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मूल्य वृद्धि पर लगाम लग गयी है ?

Posted On: 22 Sep, 2011 Others में

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समाचार ज्ञात हुआ कि मात्र ९६५ रु मासिक कमाने वाला व्यक्ति निर्धन रेखा से जीवन यापन करने वालों की श्रेणी में नहीं आता ,अर्थात या तो महंगाई हमारे देश से पूर्णतया समाप्त हो गयी या सरकार आंकड़ों के जाल में उलझाकर जनता का मूर्ख बना रही है,यदि महंगाई समाप्त हुई है तो सरकार की जितनी सराहना की जाय कम है परन्तु यदि वो निर्धन जनता का मज़ाक उड़ा रही है तो?
सरकार को दोष देने, और कोसने का काम अभी तक विपक्ष का था,परन्तु लगता है,अब तो कांग्रेस में वास्तविक लोकतंत्र की शुरुआत हुई है,जो स्वयं सरकार के सिपहसालारों ऩे ही अपने साथियों के कारनामों पर स्वर बुलंद किया है,या बुलंद करने का ढोंग किया है..अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त महान अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह जो २ दशक से भी अधिक समय से देश की समस्याओं को परख रहे हैं,रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुकें,है,देश विदेश में अर्थशास्त्र विषय में अपनी विद्वता का लोहा मनवा चुकें है अनेकानेक उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं,,ये मानते हैं तथा उच्चतम न्यायालय में अपने हस्ताक्षरित शपथ पत्र में ( जो योजना आयोग द्वारा तैयार किया गया है)स्वीकार करते हैं कि यदि हमारे देश में किसी व्यक्ति की मासिक आय ९६५ रु शहरों में तथा ७८१ रु ग्राम्य क्षेत्रो में है तो वह व्यक्ति बी पी एल अर्थात गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की श्रेणी में नहीं आता.अर्थात लगभग ३२ रु तथा २६रु (लगभग) प्रतिदिन अपने ऊपर व्यय करने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति इस श्रेणी से बाहर है.,सरकार के अनुसार अनाज पर प्रतिदिन ५.५० रु,दाल पर एक रु २ पैसे,सब्जी पर २ रु,दूध पर २ रु ३३ पैसे,स्वास्थ्य पर ४० रु और मकान के किराये पर ५० रु व्यय करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर है.
मैं अपने घर में काम करने वाली सेविका का उदाहरण देकर स्पष्ट करना चाहूंगी उसके परिवार में ६ सदस्य हैं,बच्चे छोटे हैं,पति किसी निजी फैक्ट्री में कभी कभी काम करता है,वो स्वयं ४-५ घरों में झाडू पोछा करती है संभवतः २५०० रु के लगभग कमा लेती है, ७०० रु में एक छोटा सा कमरा उसने किराये पर लिया है,बच्चों का पेट भी भरना है, साक्षर भी बनाना चाहती है,. दैनिक घरेलू उपयोग का सारा सामान वह भी उतनी कीमत पर खरीदती है जितना हम.तो सरकार के अनुसार वह तो निर्धनता रेखा से बहुत ऊपर है,भले ही वह अपने घर में प्रतिदिन बच्चों का पेट न भर पाती हो.उसका आज तक बी पी एल कार्ड नहीं बन सका हाँ यदि वह उसके लिए मोटी रिश्वत का प्रबंध कर ले तो उसका कार्ड बन सकता है.
कुछ समय पूर्व इस श्रेणी के लिए जो सीमा निर्धारित की गयी थी उसके अनुसार ये राशि निर्धारित हुई थी क्रमशः २० रु और १५ रु अर्थात एक ओर तो सरकार ऩे इस राशि में १२ व ११ रु का अंतर कर ये स्वीकार किया है ,कि महंगाई में वृद्धि हुई है ,स्वयं सरकार स्वीकार कर चुकी है,कि कीमतें आसमान छू रही हैं,उनपर लगाम लगाना टेढ़ी खीर है,या असंभव है,,कारण चाहे अंतर्राष्ट्रीय हों या कुछ और .सबकी वेतन वृद्धि महंगाई भत्तों में वृद्धि की जा रही है ,स्वयं सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाये जा रहे हैं .
दूसरी ओर आम व्यक्ति! जिसको सर ढकने को छत, तन ढकने को वस्त्र तथा पेट भरने के लिए अन्न चाहिए,दाल,दूध (चाहे वो चाय के लिए ही खरीदा जाय)और सब्जी उसकी आवश्यकता तो सभी को है ,बाजार में सस्ते ढाबे में रोटी २-३ रुपए की चाय ७ रु की .है और घर में भोजन पकाने की यदि बात की जाय तो उसके लिए ईंधन भी चाहिए,नमक हल्दी की भी आवश्यकता है.,चाय में चीनी चाय पत्ती भी डलती है. सब्जी, दाल दवा ,वस्त्र भी दैनिक आवश्यकताओं की श्रेणी में आते हैं..ये मूल्य तो अनुमानतः छोटे शहरों के हैं बड़े शहरों की तो बात तो फिलहाल की ही नहीं (वैसे इस श्रेणी के लोग महानगरों में भी रहते हैं) …… .ऐसे ही यदि गाँव के भी बात की जाय तो वस्तुओं के मूल्य तो वहां भी यही हैं,अंतर रहने के स्थान का हो सकता है.

