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बच्चों को मोहरा न बनाएं.

Posted On: 7 Oct, 2011 Others में

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                                        संयोग से गत दिनों में एक परिवार से सम्पर्क कुछ अधिक समय रहा.परिवार सुखी,समृद्ध और सुशिक्षित.पुत्र-पुत्रवधू,अग्रिम पीढी के प्यारे बच्चे.परन्तु एक घटना ऩे स्तब्ध कर दिया. छोटे बच्चे ऩे अपनी माँ से पूछा कि क्या वो अपने दादा-दादी के पास थोड़ी देर  के लिए जा सकता है,जबकि दादी- दादा  बहुत ही सज्जन थे, दिखावे के रूप में संभवतः पारस्परिक सम्बन्ध भी संतोषजनक थे  और  सब एक ही घर में रहते थे.सर्वप्रथम तो ये देखकर कुछ आश्चर्यजनक लगा कि घर में जाने के लिए अनुमति! और माँ का मना करना.मैंने सोचा संभवतः कोई विशेष कारण हो, तो पता चला कि ऐसा कुछ नहीं बस अति आधुनिकता के रंग में  रंगी उस मम्मी को ये डर रहता है कि बच्चे गंवार बन जायेंगें.घर लौटने पर भी यही उधेड़ बुन चलती रही कि क्या बच्चे की सबसे बड़ी शुभचिंतक माँ की ये सोच उचित है.? पुत्र या पुत्री  का विवाह कर सभी माता-पिता अग्रिम पीढी के साथ समय व्यतीत करने को आतुर रहते हैं,और बच्चे भी आनंदित रहते हैं उस दुनिया में.दादी दादी द्वारा सुनायी जाने वाली कहानियां  अब दुर्लभ होती जा रही हैं,जो बच्चों के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं.उसके पीछे पूर्व लेखों में  अन्य पूर्ववर्णित कारणों के अतिरिक्त ये कारण और अधिक पीड़ाजनक है.
                                                                             ये कहानी कोई एक दो परिवारों की नहीं बहुत से परिवार इस दुखद त्रासदी से पीड़ित हैं,और स्वयं को बच्चों का शुभचिंतक मानने वाले माता-पिता अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने के प्रयास में यही भूल जाते हैं कि वो बच्चों का कितना अहित कर रहे हैं. ये एक ज्वलंत समस्या है,न केवल पारिवारिक दृष्टिकोण से अपितु बच्चे के भविष्य के दृष्टिकोण से भी.
                                                                            प्राय परिवारों में बच्चों के समक्ष परिवार के अन्य सदस्यों की निंदा आदि धडल्ले से की जाती  है,निंदा परिवार के सदस्यों की ही नहीं स्वयं बच्चों के माता-पिता एक दूसरे की करते हैं,एक बार एक बच्चे को अपनी माँ के लिए कुछ अपशब्द बोलते हुए देखा तो पता चला कि सुशिक्षित होने पर भी बच्चे के पिता की भाषा गालीगलौज में बात करने की थी.वही बच्चे के संस्कारों में समाहित हो गया था.साथियों के साथ अपने शिक्षकों के प्रति भी वही भाषा उसकी प्रवृत्ति बनजाती है.इन सबसे बढ़कर दुखद है बच्चों को माता-पिता द्वारा मोहरा बनाना.प्राय परिवार में बच्चों से जासूसों का काम लिया जाता है. शतरंज के मोहरों की भांति कभी बच्चे की भावनाओं के साथ माँ खेलती हैं,तो कभी पिता. .बच्चे अपने पिता की सभी बातें अपनी माँ को बताते हैं और यही स्थिति विपरीत रूप में भी रहती है,अर्थात पिता भी बच्चों को ऐसी जासूसी के लिए प्रयोग करते हैं.यदि बच्चा अनिच्छुक हो तो उसको भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जाता है,उसको कहा जाता है कि वो अपने माँ पिता से प्यार नहीं करता या माता-पिता उसकी अभीष्ट वस्तु तभी लाकर देंगें जब वह उनके द्वारा सौंपा गया कार्य करेगा,या फिर माँ पिता उससे बोलेंगें नहीं या उसको प्यार नहीं करेंगें और कभी तो बच्चे को मारने-पीटने की भी धमकी दी जाती है., .