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जलाओ दिए इतने कि अँधेरा धरा पर...................

Posted On: 24 Oct, 2011 Others में

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21diwali

दीपोत्सव आप सभी के जीवन में ,निराशा का तिमिर दूर करे आशाओं का संचार कर सबके जीवन को जगमग कर दे. इस शुभ अवसर पर कविवर गोपाल दास नीरज की ये रचना जो मुझको बहुत प्रिय है,आप सबके साथ ……………………..

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |

नयी ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,

उडे मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,

लगे रोशनी की झडी झूम ऐसी,

निशा की गली में तिमिर राह भूले,

खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,

उषा जा न पाये, निशा आ ना पाये |

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |

स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,

कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,

मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,

कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,

चलेगा सदा नाश का खेल यूं ही,

भले ही दिवाली यहां रोज आये |

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,

नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,

उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,

नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,

कटेंगे तभी यह अंधरे घिरे अब,

स्वय धर मनुज दीप का रूप आये |

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |
(दीप पर्व पर आप सबके समक्ष एक स्वरचित रचना प्रस्तुत करना चाह रही थी,परन्तु मंच पर एक से बढ़कर एक कवियों की रचनाओं के समक्ष अपनी बेचारी रचना को प्रस्तुत करने का साहस नहीं हुआ अतः देश की वर्तमान परिस्थितियों में नीरज जी की ये सामयिक रचना.)

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58 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shuklabhramar55 के द्वारा
November 3, 2011

आदरणीया निशा जी विलम्ब से आया …भले ही आप ने स्वरचित रचना नहीं डाला हो लेकिन नीरज जी की याद ..उन दिनों की याद और ये सुन्दर कोमल रचना ला कर आप ने सुन्दर कार्य किया मन खुश हो गया … निशा की गली में तिमिर राह भूले, खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग, उषा जा न पाये, निशा आ ना पाये | जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये | आभार भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    November 4, 2011

    धन्यवाद शुक्ल जी ,सुन्दर रचना आनन्दित करती है ये कविता मुझको भी बहुत पसंद है.

mparveen के द्वारा
October 30, 2011

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये | जी निशा जी सभी ऐसा चाहते हैं पर धरा का अँधेरा ख़तम नहीं होता…. पर कोशिश तो जारी है कभी तो मिटेगा … धन्यवाद….

    nishamittal के द्वारा
    October 30, 2011

    हम सब की आशायें अवश्य पूर्ण होंगी और अन्धकार मिटेगा.धन्यवाद.

    sumit के द्वारा
    October 31, 2011

    करोगें याद गुजरें जमाने को, तरसोगें हमारे साथ एक पल बिताने को,

    nishamittal के द्वारा
    October 31, 2011

    सुमित जी प्रथम प्रतिक्रिया हेतु आभार.

sadhana thakur के द्वारा
October 27, 2011

आदरणीय निशा जी ,सबसे पहले दीपावली की ढेर सी शुभकामनाये ….आभार की आपने इतनी अच्छी रचना मंच पर प्रस्तुत की ….

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    धन्यवाद साधना जी आभार व्यस्त समय में प्रतिक्रिया देने के लिए.मंगलकामनाएं.

Dr. SHASHIBHUSHAN के द्वारा
October 26, 2011

न तन में है शक्ति, न मन में है शक्ति, करेंगे भला क्या ये दीपों की भक्ति। सभी चोर डाकू हैं रहबर बने फिर, अँधेरा धरित्री का कैसे मिटायें।।

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    आदरनीय शशि भूषण जी,सर्वप्रथम आभार आपकी प्रतिक्रिया के लिए.सही कहा है आपने परन्तु यदि हम अपने मन का अँधेरा ही मिटा सकें तो शायद कुछ सकारात्मक हो सके.

abodhbaalak के द्वारा
October 25, 2011

निशा जी आपने फिर से स्कूल में पढ़ी जाने वाली प्रार्थना याद दिला दी……….. आपको भी सपरिवार दीवाली के ढेरो शुभकामनयें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    धन्यवाद अबोध जी मंगलकामनाएं.