क्या इतना अर्जन करने वाले लोगों को प्रभु ऩे सभी रोगों से मुक्ति प्रदान कर रखी है?,क्या शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार उनके बच्चों को नहीं है?
इन आंकड़ों में उलझाकर किसका मूर्ख बनाना चाहती है सरकार ?,मूर्खता तो स्वयं अपनी प्रदर्शित की है यह आंकडें प्रदर्शित कर. क्या सरकार यह दिखाना चाह रही है कि हमारे यहाँ सब कुछ बहुत सस्ता है,भंडार भरे हैं,इतनी धनराशी अर्जित करने वाले सभी लोगों को सरकार ने रहने,ईंधन,चिकित्सा,शिक्षा की सुविधाएँ सबको निशुल्क प्रदान की हुई हैं.कहाँ गयी हमारे प्रधानमन्त्री जी की विद्वता,उनका जमीन से जुड़े होने का दावा करना ,तथा सहृदयता और व्यवहारिकता
वास्तविकता तो ये है कि” जाके पैर न फटी बिबाई वो क्या जाने पीर पराई” निरंतर वातानुकूलित कार्यालयों में काम करने वाले, वातानुकूलित पंचसितारा होटल सदृश सुविधायुक्त ,आवासों में रहने वाले तथा ऐसी ही गाड़ियों में यात्रा करने वाले लोग कैसी जान सकते हैं कि आदमी को गुजारे के लिए क्या चाहिए ,कैसे पेट भरे,तन ढके,या रात गुजारे.और वैसे भी उनको तो सम्पूर्ण देश में सबसे सस्ता पूर्णतया साफ़ सुथरा शाकाहारी भोजन मात्र १२.३० में मिलता है,चाय १ रु में मिलती है,और दाल डेढ़ रु में और मांसाहारी भोजन २२ रु में प्राप्त होता है .चिकित्सा सुविधाएँ सर्वसुविधासम्पन्न अस्पतालों में निशुल्क मिलती हैं .और वैसे तो उनको अपने इलाज के लिए यहाँ की सुविधाओं पर विश्वास नहीं है,अतः विदेश जाकर इलाज कराते हैं
कैसे
हृदयहीन लोगों के हाथ में है,हमारे देश की बागडोर जिनके लिए “आप भरा तो जग भरा” कोई भूखे पेट सो रहा है,कोई खुले आसमान के नीचे रात गुजारता है,फटे चीथड़े लपेट कर अपनी लाज बचा रहा है,कूड़ा बीन कर अपनी जिन्दगी गुजार देता है उनकी आत्मा उनको कभी कचोटती नहीं कैसे कचोटेगी आत्मा तो बिक चुकी है, भ्रष्टाचार की मंडी में.
आखिर किसने अधिकार दिया है इनको अभावग्रस्त जनता की हंसी उड़ाने का ?संभवतः ये भूल रहे हैं कि भूखे (निर्बल ) सताने का परिणाम बहुत घातक होता है.और ये परिणाम इनको भुगतना ही होगा.

