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कांग्रेस की रणनीति सफल? (जागरण जंक्शन फोरम )

Posted On: 16 Oct, 2011 Others में

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भ्रम टूटा सा लग रहा है,लगता है,एक मृग तृष्णा थी जिसके पीछे हम दीवानों की तरह से भाग रहे थे,या कोई सुखद स्वप्न देख रहे थे. बर्बादी की ओर जाते देश के अंधकारमय भविष्य के लिए एक प्रकाश की किरण सम्पूर्ण देश को मंत्रमुग्ध कर रही थी,बच्चे,बूढ़े,युवा,महिलाएं,शिक्षित -अशिक्षित सभी इसी आस में अंधसमर्थन  दे रहे थे कि अब देश को एक गांधी जैसा कोई मिल गया है,जो देश की  डूबने  को तैयार  नैय्या का बेडा पार लगा देगा, सम्पूर्ण देश अन्नामय हो रहा था.”मैं भी अन्ना,तू भी अन्ना” का नारा बुलंद था.सबको भरोसा था अन्ना पर और अन्ना की टीम पर.जनता  ऩे  तो अन्ना को   भगवान  का  ही दर्जा दे डाला था.हम सबने अन्ना के हाथ सशक्त करने के लिए लिखा था.दुआएं की थी.परन्तु अब लग रहा है कि हम भारतीय शायद जल्दी ही भावावेश में आ जा जाते हैं और ठगे जाते हैं.क्या कांग्रेस अपनी बांटो और राज करो की राजनीति में एक बार पुनः सफल हो गयी है?.वर्तमान परिदृश्य में सब कुछ बहुत आहत करने वाला है.निम्न बिन्दुओं पर यदि विचार किया जाय तो देश पुनः उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है.ये बिंदु हैं -
अन्ना का कांग्रेस को हराने के लिए प्रारम्भ किया आन्दोलन बीच में बंद कर देना,
प्रशांत हेगड़े के द्वारा हिसार में प्रारम्भ आन्दोलन को जल्दबाजी बताना .
प्रशांत भूषण का देश को बांटने वाला बयान देते हुए जनमत संग्रह की मांग कर डालना.
स्वामी  अग्निवेश का प्रारम्भ से ही विवादित रहना.
टीम द्वारा निरंतर परस्पर विरोधाभासी बयान देना.
अब अन्ना द्वारा अपने गाँव रालेगन सिद्धि में मौन धारण कर लेना.
कहीं अन्ना अपनी टीम के दवाब में तो नहीं.जिस कांग्रेस ऩे प्रारम्भ से ही अन्ना की मूल भूत मांगों पर हामी भरी ही नहीं ,और निरंतर सरकार के प्रवक्ता व सिपहसालार उन मांगों को स्वीकारने के विरोध में अपने विचार दे रहे हैं ,तो उस बिल के प्रस्तुतीकरण  की प्रतीक्षा करने का क्या औचित्य ? जैसा की कहा गया है की प्रतीक्षा की जा रही है शीत सत्र की.
२७ अगस्त को जब संसद में चर्चा हुई तो किसी भी दल ऩे अन्ना की शर्तों को पूर्णरूपेण स्वीकार नहीं किया .इसी विषय पर एक आलेख मैंने लिखा था “सब कुछ बाकी है,अभी जश्न कैसे मनाया  जाय.” उसी के अनुसार सभी दलों का जो रुख अन्ना की शर्तों के प्रति था वो इस प्रकार था “

२७ अगस्त को  जन लोकपाल बिल पर हुई चर्चा में कोई स्पष्ट सहमति दलों ऩे नहीं दी जन लोकपाल बिल पर सर्वाधिक समर्थन में खडी .भारतीय जनता पार्टी ऩे प्रधानमंत्री को जन लोकपाल बिल के दायरे में लेने पर सशर्त शब्द जोड़ दिया,न्यायधीशों पर नहीं कहा,सांसदों पर नकारात्मक ही रुख रखा परन्तु सिटी जन चार्टर ,दंड देने का हक़,नीचे के पायदान के कर्मियों ,लोकायुक्त,तथा सी बी आई पर स्पष्ट सहमति दी.
राजद सुप्रीमो लालू तो ये मानने को तैयार नहीं थे कि देश में बहुत भ्रष्टाचार है,उनके अनुसार जितना भ्रष्टाचार बताया जा रहा है उतना नहीं है(वो तो सारा चारा हज़म कर चुके हैं),
बसपा ऩे कोई भी शर्त स्वीकार नहीं की,माकपा,द्रुमुक के उत्तर टालने वाले,सपा का अस्पष्ट रुख रहा.

शरद यादव द्वारा बेतुकी दरार डालने वाली  शर्त कि पिछड़े वर्ग,अनुसूचित जातियों की भागीदारी हो (कोई उनसे पूछे भ्रष्टाचार से प्रभावित सभी वर्ग हैं,इसमें जाति धर्म कहाँ से बीच में
आगया.)