Dr S Shankar Singh के द्वारा
October 25, 2011

आपको सपरिवार दीपावली की बहुत बहुत शुभ कामनाएं डा. एस शंकर सिंह

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    आभार डॉ साहब आप[को भी दीपावली,गोवेर्धन पूजा और भाईदूज मंगलमय हो

malkeet singh jeet के द्वारा
October 25, 2011

आदरनीय क्षमा के साथ कहू कि आज दिया तो हम सब बनाना चाहते है पर दिए की तरह ही बस दूसरो को उपदेश कि रौशनी देते है और खुद अंधेरो में दुबे रह जाते है काश के महताब सी रौशनी कर सके जो थोड़ी देर ही सही सब के साथ खुद को भी दिन सा रौशन करती है मगर डरते है क्योकि महताब खुद जल कर रौशनी करती है जब कि “लोग कहते है दिया जलता है ” पर रात भर दिया तेल और बाती को जलाता है सुबह फिर मुस्कुराता है अपने मुह पे कालिख लिए

    malkeet singh jeet के द्वारा
    October 25, 2011

    एक बात तो भावो के आवेग में रह ही गई “रचना ये तो महान है ही पर आपकी लेखनी से भी कुछ कम नहीं निकला होगा हो सकता आपकी नजरो में उस में कुछ बाकी रह गया हो लेकिन हम बच्चों के लिए तो आपके हर शब्द में कुछ न कुछ सीखने के लिए होता ही है

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    बहुत सुन्दर व्याख्या आपकी .आभार प्रतिक्रिया हेतु.आपकी सदभावनाएँ पूर्ण हों.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    जीत जी,आपके द्वारा प्रकट भावनाओं व सम्मान के लिए आभार.इस बार नहीं शीघ्र ही कोई रचना जरूर प्रस्तुत करूंगी.

राही अंजान के द्वारा
October 24, 2011

आदरणीया निशा जी, सादर प्रणाम ! दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ !! नीरज जी द्वारा रचित अति सुंदर पंक्तियाँ…..खासकर… लगे रोशनी की झडी झूम ऐसी, निशा की गली में तिमिर राह भूले !! . मंच पर रखने के लिए हार्दिक आभार । और ये क्या….आपका साहस नहीं हुआ !!! नहीं नहीं…..आप तो मुझ जैसे नवसिखुओं के लिए एक प्रेरणा-पुंज हैं !! आपसे विनम्र अनुरोध है कि मंच पर आपकी अगली पोस्ट के रूप में वही रचना हो । आशा है कि आप इस नादान ‘अंजान’ को निराश नहीं करेंगी । आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के इंतज़ार में….

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    नीरज जी की रचना तो प्राय बेजोड़ हैं ही हाँ मंच पर रख कर बहुत अच्छा लगा.मुझको भी.आपकी सद्भावनाओं व सम्मान के लिए आभारी हूँ.यथासंभव शीघ्र ही कोई रचना प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगी.

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 24, 2011

आदरणीय दीदी जी , सादर प्रणाम ! कविवर गोपाल दास नीरज की सुन्दर रचना को साझा करने के लिए हार्दिक आभार सुन्दर रचना ……..बधाई ! आपको दीपावली की अग्रिम हार्दिक शुभकामनायें |

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    धन्यवाद डॉ साहब आपकी प्रतिक्रिया के लिए.भाई दूज की मंगलकामनाएं.

rajuahuja के द्वारा
October 24, 2011

निशा जी , नीरज जी की रचना अपने आप में अद्वितीय है ! फिर दीपोत्सव पर तो यह और भी मौजूं हो गई !इसी महान रचनाकार की रचना की एक बानगी देखिये ! कर रहा नृत्य विध्वंस , सृजन के थके चरण संस्कृति की इति हो रही , क्रुद्ध है दुर्वासा बिक रही द्रोपदी , नग्न खड़ी चौराहे पर पढ़ रहा किन्तु साहित्य सितारों की भाषा , तुम गाकर दीपक राग जगा दो मुर्दों को मैं जीवित को जीने का अर्थ बताउगा तुम दिवाली बनकर जग का तम दूर करो मैं होली बन कर बिछड़े ह्रदय मिलाऊंगा ! रोशनी के पर्व पर हार्दिक शुभकामनायें ,दीपावली मंगलमय हो ऐसी कामना के साथ !