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52 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

atharvavedamanoj के द्वारा
October 4, 2011

आदरणीय निशा जी, सादर प्रणाम| आपके इस आलेख पर मुझे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का एक व्याख्यान का एक वाक्य स्मरण हो आया, जो उन्होंने संभवतः कलकत्ता में दिया था,”आप कांग्रेस के लोग जो ऊँचे ऊँचे बंगलो में रहते हैं, आप नहीं जानते की बमबारी क्या चीज होती है” स्थितियां तब भी वही थी और अब भी वही है|तब कांग्रेस के लोग बमबारी नहीं जानते थे अब बेकारी नहीं जानते हैं|बहुत ही सुन्दर आलेख…जय भारत|

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    नमस्कार मनोज जी,बहुत दिन बाद आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त कर अच्छा लगा,इसीलिये मैंने लिखा था,जाके पैर न फटी बिबाई .एयर कंडिशंड घरों में रहने वालों को क्या पता गर्मी के पसीनों और हाड कंपाने वाले शीत का.आपका धन्यवाद

Alka Gupta के द्वारा
September 25, 2011

निशा जी, आपके इस आलेख पर थोडा देर आने के लिए खेद है ! हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि हमारी सरकार गरीबी और अमीरी की रेखा के निर्धारण करने में अंतर ही नहीं समझ पायी क्योकि ये भुक्त भोगी नहीं है…आम जनता ही प्रभावित होती है……..यथार्थपरक विचारणीय आलेख

    nishamittal के द्वारा
    September 25, 2011

    धन्यवाद अलका जी आपका कथन सोलह आने सही है,जाके पैर न फटी बिबाई………..

suman dubey के द्वारा
September 24, 2011

निशा जी नमस्कार । बहुत ही सार्थक लेख निशा जी एसी कमरों मे गरीबी का निर्धारण करना और पांच साल मे गरीबों के बीच जाना और बाद में यही नितियां बनाना ही तो इनको आता है अब भी जनता को जाग जाना चाहिये और चुनाव में अपनी निर्धारण नीति बनाना चाहिये।

    nishamittal के द्वारा
    September 24, 2011

    धन्यवाद सुमन जी आपकी प्रतिक्रिया हेतु.

mparveen के द्वारा
September 24, 2011

निशा जी नमस्कार, आप सही कह रहे हैं सरकार ने पता नहीं क्या सोच कर निर्धन रेखा निर्धारित की है वो क्या जाने निर्धनता क्या होती है …. वातानुकूलित होटल के कमरे में बैठ कर गरीबी रेखा का निर्धारण तो कर दिया पर क्या किसी गरीब की झोपडी में जाकर देखा की किस प्रकार वो अपनी जरूरतें पूरी कर भी पाते हैं या नहीं … वह रे सरकार !!!

    nishamittal के द्वारा
    September 24, 2011

    धन्यवाद प्रवीन जी ,इनको सजा के रूप में किसी गरीब की झोंपड़ी में रखा जाय और समस्त सुख-सुविधाओं से वछित कर इतनी धन राशि में पेट भरने को कहा जाय.,

vinitashukla के द्वारा
September 23, 2011

निर्धन रेखा का निर्धारण भी ये नेता, अपनी सुविधा के अनुसार ही करते हैं. सिर्फ ये कह देने से कि ९६५ रु. मासिक कमाने वाला निर्धनों की श्रेणी में नहीं आता; यह अपने दायित्व से भाग नहीं सकते. तारीफ़ तो तब है, जब यह लोग , जो जनता की गाढी कमाई पर मौज कर रहे है, स्वयं उतनी ही तनख्वाह पर गुजारा करके दिखाएँ. सोचने पर मजबूर करने वाला सार्थक लेख निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    आपने सही कहा है विनीता जी ,गरीबी का उपहास उड़ाने वाले इन नेताओं को इतनी` धनराशी देकर इनके परिवार के साथ छोड़ा जाय और इनको विवश किया जाय इतने धन में गुजारा करने के लिए.धन्यवाद

Amita Srivastava के द्वारा
September 23, 2011

निशा दी , नमस्कार आज की मंहगाई में इन अमीर नेताओ की गरीबी की एक नई परिभाषा |

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    कितनी बड़ी विडंबना अमिता जी.