कांग्रेस ऩे प्रधानमंत्री को सम्मिलित करने की` शर्त को  विचाराधीन रखा,सिटीजन चार्टर को सशर्त ,दंड देने का हक़ विचारार्थ ,राज्यों में लोकायुक्त विचारार्थ,निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मी सशर्त,सी बी आई विचारार्थ,न्यायाधीश नहीं,सांसद नहीं. अर्थात एक भी शर्त पर कांग्रेस ने स्पष्ट सहमति नहीं दी.
(उपरोक्त आंकडें या विवरण  समाचारपत्र तथा समाचार चैनल्स की सूचनाओं पर आधारित)
कांग्रेस से कैसे आशा की जा सकती है कि वह जनलोक पाल बिल को शीत सत्र  में प्रस्तुत करेगी क्योंकि वो निरंतर इसी रुख पर अडिग हैं कि वो सरकार द्वारा तैयार लोकपाल बिल ही प्रस्तुत करेंगें,जिससे अन्ना और उनकी टीम सहमत नहीं थे उस समय.ऐसे में अन्ना का वर्तमान दृष्टिकोण  कुछ पच नहीं रहा है
मेरे विचार से कुछ संभावित कारण निम्नाकित  हो सकते हैं,
अन्ना को कांग्रेस ऩे दवाब में लिया है ,बार बार ये आरोप लगाकर कि अन्ना संघ का साथ दे रहे हैं.(क्या देश हित में संघ का साथ लेना या देना कोई संगीन अपराध है?)
अन्ना की टीम अन्ना को धोखा दे रही  है,जिसमें कुछ भेदिये उपस्थित हैं और जो दोहरी चाल चल रहे हैं.
अन्ना अपनी टीम के रुख से त्रस्त व पीड़ित  हैं,परन्तु उनकी स्थिति सांप के मुख में छछूंदर वाली हो रही है जिसमें उनके लिए थूकना भी कठिन हो रहा है और निगलना भी.अन्ना इतने अधिक आहत हैं कि उन्होंने अपना अभियान बंद कर मौन धारण करना उचित समझा.
ये कोई नवीन रणनीति है.
उपरोक्त स्थितियों में चाहे जो कुछ भी हो परन्तु इससे विश्वसनीयता पर आंच अवश्य आती है और और जनता का विश्वास चोटिल होता है तथा “हार की जीत ” कहानी वाली स्थिति बनती है कैसे विश्वास करेगी जनता किसी पर भविष्य में .
अंत में प्रशांत भूषण सदृश सदस्यों की जितनी भर्त्सना की जाय कम है जो देश को तोड़ता या तोड़ने की बात करता है उसकी निंदा जितनी की जाय कम है ऐसे लोगों के लिए कोई दंड क्यों नहीं.और अन्ना की जो छवि जनता के मस्तिष्क में बनी थी उसके अनुसार तुरंत ही उनको बाहर किया जाना चाहिए.क्योंकि ऐसे लोगों का कोई ईमान धर्म  नहीं होता.अग्निवेश तो पहले ही संदिग्ध प्रमाणित हो चुके हैं और  यही स्थिति हेगड़े की है.परिणाम क्या होगा ये तो समय बतायेगा परन्तु अन्ना को कठोर फैसले लेते हुए जनता के अगाध विश्वास को पुनः अर्जित करना होगा.और देश हित को शीर्ष पर रखना होगा.

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61 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ojasvi के द्वारा
October 23, 2011

निशा जी,प्रणाम. एक सुंदर लेख हेतु धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    October 23, 2011

    आपकी प्रथम प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

nishamittal के द्वारा
October 19, 2011

आदरनीय सरफराज जी, प्रशांत भूषण के बयान के कारण भ्रष्टाचार अभियान को समाप्त करने की बात से तो मैं कभी भी सहमत नहीं.जैसा की मैंने आपके पूर्व कमेन्ट के उत्तर में भी लिखा है,अन्ना जी व बाबा रामदेव पर पहले भी लिख चुकी हूँ कि देश हित में होने वाले किसी भी आन्दोलन या अभियान को जारी रख कर और उसमें जनता की भागीदारी के साथ ही देश से भ्रष्टाचार आदि को कम तो किया ही जा सकता है,आन्दोलन में कमियां होना अस्वाभाविक नहीं क्योंकि सभी मानव हैं और सबकी सोच भिन्न होती है.अतः जैसा कि कहा गया “शो मस्ट गो ऑन” कार्यक्रम तो और भी जोशो खरोश से चलना चाहिए, परन्तु मान्यवर प्रशांत भूषण सरीखे लोगों को माफ़ करना तो देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ है,जिसका विरोध होना ही चाहिए.क्योंकि ऐसी घटनाओं से अलगाववाद को हवा मिलती है.

