके विचारों के लिए.

mparveen के द्वारा
September 21, 2011

निशा जी सादर प्रणाम , हाँ जी ऐसा किसी के साथ कहीं भी कभी भी घट सकता है . और ऐसे समय में अगर कोई हमारी इस तरह से मदद कर दे तो वो इंसान भगवान् से कम नहीं होता है क्यूँ की कहा गया है की भगवान् इंसानों के रूप में ही हमारी मदद करते हैं …. और ऐसे मददगार सही रूप में मानवता को दर्शित करते हैं यही मानवता धरम है …. ऐसे लोगों का उपकार हम जीवन पर्यंत नहीं भूल सकते हैं ……

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    प्रवीन जी,आपने सही कहा है,विपत्ति के समय सहायता करने वाला शायद देवदूत के रूप में ही होता है.

krishnashri के द्वारा
September 21, 2011

इंसानियत ,आदमियत ,मानवता अभी जिन्दा है और ऐसे ही लोंगो से जिन्दा रहेगी .

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद कृष्ण श्री जी आज भी ऐसे लोग हैं.

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
September 21, 2011

आदरणीय दीदी सादर प्रणाम ! आपने सत्य लिखा है कि “यदि हमारे पास बहुत सारा धन है और उसमें से हम कुछ राशि से किसी की सहायता करते हैं वो इतनी महत्पूर्ण नहीं, जितना कि अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण लगाकर सहायता करना.” प्रेरक रचना हेतु बधाई |

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    डॉ साहब वास्तविक सहायता यही है,और हमारी संस्कृति हमको यही सिखाती है.

neelamsingh के द्वारा
September 21, 2011

निशा जी , आपका संस्मरण मानवता पर विश्वास जगाता है और साथ ही यह सुखद एहसास भी करवाता है कि इंसानियत अभी जिंदा है |

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    नीलम जी अपने व्यस्त समय में से लेख व प्रतिक्रिया के लिए समय निकलने हेतु धन्यवाद.

suman dubey के द्वारा
September 21, 2011

निशा जी नमस्कार्। सबक देती पोस्ट ।निशा जी सच्ची मानवता ही सच्चे अर्थो में धर्म है। आपने नयी पोस्ट पर विचार नही रखे मुझे आपका इन्तजार रहता है।

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2011

    सुमन जी प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2011

    सुमन जी आपका आलेख खोजा पर मिला नहीं,कृपया लिंक दें.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
September 21, 2011

निशा जी अभिवादन, सुन्दर और प्रेरणादायक पोस्ट. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद सिद्दीकी जी.

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 21, 2011

आदरणीया निशा जी, खुद इश्वर मनुष्य के रूप में अपने भक्तों की रक्षा करने आए है ऐसा हमने पढ़ा था आज अगर आपकी कहानी को पढता हूँ तो ठीक वैसा ही महसूस होता है.. आकाश तिवारी

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    धन्यवाद आकाश जी बहुत समय बाद आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.ऐसी सहायता ईश्वरीय ही होती है अपने दूत के माध्यम से.

sadhana thakur के द्वारा
September 21, 2011

आदरणीय निशा जी ,,आपके साथ बीती ये घटना साफ दर्शाती हैं की इस दुनिया में अच्छे बुरे दोनों तरह के इन्सान हैं ,सच हैं ये दुनिया इतनी बुरी भी नहीं जितना कभी -२ हम सोच लेते हैं ,बहुत प्रेरक लगी आपकी ये यात्रा ,एक सबक भी मिला …………..

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    प्रेरक प्रसंग प्रेरणा प्रदान करने हेतु ही झोटे हैं,साधनाजी.

yogi sarswat के द्वारा
September 21, 2011

nisha ji namaskaar, aap jo likti hain aisa lagta hai jaise poore manoyog se likti hai. apko bahut bahut dhanyavad ki aapne aise samay mein is pahlu ko samne laye jab poora hindustan ek doosare ko kat khane ki nazar se dekhta hai.

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    योगी जी आपकी प्रथम प्रतिक्रिया प्राप्त हुई धन्यवाद आपका.

chandrajeet के द्वारा
September 21, 2011

निशाजी नमस्ते.. आप ने जो अपनी आप बीती इस लेख के माध्यम से बताया है वास्तव में बहुत ही आकर्षित करती है लेकिन यह सत्य है कि आज भी महापुरुषों कि कमी नहीं है शायद इसी तरह के लोगों की वजह से यह दुनिया आज तक टिकी हुई है ….

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    आपके विचार से सहमत हूँ मैं धन्यवाद आपका.

Amar Singh के द्वारा
September 21, 2011

बहुत ही प्रेरणादायक लेख. आज के समय में भी ऐसे लोग उपस्थित है जो किसी की सहायता करने के लिए तत्पर रहते है और लोग उन्हें सदा याद भी रखते है, जैसे देखिये आपको अभी तक वह व्यक्ति याद है जिन्होंने उस मुश्किल समय में आपकी मदद की थी बल्कि आज वह औरो के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन गए. अच्छे कार्यो को सदा ही सराहना मिलती है.

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2011

    अमर सिंह जी आज नहीं यह प्रसंग और उन सज्जन को कभी नहीं भूल सकती मैं .धन्यवाद


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