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    राज जी,नीरज जी की रचनाएँ तो बेजोड़ हैं ही.आपके द्वारा प्रस्तुत पंक्तियाँ बहुत अच्छी हैं.पढी थीं ये भी,आपको भी मंगलकामनाएं.

vinitashukla के द्वारा
October 24, 2011

दीप पर्व पर इस सुन्दर रचना को साझा करने के लिए आभार निशा जी. आपकी सब रचनाएँ एक से एक बढ़कर उत्क्रृष्ट होती हैं; फिर दुविधा कैसी. दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    धन्यवाद विनीता जी आप लोगों की अपेक्षाओं को पूर्ण करने का प्रयास अवश्य करूंगी.

Santosh Kumar के द्वारा
October 24, 2011

आदरणीय निशा जी,.सादर प्रणाम मैं जब जब दीपावली से सम्बंधित कोई पोस्ट पढ़ता हूँ ,.तब तब इस कालजयी रचना की पहली पंक्ति अनायास ही गुनगुनाने लगता हूँ …स्कूल में पढ़ी थी ,..बाकी याद नहीं रहा ,.. मंच पर रखने के लिए आपका कोटिशः आभार .. …लेकिन ,..अब आपकी रचना का बेसब्री से इंतज़ार करूंगा …..सबको साहस देने वाली आप यदि ऐसा कहेंगी तो कैसे चलेगा ?,….कृपया हमें इस रचना से वंचित करने का दंड ना दें .. पुनः प्रणाम

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    संतोष जी मुझको बहुत ही संकोच हो रहा हैप्रयास करूंगी शीघ्र ही सभी ब्लोगर बंधुओं की अपेक्षाएं पूर्ण करूं,परन्तु एक डीएम नहीं केवल दीपावली नहीं अब ही बहुत से अवसर हैं चलते रहेंगें.आपकी सद्भावनाओं व सम्मान के लिए आभारी हूँ.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    कृपया दम पढ़ें.

Lahar के द्वारा
October 24, 2011

निशा जी सप्रेम नमस्कार नीरज जी की ये रचना तो वास्तव में अदभुत है | कोई उच्च कोटि के विद्वान ही एसी रचना लिख सकते है | लेकिन आपने ये कह कर हम सभी को शर्मिंदा कर दिया , की आप को अपनी स्व रचना प्रस्तुत करने का साहस नहीं हुआ | अन्य लोगो के बारे में तो मुझे नहीं पता लेकिन मेरे जैसे लोग आपकी रचनाये पढ़ कर अपनी रचनाये जागरण मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयास करते है और अगर आप ही एसा कहेंगी तो हम जैसे लोगो का क्या होगा …………………….

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    आपकी सद्भावनाओं व स्नेह सम्मान के लिए बहुत आभारी हूँ.दीपपर्व ही नहीं बहुत से अवसर बाकी हैं,मंच पर हम सभी साथ हैं.अवश्य कोई रचना प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगी.

pramod chaubey के द्वारा
October 24, 2011

मंच पर एक से बढ़कर एक कवियों की रचनाओं के समक्ष अपनी बेचारी रचना को प्रस्तुत करने का साहस नहीं हुआ….जैसी बातें कहकर आपने मुझे निराश किया है।  आदरणीया निशा जी, आदरणीय श्री अशोक जी जैसे विचारवानों  की वजह से जेजे से जुड़ा हूं, जिनमें सहजता प्रकट होती है। मुझे  नम्बर देना होता तो सबसे अधिक अंक आपको देने में नहीं हिचकता।  भले ही इसके लिए श्री अशोक जी से अनुमति लेनी पड़ती। मुझे आपकी उस रचना का इंतजार होगा, जिसे आपने  प्रस्तुत नहीं किया। आदरणीय श्री अशोक जी से उम्मीद करूगां कि  आप भी आदरणीया निशा जी के मेरे अनुनय का समर्थन करेंगे।  मुझे लगता है कि आपकी रचना बेचारी नहीं बल्कि हम सब….हो गये।   

    akraktale के द्वारा
    October 25, 2011

    आदरणीय प्रमोद जी नमस्कार, मैंने जब आदरणीय निशा जी के ब्लॉग पर कविता देखि तो मै बहुत खुश हुआ किन्तु जब मैंने पढ़ा की ये रचना नीरज जी की है तो इतनी सुन्दर रचना को भी मैंने अनमने मन से ही पढ़ा क्योंकि मेरा मन तो आदरणीया की स्व रचना पढ़ना चाह रहा था.हर मन में एक कवि का वास है. फिर मन के विचारों को आदरणीया जैसी रचनाकार हम लोगों के साथ ना बांटे तो यह ज्यादती ही है.धन्यवाद.