sarferaz alam के द्वारा
October 18, 2011

निशा जी सबका सार एक है की जनलोक पाल पास नहीं होना है कांग्रेस के साथ पीठ पीछे और भी लोग अपनी अपनी चल चल रहे हैं| अन्ना टीम में दरार पड़ने का सूत्रपात तो अन्ना के भ्रष्टाचार के विरूढ चलाये गए आन्दोन में स्वामी अग्निवेस के आवाज वाली क्लिप जिसमे अन्ना के मांगो की विरोध की बात थी, से हो चुका था| और सवामी अग्निवेश को मोहरा बनाया गया| स्वामी अग्निवेस की हाल तो घर का भेदी लंका धाये जैसी हो गयी है| अन्ना जी की टीम जब कांग्रेस को वोट न देने की अपील कर रही है तो कांग्रेस के साथ अन्य पार्टियों को भी बुरा लग रहा है लेकिन इस बात पर भी विचार करना चाहियी की इन्ही राजनितिक पार्टियों की निति से खिन्न हो कर कुछ बुधजिवी लोग चुनाव में भागीदारी नहीं करते हैं, क्या उन लोगों की सोच और कांग्रेस की जनता के और देश में भ्रष्टाचार समर्थन निति मेल नहीं खाती| इन नेताओं की बयानों और सरकार की नीतियों की कुछ लोग घोर निंदा भी करते हैं, तो क्या इससे उनकी नीतियों में बदलाव आया| हाँ बदलाव आया तो उत्साह के साथ अपने कुकर्मों के साथ तिहार जेल में देश हित को छोड़ कर सिर्फ अपने स्वास्थ की चिंता में लगे हुए हैं| बड़ी अजीब बात है माना की एक भूषण की बयान से देश की जनता को ठेस पहुंची, पर इसका यह मतलब नहीं की देश के गरीब जनता का ढाई हजार करोड़ रूपये देश में वापस लाने की बात भूल जाई| और यह काम सिर्फ जनता ही कर सकती है नेताओं के बॉस की बात नहीं| और रही बात काश्मीर के राजनीति को तो आजादी के बाद देश में राज्यों मिलन के साथ ही काश्मीर मसले पर राजनीती हो रही है ” मेरे महान नेताओं ऐसा मौका आने मत देना की राजनीति करने का यह भी मुद्दा हाथ से निकल जाये| सरफ़राज़ आलम सोनभद्र उत्तर प्रदेश

pramod chaubey के द्वारा
October 18, 2011

सांच को आंच क्या.. आपकी बातों में दम है। टीम अन्ना तो टूटनी ही थी, जिन्हें लोभ लालच होगा, वे भला कितने दिनों तक चल पायेंगे। अन्ना विचारवान प्राणी हैं।  उन पर अभी भरोसा किया जाना चहिए। भ्रष्टाचार में डूबी व्यवस्था पर अंकुश लग जायेगा तो बहुत सी समस्या खुद ब खुद सुलझ जाती  परन्तु जंजीरों में जकड़ी मां भारती को बंधन से  मुक्त कराने में बेटों की शहादत आवश्यक हो गयी है।  बलिदान मांग रही है..

    sarferaz alam के द्वारा
    October 18, 2011

    प्रमोद सर नमस्कार आपने तो गागर में सागर वाला काम कर दिया

    nishamittal के द्वारा
    October 19, 2011

    प्रमोद जी,अन्ना पर भरोसा बरकरार है जैसा की मान्यवर शाही जी ने भी अपनी प्रतिक्रिया में उल्लेख किया है अन्ना सदा ही ईमानदारी के पक्षधर हैं,परन्तु टीम के कुछ सदस्य नित्य कुछ न कुछ जनता को ठगने वाली गतिविधियाँ दिखाकर भ्रम में डाल रहे हैं.भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के उनके प्रयासों को ही तो कांग्रेस क्या कोई भी राजनैतिक दल पूर्णतया स्वीकार नहीं कर पा रहा है,अपनी नकेल कोई कसवाना नहीं चाहता .भ्रष्टाचार के पंक में आकंठ डूबे नेता अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारें .आज राजनीति सबसे बड़ा कमाऊ उद्योग है जिसमें संलग्न होने पर उनकी अगली पिछली सभी पीढियां तर जाती हैं.धन्यवाद

    pramod chaubey के द्वारा
    October 20, 2011

    आज राजनीति सबसे बड़ा कमाऊ उद्योग है जिसमें संलग्न होने पर उनकी अगली पिछली सभी पीढियां तर जाती हैं….मुझे पता है कि  आप जैसा इंसान राजनीति से तर जाने की बात व्यंग्य में की है। आदरणीया निशा जी, नमन।

    nishamittal के द्वारा
    October 20, 2011

    प्रमोद जी ,व्यंग्य के साथ ये कटु सत्य है,आप बताएं आज राजनीति में देश की सेवा के लिए पदार्पण करने वाले कितने हैं?कोई आपको बिरले ही मिलेंगें अन्यथा इतनी अथाह धन राशि जो चुनाव में पानी की तरह बहाई जाती है कोई क्यों व्यय करेगा प्रचार में व जनता को लुभाने के अन्य कार्यों में.भले ही राशि बड़े बड़े उद्योगपति देते हों या अपनी जेब से व्यय होती हो,परन्तु जो दे रहे हैं वो उससेकई गुने लाभ की आशा में ही तो दे रहे हैं.यही कारण है,कि देश से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता.

