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निंदक नियरे राखिये ...........

Posted On: 25 Sep, 2011 Others में

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खेल में विजयी होने पर,परीक्षा में अच्छी सफलता पर,अथवा किसी अन्य गतिविधि में भाग लेकर पुरस्कार के साथ घर बच्चे के चेहरे की दमक घर पहुँचने की जल्दी और माता-पितासे प्रशंसा प्राप्त व लाड पाना अद्भुत क्षण होते हैं,जो उत्साह के साथ उसको आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करते हैं.
स्वादिष्ट खाना बनाने पर ,सजने संवरने पर,कोई अन्य महत्पूर्ण कार्य करने पर पति व परिजनों की प्रशंसा महिला के उत्साह को द्विगुणित कर देती है.पुरुष की किसी भी कार्य में सफलता ,अधिकारी द्वारा सराहना कोई भी उपलब्धि उसको आनंदित करती है.
सेवक कोई अधीनस्थ कर्मचारी शिष्य,कोई भी पारिवारिक सदस्य आदि आदि …..की प्रशंसा आपका कठिन से कठिन काम सरल बना देती है.
जीवन के समस्त क्षेत्रों में जब भी प्रशंसा या सराहना मिलती है तो आगे बढने की प्रेरणा मिलती है.अतः प्रशंसा एक ऐसा दिव्यास्त्र है,जिसके लिए आबालवृद्ध सभी उत्कंठित रहते हैं.आप किसी वृद्ध महिला की पाककला या अन्य किसी भी विशेषता की प्रशंसा करके देखिये ,शरीर में शक्ति न होने पर भी वो आपके लिए भोजन बनाने को तैयार हो जायेंगी.अतः प्रशंसा एक ऐसा दिव्यास्त्र है,जिसके प्रयोग से आप बच्चे से लेकर बूढ़े को भी अपना बना सकते है,यहाँ तक कि पशु पक्षी  भी इस प्रशंसा/प्रेम को समझते हैं.
अतः सकारात्मक प्रशंसा एक शक्तिवर्धक मुफ्त का टोनिक है,और आवश्यक भी है,तथा प्रेरक का काम करता है.परन्तु कभी कभी यही प्रशंसा इन सबसे विपरीत भूमिका का भी निर्वाह करती है. जैसा कि कहा गया है,”अति सर्वत्र वर्जेयत “अर्थात अति प्रशंसा चापलूसी में बदल जाती है,और निश्चित सी बात है कि वहां कुछ न कुछ स्वार्थ है , अति प्रशंसा करने वाले का .,और ऐसे लोग निरर्थक भी प्रशंसा या चापलूसी करते हैं.
.प्राचीन युग में राजाओं की प्रशंसा में भाट चारण लोग अपने शरणदाता राजाओं की प्रशंसा में गाते थे, और प्राय उन राजा महाराजाओं की झूठी प्रशंसा उनको मदहोश रखती थी और उनके विनाश का कारण बनती थी राजा भी केवल अपनी प्रशंसा ही सुनना चाहते थे..विभीषण और लंकापति रावण का उदाहरण इस तथ्य का ज्वलंत प्रमाण है,विभीषण ने प्रभु श्री राम की महिमा का बखान करते हुए रावण को माँ सीता को लौटाने का परामर्श दिया तो रावण ने उनको तो लात मारकर लंका से बाहर निकाल दिया और शेष मंत्री ,दरबारी रावण को विरुदावली बखान करते हुए स्वयं तो रावण का कृपापात्र बने रहे परन्तु रावण के कुल का नामोनिशान मिटवा दिया.
यही प्रवृत्ति आज भी है,सभी प्रभावशाली पदों पर आसीन महानुभावों की प्रशंसा कर अहर्निश उनको महिमामंडित करने वाले सदा इर्द गिर्द रहते हैं और उनको आहलादित रखते हैं. ,और सत्ताधारी !……….. उस नशे में खोये रहते हैं.स्वार्थी लोग अपने उल्लू सीधा करते हैं और आमजन पिसता है क्योंकि नेतागण अत्यधिक प्रशंसा से आत्ममुग्धता की स्थिति में पहुँच जाते हैं,और आमजनता के प्रति अपने दायित्व को भुला बैठते हैं.