आदि आदि…………कई बार तो बच्चों को अनुचित प्रलोभन देकर अनैतिक कार्य करवाने  तथा उनको जान से मरने तक के मामले समाचारपत्रों की सुर्खियाँ बनते हैं…संभवतः माता-पिता ये भूल जाते हैं कि बच्चों के इस भावनात्मक शोषण से वो उन बच्चों के साथ शत्रुता कर  रहे हैं, बच्चे के मन पर ऐसे संस्कारों का रोपण हो रहा है,जो बच्चों के लिए तो घातक है,भविष्य में बच्चे इस कुप्रवृत्ति का लाभ उठाकर स्वयं अनैतिक कार्यों में संलग्न हो जाते हैं.साथ ही अपने माता-पिता के प्रति उनके ह्रदय में सम्मान भी नहीं रहता.
                                          इसी संदर्भ में अभी पता चला कि कुछ लोग अपने बच्चों को नवरात्र में कन्या पूजन आदि में भेजना भी ठीक नहीं समझते.उनके विचार से ये अपमानजनक है और ऐसे कार्यक्रम में अमीर गरीब सभी प्रकार के बच्चे होते हैं.उनके साथ बच्चों का सम्पर्क उचित नहीं.मेरे विचार से यहाँ माता-पिता बच्चे को समाज से जोड़ने का नहीं तोड़ने का काम कर रहे हैं बच्चे को किसी ग्रंथि का शिकार बनाना सर्वथा अनुचित है. .
                                                                                       एक अन्य जटिल समस्या है,जो यद्यपि किसी न किसी रूप में समाज में सदा  दृष्टिगत होती  रही है,परन्तु वर्तमान में चरम पर है.माता-पिता का  अपने बच्चों को सदा शीर्ष पर देखना एक स्वप्न होता है, ,जो एक शुभ लक्षण है.बच्चे की प्रतिभा को निखारकर,अपनी सामर्थ्य के अनुसार सुविधा -साधन प्रदान कर तथा उसको प्रेरणा प्रदान करना सभी माता-पिता का दायित्व है.प्रतिभा चाहे शिक्षाजगत में हो,क्रीडा,ललित कलाओं आदि या किसी अन्य क्षेत्र में, उसको प्रोत्साहन प्रदान करना आवश्यक है,.परन्तु मेरे विचार से  अपने स्वप्नों को उनपर  थोपना न्यायोचित नहीं.एक बार एक बच्चे का केस पढ़ा था शायद” बुधिया” उस बच्चे का नाम था जिसकी प्रतिभा उसका कुशल धावक होना था परन्तु उसकी शारीरिक अक्षमता के बाद भी उसका एक प्रकार से शोषण ही होता था.दूसरे शब्दों में उसके शरीर पर अत्याचार.
टी वी के विभिन्न कार्यक्रमों में बच्चों के माता-पिता के उदगार सुनकर आश्चर्य भी होता है और दुःख भी..नृत्य के एक कार्यक्रम में एक छोटी सी बच्ची द्वारा एक अत्यंत अभद्र व अश्लील गीत पर गंदी भावभंगिमाओं के द्वारा नृत्य किया गया तो मान्यवर निर्णायक महोदय में से एक ने उस बच्ची से पुछा कि उसको किसने सिखाया, तो उसने कहा उसके पापा ने .पापा को मंच पर बुलाया गया और उनसे पूछा कि आपने यही नृत्य क्यों सिखाया इस प्रतिभाशालिनी बच्ची को तो उनका उत्तर था कि दर्शकों को पसंद आ सके .इसी प्रकार . ,जब नन्हें मुन्ने बच्चों को रिकार्ड्स में लाने  के लिए या टैलेंट प्रदर्शन कार्यक्रमों में उनको विजयश्री दिलाने के लिए उनको झौंक दिया जाता है,.स्वाभाविक रूप से विजयश्री एक बच्चे को मिलती है,और शेष को अश्रु बहाते देखा जा सकता है,मेरे कथन का अर्थ ये कदापि नहीं कि इन कार्यक्रमों में भाग लेना अनुचित है,परन्तु उनकी क्षमता , उनकी निजी प्रतिभा व रूचि होने पर .वैसे भी प्राय परिणाम वोटिंग आधारित होते हैं,जिनके कारण प्राय अपेक्षित नहीं होते और बच्चे अवसाद के शिकार हो जाते हैं,अभी पिछले दिनों कुछ केसेज ऐसे रहे ,जिनके कारण बच्चे शारीरिक व मानसिक अवसाद का शिकार बने.पढ़ाई तो उनकी बाधित हुई ही ,तनाव से भी पीड़ित  हुए.किसी कार्य में सफलता के लिए जूनून होने अच्छा है,परन्तु अपेक्षित सफलता न मिलने पर उनका शारीरिक मानसिक शोषण उनको व्यथित कर देता है.