sarferaz alam के द्वारा
October 18, 2011

पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव के मद्देनज़र सभी पार्टियों ने अपनी अपने पुराने ट्रैक पर लौट आये हैं! हिसार चुनाव के परिणाम आने के बाद नेताओं ने अपने अपने जातिवाद पर आधारित वोटो की राजनीती की दोहाई देते हुए नज़र आने लगे, पर देखना यही है की क्या अब भी जनता जातिवाद के मोह में जकड़ी हुई है | अन्ना जी द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये गए आन्दोलन का माहौल का असर जब कांग्रेस पर दिखने लगा तो अब अन्ना टीम पर बारी बारी हमला हो रहा है| इस वक्त विरोधी भ्रष्टाचारी गुट का बस एक ही मकसद की अन्ना टीम पर हमला करके उनको और उनके मनोबल को तोड़ना| लेकिन मेरे हिसाब से यह लोग इतने से संतुस्ट नहीं होंगे कुछ फासिस्टवादी ताकते और उनके आड़ में दुसरे लोग भी चुनाव आने के समय अन्ना फैक्टर से धेयाँन हटाने के लिए आगजनी और माहौल को बिगड़ने की भी कोशिस करेंगे| पर यह तो आश्वस्त है की अन्ना की भ्रष्टाचार हटाओ निति के माहौल में उत्तर प्रदेश में मंत्रियों की बलि की लिस्ट बन गयी है तो दुसरे ओर तिहाड़ जेल की रौनक भी बढ़ गयी है| लेकिन सवाल अब यह उठ रहा है की कुछ समय अन्ना के साथ पुरे देश में खड़े युआ की सोच अचानक कैसे बदल गयी क्या लोग राजनितिक पार्टियों की मंशा को नहीं समझ पा रहे हैं? मुझे तो कभी कभी यह लगने लगता है की कहीं ये देश के गद्दार सीमा पार या काश्मीर में अन्ना टीम की सुपारी न दे दे| जन्लूक्पाल बिल पर संसद में चर्चा करने के बाद संसद की गरिमा की बात करने वाले यह भी भूल गयी की वोह संसद में सपथ भी लिये थे| खैर जनता देखती रहे अभी और लोग बाके है कुछ दिन में और भी हमले होने हैं और देश में जो कुछ भी उठा पटक हो रही है वोह सिर्फ नेता करा रहे हैं और कोई दूसरा नहीं| सरफ़राज़ आलम सोनभद्र उत्तर प्रदेश

    pramod chaubey के द्वारा
    October 18, 2011

    आदरणीय सरफराज जी सादर प्रणाम देश के नाम पर कथित राजनेताओं के चरित्र  इससे भिन्न नहीं है। कुर्सी के लिए वे कुछ भी करा सकते हैं। 

    nishamittal के द्वारा
    October 19, 2011

    सरफराज जी,सर्वप्रथम तो पोस्ट पर व्यक्त आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ.निस्संदेह राजनैतिक दल एक ही चरित्र का प्रदर्शन कर रहे हैं,कोई कम तो कोई अधिक.परन्तु दोषी तो हम आप भी कम नहीं जो देशहित के मुद्दों पर नहीं जाति,धर्म और अन्य बांटने वाले मुद्दों पर अपना मत बर्बाद करते हैं,जिनसे देश का नहीं उन्ही नेताओं का लाभ होता है,जो इन मुद्दों के आधार पर राजनीति करते हैं,परन्तु हम इसी गोरख धंधे में उलझे रहतेहैं. अन्ना जी की जहाँ तक बात है मैं इसी मंच पर अन्ना जी पर पहले भी लिख चुकी हूँ और आज भी मैंने ये कभी नहीं कहा की अन्ना गलत हैं,उनके साथियों के जिनके नाम आलेख में दिए हैं की गतिविधियाँ शायद अन्ना जी को लचीला रुख अपनाने को बाध्य कर रही हैं.यही कारण है शायद आहात हो कर ही उन्होंने मौन धारण किया है. कांग्रेस के चरित्र की जहाँ तक बात है,राजनीति के दुश्चक्र में कुछ भी संभव है यही कारण है कि जो अन्ना हजारे या बाबारामदेव उनको महान दिख रहे थे अब प्रतिदिन उनके विरुद्ध कोई न कोई नया मुद्दा उपलब्ध रहता है,जनता को जागरूक रहना होगा और इन चालों को असफल बनाना होगा.और अन्ना जी को भी अपने विवेक के साथ कठोर कदमों के साथ जनता के विश्वास को बनाये रखना होगा.

    nishamittal के द्वारा
    October 19, 2011

    धन्यवाद प्रमोद जी.

lata kamal के द्वारा
October 17, 2011

निशा जी नमस्कार ,बहुत बढ़िया लेख ,हम सबके लिए भी और अन्ना टीम के लिए भी क्योंकि अन्ना टीम को भी उतना ही सोचने की जरूरत है जितना हम सबको .इसके साथ -२ विचारों की एकता भी उतनी ही महत्त्व -पूर्ण है .स्वामी अग्निवेश का रवैया तो शुरू से ही संदेहास्पद था .हेगड़े साहब भी पहले ऐसा कुछ संकेत दे चुके थे . कांग्रेस का फायदा यह है कि कुछ समय के लिए जनता का ध्यान उस पर से हट जाता है और कांग्रेस को अगली चाल चलने का समय मिल जाता है .बहुत ही बारीकी से आपने यह सब सोचा और लिखा .अन्ना अपने नेक और सकारात्मक विचारों के साथ -२ थोड़े से कठोर व्यक्तित्व के स्वामी होते तो बात ही निराली होती .फिर भी हम लोगो को जगाने के लिए उनका धन्यवाद .

