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मंदबुद्धि बच्चे (विधि की विडंबना )

Posted On 20 Oct, 2011 Others में

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ahoee

अहोई अष्टमी की सभी को हार्दिक मंगलकामनाएं. संतान के मंगल के लिए मनाया जाने वाला ये पर्व सबके लिए मंगलमय हो.

किसी भी परिचित के यहाँ पहुँचने पर उस परिवार का कोई बच्चा उपेक्षित दिखे तो कुछ अजीब अनुभूति होती है,,परन्तु ये कुछ अप्रत्याशित नहीं घर में किसी अविकसित मस्तिष्क ,मंदबुद्धि या मानसिक विकृति वाले बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार प्राय परिवारों में होता है.यहाँ तक कि प्रताड़ना भी की जाती है,और यदि उसके माता-पिता नहीं है,तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है.अपने देश की की ही यदि बात करें तो हमारे देश में एक अनुमान के अनुसार प्रति १० बच्चों में एक अविकसित मस्तिष्क या अपंगता से पीड़ित है.पिछले दिनों कुछ ऐसे मामले पता चले जहाँ सम्पत्ति के लोभ में ऐसे बच्चों को किसी किसी न रूप में जीवन से वछित कर दिया जाता है.मानवजीवन की ये एक जटिलतम और दुखपूर्ण समस्या है.यथार्थ तो ये है कि मानव जीवन जहाँ गुणों का भण्डार हो सकता है,वहीँ स्वार्थ का पुतला,अहंकारी आदि आदि……….
्वार्थ = स्व+अर्थ अर्थात अपने लिए .परिभाषा के रूप में देखें तो अपने सोचना,कुछ करना ,अपने लाभ के लिए चिंतनशील रहना मानवीय दृष्टि से एक स्वाभाविक या नैसर्गिक क्रिया है,परन्तु जब स्वार्थ +दुर्भावना का कुसंयोग हो और मानव अपने हित के लिए किसी भी चरम पर पहुँच जाय ,मानवता को ही विस्मृत कर बैठे तो मानव’, मानव नहीं दानव बन जाता है और फिर उसके लिए किसी रिश्ते नाते को मोल नहीं रहता .ऐसे उदाहरण अब प्राय प्रतिदिन सुनने को मिलते हैं.परन्तु मानव ये भुलादेता है कि विधाता के दिए गये किसी दंड स्वरूप ही शायद पीड़ित बच्चा या व्यक्ति एक शिक्षा है ,एक सबक है हर उस व्यक्ति के लिए जो स्वयं को स्वयंभू मान बैठता है,कहा गया है :उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती ;
परमात्मा
ी सभी कृतियों में मानव को श्रेष्ठ माना गया है.मानव जीवन में विलक्षण विशेषताएं होना स्वाभाविक है.परिवार में शिशु के आगमन की कल्पना से प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता , बच्चे से ,अपने अपने सम्बन्ध के अनुसार सबके ह्रदय में नयी नयी कल्पनाएँ उमंगें होती हैं.जन्म के पश्चात जहाँ परिवारों में अपनी सामर्थ्य के अनुरूप खुशियाँ मनाई जाती हैं वहां कुछ परिवारों में सम्पूर्ण उत्साह विलुप्त हो जाता है जब बच्चे में कोई गंभीर शारीरिक या मानसिक विकृति दृष्टिगोचर होती है. कुछ शारीरिक विकृति तो प्राय एक दम दिख जाती हैं,परन्तु कुछ का पता तो कुछ समय पश्चात ही चल पाता है.मानसिक विकृतियाँ तो कुछ और अन्तराल के पश्चात ही संज्ञान में आ पाती हैं,यथा अविकसित मस्तिष्क ,मंद बुद्धि या फिर विक्षिप्त .विकलांगता से प्रभावित कुछ बच्चों का तो आंशिक या पूर्ण उपचार संभव होता है,और कुछ के लिए तो चिकित्सक भी हाथ खड़े कर देते हैं,और प्रकृति की मार से पीड़ित इन बच्चों व इनके माता-पिता का अपना जीवन भी अभिशाप बन जाता है.
आजीवन प्रयत्नशील रहकर ऐसे बच्चों के उपचार में अपना तन-मन-धन सबकुछ लुटा कर भी माता-पिता यथासंभव सामान्य जीवन जीने योग्य बनाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं.कष्ठप्रद स्थिति तो वह होती है,जिसमें या तो उपचार संभव नहीं या माता-पिता की सामर्थ्य नहीं .शारीरिक विकलांगता प्राय कुछ मामलों में तो दूर भी हो जाती है या यथासंभव आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है. परन्तु मानसिक विकलांगता तो और भी अधिक कष्ठ्प्रद है.विडंबना के शिकार ये बच्चे स्वयं तो अभिशप्त जीवन व्यतीत करते ही हैं,इनके माता-पिता भी आजीवन इसी चिंता में व्यथित रहते हैं,क्या होगा उनके बाद इनका.
शारीरिक विकलांगता में तो दृष्ठि हीनों के लिए,मूक वधिरों के लिए या फिर हाथ पैरों की विकलांगता से पीड़ित बच्चों के लिए व्यवस्थाएं हैं,परन्तु इन अभिशप्त बच्चों के लिए कुछ नहीं.घर से बाहर इनको कुछ सहृदय लोग दया दृष्टि से देखते हैं परन्तु अधिकांश लोग तो मज़ाक उड़ाते हैं और अवसर मिलने पर पत्थर आदि मारने से चूकते नहीं.घर में इनको बेकार समझकर उपेक्षित व्यवहार होता ही है