यदि परिवार में कोई समस्या ऐसी है भी जो आपको पूर्व पीढी की पसंद नहीं तो बच्चे को सकारात्मक रूप से समझाया जा सकता है,तथा बड़े लोगों से भी अनुरोध किया जा सकता है इसी प्रकार पति पत्नी द्वारा पारस्परिक अविश्वास या विवाद की स्थिति में बच्चे का भावनात्मक शोषण उसको अपराधी बना सकता है..उनका आत्मविश्वास समाप्त करता है,और अपने पालकों के प्रति सम्मान की कमी या वितृष्णा उत्पन्न करता है.और बर्बाद करता है उनका भविष्य. strong>

                                                        प्राय देखा जाता है,कि माता-पिता अपने पूर्वसंचित अरमानों को अपने बच्चों के माध्यम से पूर्ण करना चाहते हैं,जो उस  सीमा तक ही उचित है,जब तक बच्चे पर बोझ के रूप में नहीं है,अतः अपनी संतान को प्रेरित करिए,यथासंभव साधन प्रदान करिए परन्तु अपनी अतृप्त आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उनको मोहरे के रूप में प्रयोग करते हुए उनके भविष्य के साथ मत खेलिए ,उनकी स्वाभाविक प्रतिभा को विकसित होने दीजिये.माता-पिता से बड़ा हितैषी बच्चे का कोई नहीं हो सकता ,परन्तु अपने अरमानों की पूर्ती के लिए उनका भविष्य दांव पर मत लगाईये.
                                                
 

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57 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

चन्द्रपाल के द्वारा
October 12, 2011

निदा फाजली साहब के एक शेर की याद आ गई आपके लेख से … बच्चों के नन्हें हाथों को चांद सितारे छूने दो। चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे।

    nishamittal के द्वारा
    October 12, 2011

    सर्वप्रथम तो आपकी प्रथम प्रतिक्रिया हेतु आभार चंदरपाल जी.सही कहा आपने निर्दोष ,निर्मल मन वाले बच्चों की कोरी स्लेट को हम ही वाह्य आडम्बरों से चित्रित कर उसको विकृत बनाते हैं,परन्तु पुस्तकें देना तो आवश्यक है बस संस्कार हम अपने व्यक्तिगत उदाहरणों से बच्चों को प्रदान कर सकते हैं.

bharodiya के द्वारा
October 10, 2011

निशाबेहन नमस्कार धन्यवाद ईस लेख के लिये । अपनी बात केहने में एक जगह आप को झिझक हो गई । आप ने कहा —-मेरे कथन का अर्थ ये कदापि नहीं कि इन कार्यक्रमों में भाग लेना अनुचित है——– मै एक द्रष्य आप के साम ने रखता हुं । एक मां अपने बच्चे को एक कम्पनी की प्रोडक्ट पिलाती है । स्कूल में जापानी कुश्ति का आयोजन होता है । ईस मां का बच्चा दूसरे बच्चे को पछाड कर उस की छाती पर बैठ जाता है और अपनी मुठ्ठी दबा कर कोहनी मोड कर विजय की मुद्रा मे आ जाता है । मां खूश, होल में तालियां । मै तो मानता हुं की इन कार्यक्रमों में भाग लेना बिलकुल अनुचित है । ईस लिए नही की मुझे ऐसे द्रष्य से घीन आती है । में हारे हुए बच्चों के ऍंगल से देखता हुं । ईस सीन का हारा हुआ बच्चा तो जानता था मुझे हारना है उसी का पैसा उसे मिलनेवाला है लेकिन दूसरी कई प्रतियोगीता है जहा बच्चे सिर्फ जीतने की आशामें ही जाते हैं । जब वो हारते हैं तो हार जीवन भरके लिए बोज बन जाती है । एक लघुताग्रंथी बंध जाती है । बच्चों की उमर कलाकार बनने की नही होती है, मूलभुत शिक्षा पाने की होती है । नाबालिग अवस्था में बच्चा कोइ डोक्युमेंट साइन नही कर सकता तो फिर अपने जीवन का डोक्युममेंट कैसे साइन कर सकता है । मांबाप और प्रशासन की जीम्मेदारी बनती है बच्चों को सही दिशामे ले जाये । बच्चों की कला देखने वालों को कलासे कोई नाता नही है, वो तो बस ये बच्चा कर रहा है ईस बात की हैरत होती है और हैरत का ही मजा लेते है । कला कोइ रास्ते मे पडी चीज नही है जो बच्चा कम उम्र मे सिख सकता है । कडी साधना के बाद कला मिलती है । टी.वी वाले ईसे बाल मजदूर की तरह उपयोग करते हैं । कला के नाम पर सपोर्ट करना कला का ही अपमान है ।

    nishamittal के द्वारा
    October 10, 2011

    भरोदिया जी आपने एक कटु सत्य को उद्घाटित किया है,प्राय रियलिटी शोज में सभी कार्यक्रमों में ऐसा होता है,जो कलाकार प्रारम्भ से शीर्ष पर चल रहा होता है,अंत में बाजी दूसरा मार लेता है,ऐसा लगता है,सब पूर्व प्रायोजित है.बाल श्रम पर बहुत पहले एक लेख लिखा गया था उसमें इस तथ्य पर लिखा था कार्यक्रमों में अबोध बच्चों की भागीदारी.भी एक प्रकार से बालश्रम है,हाँ बच्चे की जन्मजात प्रतिभा को निखरने का पूर्ण अवसर मिलना चाहिए.उनपर बलात थोपना नहीं चाहिए.

