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दैव मेरे भाग्य में है क्या बदा (एक प्रेरक प्रसंग)

Posted On: 11 Oct, 2011 Others में

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                                                                                    मेरी और मेरे पति की प्रसन्नता का कोई पारावार न था जब हमें फ़ोन से समाचार प्राप्त हुआ कि प्रेरणा का विवाह निश्चित हो गया है.यह सत्य कथा बताने से पूर्व पात्रों का परिचय कराना आवश्यक है.लगभग १० वर्ष पुरानी बात है,जब एक सज्जन जिन्होंने अपना परिचय एक माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक के रूप में दिया था ,हमारे घर आये किसी परिचित का संदर्भ बताकर .उन्होंने बताया कि वो अपनी बेटी को जो संभवतः उस समय कक्षा १० की विद्यार्थी थी, मेरे पति (जो स्वयं एक महाविद्यालय में वाणिज्य विषय के प्रवक्ता हैं )से मिलवाना चाहते हैं पतिदेव ऩे सहर्ष स्वीकृति दे दी.और अगले दिन आने का समय निश्चित कर वो सज्जन चले गये.नियत समय पर उनका आगमन अपनी सुपुत्री प्रेरणा के साथ हुआ.पुत्री को देखकर बहुत दुःख हुआ.छोटी सी गुडिया जैसी लडकी जो विकलांग थी और विकलांगता इतनी अधिक कि किसी के सहारे के बिना नहीं चल सकती थी,बैसाखियों की मदद लेने पर भी किसी न किसी का उसके साथ होना जरूरी था,. उस हंसमुख,बालिका की विकट परिस्थिति देखकर बहुत कष्ट हुआ,क्यों विधाता ऐसे दंड देते हैं.बातचीत करने पर पता लगा कि पोलियो से पीड़ित वह बालिका बहुत मेधावी है,
                                                                           उसको देखकर, मेरी रूचि भी उसकी परिस्थिति व समस्या जानने में थी कि किस कारण प्रेरणा के पिता उसको लेकर आये थे.प्रेरणा ऩे बताया कि वह बनना तो चाहती है डॉ परन्तु कैसे बन सकती है ,अपनी अक्षमता के चलते .वह कुछ और विकल्प जानना चाहती थी जिससे उसका भविष्य सुरक्षित हो सके.और उसकी अपंगता बाधक न बने.बात करते करते वह थोडा भावुक हो गयी और रोने लगी.मैंने उसको समझाया प्रयास किया,कहा कि वह उस कुर्सी टाईप वाहन का प्रयोग क्यों नहीं करती जिससे उसकी परनिर्भरता थोड़ी कम हो .उसने बताया कि एक बार कुछ निर्लज्ज लड़कों ने ऐसी ही एक लडकी के वाहन में कुछ गड़बड़ी कर किसी दुर्घटना का शिकार बना दिया था क्योंकि वह उनकी अनुचित व अनैतिक इच्छाओं की पूर्ती के लिए तैयार नहीं थी. तद्पश्चात उसको एक पुस्तक मेरे द्वारा दी गयी ,जिसमें एक प्रेरक प्रसंग था एक अश्वेत बालिका विल्मा रुडोल्फ का.
                                                                                   १९६० में इटली में रोम में आयोजित होने वाले ओलम्पिक खेलों में एक २० वर्षीया लडकी रुडोल्फ गिलमा ऩे तीन स्वर्ण पदक जीत कर सर्वश्रेष्ठ धाविका का पुरस्कार भी जीता था.रोम ओलंपिक में लोग 83  देशों के 5346 खिलाड़ियों में इस बीस वर्षीय बालिका का असाधारण पराक्रम देखने के लिए इसलिए उत्सुक नहीं थे कि विल्मा रुडोल्फ नामक यह बालिका अश्वेत थी अपितु यह वह बालिका थी जिसे चार वर्ष की आयु में डबल निमोनिया और काला बुखार होने से पोलियो हो गया और फलस्वरूप उसे पैरों में ब्रेस पहननी पड़ी। विल्मा रुडोल्फ़ ग्यारह वर्ष की उम्र तक चल-फिर भी नहीं सकती थी लेकिन उसने एक सपना पाल रखा था कि उसे दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बनना है। उस सपने को यथार्थ में परिवर्तित होता देखने वे लिए ही इतने उत्सुक थे पूरी दुनिया वे लोग और खेल-प्रेमी।