abodhbaalak के द्वारा
September 23, 2011

काश इन नेताओं को केवल ९६५……… आज बाज़ार में सौ रुपिया लेकर जाओ तो हम क्या खरीद पते हैं, इस पर गरीबी रेखा को ९६५ पर बन्न्धना ….. शर्म आती है ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    दुर्भाग्यजनक है इनकी सोच अबोध जी.धन्यवाद

sadhana thakur के द्वारा
September 23, 2011

आदरणीय निशा जी ,आपका लिखा एक -२ शब्द सही हैं ,,हमारी सरकार बेगैरत हो चुकी हैं ,कल जिस तरह का बयान प्रधानमंत्री ने दिया हैं वो सच में हास्यापद हैं ……बहुत ही अच्छा आलेख आपका …………..

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    आभार साधना जी आपकी प्रतिक्रिया हेतु,

jlsingh के द्वारा
September 23, 2011

निशा जी, प्रणाम! सरकार के इस क्रूर मजाक पर आपने जोरदार प्रहार किया है!– कमोबेश सभी आदमी अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है. इस पर तुर्रा यह की किसी दुसरे विद्वान ने टी वी पर कह दिया की यह सीमा ३२ रुपये से बढाकर ४० रुपये कर देनी चाहिए!—– सभी अर्थ-शास्त्री सारी जनता को बेवकूफ ही समझते हैं इसलिए की हम उनको चुनकर भेजते है और अपनी मिहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन्हें टैक्स में जो देते हैं. पता नहीं २०१४ कब आयेगा या उसके पहले ही पृथवी इन आततायियों के उत्पात से रसातल में चली जायेगी!——— जवाहर.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    इनको सबक जनता ही सिखा सकती है सिंह साहब

surendra shukl bhramar5 के द्वारा
September 22, 2011

आदरणीया निशा जी इस भ्रष्टाचार की मंडी में गरीब कहाँ दिखते हैं उनका चिथड़ा रूप उपहास का केंद्र ही तो है ..लोगों को जागना चाहिए ताकि इनकी नाक पकड़कर कुछ दिन इन्हें गरीबखाने में रख खाना खिलाया जाए और ये जमीन की हकीकत को समझें ….सार्थक और सुन्दर लेख भ्रमर ५ दूसरी ओर आम व्यक्ति! जिसको सर ढकने को छत, तन ढकने को वस्त्र तथा पेट भरने के लिए अन्न चाहिए,दाल,दूध (चाहे वो चाय के लिए ही खरीदा जाय)और सब्जी उसकी आवश्यकता तो सभी को है ,बाजार में सस्ते ढाबे में रोटी २-३ रुपए की चाय ७ रु की .है और घर में भोजन

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    सटीक सुझाव आपका शुक्ल जी.धन्यवाद.

Deepak Dwivedi age 27 के द्वारा
September 22, 2011

नमस्कार यथार्थ को व्यक्त करता पारदर्शी आलेख. धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद दीपक जी.

संदीप कौशिक के द्वारा
September 22, 2011

आदरणीया निशा जी, सिर्फ एक ही लोकोक्ति……..”अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा” ! और भुगत रहा है हर आम आदमी……..!! ;(

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    सार्थक प्रतिक्रिया हेतु आभार.संदीप

Harish Bhatt के द्वारा
September 22, 2011

आदरणीय निशा जी सादर प्रणाम. कभी अपने ऊपर राज करने के लिए जनता ने ही इन नेताओ को अधिकार दिया था, लेकिन अब ये बेलगाम हो गए है. वोह समय अब दूर नहीं जब जनता इनसे ये अधिकार छीन लेगी. इन नेताओ को अपनी करनी का फल तो जरुर भुगतना होगा.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद हरीश जी,जैसी करनी वैसी भरनी

akraktale के द्वारा
September 22, 2011

निशाजी  आपने लिखा कि कैसे हृदयहीन लोगों के हाथ में है,हमारे देश की बागडोर है. मैने भी विचार किया कि कैसे लोगों के हाथ में हमारे देश की बागडोर है. जो उनके पाँच सितारा होटल के एक वक्त के नाशते से भी कम खर्च पर देशवासीयों से महीने भर भर पेट खाने और खुश रहने की उम्मीद  कररहे हैं, तब मुझे समझ आया कि ये कोई और नहीं देशी तालिबान हैं वहां तालिबान का अर्थ छात्रों से है यहां अर्थशास्त्रीयों से है.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    अशोक जी,कहावत है,अक्ल पर पत्थर पड़ना परन्तु उन प्ठ्रों के साथ इन्होनें गरीबों का मज़ाक उड़ाया है.