.मेरे अपने किसी घनिष्ठ रिश्तेदार की बेटी ऐसे ही अल्पविकसित मस्तिष्क की समस्या से पीड़ित है,शेष उसके चार बहिन भाई सामान्य है.माता-पिता ने यथासंभव उसके उपचार के भी प्रयास किये ,सरकारी सेवा में रत होने के कारण उनको चिकित्सा सुविधा उपलब्ध थी .आज उनकी बेटी लगभग ४०वर्ष की है,परंतु आत्म निर्भर नहीं.सम्पत्ति में उसके लिए बड़ा भाग भी उन्होंने सुरक्षित रखा है,परन्तु उसके भविष्य के विषय में वो राहत की सांस नहीं ले पा रहे हैं और यही उनकी चिंता का कारण है.यद्यपि उनका कथन है उनकी शेष चार संतानों में जो भी उसके प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह उनके पश्चात करेगा,अपनी सम्पत्ति में से उसको अतिरिक्त भाग भी वो देंगें,परन्तु आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं,उनका कहना है,समस्या तो ऐसी स्थिति में लड़का या लडकी दोनों के साथ है,परन्तु लडकी होने के कारण उसको समाज के भेडियों से भी बचाया जाना आवश्यक है.अतः किसी केंद्र में भेजना भी इतना सरल नहीं.
मंद बुद्धि बच्चों के लिए बनाये गये केन्द्रों की यदि बात की जाय तो .सर्वप्रथम तो हमारे देश में ऐसे केंद्र बहुत अधिक नहीं जहाँ उनको स्थान मिल सके,और सरकार द्वारा स्थापित ऐसे केंद्र तो अव्यवस्था व भ्रष्टाचार के गढ़ हैं. और यदि कुछ निजीसंस्थाओं द्वारा चलाये गये संस्थान या केंद्र हैं भी तो वहां का व्यय इतने अधिक हैं कि वहां का व्यय एक सामान्य आय वाले व्यक्ति के लिए वहन करना संभव नहीं होता. ऐसे बच्चों का .शारीरिक श्रम आदि न करने के कारण उनका शरीर तो बढ़ता है पर मस्तिष्क नहीं,आयु बढ़ने के साथ उनको कई बार अन्य रोग भी परेशान करते हैं.
समस्या तो विकराल है पर समाधान नहीं सूझता.मेरे विचार से यदि समय रहते यथासंभव उपचार इन बच्चों को भी मिले तो कुछ सीमा तक उनमें सुधार लाया जा सकता है.इसी प्रकार कुछ ऐसे केंद्र जो समाजसेवा की भावना से सम्पन्न लोग चला सकें तो वहां ऐसे बच्चों में सामाजिकता के साथ सुधार भी होता है.ऐसा ही एक केंद्र है,pathway जो एक महानुभाव द्वारा एक एन,जी ओ के रूप में संचालित किये जा रहे हैं.जिनका ध्येय है ,”"Every individual should be given the opportunity to utilize their potential in order to live with dignity and self-respect, regardless of mental or physical limitations”, Pathway seeks to serve the poorest of the poor by providing the best ”
२ बच्चों के साथ १९७५ में प्रारम्भ किया गया ये केंद्र आज लगभग २२००० से भी अधिक पीड़ित जनों की सेवा कर रहा है.यहाँ पर विशेष थेरेपीज द्वारा ऐसे पीड़ितों का उपचार होता है,और उनको आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास भी किये जाते हैं प्रशिक्षण के माध्यम से.
मात्र इतने प्रयास पर्याप्त नहीं ., ,ऐसे पीड़ितों के पुनर्वास पर विचार करना सबका ही धर्म है. साथ ही परिवार में यदि कोई सदस्य ऐसा है तो उसके प्रति संवेदनशीलता को बनाये रखना मानवता के नाते आवश्यक है. .