                                                               डॉक्टर के मना करने के बावजूद विल्मा रुडोल्फ़ ने अपने पैरों की ब्रेस उतार फेंकी और स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर अभ्यास में जुट गई। अपने सपने को मन में प्रगाढ़ किए हुए वह निरंतर अभ्यास करती रही। उसने अपने आत्मविश्वास को इतना ऊँचा कर लिया कि असंभव-सी बात पूरी कर दिखलाई। एक साथ तीन स्वर्ण पदक हासिल कर दिखाए। सच यदि व्यक्ति में पूर्ण आत्मविश्वास है तो शारीरिक विकलांगता भी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती।

प्रेरणा सेये तो प्रेरणा से हमने नहीं कहा की कि वह चिकित्सक की परामर्श को अनदेखा करे परन्तु इतना अवश्य कहा कि वह अपने परिश्रम व लगन के साथ कुछ जरूर बन सकती है,मेरे पति ने उसको कुछ विकल्प उसके भावी करियर के लिए सुझाये और उनपर विचार कर उसको पुनः आने के लिए कहा.
                                                                  ३-४ दिन बाद प्रेरणा पुनः समय लेकर आयी.वो अन्य विकल्पों पर विचार कर आयी और निश्चित हुआ की वह कक्षा ११-१२ में वाणिज्य विषय लेगी.क्योंकि विज्ञान में मेडिकल की कोचिंग की हमारे शहर में कोई बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं थी और उसको अलग अलग शिक्षकों के पास जाना पड़ता जिसके लिए आर्थिक परिस्थिति व उसकी शारीरिक समस्या आड़े आ रही थी,क्योंकि उसके पिता को उसके २ अन्य बहिन भाईयों की शिक्षा का भी भार वहन करना था.निश्चित हुआ की वह थोडा प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त कर स्वयं अध्ययन करेगी और अपनी विषयगत समस्याएं मेरे पति से पूछ लेगी.अवकाश वाले दिन..और उसकी दिनचर्या प्रारम्भ हो गयी.
                                                                                         इंटर की परीक्षा उसने बहुत अच्छे अंकों से पास की और उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास आया.हमें भी उससे बहुत जुड़ाव अनुभव होता था.और उसका परिश्रम व लगन देखकर बहुत प्रसन्नता भी.स्नातक कक्षा में प्रवेश लेने पर अध्ययन के प्रति उसकी गंभीरता और भी बढ़ गयी.विकलांगता के अतिरिक्त उसके साथ एक समस्या और भी थी ,वह अधिक समय बैठ नहीं पाती थी और चल फिर न पाने के कारण उसके शरीर का भार भी वढ़ रहा था.परन्तु उसका पूरा परिवार उसके साथ था .
                                                                                        समय के साथ उसकी स्नातक की शिक्षा पूर्ण हुई और उसकी मेहनत रंग लाई.उसने यूनिवर्सिटी में भी स्थान प्राप्त किया.और अब जुट गयी अपने भविष्य को सँवारने में . प्रतियोगी परीक्षाएं भी दी ,हमारे शहर में प्राय परीक्षाओं का केंद्र नहीं होता अतः उसके माता-पिता उसको विभिन्न स्थानों पर ले कर गए ,उसको कहीं लेजाना इतना सरल भी नहीं था और लडकी होने के कारण हर स्थान पर उसके माता-पिता दोनों को उसके साथ जाना पड़ता था.,कुछ में सफलता मिली तो साक्षात्कार में कमी रह गयी और अंत में उसको दो बैंक्स की सभी परीक्षाएं में सफलता मिली और एक में उसने अपना कार्य भार एक प्रोबेशनरी अधिकारी के रूप में संभाला.परन्तु अभी उसकी परेशानी समाप्त नहीं हुई थी क्योंकि विभागीय प्रशिक्षण आदि के लिए उसको समय समय पर जाना भी पड़ता था और ऐसे में उसकी माँ ने उसका सदा साथ दिया.