abodhbaalak के द्वारा
October 10, 2011

आदरणीय निशा जी समय के साथ बच्चे अपने बचपन खोते जा रहे हैं, वो सरलता, सुलभता कहा है, हर तरफ गला काट कम्पटीशन ने उन्हें ……….. और माँ बाप भी उन्हें केवल जीत ते ही देखना चाहते हैं और अपनी ऐसी इच्छाएं जो की वो पूरी नहीं कर सके उसे पूरा करने के लिए …………. समाज का आइना dikhata lekh… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 10, 2011

    अबोध जी ,धन्यवाद समय से पूर्व परिपक्व होते बच्चे ,उनकी भाषा और उसपर आन्नदित होते अभिभावक.यही वस्तुस्थिति दृष्टिगोचर हो रही है सर्वत्र.

anoop pandey के द्वारा
October 9, 2011

चार पलों में बचपन बीता, एक दो दिन रही जवानी मरतेदम तक जिया बुढ़ापा अपने जीवन की यही कहानी….. ये आज का सच है….बच्चे अपने माँ बाप के सपनो को पूरा करने के लिए ही जी रहे है….या कहूँ की माँ बाप जो खुद नहीं कर पाए वो अपने बच्चो से करवाकर संतुष्टि खोज रहे है……पर पहचान और पैसे की ये हवस बचपन को छीन कैसे बुढ़ापे को कम उम्र में ही थोप रही है ये उनको नहीं दीखता……सार्थक लेख हेतु साधुवाद….

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद पाण्डेय जी आपकी प्रथम व सकारात्मक प्रतिक्रिया एवं सहयोग के लिए.जीवन का यथार्थ बताया है आपने.

    anoop pandey के द्वारा
    October 10, 2011

    आभार निशा जी किन्तु आपके लेखों पर ये मेरी प्रथम प्रतिक्रिया नहीं है….जून जुलाई के लेखों पर भी मेरी कई प्रतिक्रियाएं है. और आपने भी हमारे ब्लॉग पर प्रतिक्रियाएं दी है…..

    nishamittal के द्वारा
    October 10, 2011

    आदरनीय पाण्डेय जी ,क्षमा चाहती हूँ एक लम्बे अन्तराल के कारण आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई और ब्लॉग भी संभवतः आपका नहीं आया (वैसे कुछ समय मैं भी मंच से अनुपस्थित रही.)

    anoop pandey के द्वारा
    October 11, 2011

    thats correct………i m on ship n currently anchored at maxico so v r getting some net. this way u were not wrong i m absent from july ……. but still xpect that ppl wont forget me wen i will b back. and i m quite thankful to u that u remebered.

    nishamittal के द्वारा
    October 11, 2011

    विषम सुविधाओं व व्यस्तता में ब्लॉग को समय देने के लिए आभार.समय मिलने पर आप पुनः लिखेंगें.

pramod chaubey के द्वारा
October 9, 2011

निशा जी, बच्चे तो देवता हैं। हम उन्हें बनाने के चक्कर में बिगाड़ देते हैं।  बच्चों को मोहरा न बनाएं.. शीर्षक से कही बातें अच्छी हैं। इंसान की प्रकृति(स्वभाव) जैसा होता है। अमूमन वह घर में  या बाहर एक जैसा व्यवहार करता है।  घर और बाहर दोनो ही  स्थितयों में अच्छा व्यवहार वाजिब है। हम जैसे होंगे बच्चे भी वैसे होंनिशा जी, बच्चे तो देवता हैं। हम उन्हें बनाने के चक्कर में बिगाड़ देते हैं। बच्चों को मोहरा न बनाएं.. शीर्षक से कही बातें अच्छी हैं। इंसान की प्रकृति(स्वभाव) जैसा होता है। अमूमन वह घर में या बाहर एक जैसा व्यवहार करता है। घर और बाहर दोनो ही स्थितयों में अच्छा व्यवहार वाजिब है। हम जैसे होंगे बच्चे भी वैसे होंगे।   

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    चौबे जी ,माता-पिता अपने संस्कारों के अनुरूप ही बच्चों को शिक्षा देते हैं,परन्तु बच्चे के भविष्य निर्माण का उत्तरदायित्व सम्भाले हुए माता-पिता तथाकथित आधुनिकता की दौड़ में उनको मोहरा बनाते हैं,चाहे वह पारिवारिक मोर्चा हो या फिर करियर ,हर बच्चा एक इंसान भी है ये भुला दिया जाता है.धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए.