chaatak के द्वारा
September 22, 2011

निशा जी, मैंने जब इस खबर को सुना तो हतप्रभ रह गया कि प्रधानमन्त्री सचमुच अर्थशास्त्री हैं या फिर अनर्थशास्त्री हैं अंततः मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये बिलकुल व्यर्थ-शास्त्री हैं जिन्होंने शायद किसी अच्छे प्रोफ़ेसर की उपलब्धियों को कट-कापी-पेस्ट करके खुद को कागजों पर महारथी साबित कर रखा है. एक छोटी सी सलाह मेरी भी है जिसे जनता की आवाज भी माना जा सकता है (यदि आप सभी इत्तेफाक रखें तो) हम इन आंकड़ों को सही मान लेंगे और उसी तरह का जीवन भी अपना लेंगे जो ९६५ रुपये में जीने के लिए सरकार कह रही है बशर्ते सभी सांसदों विधायको और मंत्रियो की कुल तनख्वाह भी १००० (यानी हम अमीरों से भी ३५ रुपये अधिक) रुपये प्रतिमाह कर दी जाए और उनपर पूरी नजर राखी जाये कि वे इससे ज्यादा राशि न तो रख सकें और न खर्च कर सकें. एक और ज्वलंत मुद्दे को मंच पर लाने के लिए बधाई!

    bharodiya के द्वारा
    September 23, 2011

    नमस्कार चातकभाई प्रुथ्वी माता को तारक मेहता का उल्टा चस्मा पेहना के १९७० तक वापस नही घुमाया जा सकता । लेकिन कोई बुध्धिमान फाईनान्स मिनिस्टर जरूर आयेगा और वो १०० रुपये को ही एक रुपए का दरजा दे देगा । मेहंगाई और कमाई भी १०० गुनी कम हो जायेगी । पगार जो आज खोखली है वो १०० गुनी मजबूत हो जायेगी । बचत वालों को भी रोने की जरूरत नही, भले बेंक बेलेंस से दो शून्य निकल गये हो, उन की बचत की वेल्यु वही रहेगी ।

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    सही सुझाव आपका चातक जी इनको इतनी धन राशि के साथ ऐसे स्थान पर परिवार सहित छोड़ दिया जाय और बाध्य किया जाय इतनी धनराशी में जीवन यापन हेतु.धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    भरोदिया जी चातक जी पर आपके कमेन्ट का उत्तर मेरे विचार से आपका स्वप्न साकार हो,यही उत्तम है वेतन बढाया और टेक्स तथा महंगाई उसी प्रकार बड़ी जा रही है.

Abdul Rashid के द्वारा
September 22, 2011

राजनैतिक लोग गरीबो को शायद इसी के लिए गरीब बनाय रखना चाहते है ताकि अधमरे लोग कोई प्रतिक्रिया न दे सके http://singrauli.jagranjunction.com

    bharodiya के द्वारा
    September 23, 2011

    नमस्कार अब्दुल रशीदभाई बिलकुल सही फरमाया ।

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद राशिद जी.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद भरोदिया जी

naturecure के द्वारा
September 22, 2011

आदरणीय दीदी सादर प्रणाम ! वास्तव में यह दुखद है, इसका परिणाम इनको भुगतना ही होगा |

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद डॉ साहब.