                                                                           लडकी होने की विवशता तो सदा साथ थी ही.अब माता-पिता को चिंता थी, उसके विवाह की जो सभी माता-पिता की रहती है,क्योंकि माता-पिता आजीवन उसका साथ नहीं दे सकते थे.विवाह के लिए सुयोग्य पात्र ढूंढना दुष्कर कार्य था.कुछ पात्र मिले भी तो वो उसके योग्य किसी भी दृष्टिकोण से नहीं थे क्योंकि अधिकांश की दृष्टि उसकी वेतन व सुविधाओं की धन राशि पर थी ,स्वयं प्रेरणा को भी भय था कि कभी उसका जीवन नर्क ही बन जाए पति कैसा भी प्राय पत्नी उसका साथ देती है (अपवाद न गिनें) परन्तु पत्नी की असहाय स्थिति में उसका साथ देने वाले महान पति बिरले ही होते हैं, और वो भी ऐसी दुष्कर व आजीवन रहने वाली स्थिति में.

                                                                                      अंततः उसके पिता ने एक दिन जब फ़ोन पर बताया कि उसके लिए उपयुक्त वर मिल गया है,मैंने उत्सुकतावश पूरी जानकारी उनसे ली उन्होंने बताया कि लड़का स्वयं किसी कम्पनी में अधिकारी है परन्तु स्वयं भी विकलांग है और माता-पिता साथ रहते हैं और वो बिना किसी दहेज के साधारण विवाह करना चाहता है,तो बहुत ही प्रसन्नता हुई .अब तो उसके विवाह को एक वर्ष से अधिक हो चुका है दोनों बहुत प्रसन्न हैं और  और मुम्बई में सुखपूर्ण जीवन जी रहे हैं.
                                                                                निस्संदेह आज प्रेरणा अपने पति के साथ बहुत सुखी है,पर उसका परिश्रम,माता-पिता उसके प्रति पूर्ण सहयोग और साथ में उसका भाग्य उसकी सफलता में प्रमुख सूत्र.आज से दस वर्ष पूर्व ये कल्पनातीत था प्रेरणा के लिए,उसके अभिभावकों,परिचितों व स्वयं हमारे लिए कि प्रेरणा सुखमय विवाहित जीवन व्यतीत कर पाएगी .हाँ विपरीत परिस्थिति होने पर भी निराश न होना जीवन को संवार सकता है और याद आती हैं अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी की कविता “एक बूँद “की जिसमें बूँद यही सोचती है कि पता नहीं मेरा भविष्य क्या होगा मैं बचूँगी या मिलूंगी धूल में ” और अंत में वो एक सीपी में जा गिरी और मोती बन गयी.

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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
October 18, 2011

निशा जी , बहुत ही प्रेरणास्पद प्रसंग है……प्रबल इच्छाशक्ति से ही हर कार्य संभव प्रतीत होते हैं…..उत्कृष्ट आलेख के लिए बधाई !

    nishamittal के द्वारा
    October 18, 2011

    धन्यवाद अलका जी बहुत दिनों से आपकी अनुपस्थिति खल रही थी.

roshni के द्वारा
October 16, 2011

निशा जी नमस्कार ‘ बहुत ही अच्छा प्रेरक प्रसंग . अगर इंसान चाहे तो क्या नहीं हो सकता और उसकी इछा शक्ति के आगे कोई भी कार्य असम्भव नहीं होता .. आभार सहित

    nishamittal के द्वारा
    October 16, 2011

    बिलकुल सही रौशनी इच्छा शक्ति बहुत महत्वपूर्ण है.धन्यवाद.

shiromanisampoorna के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय निशा जी,श्री राधे,आपकी लेखनीय वन्दनीय है प्रेरणा सचमुच सब की प्रेरणा होगी जब जीवन में हताशा,निराशा और समय प्रतिकूल हो,अपने साथ छोड़ जाये तब प्रेरणा ही जीवन में उमंग,उत्साह और हिम्मत का संचार करती है साधुवाद……………………/

    nishamittal के द्वारा
    October 16, 2011

    शिरोमणि जी आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार.

naturecure के द्वारा
October 13, 2011

आदरणीय दीदी, सादर प्रणाम ! किसी ने सच कहा है – कौन कहता है की आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता , एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों | बहुत सुन्दर पोस्ट ……बधाई !

    nishamittal के द्वारा
    October 14, 2011

    धन्यवाद कैलाश जी आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु

Amar Singh के द्वारा
October 13, 2011

बहुत प्रेरणा पद कहानी. अगर व्यक्ति में द्रिड इच्छा हो तो कुछ भी असंभव नहीं.