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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

G.Sarwar Khan के द्वारा
November 27, 2011

Its very good.

shuklabhramar55 के द्वारा
November 3, 2011

आदरणीया निशा जी सुन्दर जानकारी हमारे देश में न तो पैसे की कमी है न अच्छे लोगों की बस जरुरत है तो सब को मन बना कर बढ़ जाने की …समस्या मिट न सके ऐसी कोई बात नहीं ..पर काश … सुन्दर जानकारी और आप के विचार …भ्रमर ५ pathway जो एक महानुभाव द्वारा एक एन,जी ओ के रूप में संचालित किये जा रहे हैं.जिनका ध्येय है ,””Every individual should be given the opportunity to utilize their potential in order to live with dignity and self-respect, regardless of mental or physical limitations”, Pathway seeks to serve the poorest of the poor by providing the best ” २ बच्चों के साथ १९७५ में प्रारम्भ किया गया ये केंद्र आज लगभग २२००० से भी अधिक पीड़ित जनों की सेवा कर रहा है.

    nishamittal के द्वारा
    November 4, 2011

    धन्यवाद शुक्ल जी आपकी भावनाओं और प्रतिक्रिया हेतु.अभी ऐसे बहुत से केन्द्रों की आवश्यकता है.

Lahar के द्वारा
October 23, 2011

निशा जी सप्रेम नमस्कार वास्तव में आज अविकसित मस्तिष्क ,मंदबुद्धि या मानसिक विकृति वाले बच्चे को सामाजिक और घरेलू प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है | शायद आपका ये लेख उन कुछ अविकसित बच्चो की जिन्दगी सजा पाए जो समाज में उपेछित है | आपने एक अत्यंत सोचनीय मुद्दे पर विचार रखा जिसके लिए आपको धन्यवाद |

    nishamittal के द्वारा
    October 23, 2011

    पंकज जी,सामजिक समस्याओं से सम्बन्धित लेख यदि समाज में उन समस्याओं के प्रति चेतना ला सकें तो बहुत आच्छा हो.मेरी हार्दिक इच्छा यही है कि ऐसा हो सके.धन्यवाद.

syeds के द्वारा
October 22, 2011

आदरणीय निशा जी, सच्चाई से भरा हुआ मर्मस्पर्शी लेख..बधाई http://syeds.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 22, 2011

    धन्यवाद सैय्यद जी.

alokranjan के द्वारा
October 22, 2011

आदरणीय निशाजी, बहुत ही मर्मस्पर्शी लेख.सचमुच ये बच्चे वंचित रह जाते है उन सब चीजों से जिस का वे हक़ रखते है.

    nishamittal के द्वारा
    October 22, 2011

    धन्यवाद सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु.

abodhbaalak के द्वारा
October 21, 2011

आदरणीय निशा जी मानवीय मुद्दे के प्रति संवेदनायें जगानी वाली और हमें अपने अन्दर झाकन्ने पर विवश करती एक मर्म्स्पर्शीय रचना . http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद अबोध जी.