Amar Singh के द्वारा
October 8, 2011

समाज का आइना दिखाता लेख.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद अमरसिंह जी.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 8, 2011

पीढ़ियों के बीच की वैचारिक खाई से सम्बंधित समस्याएं तो काफ़ी पुरानी हैं, परन्तु खुद को आधुनिक समझते हुए बच्चों के अन्दर ग्रंथियों का निर्माण करने का प्रयास कान्वेंट संस्कृति के माता-पिता को कितना महंगा पड़ेगा, उन्हें शायद इसका अनुमान नहीं है । गंवार वे नहीं जिन्होंने कान्वेंट का मुंह नहीं देखा, बल्कि वे स्वयं बहुत बड़े मूर्ख हैं, जो अपने बच्चों को मानवीय रिश्तों की संवेदनशीलता एवं उच्च-कोटि के संस्कारों से वंचित रखना चाहते हैं । समाज में हर जगह वही परिवार सम्मान एवं उन्नति के शिखर पर आसीन दिखते हैं, जिन्होंने पीढ़ियो के बीच सामन्जस्य बनाकर घर के बुज़ुर्ग अथवा माता-पिता को हमेशा खुद से अधिक श्रेष्ठ एवं सम्माननीय समझा है, हमेशा उनकी इज़्ज़त की, तथा अपनी संतान में भी ऐसे ही संस्कार भरने का प्रयास किया । यह सच्चाई देखकर भी जो तथ्य से अन्जान हैं, उन्हें खुद तो ठोकरें नसीब होती ही हैं, भावी पीढ़ी के रास्तों में भी कांटे ही बिखेर रहे हैं । आभार !

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    तथाकथित आधुनिक पीढी को वास्तविकता से परिचित कृते आपके सन्देश के लिए आभार.बहुत दिन बाद प्राप्त आपकी सुखद प्रतिक्रिया के लिए पुनः धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    कृपया कराते पढ़ें.

Tamanna के द्वारा
October 8, 2011

निशा जी, सामाजिक हकीकत को बयां करता आपका लेख बहुत अच्छा है, लेकिन वर्तमान समय पूरी तरह प्रतिस्पर्धा प्रधान बन चुका है. जो आगे नहीं निकलता वह बहुत पीछे रह जाता है.अभिभावक अपने बच्चों के अच्छे के लिए ही उन्हें प्रोत्साहित करते है, हा, हद से ज्यादा दबाव बच्चे के मस्तिष्क पर आघात कर सकता है.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    तमन्ना जी प्रतिस्पर्धा का जमाना है,आपके इस तर्क से सहमत हूँ मैं परन्तु बच्चे की भावनाओं से खिलवाड़,उसके मस्तिष्क में अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए विष भरना और उसको अश्लीलता के लिए प्रोत्साहित करना तथा उनकी क्षमता व रूचि के विरूद्ध उनपर दवाब बनाना ही क्या उनको आगे ले जा सकता है,केवल अश्लीलता का सहारा ही आगे ले जा सकता हैं,ऐसा नहीं है.धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए.

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 10, 2011

    तमन्ना जी, नमस्कार आदरणीय निशा जी ,.सादर प्रणाम प्रतिस्पर्धा कुछ हद तक ठीक है लेकिन हर बात में प्रतिस्पर्धा ठीक नहीं ,…थोड़ी सी समझदारी दिखानी चाहिए ,..वही मिलता है ,.जो भाग्य और कर्मों से निर्धारित होता है ,… अभिभावक अच्छे के लिए प्रोत्साहित करें यह तो अच्छा ही है ,..लेकिन अपना उल्लू सीधा करने के लिए बच्चों का इस्तेमाल निहायत ही घटिया मानसिकता है ,..इससे सब का नुक्सान ही होता है ,..किसी का भी फायदा नहीं होता ,…अश्लीलता का प्रयोग राखी सावंत की मानसिकता को दिखाता है ,…साभार

    nishamittal के द्वारा
    October 10, 2011

    राखी सावंत के कार्यक्रम या फिर बिग बौस सदृश कार्यक्रम सभी एक ही लीक के हैं,बच्चों के मुख से बोले जाने वाले संवाद कभी कभी बहुत ही अप्रिय लगते हैं माता-पिता प्रसन्न होते हैं मानो यही आधुनिकता का मापदंड है.धन्यवाद

vasudev tripathi के द्वारा
October 8, 2011

आज की बिडम्बना का बहुत सही चित्रण किया है आपने निशा जी आपने, आज यह विकासवादी वैचित्र्य हमारे समाज को मानवता व संस्कार से दूर न जाने कहाँ ले जाकर छोड़ेगा..?? वीओकसित होती कान्वेंट कल्चर और दम तोड़ती भारतीय संस्कृति की इस गति को देखकर मन सशंकित होता है की न जाने कितने दिनों तक यह भारत जीवित रह पाएगा…….?????