    nishamittal के द्वारा
    October 18, 2011

    लता जी अन्ना का उद्देश्य गलत नहीं यही कारण है कि उनको सभी वर्गों से अथाह समर्थन प्राप्त हुआ और लगा गया कि देश जाग गया परन्तु उनकी टीम के कुछ सदस्यों के तेवर शंकाएं उत्पन्न करते हैं.धन्यवाद.

syeds के द्वारा
October 17, 2011

निशा जी, बहुत ही अच्छा विश्लेषण..कांग्रेस असल मुद्दे से ध्यान हटाना चाहती है…तो अन्ना जी को भी फूँक कर कदम रखना चाहिए…अच्छे लेख के लिए बधाई http://syeds.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    धन्यवाद सैय्यद जी आपके सकारात्मक विचार हेतु.

yogi saraswat के द्वारा
October 17, 2011

आदरणीय निशा जी , आपके विचारों का स्वागत करता हूँ , लेकिन इतनी जल्दी कोई निष्कर्ष मत निकालिए | अन्ना और उनकी टीम के सदस्य कोई राजनीती के मंजे हुए खिलाडी नहीं है कि वो बिलकुल राजनीतिक तरीके से बोले | वो हम जैसे ही सामान्य लोग है , गलती सबसे होती है | केवल प्रशांत भूषण के एक बयान को लेकर पूरे आन्दोलन और उसके सिपाहियों को गलत ठहराने कि कोशिश मत करिए | उन्हें समय दीजिये |

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    योगी जी आपने सही कहा है कि हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए परन्तु प्रशांत भूषण , स्वामी अग्निवेश को,तथा संतोष हेगड़े के परस्पर विरोधाभासों को और देश तोड़ने वाले ब्यान (प्रशांत भूषण) के लिए कैसे क्षमा किया जा सकता है जबकि उनको ये कहने का कोई अफ़सोस नहीं.अन्ना भी शायद पीड़ित हैं,एतदर्थ उन्होंने मौन धारण किया है.धन्यवाद.

mparveen के द्वारा
October 17, 2011

निशा जी नमस्कार, राजनीति एक ऐसा कीचड़ है जो किसी को भी दागदार कर देता है … मुझे राजनीती का ज्यादा पता नहीं पर जो हो रहा है वो हमारे देश के हित में नहीं … कितनी सरकारे आती हैं कितनी चली जाती हैं पर होता है क्या सिर्फ धोखा … कोई देश के बारे में नहीं सोचता न उन करोड़ो लोगो के बारे में जो बस यही आस में रहते हैं की चलो अब सरकार बदलेगी शायद उनके हित में अब कुछ होगा पर सिवाय धोके के उनको कुछ नहीं मिलता ….. अन्ना जी के आन्दोलन से कुछ आशाएं थी पर अब डर है की कहीं वो सिर्फ सपने ही न रह जाये ….. अन्ना जी को वाकई में कठोर निर्णय की जरुरत है … धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    प्रवीन जी आपने सही कहा है राजनीति की बिसातें जनता को दिग्भ्रमित करने हेतु की जाती हैं और वही हो रहा है और जनता मूर्ख बनती है.धन्यवाद.

राही अंजान के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीया निशा जी, सादर नमस्कार ! ये तो काँग्रेस की शुरू से ही परंपरा रही है । अंतिम क्षणों में पूरा परिदृश्य बदलने की (कु)कुव्वत रखने के कारण ही वह आज तक राज करने में सफल रही है और हमारे देश की जनता को तो बस ताज़ा लीपा हुआ ही नया और सुंदर दिखता है । :(

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    अनजान महोदय ,अंतिम दांव ऐसा खेलो कि समस्त परिदृश्य चमका दिखे और जनता सब पुराने अपराध भूल जाती है.धन्यवाद./.

    राही अंजान के द्वारा
    October 17, 2011

    यही तो इस देश का दुर्भाग्य है…..जहां विवेक से ज्यादा क्षेत्रवाद एवं जातिवाद हावी हो जाता है ! :(

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    काश हम इन संकीर्ण मानसिकताओं से ऊपर उठ पाते.देश हित में.

    pramod chaubey के द्वारा
    October 20, 2011

    आदरणीया निशा जी की बातों में राही जी की निकाली  राह में हम में सहभागी हैं। वाद या संकीर्ण मानिसकता  से निकलने की (अंजान) राह तो…. शिक्षा ही है…

    nishamittal के द्वारा
    October 20, 2011

    प्रमोद जी ,राह तभी तो निकलेगी जब चाह हो.यदि नेताओं का विश्लेषण आप करें तो गिनती करके देखिये देश के हित में सोचने वाले कितने हैं.शायद निराशा ही हाथ लगेगी.आपसी फूट,क्षेत्रवाद,प्रांतवाद और संकीर्ण मानसिकताएं हावी की जाती हैं केवल वोटर को मुट्ठी में रखने के लिए,या उसकी भावनाओं का शोषण करने के लिए.धन्यवाद आपका समय देने के लिए.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 16, 2011