प्रशंसा करते -करते किसी को  भगवान बना देना, इतनी अधिक प्रशंसा करना कि सीधासरल आदमी भी अपना विवेक खोकर स्वयं को भगवान् ही मान बैठता है बहुत विनाशक स्थिति है..और एक समय ऐसा आता है कि वह व्यक्ति अहंकार और दर्प का शिकार बन जाता है और उसके गुण अवगुणों में बदल जाते हैं और स्वयं उसका पतन होते होते वह रसातल में पहुँच जाता है.
राजनीति व जन भावनाओं से जुड़े क्षेत्रों व आस्था आदि में ये प्रवृत्ति बहुत आम है.एक सामान्य व्यक्ति जिसको कोई महत्त्व समाज में जन दृष्टि में नहीं होता अचानक अपने किसी अच्छे कार्य या प्रदर्शन के चलते ,प्रचार के माध्यम से भगवान् की श्रेणी में पहुँच जाता है,और शीर्ष पर पहुंचकर धडाम से रसातल में भी पहुंचा   दिया जाता है. और ये काम करता है मीडिया .हमारे देश में ये प्रचलन आम है .क्रीडा क्षेत्र में,अभिनय के क्षेत्र में,धार्मिक क्षेत्र में भगवान बनना बहुत आसान है.आप धर्मगुरुओं के दरबार में जाकर देखिये उनके चरणों में बिछे आस्तिक अंधभक्तों को देखिये,.उनके स्तुति गान,चरणवंदना को देखिये,और फिर देखिये उनके घृणित कर्म.(अपवाद संभव हैं)
किसी भी खिलाड़ी का प्रदर्शन अच्छा होने पर,किसी अभिनेता के अभिनय से प्रभावित होने पर ,किसी नेताके सद्कार्यों को देखकर, या किसी भी प्रकार की सफलता को सराहना बहुत अच्छा है,उसके सद्गुणों को यथासंभव अपनाना शुभ लक्षण है,परन्तु ऐसी दीवानगी की आप उस व्यक्ति को भगवान बना दें बहुत ही हानिकारक. उस व्यक्ति के लिए भी जिसकी प्रशंसा की जा रही है,और स्वयं आपके लिए भी. इतना ही नहीं कई बार माता-पिता अपने बच्चों की भी इतनी अधिक प्रशंसा करते हैं कि बच्चे के लिए वो अति प्रशंसा प्रेरक नहीं रहती हानि कारक बन जाती है,उनमें अतिआत्मविश्वास उत्पन्न हो जाता है
” निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय,
बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय”
जिस बात को हमारे अनपढ़ कवि इतनी भली प्रकार समझते थे हम क्यों नहीं समझ पाते.जो अपने शिक्षित होने का दंभ भरते हैं.
अतः प्रशंसा कर मनोबल तो बढ़ाइए परन्तु इतनी नहीं कि उस व्यक्ति का ही अहित हो.और दूसरी और स्वयं प्रशंसा प्राप्त करने वाले को भी अपनी आँख -कान खुले रखने चाहिए चाहे वो परिवार जैसी छोटी ईकाई हो या फिर कोई भी क्षेत्र ,हमारे इतिहास में ऐसे राजाओं के उदाहरण है,जो भेष बदल कर प्रजा के सुख-दुःख का पता लगाते थे अतः निष्पक्ष आलोचक की उपस्थिति हर व्यवस्था में संजीवनी का काम कर सकेगी..

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44 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pramod chaubey के द्वारा
October 5, 2011

सटीक बात.

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद चौबे जी.

Rekha Gupta के द्वारा
September 29, 2011

very impressive article.

    nishamittal के द्वारा
    September 30, 2011

    धन्यवाद रेखा जी प्रतिक्रिया व ब्लॉग पर आने के लिए.

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
September 29, 2011

निशा जी अत्यधिक प्रशंसा यानि की चापलूसी भी भ्रष्टाचार का ही हिस्सा है विशेष रूप से नौकर शाही में चापलूस व्यक्ति जल्दी उन्नति कर जाता है वनिस्बत उसके जो अपने कम को इमानदारी से अंजाम देता है.परन्तु चापलूसी में विश्वास नहीं करता .