    akraktale के द्वारा
    October 25, 2011

    निशाजी सादर नमस्कार, जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये | अब इससे भी क्या श्रेष्ठ है! नीरज जी की आपने बहुत ही सुन्दर कविता प्रस्तुत की है.मगर दीप अभी बुझे नहीं हैं,आप कविता करें रोशनी और बढ़ जायेगी.आभार.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    प्रमोद जी सादर अभिवादन.मुझको शब्द नहीं मिल पा रहे हैं की किन शब्दों में मैं आपका व स्नेही बंधुओं द्वारा प्रदत्त सम्मान व स्नेह के प्रति आभार व्यक्त करून.मेरा अनुरोध आपसे, अशोक जी तथा आप सभी मंच पर एक से एक प्रबुद्ध विचारक ,व लेखक हैं जिनमें ऐसे जन भी हैं,जो काव्य ,कहानी,व्यंग्य तथा अन्य विधाओं में समान रूप से दक्ष हैं.अर्थात सभी में अपने विचार रख सकते हैं.अतः तुलना करके मुझको लज्जित न करें.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    हाँ यथा शीघ्र मैं कोई रचना अवश्य प्रस्तुत करूंगी.धन्यवाद आपका.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    आदरनीय अशोक जी,बहुत बहुत आभार आपका और मेरा दोष कि इस बार मैं सबकी अपेक्षाएं पूर्ण करने में असमर्थ रही परन्तु हम सभी मंच पर हैं,शीघ्र ही मैं अपनी ओर से यथासंभव प्रयास करूंगी

Tamanna के द्वारा
October 24, 2011

निशा जी, दीपावली के अवसर पर एक बेहतरीतन रचना प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक धन्यवाद …वैसे आपकी मौलिक रचनाएं भी हमेशा बेजोड़ होती हैं. जिसके लिए आप प्रशंसा की पात्र हैं. दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    धन्यवाद तमन्ना जी आप[की सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए.

vikasmehta के द्वारा
October 24, 2011

निशा जी नमस्कार दीपावली की शुभकामनाये …….निशा जी स्वरचित रचना प्रस्तुत कर देती तब भी आपकी सराहना ही होती चुकी आपकी कलम जब भी चलती है एक सुंदर सन्देश देती है ……… कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी, मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी, कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी, चलेगा सदा नाश का खेल यूं ही, भले ही दिवाली यहां रोज आये |

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    विकास जी आभार आपकी सद्भावनाओं का .मैं शीघ्र ही प्रयास करती हूँ पुनः

alkargupta1 के द्वारा
October 24, 2011

निशा जी , दीपावली के इस पर्व पर कविवर नीरज की कविता को मंच पर प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद ! पर निशा जी अगर आप अपनी रचना प्रस्तुत करती तो अति उत्तम बात होती…चलिए कोई बात नहीं…..ऐसी उम्मीद करती हूँ भविष्य में अवश्य प्रस्तुत करेंगी……सपरिवार आपको दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं !

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    अलका जी धन्यवाद अपनी रचना भी प्रस्तुत करने का प्रयास करती हूँ.

October 24, 2011

के पर्व पर इस रचना को पोस्ट करके आपने बड़ा ही सराहनीय कार्य किया है…आपको बहुत बहुत साधुवाद। दीवाली की शुभ कामनाओं एवं बधाइयों के साथ …डॉ॰ सूरज।

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    धन्यवाद बाली जी आपकी प्रतिक्रिया हेतु.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 24, 2011