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    संस्कृति पर प्रहार किसी संस्कृति को मिटाने का प्रयास करना प्रमुख साधन है,परन्तु दुखद अन्धेनुकरण में यह काम हम स्वयं कर रहे हैं.बिना बिचारे .धन्यवाद

mparveen के द्वारा
October 8, 2011

नमस्कार निशा जी , कई दिन बाद फिर से आपका आलेख पढ़ कर बहुत अछा लगा .. आपके आलेख हमारे लिए ज्ञान से भरपूर होते हैं और एक सीख का काम करते हैं .. आशा है आप इसी तरह ज्ञान वर्धन करती रहेंगी और लिखती रहेंगी…… माँ बाप को अपने बच्चे पर कुछ भी थोपने से पहले अपने बाल्यकाल में जाकर देखना चाहिए की जब हमारे माता पिता हम से कोई आशा रखते थे तो हमारी क्या मनोदशा होती थी …. हर माँ बाप को अपने बच्चों से आशाएं होती हैं पर माँ बाप का भी कर्त्तव्य है की एक बार अपने बच्चे की इच्छाओं और रुचियों को भी देख ले जो वो चाहे उनको वाही बन्ने दे किसी प्रकार का निर्णय थोपे नहीं उन पर …… धन्यवाद….

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    बच्चे को आगे देखने के लिए उसकी भावनाओं से खिलवाड़ तथा अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसको अनुचित कार्यों में संलग्न करना दुर्ब हग्यजनक है,धन्यवाद प्रवीन जी.

Charchit Chittransh के द्वारा
October 8, 2011

अत्यंत महत्वपूर्ण , उपयोगी एवं अनुकरणीय बिंदु प्रस्तुत किये हैं आपने ! वधाईयां !!!!!!!!! मेरे मत में हायर सेकंडरी और उससे ऊपर की कक्षाओं में बाल मनोविज्ञान का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए !

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद चित्रांश जी ,हमारी व्यवस्थ उन सब आवश्यक तथ्यों को ही पाठ्यक्रम से हटा रही है,जो व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है,सकारात्मक प्रयास करने के लिए मनोयोग से लगना होगा.

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 8, 2011

आदरणीय निशा जी ….सादर अभिवादन ! यह शायद हार्ड कम्पीटीशन का नतीजा भी हो सकता है ….. मा- बाप का गैरजरूरी अत्यधिक दबाव + और अपनी महत्वाकांक्षी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए औलाद को वक्त से पहले ही हद से ज्यादा जिम्मेवारी के बोझ तले दबा देना किसी भी हालत में उचित नहीं कहा जा सकता …… जैसा की आपने कहा है की जहाँ पर बच्चो की अपनी रूचि है- उस मामले की बात ही अलग है ….. रजनी सीरियल के समय में एक गुड्डी नाम की बाल कलाकार हुआ करती थी …… उस बेचारी का अत्यधिक दोहन तथा आर्थिक शोषण करने के लिए उसके सगे बाप ने ऐसे टीके लगवाए थी की उसका विकास रुक जाए और वोह बालकलाकार के रूप में जयादा से ज्यादा –ज्यादा देर तक कम सके ……मुबारकबाद

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 10, 2011

    आदरणीय गुरुदेव ,.सादर प्रणाम आपने अच्छा उदहारण देकर लालची घटिया मानसिकता को स्पष्ट किया है ,..मैं आपसे पूरा सहमत हूँ ,..आदरणीय निशा जी भी आपसे पूरा सहमत होंगी,…साभार

atharvavedamanoj के द्वारा
October 7, 2011

आदरणीय निशा जी, सादर प्रणाम| जौहर की भूमिका लिखते समय मेरे प्रेरणास्रोत परमराष्ट्र कवि श्री श्यामनारायण पाण्डेय जी लिखते है ….आग लगा दो उस देश को जिस देश में राष्ट्र की रक्षा के लिए हँसते हंसते अपने प्राणों की बलि देने वाले पुरुष नहीं..फूंक दो उस समाज को जहाँ अपने मर्यादा की रक्षा के लिए सहर्ष अपने आपको आग में झोंक देने वाली स्त्रियाँ न हो|…कविवर के इन शब्दों का मेरे व्यक्तिव पर बहुत ही गहरा प्रभाव है किन्तु आज हमारे राष्ट्र की धारा विपरीत दिशा की ओर बह रही है|निःसंदेह इसका कारण आपके लेख में वर्णित पारिवारिक अधिगम है ..जिसने अब इस देश में महापुरुषों के आगमन को बाधित कर रखा है|बहुत ही सार्थक और समीचीन लेख के लिए कोटिशः बधाइयाँ, जय भारत, जय भारती|