mparveen के द्वारा
October 21, 2011

निशा जी नमस्कार, आपका आलेख मर्म स्पर्शी और सत्य है .. ऐसे बच्चों के लिए केंद्र खोल तो दिए जाते हैं पर कई बार कुछ भ्रष्ट लोगो के कारन उन बच्चों को वो सब नहीं मिल पाता … इन बच्चों को हमारे सहयोग की जरुरत है और हमारा फ़र्ज़ भी बनता है की हम सहयोग करें धन्यवाद……

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    प्रवीन जी आपके विचार से सहमत हूँ,प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

Harish Bhatt के द्वारा
October 21, 2011

आदरणीय निशा जी सादर प्रणाम, इन बच्चों को दया नहीं, सहयोग की आवश्यकता होती है. इन बच्चों का क्या दोष? मैं ऐसे ही बच्चों के स्कूल में कम्प्यूटर टीचर रह चुका हूं. आठ साल मैंने इन बच्चों के बीच ही बिताए है. मैं जानता हूं कि यह बच्चे कम्प्यूटर पर बहुत ही अच्छी तरह काम कर लेते थे. जिसकी वजह से कई बार इन बच्चों को सम्मानित भी करवाया गया. ताज्जुब की बात थी कि कुछ बच्चे कम्प्यूटर पर टाइपिंग भी आराम से बहुत धीरे-धीरे करते थे, जिनको देखकर अच्छे खासे पढ़े लिखे सकापका जाते थे. ़ऋषिकेश में स्थित उस स्कूल का नाम है……. ज्योति विकलांग विद्यालय -विशेष बच्चों का विद्यालय. आज मैं उनके बीच में नहीं हूं, पर उनकी बहुत याद आती है, उनके साथ बिताया गया समय में अपने जीवन का सबसे अनमोल समय मानता हूं। आपका लेख पढ़कर मुझे अपने पुराने दिन याद गए, जब वह बच्चे मुझे चारों ओर से घेर तक बैठा करते थे.

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    हरीश जी,आपका व्यक्तिगत अनुभव इन बच्चों के मध्य आपने वर्णित किया है,प्रतिभा उनमें भी है,बीएस यथासंभव उसको निखारने और उनको अपनत्व प्रदान करने की आवश्यकता है.धन्यवाद.आपकी उनके प्रति अपनत्व की भावना के कारण ही उनको आपका साथ अच्छा लगता था.

akraktale के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय निशा जी नमस्कार, बहुत आभार की आपका ये आलेख आपने मेरे सुपुत्र के जन्मदिन पर लिखा पोस्ट अवश्य एक दिन बाद हुआ. कल ही उसका जन्मदिन था.उसके साथ बिठाये पिछले पंद्रह वर्षों में मैंने जो भी अनुभव किया है आपके आलेख में फिरभी कम ही लिखा लगता है.हाँ मगर जो भी लिखा है सत्य है.हाँ जब परिवार के अन्दर की बात से समानता देखें तो मेरे यहाँ बिलकुल वैसा नहीं है. हाँ मै अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ की इनको भी साथ चाहिए, ये भी इंसान हैं.दो पल का प्यार भी इनको उत्साहित कर देता है. साधुवाद.

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    अशोक जी विधि की विडंबना के शिकार आपके पुत्र के विषय में जान कर बहुत दुःख हुआ .ईश्वर से उसके लिए उसके जन्मदिन की मंगल कामनाएं,ईश्वर करे वो आत्मनिर्भर बन सके.आपके परिवार निश्चित ही उसको आत्मनिर्भर बनाने में योगदान देगा.

    surendra singh के द्वारा
    October 22, 2011

    आदरणीय अशोक जी,  आपके पुत्र को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं.

    nishamittal के द्वारा
    October 22, 2011

    सुरेन्द्र जी संभवतः अशोक जी इसको अब चैक न करे.मैं उनतक आपकी शुभकामनाएं पहुँचाने का प्रयास करती हूँ.

vinitashukla के द्वारा
October 20, 2011

मंदबुद्धि बच्चों को दया नहीं बल्कि सद्भावना और प्रेम की आवश्यकता होती है . समाज में, यहाँ तक कि उनके अपने ही परिवार में, उनके प्रति जो हिकारत की भावना दिखाई पड़ती है; बहुत निंदनीय है. अच्छे और सार्थक आलेख पर बधाई निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद विनीता जी आपकी संवेदनशील प्रतिक्रिया हेतु.