निशा जी, आपने स्थितियों की नब्ज़ टटोलने की कोशिश की है, और आंशिक रूप से सफ़ल भी हैं । विकट स्थिति ये है कि समस्या से निपटने की समस्त प्रकार की प्रक्रियाएं राजनैतिक व्यवस्था की दहलीज़ से होकर ही गुजरनी हैं, जो खुद प्रदूषित और गन्दे नाले में तब्दील है । अन्ना की समस्या ये है कि वह हमेशा ‘वन मैन आर्मी’ रहे हैं, और जो किया, अपने अकेले के बूते पर किया । अब जो लक्ष्य सामने है, उसे वन मैन आर्मी द्वारा नहीं, बल्कि एक बड़े सांगठनिक ढांचे के बल पर ही प्राप्त किया जा सकता है । ऐसा ढांचा रातों रात खड़ा नहीं होता । सही व्यक्तियों के चुनाव सहित ढेर सारी प्रशासनिक क्षमताएं नेतृत्व देने वाले व्यक्ति के अन्दर होनी चाहिये, ताक़ि वह संगठन पर काबिज़ रहे, न कि संगठन उसपर हाबी हो जाय । अन्ना हज़ारे निहायत ईमानदार, संकल्पशक्ति से भरपूर और देश के लिये मर मिटने वाले इंसान अवश्य हैं, परन्तु किसी संगठन को चलाने की प्रशासनिक क्षमता उन्हें विधाता ने नहीं दी है । जबकि ऐसी क्षमताएं बाबा रामदेव में कूट-कूट कर भरी हुई हैं । यदि दोनों शक्तियां एक मंच पर इकट्ठी होतीं, तो आज आन्दोलन की रूपरेखा कुछ और होती । यह देश का दुर्भाग्य है कि लक्ष्य एक होने के बावज़ूद दोनों राष्ट्रभक्त अपनी अपनी डफ़ली अलग बजाकर अपने वास्तविक कर्त्तव्य के साथ न्याय नहीं कर रहे । यह वक़्त एकजुट होकर देश से भ्रष्टाचार को समूल उखाड़ फ़ेंकने का है, परन्तु इन महारथियों को बिल्कुल छोटी-छोटी बातों को लेकर एकदूसरे पर विश्वास और भरोसा नहीं है, या फ़िर इनका अहंकार आड़े आ रहा है, जिसे स्वाभिमान का अतिक्रमण कहा जा सकता है । जो अन्ना के पास है, वह रामदेव में नहीं है, और जो क्षमता बाबा रामदेव में है, उससे अन्ना कोसों दूर हैं । अर्थात दोनों ही एकदूसरे के पूरक हैं, परन्तु इनकी समझ में यह छोटी सी बात आ नहीं रही है । जिस दिन दोनों को यह समझ आ जाएगी, देश का दुर्भाग्य सौभाग्य में बदलने लगेगा, और सत्ताधारियों की फ़ूट डालकर राज करने वाली नीति काफ़ूर हो जाएगी । आभार !

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    आदरनीय शाही जी ,आपकी प्रबुद्ध प्रतिक्रिया की सदा प्रतीक्षा रहती है,और वो मिलने पर न केवल कुछ ज्ञान में वृद्धि होती है एक जोश उत्पन्न होता है.मैं अन्ना को दोषी नहीं मान रही हूँ परन्तु जो परिस्थितियां उत्पन्न हो रही हैं,और अन्ना टीम के अधिकांश सदस्य जो गुल खिला रहे हैं उससे मन में सैकड़ों आशंकाएं मस्तिष्क में आती हैं उन्ही को लिखने का प्रयास किया है. अन्ना और रामदेव का मिलन जो आपने कारण गिनाये हैं के कारण संभव नहीं हो पा रहा है,और उसका खामियाजा देश की जनता को भुगतना न पड़ जाए काश देश हित में समस्त अंतर्विरोधों को भुलाकर ये महारथी एक हो सकें और पूरक बन सकें.आभारी हूँ आपकी प्रतिक्रिया के लिए..

naturecure के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय दीदी सादर प्रणाम ! मैं संतोष जी की बातों से पूर्णतया सहमत हूँ , कांग्रेस अंग्रेजों की तरह फुट डालो शासन करो की नीति के चलते ही अपनी रणनीति में सफल हो जाती है परन्तु …समय जबाब देगा |