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद मनोज जी ,बहुत अच्छा स्मरण कराया आपने कविवर श्यामनारायण पाण्डेय जी का.उनकी रचनाएँ प्रभावशाली होने के साथ ओज से परिपूर्ण होती हैं,काश हमारी सरकार ऐसे महान कवियों की रचनाओं का समावेश अधिकाधिक पाठ्यपुस्तकों में करे. अपने स्वार्थों के लिए तथा अपनी सुप्त आकांक्षाओं के लिए बच्चों को मोहरा बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है.

vinitashukla के द्वारा
October 7, 2011

बच्चे तो कच्ची मिट्टी के समान होते हैं, जिस रूप में ढालो, ढल जायेंगे. अपने सही कहा निशा जी; बच्चों में अच्छे संस्कार डालने के लिए, अभिभावकों को अपनी कमजोरियों पर काफी हद तक काबू रखना पड़ता है. इस सार्थक और अर्थपूर्ण पोस्ट पर बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    बिलकुल सही कहा आपने विनीता जी.धन्यवाद

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 7, 2011

आदरणीय दीदी, सादर प्रणाम ! वास्तव में यह आज की एक ज्वलंत समस्या है | कहा जाता है की बच्चे तो कुम्हार की मिटटी के सद्रश होते हैं जिन्हें हम कोई सा भी आकार दे सकते हैं | ये तो ऐसे पौधे हैं जिन्हें संस्कार के गंगाजल से सींचा जाना चाहिए,परन्तु अज्ञानता या अहम् के वशीभूत हो हम उन्हें शराब से सिंचित कर रहे हैं | बहुत ही सुन्दर आलेख ……..बधाई !

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद डॉ साहब.

sadhana thakur के द्वारा
October 7, 2011

आदरणीय निशा जी ,बहुत ही सकारात्मक सोच को दर्शाती सुन्दर रचना ,बच्चे को कहीं न कहीं तो हमलोग इस्तेमाल करते ही हैं …

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद साधना जी प्रतिक्रिया हेतु.

alkargupta1 के द्वारा
October 7, 2011

निशा जी , भौतिकता की चकाचौंध में बाह्य प्रदर्शन करने वाले माता-पिता को आगाह करता हुआ शिक्षाप्रद उत्कृष्ट आलेख के लिए बधाई !

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    अलका जी ,धन्यवाद आपके विचारों के लिए.

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
October 7, 2011

आदरणीया निशा जी सच में बहुत से कारण देखे गए जिनसे बच्चे कुंठित हुए पहले लोग केवल बालिकाओं के लिए चिंतित होते थे लेकिन हालिया घटनाओं ने बच्चों को भी कहीं अकेले भेजना वहां छोड़ने पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया माँ बाप भी करें तो क्या करें बच्चों को आगे बढ़ने के लिए बाहर रखना भेजना भी और झेलना भी …जो भी बहुत सुन्दर और सार्थक लेख आप का विचार करने को प्रेरित करता …भ्रमर ५ बच्चे शारीरिक व मानसिक अवसाद का शिकार बने.पढ़ाई तो उनकी बाधित हुई ही ,तनाव से भी पीड़ित हुए.किसी कार्य में सफलता के लिए जूनून होने अच्छा है,परन्तु अपेक्षित सफलता न मिलने पर उनका शारीरिक मानसिक शोषण उनको व्यथित कर देता है.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद शुक्ल जी आपके सद्भावनापूर्ण विचारों के लिए