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद अमर सिंह जी.

abodhbaalak के द्वारा
October 13, 2011

आदरणीय निशा जी एक ऐसी रचना जो हम सब के लिए प्रेरणा के स्रोत्र हैं. इश्वाव्र से प्रार्थना है की प्रेरणा का साड़ी जीवन ख़ुशी से बीते http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद अबोध जी.

mparveen के द्वारा
October 13, 2011

निशा जी सादर प्रणाम, आपकी प्रेरणा हम सब के लिए प्रेरणा बन गई …. कहा भी गया है कि “जहाँ चाह वहां राह” …………. धन्यवाद ……..

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद प्रवीन ,आपने सही कहा इच्छा शक्ति और कर्म दोनों ही किसी भी कार्य में सफलता के प्रमुख सूत्र हैं.

Abdul Rashid के द्वारा
October 12, 2011

आदरणीय निशा जी सादर नमस्कार सच का आइना है यह लेख

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद राशिद जी.

sdvajpayee के द्वारा
October 12, 2011

 निशा जी, इस प्रेरक प्रसंग के जरिए आप ने विपरीत स्थितियों में भी निराश न होने का संदेश दिया है। आप ने सही कहा कि  विपरीत परिस्थिति होने पर भी निराश न होना जीवन को संवार सकता है । कहावत है ‘हिम्‍मते मर्दां मददे खुदा’ हिम्‍मत करने वाले की ईश्‍वर भी मदद करता है।  आशा, उमंग, दृढता और लक्ष्‍य परक श्रम शीलता के सहारे मंजिल पाई जा सकती हैनिशा जी, इस प्रेरक प्रसंग के जरिए आप ने विपरीत स्थितियों में भी निराश न होने का संदेश दिया है। आप ने सही कहा कि विपरीत परिस्थिति होने पर भी निराश न होना जीवन को संवार सकता है । कहावत है ‘हिम्‍मते मर्दां मददे खुदा’ हिम्‍मत करने वाले की ईश्‍वर भी मदद करता है। आशा, उमंग, दृढता और लक्ष्‍य परक श्रम शीलता के सहारे मंजिल पाई जा सकती है।

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    आदरनीय बाजपेयीजी,बहुत समय पश्चात आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.आपने जिन तथ्यों से सफलता मिलने की बात कही है मैं उनके अतिरिक्त भाग्य की भूमिका को भी मानती हूँ आशा, उमंग, दृढता और लक्ष्‍य परक श्रम शीलता आभार आपकी प्रतिक्रिया हेतु,

aditya के द्वारा
October 12, 2011

आदरणीय निशा जी नमस्कार ! अत्यंत ही प्रेरणादायी और उत्साहवर्धक प्रसंग है. प्रेरणा अपने नाम के अनुरूप अन्यो के लिए प्रेरणा बन पायेगी, ऐसा विश्वास है. प्रेरणा को प्रेरणा देने के लिए आप और आपके पति महोदय भी बधाई के पात्र हैं. अपनी बिटिया के लिए संघर्ष करके माता पिता ने भी अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है. प्रेरणा के जीवन में कोई और कोई दुःख न आये इसी प्रार्थना के साथ, आपका अनुज, आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    आपने सही कहा है,इतनी कर्मठता से मिले माता-पिता का सहयोग ने उसके जीवन को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है.धन्यवाद.

manoranjan thakur के द्वारा
October 12, 2011

समाज को आइना देखाती यथार्थ सच

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद मनोरंजन जी.

sadhana thakur के द्वारा
October 12, 2011

आदरणीय निशा जी ,प्रेरणा का जीवन सच में प्रेरणादाई है .आत्मविश्वाश से भरा है ,उसके माता पिता को भी नमन है …………..

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद साधना जी.

syeds के द्वारा
October 12, 2011

आदरणीय निशा जी, बेहद खूबसूरत लेख और जिंदिगी की मुश्किल गढ़ियों में भी साहस न छोड़ने का सबक देते प्रेरक प्रसंग बधाई http://syeds.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद आपका सैय्यद जी.

akraktale के द्वारा
October 11, 2011

निशा जी बहुत ही प्रेरक घटना, अवश्य साहस ही जीवन देता है.

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद अर्क्ताले जी.