Santosh Kumar के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय निशाजी ,.सादर प्रणाम बहुत मानवीय सार्थक पोस्ट ,..जिनके साथ प्रकृति ने ही अन्याय किया है,..कम से कम इंसान को इंसानियत दिखानी चाहिए लेकिन अब इंसान की खाल में जानवर ज्यादा हो गए हैं ,..फिर भी अभी बहुत लोग हैं जिन्होंने ऐसे बच्चों/बड़ों को न सिर्फ उनका हक़ दिया बल्कि सम्मान भी दिया है ,…मानव धर्म का पूर्ण पालन करने वालों को नमन

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    संतोष जी,पोस्ट की प्रतिक्रिया आपकी इंसानियत के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है.धन्यवाद

October 20, 2011

निशा जी नमस्कार ! मानवीय मूल्यों के प्रति इतनी सहज अभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत साधुवाद !

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    आपकी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए आभार

roshni के द्वारा
October 20, 2011

निशा जी नमस्कार एक गंभीर विषय है ये मानसिक रूप से बीमार बच्चों की जो हालत होती है और लोगों का उनके प्रति जो व्यवहार होता है वोह बहुत ही चिंताजनक है एक अच्छे विचार के लिए धन्यवाद आभार

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद रौशनी.प्रतिक्रिया हेतु.

jlsingh के द्वारा
October 20, 2011

निशा जी, नमस्कार! सामाजिक और संवेदनशील मुद्दे आपकी लेखनी की विशेषता है. “शारीरिक विकलांगता में तो दृष्ठि हीनों के लिए,मूक वधिरों के लिए या फिर हाथ पैरों की विकलांगता से पीड़ित बच्चों के लिए व्यवस्थाएं हैं,परन्तु इन अभिशप्त बच्चों के लिए कुछ नहीं. घर से बाहर इनको कुछ सहृदय लोग दया दृष्टि से देखते हैं परन्तु अधिकांश लोग तो मज़ाक उड़ाते हैं और अवसर मिलने पर पत्थर आदि मारने से चूकते नहीं. घर में इनको बेकार समझकर उपेक्षित व्यवहार होता ही है” समाज की व्यवस्था पर चोट करता है. आमिर खान की ‘तारे जमीन पर’ फिल्म कुछ इसी विषय पर बनी थी. हमारे समाज के अन्दर भी इस तरह की मानसिकता विकसित होनी चाहिए ताकि मंद बुद्धि बच्चे पर किसी तरह का आघात न पहुंचे. बहुत सहृदयी हैं आप! आपकी सोच को मेरा नमन!

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    आपकी संवेदनशीलता का परिचय देती आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार सिंह साहब.तारे जमीन पर बहुत ही अच्छी पिक्चर थी विशेष रूप से असामान्य व्यक्तित्व सम्पन्न बच्चों के सम्बन्ध में

Tamanna के द्वारा
October 20, 2011

निशा जी, आपकी यह रचना भावनात्मक पक्ष पर बेहद खरी उतरती है..ऐसे बच्चों के प्रति हमारा व्यवहार संवेदनशील होना चाहिए. उपेक्षा इन्हें और कमजोर करती है..

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद तमन्ना जी.

sdvajpayee के द्वारा
October 20, 2011

एक मानवीय मुद्दे के प्रति संवेदनायें  जगानी वाली अच्‍छी पोस्‍ट के लिए  आभार ।

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद आदरनीय बाजपेयी जी.

Amresh Bahadur Singh के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय निशा जी,..नमस्कार ………… यह सच है की मंद बुद्धि एक गंभीर समस्या है पर उससे कही ज्यादा उनके साथ होने वाले सामाजिक ,भावनात्मक misbehavior है जो उनके साथ किया जाता है ……. जो उनको और भी अधिक कमजोर बना देता है………….