Santosh Kumar के द्वारा
October 7, 2011

आदरणीय निशा जी ,.सादर प्रणाम आपका यह आलेख सभी मातापिता को जरूर पढ़ना चाहिए ,………… “पुत्र या पुत्री का विवाह कर सभी माता-पिता अग्रिम पीढी के साथ समय व्यतीत करने को आतुर रहते हैं,और बच्चे भी आनंदित रहते हैं उस दुनिया में.दादी दादी द्वारा सुनायी जाने वाली कहानियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं,जो बच्चों के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं.”……………………………… कई मातापिता जाने-अनजाने अपने ही बच्चों को अनैतिकता से परिचित करा देते हैं ,..बालमन में दुर्गुणों कि प्रेरणा अपने घर से ही शुरू हो जाना घातक … अपनी आकांक्षाओं का भार बच्चों के मासूम कन्धों पर डालना क्रूरता ही कहा जाएगा ,…ज्यादा पाने की गफलत में ज्यादातर गंवाते ही हैं … बाकी टेलीविजन और आसन संचार की कृपा से बच्चे भी दोगुनी रफ़्तार से बड़े हो रहे हैं ,..हमें अधिक सतर्कता की जरूरत है ,..लेकिन हम तो हम हैं ,.खुद से आगे सोचना ही नहीं चाहते,… मुझे व्यक्तिगत रूप से इस बात का मलाल रहता है कि मेरे मातापिता महीने में २०-२२ दिन बच्चों के साथ नहीं हो पाते ,.. ………. आत्मसात करने वाले लेख के लिए आपका कोटिशः आभार

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    संतोष जी,आपने सही लिखा है,समय से पूर्व अधकचरे ज्ञान के सहारे परिपक्व होते बच्चे और उस पर अज्ञानता व स्वार्थ वश मातापिता (तथाकथित आधिनिकता के रंग में रंगे )की शिक्षा बच्चों को अपनी संस्कृति व सभ्यता से दूर करते हुए पाश्चात्य रंग में रंग रही है,उनको बचाने के लिए शीघ्र ही सचेत होना आवश्यक है.धन्यवाद आपके विचारों के लिए.

Abdul Rashid के द्वारा
October 7, 2011

आदरणीय निशा जी सादर नमस्कार आधुनिक्ता के दिखावे के चक्कर में लोग अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ कराने वाले खुद को सबसे ज्यादा अकलमंद सम्झते है. शायद उन्हें आने वाले कल का एहसास नही या फिर आधुनिकता का खुमार उन्हें भविष्य को सोचने हि नही देता. सुंदर लेख के लिए बधाई. http://singrauli.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद राशिद जी.

jlsingh के द्वारा
October 7, 2011

निशा जी, नमस्कार! हमेशा की तरह आपने सामाजिक और पारिवारिक कुरीतियों को उजागर कर समाधान की तरफ भी रास्ता दिखलाया है. उम्मीद है हम सभी पाठक कुछ सीख लें सकें! बेतरीन और विस्तृत दृष्टान्तों के साथ यह लेख काफी रोचक और सराहनीय है. हमें बच्चों में अच्छे संस्कार भरने चाहिए न कि बुरे! बहुत बहुत धन्यवाद! — जवाहर.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद सिंह साहब आपकी सहमती हेतु.

akraktale के द्वारा
October 7, 2011

आदरणीय निशाजी नमस्कार, दशहरे की शुभकामनाएं.नवरात्री में मंच पर आपकी कमी लगातार महसूस की गई और आते ही आपने फिर अपनी शैली में एक अच्छा नसीहत देता आलेख दिया. माता पिता द्वारा बच्चों को इस प्रकार उपयोग करना या कुसंस्कार देना वाकई दुखद है किन्तु फिरभी हम आये दिन यह व्यवहार देखते हैं.खेलों में बच्चों को आगे बढाने के लिए जो तरीका चीन में प्रचलित है उससे तो हमारे यहाँ स्थिति ठीक ही है. मै अपने घर में ही देखता हूँ की बच्चे जो माता पिता से नहीं कह पाते वह दादा दादी को आसानी से बोल देते हैं. यदि बच्चों को रोका गया तो माता पिता का तो कुछ नहीं मगर बच्चों को अवश्य मानसिक घुटन होगी.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    आपने लेख पर बिलकुल सही विचार व्यक्त किये हैं.माता-पिता से बड़ा शुभचिंतक बच्चे का कोई नहीं होता परन्तु जब स्वयं पालक ही बच्चे को अपनी स्वार्थपूर्ती या अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए मोहरा बनाएं तो वह बच्चों के साथ खिलवाड़ ही है.

omprakash pareek के द्वारा
October 7, 2011

निशाजी, आपने वर्तमान भारतीय समाज की एक ऐसी राग को छुआ है की बहुत से सीनियर सिटीजंस को टीस देगी. इतने अछे लेख के लिए बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद पारीख जी.

sumandubey के द्वारा
October 7, 2011

निशा जी नमस्कार , यथार्थ से परिचय कराता आलेख आपका आधुनिकता की चादर ओढे बेटे भू यह भूल जाते है उसी परिस्थित में खुद को भी एक दिन पहुंचना है.

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद सुमन जी.

chandrajeet singh के द्वारा
October 7, 2011

निशा जी प्रणाम… वास्तविकता से परिचय करता लेख ! बहुत सुंदर ……. बधाई आप को …..

    nishamittal के द्वारा
    October 9, 2011

    धन्यवाद चंदर जीत जी.


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