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    आपके विचार से सहमत हूँ मैं सत्यशील जी,देर से प्रतिक्रिया के उत्तर देने का कारण सिस्टम की समस्या थी.

syeds के द्वारा
September 27, 2011

आदरणीया निशा जी, बेशक अगर आस पास कोई ऐसा हो जो हमारे ग़लत कामो को गलत कहता हो तो जिंदिगी में गलतियां कम हो हमेशा की तरह बेहतरीन लेख… http://syeds.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद सैय्यद बंधु आपकी प्रतिक्रिया हेतु

roshni के द्वारा
September 27, 2011

निशा जी नमस्कार हमेशा की तरह सार्थक और बढ़िया लेख ………… आभार

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद रौशनी प्रतिक्रिया के लिए.

jlsingh के द्वारा
September 27, 2011

निशा जी, नमस्कार! हमेशा की तरह सद्विचारों से ओत प्रोत लेख पढ़कर बेहद प्रेरणा मिलती है! आपसे ऐसे लेख की अपेक्षा की जाती है और हर बार एक नया विचार लेकर उपस्थित होती हैं. आपकी जितनी भी प्रशंशा की जाय कम है. जवाहर http://jlsingh.jagranjunction.com/2011/09/26/थोड़ा-हल्का-हो-लिया-जाय/

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद सिंह साहब आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए.

Amita Srivastava के द्वारा
September 26, 2011

निशा दी , आपने बहुत सही कहा कि निष्पक्ष आलोचक की उपस्थति हर व्यवस्था मे संजीविनी का काम करेगी |

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    अमिता सही कहा है आपने.धन्यवाद

Abdul Rashid के द्वारा
September 26, 2011

आदरणीय निशा जी नमस्कार सच कहा आपने लेकिन आज कितने लोग है जो निंदा को पसंद करने की क्षमता रखते है. सुन्दर विचार काश लोग समझ पाते और निंदा और अपमान में भेद कर पाते

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    आपने सही कहा है,रशीद जी की अपनी निंदा सहन करने की सामर्थ्य सबमें नहीं होती.परन्तु निंदा सकारात्मक होनी चाहिए.

vinitashukla के द्वारा
September 26, 2011

सच है निशाजी; स्वस्थ आलोचना व्यक्ति को जीवन में ऊपर उठने की प्रेरणा देती है; चापलूसी को पसंद करने वाला व्यक्ति अंततः अधोगति को ही प्राप्त होता है. सुन्दर आलेख पर बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद विनीता बहिन आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु.

Ramesh Bajpai के द्वारा
September 26, 2011

आदरणीया निशा जी व्यक्ति कर्म के द्वारा ही निदा , घृणा ,या प्रसंसा का पात्र बनता है | कई बार तो उसके वस्त्र मेरे वस्त्रो से उजले क्यों ? भी निंदा का कारक बनते है | अगर आप किसी की सराहना नहीं कर सकते तो उसकी निंदा करने का अधिकार भी आप को नहीं | लोग निंदा करने के लिए हाथो लम्बी जीभ निकल लेते है , पर प्रसंसा के वक्त उनके मुख में दही जम जाता है |

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    आदरनीय बाजपेयीजी जी,प्रशंसा सार्थक हो और साथ ही निंदा भी सकारात्मक .परन्तु आपका कथन सत्य है प्राय व्यवहार में ऐसा ही होता है.धन्यवाद

sumandubey के द्वारा
September 25, 2011

निशा जी नमस्कार । हमारे समाज को यदि ए पक्ति समझ में आ जाय तो सब योगी जैसे हो जायं तारीफ तो सभी चाहते है पर तारीफ व चापलूसी में फर्क समझना आना चाहिए ।

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    सही है सुमन जी यही अंतर समझना जीवन में आगे बढ़ने के लिए जरूरी है.

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 25, 2011

आदरणीया निशा जी, बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख..और एक सच भी.. आकाश तिवारी

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद आकाश जी.

rajuahuja के द्वारा
September 25, 2011

निशा जी , प्रशंसा वह मदिरा है जो कानों से पिलाई जाती है !और फिर प्रशंसा से अहंकार की तृप्ति भी तो होती है ! अतः कोई योगी ही इससे बच पता है ,शायद लाखों में कोई एक ! सुन्दर लेख , साधुवाद !

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    राज आहूजा जी बिलकुल व्यवहारिक तथ्य बताया है आपने.धन्यवाद.

manoranjanthakur के द्वारा
September 25, 2011

एक बार फिर सुंदर आगाज बढ़िया संजीवनी बूटी

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद ठाकुर साहब.