Tamanna के द्वारा
September 22, 2011

हमारी सरकारें सिर्फ गरीब जनता का मजाक उड़ाना जानते हैं, और हम सोचते हैं कि अब एक संरक्षित समाज का हिस्सा है. http://tamanna.jagranjunction.com/2011/09/22/gujrat-riots-2002-and-sabarmati-express-set-on-fire/

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद तमन्ना जी.

manoranjan thakur के द्वारा
September 22, 2011

हालत पर बढ़िया चोट

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद मनोरंजन जी.

manoranjan thakur के द्वारा
September 22, 2011

भुगतना तो है ही भुगत रहे है हालत पर बढ़िया चोट

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद आपका.

bharodiya के द्वारा
September 22, 2011

निशाबेहन उन लोगों की गलति नही है । केलेन्डर मे गलति हो गई । २०११ का केलेन्डर सफाई के दौरान खो गया । सफाई वालेने भूलसे १९६५ का केलेन्डर लटका दिया । १९६५ मे ये आंकडे बिलकुल सही थे ।

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    भारोडिया जी कैलेण्डर में गलती इनके अपने वेतन में भी होनी चाहिए.वहां क्यों नहीं होती.

Santosh Kumar के द्वारा
September 22, 2011

आदरणीय निशा जी ,.सादर प्रणाम क्या ये कांग्रेस और उसकी गुलाम सरकार पूरे देश को मूर्ख ही समझ रहे हैं ,….यदि ऐसा है तो इनको ऐसा सबक मिलना चाहिए कि इन मूर्खों को इतिहास भी कभी क्षमा ना कर सके ,..आपके आलेख के बारे में कुछ कहना नादानी होगी ,..हार्दिक साधुवाद

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    संतोष जी जब आँखों पर पर्दा पड़ा है और भलाबुरा सोचने समझने की शक्ति राजनीति के कुचक्रों में खो गयी है.

surendra के द्वारा
September 22, 2011

महंगाई का सबसे बड़ा कारण है भ्रस्ताचार और काला धन… एक तरफ तो सरकार विकास के नाम पर विदेशो से कर्ज लेती है, और इसी कर्ज का व्याज भी हर साल उसे चुकाना पड़ता है, दूसरी तरफ हमारी सरकार के पास कर्ज की रकम को चुकाना तो दूर उसकी व्याज की रकम चुकाने के लिए भी पैसा नहीं होता, व्याज की रकम को चुकाने के लिए सरकार फिर और विदेशी कर्ज लेती है और उसी के लिए फिर सरकार देश में टैक्स बढाती है, आज बाज़ार की हर वस्तु पर ३० से ५० % तक टैक्स होता है…और यही टैक्स महगाई का कारण है…. और दूसरी तरफ हमारे भ्रस्त नेता देश को लूट कर, देश के पैसे को विदेशी बांको में जमा कर रहे है, हमारे देश की आमंदनी तो खूब है किन्तु नेताओ ने उसमे सूराख कर रखा है और वो और उसी सूराख की पाइप लाइन सीधे स्वित्ज़रलैंड और अन्य देशो में जाकर खुलती है…. वही पैसा अप्रत्यक्ष रूप से फिर वर्ल्ड बैंक में चला जाता है और फिर हम अपने उसी पैसे को कर्ज के रूप में फिर लेते है… बस यही जंगल राज और लूट राज देश में चल रह है……. उस के खिलाफ अगर बाबा रामदेव आवाज़ उठाते है तो सरकार साजिश करके मीडिया के सहारे उनको बदनाम कराती है…उनको मारने का सद्यंत्र रचती है, और हम बेवकूफ मीडिया की बातों में आ जाते है और अपने देश के एक महान देशभक्त सन्यासी को ही अपना दुश्मन और ठग समझने लगते है………

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 22, 2011

    आदरणीय सुरेन्द्र जी ,..आपकी बात से पूरा सहमत हूँ ,..बाबा रामदेव का समर्थन ना करना बेवकूफी ही है

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    सही कहा सुरेन्द्र जी आपने यही कारण है की इनको अपने वेतन बढ़ाने की चिंता है,जनता के कष्टों की नहीं और इतनी महंगाई में ३२ रु में गुजरा करने को कहते हैं क्या इनको पता नहीं की पेट्रोल की कीमतें वर्ष में कितनी बार बढी हैं और इन बढी कीमतों का प्रभाव सभी वस्तुओं पर पड़ता है रामदेव जी ने आवाज़ उठाई तो इन्होने + इनके खरीदे मीडिया ने उनको अपराधी बताना शुरू कर दिया.धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2011

    धन्यवाद संतोष जी.


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