निशा जी, दीपोत्सव के लिये सार्थक कविवर नीरज की रचना प्रकाशित कर आपने बड़ा पुनीत कार्य किया है । परन्तु अच्छा होता, जैसी भी थी, अपनी रचना पोस्ट करतीं । यह तो हर्ष का विषय है कि इस मंच पर एक से एक साहित्यिक गुदड़ी के लाल छिपे बैठे हैं, पर यह न भूलिये कि सबने अपनी सृजनशीलता की धार को यहीं रगड़-रगड़ कर चमकाया है । साहित्यकारों को भी कभी-कभार ढीठ और बेहया बनना ही पड़ता है, ऐसा पुराने समय से चला आ रहा है । ऐसा नहीं होता, तो जिस ज़माने में प्रकाशकों की तूती बोलती थी, शायद ही कोई साहित्यकार नामचीन बन पाया होता । लेकिन आपकी सदाशयता की भी दाद देनी पड़ेगी । कविवर ने अपनी कविता में ‘उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए’ कहकर सीधे-सीधे आपसे किनारा करने की च्येष्टा की है, फ़िर भी आपने स्वरचित की बजाय उन्हीं की कविता का चुनाव किया (यूं ही मज़ाक़) । आपकी अपनी रचना की प्रतीक्षा रहेगी । प्रकाश-पर्व दीपावली की आपको सपरिवार कोटिश: बधाइयां !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 25, 2011

    आदरणीया निशा जी, गुरुवर शाही जी के कथन से मैं भी सहमत हूँ। गोपाल दास नीरज जी द्वारा रचित कविता प्रस्तुत करने के लिए मैं आभारी तो हूँ किन्तु आप द्वारा रचित कविता के रसपान का सुख कुछ और ही होता। शेष शाही जी ने जो कुछ भी कहा है वो सही कहा है। धन्यवाद,

    nishamittal के द्वारा
    October 25, 2011

    आदरनीय शाही जी,आपको प्रतिक्रिया देने का समय मिला दीपावली के शुभावसर पर अवकाश के कारण.अतः दीपपर्व की पुनः मंगलकामनाएं. सर्वप्रथम तो आपकी अंतिम पंक्तियों का उत्तर देना चाहूंगी.समय कम है,पर्व के कारण परन्तु स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ..आपको ये बताना मुझको बहुत रोचक व अच्छा लग रहा है कि मेरे आदरनीय पति का नाम डॉ रविकांत मित्तल है अतः इस दृष्टिकोण से यहाँ भी विपरीत स्थिति बनती है,परन्तु ईश्वर की कृपा से हम परस्पर पूरक हैं तभी इस बंधन में बंधे हुए हैं.मेरा मानना है कि उषा का महत्व तभी है जब निशा वहां है अन्यथा तो उषा ही उषा हो तो किसके सापेक्ष हम उषा को अधिक महत्व देंगें,अतः निशा के बिना उषा का अस्तित्व निरर्थक हो जाएगा. केवल रोचकता उत्पन्न करने हेतु आपकी प्रतिक्रिया के उत्तर में भिन्न उत्तर दे रही हूँ.शेष कुछ नहीं,स्वरचित रचना प्रस्तुत न करने का कारण बस अभी रचना मेरी कसौटी पर ही थोड़ी ठीक नहीं बन पायी थी शीघ्र ही अपनी इस कमी को दूर करने का प्रयास करूंगी.पुनः धन्यवाद.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    October 26, 2011

    जब साक्षात भगवान भास्कर ही निशा के संरक्षक हों, तो एक पंकज (नीरज) की भला क्या बिसात ! वह तो स्वयं निशा का मारा कातर भाव से दिवाकर के उदित होने की बाट जोहता रहता है (कविवर जहां भी हों, क्षमा करें) । निशापति प्रकाशपुंज देवेश्वर को मेरा प्रणाम कहेंगी । आपकी रचना को यथाशीघ्र संशोधित परिमार्जित होकर पटल (पोर्टल) पर प्रकाशित हो ही जाना चाहिये । विद्वानों ने कहा है कि, ‘का बरखा जब कृषी सुखाने !’ जब प्रकाशपर्व ही व्यतीत हो जाएगा, तो उसकी प्रासंगिकता का बहाना गढ़ने लगेंगी । यह टालमटोल छोड़िये, और कविता को आने दीजिये । कसौटी पर कसने का काम हम आलोचकों पर छोड़ दीजिये, आखिर खलिहर बैठे हम करंगों के पास भी तो कुछ काम होना चाहिये ? धन्यवाद !

    rajuahuja के द्वारा
    October 27, 2011

    श्रीमान शाही जी , प्रणाम ,नमस्कार ,असलामवालेकुम,खुशामदीद ,स्वागत है ,और भी न जाने क्या क्या ! आप के शब्दों से मुझे दिग्विजय द्वारा सोनिया की स्तुति का आभास होता है ! वाह क्या कहने ,आपने तो लाजवाब कर दिया ! सुना है भूत में कुछ विशेष हिन्दुस्तानी फिरंगियों का इसी प्रकार महिमा मंडन करते थे !आज याद ताज़ा हो गई ! शाबास लगे रहिये ……….साहित्य सेवा में !