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    सही कहा है कैलाश जी अभी भविष्य में ही कुछ निश्चित होगा परन्तु परिदृश्य कुछ आशंकाएं उत्पन्न कर रहा है.धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय निशाजी ,.सादर प्रणाम सपनों पर आघात होने पर दुःख तो होता ही है ,..लेकिन सपना टूटा नहीं है ,….कांग्रेसी रणनीति फिलहाल भले ही हावी दिख रही हो ,..ये कामयाब नहीं होंगे ,… शक्तिशाली सत्ता को उखाड़ना है ,…कुछ तो समय लगेगा ही ,..आत्मचिंतन कर अन्ना जी और मजबूत होंगे,…हमें विश्वास रखना होगा ,…झूठ कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो सच से हारेगा जरूर ,…बाकी नियति को क्या मंजूर है ?…समय जबाब देगा . बहुत ही विश्लेष्णात्मक आलेख ,..हार्दिक साधुवाद

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    संतोष जी अन्ना की नेकनीयती पर संदेह या चिंता नहीं, उनके साथियों की गतिविधियाँ आशंकित कर रही हैं,वही व्यक्त की हैं,जैसा की आदरनीय शाही जी ने लिखा है,कि अन्ना स्वयं ईमानदार होते हुए भी कुशल नेता नहीं हैं.मैंने यही प्रश्न किया है क्या कांग्रेस की रणनीति सफल हो रही है,ईश्वर करे सभी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हों.धन्यवाद.

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 17, 2011

    आदरणीय निशाजी ,.सादर प्रणाम क्या करें हम ?..आशावाद के सिवा क्या बचा है ?,..यही मानना पड़ेगा कि आज नहीं तो कल भ्रष्टाचार समाप्त होगा

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    चलिए हम सबकी आशाएं फलीभूत हों धन्यवाद.

sadhana thakur के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय निशा जी ,सत- प्रतिसत आपकी सोच से सहमत हूँ ,ऐसा लगता है हवा का रूख ही बदल गया हो ,,आगे तो भगवान ही मालिक ………..

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    धन्यवाद साधना जी.

chandrajeet के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय निशा जी… आपने बिलकुल सत्य कहा है हम किसी भी निर्णय में जल्दबाजी कर जाते हैं ……

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    धन्यवाद चंद्रजीत

abodhbaalak के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय निशा जी बहुत ही विश्लेश्नाताम्क लेख, मेरी अन्ना जी के बारे मु प्रारभ में क्या धरना रही है आपको पता ही है, बहरहाल आपने हर पक्ष को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    अबोध जी मुझको अन्ना के लिए आज भी कोई अनुचित धारणा नहीं है,बस उनके कुछ साथियों की गतिविधियों के प्रति आशंकाएं हैं.धन्यवाद.

jlsingh के द्वारा
October 16, 2011

महोदया, नमस्कार! आपका विश्लेषण युक्त लेख और हालत देखकर यही लगता है कि कांग्रेस अपनी रणनीति में सफल हुई है. कांग्रेस ही क्यों लगभग सभी पार्टी के नेताओं की कलई खुल गयी है. ऐसे में आम जनता क्या करे! बहुत पहले मैंने एक पार्टी विशेष के नेता (जो दिवंगत हो चुके है), का साक्षात्कार देखा था; उनके अनुसार राजनीति में जबतक अच्छे लोग नहीं आयेंगे, राजनीति भ्रष्ट लोगों की जागीर बनी रहेगी. टीम अन्ना राजनीति में आयेगी नहीं, बाबा रामदेव राजनीति में आएंगे नहीं, प्रबुद्ध वर्ग दूर से सिर्फ आलोचना करते रहेंगे, आम जनता रोजी रोटी की समस्या से जूझते हुए अपना जीवन बिता देगी. फिर ‘क्षीण रोशनी की आश’ के सिवा हमारे पास चारा क्या है?

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 16, 2011

    आदरणीय जवाहर लाल जी ,..न अन्ना ,,ना बाबा ,…ना प्रबुद्ध वर्ग ,……इस देश को मध्यवर्ग का नेतृत्व चाहिए ,…वो जरूर होगा ….कब ?…ये नियति बताएगी ..साभार

    jlsingh के द्वारा
    October 16, 2011

    संतोष जी, नमस्कार! आपके हौसले की दाद देता हूँ. वैसे मध्यवर्ग ही हमेशा शोषित रहा है. और इसे एक साथ खड़ा करने के लिए एक कुशल नेता की आवश्यकता है जो की फिलहाल है तो अवश्य, पर सम्हाल नहीं पा रहे हैं. हम सभी मध्यवर्ग हमेशा हर जुल्म के शिकार रहे हैं, पर देखते रह जाते हैं—– कोई तारनहार के इंतज़ार में! धन्यवाद, ये हौसला बरक़रार रखने की जरूरत है.

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    जवाहर लाल जी,अन्ना जैसा की शाही जी ने लिखा है राजनैतिक दांव पेंचों से दूर रहे हैं यही कठिनाई है रामदेव व अन्ना दोनों कहते हैं वो राजनीति में नहीं आयेंगें भविष्य अनिश्चित नज़र आ रहा है.

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    जवाहर लाल जी के विचार से मैं यहाँ सहमत हूँ संतोष जी क्योंकि नेतृत्व की कमान संभालने वाला व्यक्तित्व?इसका उत्तर भी खोजिये.नेतृत्व समूह का नहीं हो सकता

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 17, 2011

    सही कहा आपने निशा जी ,.बड़ी दुखद परिस्थिति है ,.सकारात्मक सोचना ही विकल्प है

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    धन्यवाद संतोष जी.