Santosh Kumar के द्वारा
October 11, 2011

आदरणीय निशाजी,. सादर प्रणाम अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग ,.आत्मा से आपका धन्यवाद .प्रेरणा की संघर्ष क्षमता ,मेहनत ,लगन ,.परिवार का अदम्य साहस और आप दोनों गुरुजनों की प्रेरणा ,..सबको दंडवत प्रणाम .. यह प्रसंग पोस्ट करने के लिए .आपको बारम्बार प्रणाम

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    संतोष जी इन्ही सब कारकों के साथ उसके भाग्य ने भी उसका साथ दिया.पोस्ट पढने व प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

rita singh 'sarjana' के द्वारा
October 11, 2011

निशा जी ,नमस्कार ,हमेशा की भांति प्रेरणा दायक प्रसंग से रूबरू कराने हेतु आपका बहुत -बहुत आभार l इश्वर करे उनदोनों का जीवन सफल तथा सुखी हो l निशा जी , इंसान अपने आत्मबल तथा कोशिश के द्वारा जरुर कामयाबी पा सकता हैं l बशर्ते उस इंसान का इरादा नेक हो और लगन भी जो कि प्रेरणा की थी और हैं l इस कथा को हमसे सांझा करने के आपका बहुत-बहुत आभार तथा बधाई भी l

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    रीता जी आपको तो मैं कथाओं का कोष मानती हूँ आपको पसंद आयी ये घटना धन्यवाद.

jlsingh के द्वारा
October 11, 2011

निशा जी, नमस्कार! बहुत ही सुन्दर प्रेरक प्रसंग जो सभी के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं. भगवान् करें प्रेरणा का आगे का जीवन खुशहाली के साथ बीते.

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद लाल जवाहर जी.प्रतिक्रिया व शुभकामनाओं के लिए

राही अंजान के द्वारा
October 11, 2011

आदरणीया निशा जी, सादर प्रणाम ! मन में हर मुसीबत से जूझने के प्रति एक नए आत्मविश्वास का संचार करता बहुत ही सुंदर प्रसंग ! मंच पर रखने के लिए आपका हार्दिक आभार !! भगवान से दुआ है कि प्रेरणा जी की ज़िंदगी यूं ही खुशियों में हँसते-खेलते हुए गुज़रे । :)

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद संदीप आपकी प्रतिक्रिया व सद्भावनाओं के लिए.

Amita Srivastava के द्वारा
October 11, 2011

निशा दी नमस्कार , आपके आलेख इस तरह के होते है ,जिन्हें पढ़कर हमेशा एक प्रेरणा मिलती है | कृपया इसी तरह अपनी रचनाओ से हमे जीवन की शक्ति देती रहिये |धन्यवाद ….. जिन्दगी किस कदर खुसनशी होती , दिल की हर चाहत पूरी अगर होती | पर गम न होते ,तो जिन्दगी क्या होती , सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी होती | द्वारा- अमिता

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    बहुत सुन्दर प्रेरक पंक्तियों के साथ आपने प्रतिक्रिया दी.आभार.

pramod chaubey के द्वारा
October 11, 2011

आदरणीया निशा जी,  प्रेरणा के प्रसंग अन्य के लिए प्रेरणा देंगे। प्रेरक का कार्य करेंगे।  इंसान के जीवन में आयी मुसीबतों का सामना ही आगे बढ़ाने में मदद करती हैं।  अन्य को भी आपसे और प्रेरणा से प्रेरणा लेनी चाहिए। आपका सहयोग स्तुत्य है।   

    nishamittal के द्वारा
    October 13, 2011

    धन्यवाद प्रमोद जी,मेरा कोई योगदान नहीं है क्योंकि ऐसे प्रसंग व्यक्ति प्राय पढता है और एक नज़र से पढ़कर विस्मृत कर देता है,हाँ पतिदेव ने उसको बहुत सहयोग दिया जो उनका स्वभाव है.उसकी स्वयं की लगन+ उसके परिवार का सहयोग और उसका भाग्य.

    pramod chaubey के द्वारा
    October 14, 2011

    आदरणीया निशा जी सादर प्रणाम स्तुत्य कार्य हेतु आपके पति की आपके जरिये वन्दना करता हूं।  मेरा संदेश उन तक पहुंचाने की कृपा करें तो मैं धन्य रहूंगा। ईश्वर को भी तो दीन बन्धु कहा गया है…. 

    nishamittal के द्वारा
    October 14, 2011

    आपके भावपूर्ण उद्गारों के लिए आभार.आपका सन्देश अपने पतिदेव तक पहुंचा दूंगी.


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