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    सही कहा अमरेश जी आपने ,एक तो भाग्य का प्रहार और उस पर परिजनों का उपेक्षापूर्ण व्यवहार …………धन्यवाद

Amita Srivastava के द्वारा
October 20, 2011

निशा दी , सबसे पहले तो आपको अहोई अष्टमी की शुभकामनाये …..| ईश्वर के इस क्रूर मजाक को देख दिल तडप उठता है | लेकिन यही पर इन्सान लाचार है | ऐसे बच्चो के माँ -बाप पर क्या बीतती होगी ? भगवान ऐसे बुद्धिहीन ,संवेदना शून्य , भ्रष्ट सहायता केन्द्रों को भी थोड़ी बुद्धि दे | धन्यवाद |

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    सही कहा है,अमिता आपने स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने वाला इंसान प्रकृति के समक्ष आज भी बौना है.धन्यवाद आपकी विचारपूर्ण प्रतिक्रिया हेतु

pramod chaubey के द्वारा
October 20, 2011

मानसिक विकलांगता तो और भी अधिक कष्ठ्प्रद है. विडंबना के शिकार ये बच्चे स्वयं तो अभिशप्त जीवन व्यतीत करते ही हैं,इनके माता-पिता भी आजीवन इसी चिंता में व्यथित रहते हैं,क्या होगा उनके बाद इनका… इन बातों का सार्थक जवाब देने में आधुनिक  समाज विफल है।जिन्होंने ऐसे लोगों की मदद की या  कर रहे हैं, वहीं तो दीन बन्धु हैं…..आदरणीया निशा  जी, शत-शत नमन। 

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    आपकी सद्भावनाओं व सम्मान के लिए आभार प्रमोद जी.परिजनों व समाज का प्रेम अपनत्व उनको सम्बल प्रदान करेगा और माता-पिता के सकारात्मक प्रयास उसको यथासम्ब हव आत्मनिर्भर बनायेंगे.

Paarth Dixit के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय निशा जी,..नमस्कार एक बहुत ही सार्थक एवं मार्मिक लेख…हार्दिक बधाई…. साधुवाद..

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद पार्थ

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय दीदी सादर प्रणाम ! मंदबुद्धि या मानसिक विकृति वाले बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार वास्तव में यह दुखद है | गैर सरकारी संस्थाएं भी अपने दायित्व का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन नहीं करती हैं अधिकांश तो अनुदान को कागजों पर ही बराबर कर देते हैं ऐसे में pathway द्वारा किये जा रहे कार्य प्रशंशा के योग्य हैं |

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद डॉ साहब ,pathway के विषय में जानकारी मुझको एक पुस्तिका से प्राप्त हुई,व्यवहारिक रूप के विषय में जानकारी उपलब्ध नहीं है.धन्यवाद.

sadhana thakur के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय निशा जी ,,बहुत ही सार्थक रचना ,अपने आसपास ऐसे बहुत से बच्चे देख विधाता की नियति पर दुःख होता है ,,बहुत अच्छी रचना ,,,,,,

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद साधना जी.

manoranjan thakur के द्वारा
October 20, 2011

राह व सार्थकता का सुंदर समागम

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    धन्यवाद मनोरंजन जी.

alkargupta1 के द्वारा
October 20, 2011

निशा जी , सर्वप्रथम तो आपको अहोई अष्टमी की ढेरों मंगलकामनाएं ! इस अवसर पर बहुत अच्छा आलेख प्रस्तुत किया है….बधाई !

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    आपको भी मंगलकामनाएं अलक्का जी.प्रतिक्रिया के लिए धन यवाद.

Abdul Rashid के द्वारा
October 20, 2011

आदरणीय निशा जी सादर नमस्कार मानवता ही तो निशा जी हमारे समाज से ख़त्म हो रही है सुन्दर रचना

    nishamittal के द्वारा
    October 21, 2011

    सही कहा राशिद जी आपने.धन्यवाद.


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