Abdul Rashid के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय निशा जी नमस्कार राजनिती का क्या लेकिन अन्ना जैसे देश के लाल का इस्तमाल दिगभ्रमीत लोगो द्वारा किया जाना यकीनन निंदनीय है और शायद आम जनता का सपना देखने का हौँसला भी टुटेगा. दिपावली कि शुभकामनाओँ के साथ अबदुल रशीद http://www.aawaz-e-hind.in

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    धन्यवाद राशिद जी आपकी प्रतिक्रिया हेतु.

shiromanisampoorna के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय निशा जी,श्री राधे,desh को प्यार करने वालों और अपने जीवन के निर्धारित मूल्यों और सिद्दान्तों के अनुकूल जीवन जीने का प्रयास करना भी किसी संघर्ष से कम नहीं है और येसे में भावनाओं का दोहन कर अपने स्वार्थों के लिए जनमानस के साथ धोखा कितना कष्टकारी है aapne जो बात राखी वो सौ परसेंट सही हैं आपका चिंतन और लेखनी को साधुवाद……………………………../

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    शिरोमणि जी.जय श्री राधे अन्ना धोखा नहीं देंगें परन्तु अभी उनके कुछ साथियों ने चिंताएं उत्पन्न कर दी हैं.

krishnashri के द्वारा
October 16, 2011

महोदया, पूर्ण विश्लेष्णात्मक लेख / कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया आपने /

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    धन्यवाद कृष्ण श्री जी.

vikasmehta के द्वारा
October 16, 2011

निशा जी .नमस्कार लेख को निष्पक्ष ढंग से लिखने के लिए बधाई ….इन लोगो की असलियत पूरे देश के सामने आने वाली है लिखते रहिये

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    विकास जी सबको कटघरे में अभी मत खड़ा करिए जिनकी असलियत सामने आयी है,उनकी नियत पर संदेह करिए.

malkeet singh "jeet" के द्वारा
October 16, 2011

आदरनीय , सच मच लगता है जिन अन्ना के पीछे पूरा देश एक पंक्ति में चल पड़ा था वो कहीं खो से गए है

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    जीत साहब ,धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए.

akraktale के द्वारा
October 16, 2011

निशा जी नमस्कार, अवश्य ही भ्रष्टाचार का खात्मा मृग मरीचिका ही है क्यों कि स्वयम अन्ना ने इस बात को स्वीकार किया है कि कानून सौ प्रतिशत भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं कर सकता. आन्दोलन अर्धसफल रहा क्योंकि जनता ने ये जाना कि उनकी राजनेताओं से क्या अपेक्षा होना चाहिए, और नेताओं को भी अपना चेहरा आईने में देखने कि आवश्यकता महसूस होने लगी. किन्तु जनता को अभी अपेक्षा के अनुरूप प्रतिफल नहीं मिला ना ही नेता आईने में देखकर भी अपने मुह पर लगी कालिख पोंछने को राजी हैं. आन्दोलन से सर्वाधिक प्रभावित कांग्रेस हुई.सारी बातों कि जवाबदारी भी कांग्रेस पर ही आ गयी. अब मुह पर कालिख पुते नेताजी ये तो नहीं कह सकते कि हमारा चेहरा साफ़ है सो उन्होंने कोशिश शुरू कि है कि सारे आन्दोलन के संचालकों के मुह पर भी कालिख पोत दी जाए. बिलकुल कबड्डी कि तरह जहां एक खिलाडी जब पकड में आ जाए तो सारी विपक्षी टीम उस पर टूट पड़ती है.उसी तरह तरह कांग्रेस ने आक्रमण किया अब जा कर कहीं कुछ सफलता हाथ आयी है.अवश्य ही अब अन्ना कि बारी है कि अपनी टीम के कमजोर खिलाड़ियों को पहचाने. मगर अब अन्ना टीम से ज्यादा जनता कि बारी है अब अन्ना को मात्र प्रतिक मानते हुए हमें निष्पक्ष रूप से लड़ाई लड़नी होगी.तभी देश हित होगा. धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    October 17, 2011

    अशोक जी,आपने उहित ही कहा है और उसी के चलते कांग्रेस अपनी रणनीति में संभवतः सफल होना चाह रही है.परन्तु अन्ना टीम के कुछ सदस्यों की गतिविधियाँ ……….जनता को समझदारी से काम लेना होगा.

    sajjuchoudhary के द्वारा
    October 27, 2011

    jagranjunction forum App sabhi ke vichar pardne ke bad aisa lagta hai jaise congress ek deshdrohi ya videsi parti hai jisne bharat pea kabza kar rakkha hai.aur desh me jitna bhi bharastachar hai vo sab congress ki dain hai.parshant bhushan ka bayan kiran badi ka amanat me khayanat aur khud ko robin hood sabit karna aandolan me aaye chande ko tikane lagane ka jugard aadi aadi sab congrees ka hi kiya dhara hai bharastachar chahe b.j.p .kare ya koi unka sahyogi ya anye koi aur dal ya vayekti zimmadari hum congrees ko hi denge


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