Santosh Kumar के द्वारा
September 25, 2011

आदरणीय निशा जी,..सादर प्रणाम बेहतेरीन सार्थक आलेख ,..अमृत की अधिकता भी विष का काम कर सकती है ,..मेरे विचार से निंदक ही असली मित्र होता है ,.क्योंकि जो सत्य की और प्रेरित करे वही मित्र ,..और निंदक से ज्यादा सत्यज्ञान कोई नहीं दे सकता है ,..लेकिन मदांध लोग कहाँ इस बात को समझते हैं ,..यदि समझते होते तो साम्राज्य कभी बर्बाद न हुए होते… अत्यंत प्रभावशाली समसामयिक आलेख के लिए आपका हार्दिक आभार

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद संतोष जी आपके सदा सर्वदा प्राप्त होने वाले सहयोग हेतु.

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
September 25, 2011

आदरणीय दीदी, सादर प्रणाम! बिलकुल सही लिखा है आपने – ‘ जीवन के समस्त क्षेत्रों में जब भी प्रशंसा या सराहना मिलती है तो आगे बढने की प्रेरणा मिलती है ‘ परन्तु यह भी सही है कि आलोचनाएँ हमें सुधरने का अवसर प्रदान करती हैं | अच्छी रचना |

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    कैलाश जी आपका संबोधन भावविभोर कर देता है.धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया हेतु.

sadhana thakur के द्वारा
September 25, 2011

आदरणीय निशा जी ,आलोचक ही सही प्रसंशक होते हैं ,,हमेशा ही तरह उत्तम रचना .

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद साधना जी .आपकी प्रतिक्रिया हेतु.

krishnashri के द्वारा
September 25, 2011

आपकी पंक्तियों से शुरू करता हूँ ,”सकारात्मक प्रशंसा एक शक्तिवर्धक मुफ्त टानिक है |———-अतः निष्पक्छ आलोचक की उपस्थिति हर व्यवस्था में संजीवनी का कम कर सकेगी | ” बन्दर यदि एक गोले में खड़े हो जाएँ और एक दुसरे की पूंछ उठा कर जय-जयकार करे तो इसमें किसी का भला नहीं होने वाला है | अपना वर्चस्व बनाने के लिए ये झूठे प्रशंसक ,अपना एक ग्रुप बना लेते हैं ,जो उस समूह के लिए हानिकारक होता है | सोचने वालों के लिए सुन्दर आलेख |

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 25, 2011

    आदरणीय कृष्णा जी ,.अत्यंत प्रभावशाली उदहारण दिया है आपने ,..साधुवाद

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद कृष्ण जी,शायद यही चांडाल चौकड़ी होती है,जो पतन की ओर धकेलती है.

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    धन्यवाद संतोष जी

Alkar Gupta के द्वारा
September 25, 2011

निशा जी , आपने इतने महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखा है जिसकी महत्ता हर किसी के जीवन में है…..मिथ्या प्रशंसा निस्संदेह किसी के भी जीवन के लिए घातक सिद्ध होती है ये निष्पक्ष आलोचक हमारे जीवन को सुधरने का अवसर देते हैं……अति .उत्तम पोस्ट !

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    अलका जी आलोचना निष्पक्ष,सत्यता पर आधारित हो और सकारात्मक हो बस सोने में सुहागा है.

akraktale के द्वारा
September 25, 2011

निशाजी नमस्कार, बहुत ही अच्छी व्याख्या की है आपने प्रशंसक और निंदक की. यदि काफी में शकर की मात्र कम हो जाये या ज्यादा हो जाए दोनों ही दशा में उसका स्वाद बिगड़ जायेगा किन्तु संतुलित मात्रा में एक स्वादिष्ट काफी बनेगी.इसी प्रकार प्रशंसक और निंदक का संतुलन जरूरी है, झूठी प्रशंसा तो गर्त में धकेलने का कार्य करती है.

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    बहुत अच्छे व्याख्या आपके द्वारा अक्रक्ताले जी.

Amar Singh के द्वारा
September 25, 2011

सादर नमस्कार, बहुत ही सुन्दर लेख. आलोचक व्यक्ति के सर्वश्रेठ मित्र होते है. जो पल पल हमें हमारी कमियों को हमें बताते रहते है. कटु वचन है औषधि….. http://singh.jagranjunction.com/2011/09/25/%E0%A4%95%E0%A4%9F%E0%A5%81-%E0%A4%B5%E0%A4%9A%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%94%E0%A4%B7%E0%A4%A7%E0%A4%BF/

    nishamittal के द्वारा
    October 5, 2011

    आपके प्रेरक उद्धरण व प्रतिक्रिया हेतु आभार.


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