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 28, 2011

    आदरणीय शाही जी ,.सादर प्रणाम अब तो निशाजी को अपनी रचना प्रकाशित कर हमें पढ़ने का आनंद देना ही चाहिए ,..अब कोई टालमटोल ,.प्रासंगिकता के बहाने नहीं चलेंगे ,..दीपपर्व का महत्त्व सदैव रहता है ,..उजाला ही आएगा …..मैं फिरसे एक बार निशाजी से करबद्ध निवेदन करूंगा की वो यथाशीघ्र अपनी बहुप्रतीक्षित रचना प्रकाशित करें ,.. ***************************** मैं आपको अपने ब्लाग “हमार देश” पर आने का हार्दिक निमंत्रण भी देता हूँ ,कभी समय मिलने पर अवश्य अपनी पारखी नजर डालिए ,..मैं कोई साहित्यिक व्यक्ति नहीं हूँ ,..ना ही पढ़ा लिखा हूँ ,….बस जो भाव आ जाते हैं उनको लिख देता हूँ ,..इसके लिए इस मंच का आभारी हूँ ,.. आपकी उचित कृपाद्रष्टि की कामना के साथ ..पुनः सादर प्रणाम http://santo1979.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    संदीप जी धन्यवाद.आपकी सद्भावनाओं व अपेक्षाओं के लिए.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    आदरनीय राज जी,मेरा विनम्र अनुरोध है आपसे कि ऐसी उपमा कृपया न दें.मेरे पहले छोटे से आलेख पर आदरनीय शाही जी ने प्रथम कमेन्ट देकर ही मेरा उत्साहवर्धन किया था,और उसी से उत्साहित हो कर मैं निरंतर प्रयत्नशील रही.न जाने मेरी कितनी ही कमियों को उन्होंने मंच पर ही मुझको बताया और मैंने एक” आलोचक अग्रज” का मान उनको प्रदान किया है.आज भी जब मुझको उनके द्वारा या अन्य किसी भी ब्लोगर बन्धु द्वारा बताई गयी सकारात्मक कमी का पता चलता हैं तो मुझको बहुत अच्छा लगता है,इसी लिए मैंने पहले एल ब्लॉग लिखा भी था “निंदक नियरे राखिये “मेरा उनसे सदा यही अनुरोध ,आग्रह रहेगा कि वो अपनी आलोचक अग्रज वाली भूमिका का निर्वाह सदा करने की कृपा करे,शेष सब से भी मेरा यही अनुरोध है,कि सुधार लाने के लिए सुझाव अवश्य दें.

    nishamittal के द्वारा
    October 28, 2011

    संतोष जी पुनः समय देने के लिए धन्यवाद.सभी स्नेही बंधुओं की अपेक्षा के अनुरूप शीघ्र ही कोई छोटी सी कविता अवश्य लिखूँगी.

    rajuahuja के द्वारा
    October 28, 2011

    माननीय निशा जी , यदि मेरे शब्दों से आपको कष्ट हुआ तो, मैं क्षमा सहित अपने शब्द वापस लेता हूँ ! दरअसल नीरज जी जैसे व्यक्तित्व को हाशिये पर रखता देख मुझसे बर्दास्त नहीं हुआ !

    nishamittal के द्वारा
    October 29, 2011

    राज जी क्षमा जैसी बात कहकर लज्जित न करें.अपने विनोदप्रिय स्वभाव के कारण संभवतः शाही जी ने लिखा है,साथ ही क्षमा याचना भी की है,चलिए नीरज जी के प्रति आपकी भावनाएं जान कर बहुत अच्छा लगा.

syeds के द्वारा
October 24, 2011

आदरणीय निशा जी, दीपावली के अवसर पर बेहद सुन्दर रचना… बधाई… आपको सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं… http://syeds.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    October 25, 2011

    सैय्यद जी आभार मंगलकामनाओं व प्रतिक्रिया हेतु.आपको भी शुभकामनाएं.


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