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माँ सौतेली होती है?

Posted On: 1 Mar, 2012 Others में

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अभागा ही था वंश , ,जब संसार में आने पर उसके आँखें खोलते ही उसकी माँ ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं.’माँ ‘ शब्द का उच्चरण करते ही जिस अपनत्व ,पवित्रता का अहसास माँ और संतान दोनों को होता है,उससे दोनों ही वंछित रह गए थे.वंश पहली संतान ,उसके जन्म की प्रतीक्षा में सभी व्यग्र थे परिवार में.सबने स्वप्न संजोय थे, रंजन और रागिनी तो संतान के जन्म की सूचना सुनिश्चित होते ही ,संतान की शिक्षा-दीक्षा ,नाम , खिलौने और न जाने क्या क्या …हर पल कल्पना संसार में ही खोये रहते थे .
कल्पना की नीवं पर यथार्थ का महल सबका बन सके ,ऐसे भाग्य सभी का नहीं होता ,और ऐसा ही हुआ रंजन और रागिनी के साथ.प्रेम की नींव पर खड़ा उनका संसार उनके पुत्र के जन्म लेते ही तिनका- तिनका बन कर बिखर गया .एक नवीन खुशी जो उनके प्रेम संसार में चार चाँद लगा देती,की आहट सुने बिना ही रागिनी, अपनी धरोहर,अपने पुत्र को पति रंजन और अपनी बहिन कामिनी के पास छोड़ कर संसार से विदा हो गई.रंजन तो एकदम गुमसुम हो गया था ,कुछ भी नहीं सूझ रहा था.हर समय रागिनी के साथ देखे स्वप्न उसको क्लांत बनाये रखते थे.
‘ वंश’ का यही नाम सोचा था रंजन और रागिनी ने (पुत्र जन्म होने पर ) का तो माँ से परिचय भी नहीं हुआ.परिवार में शोक की लहर छा गई.रंजन के माता-पिता नहीं थे ,एकलौती विवाहित बहिन भी पारिवारिक समस्याओं के कारण उनके पास नहीं आ सकती थी.रंजन जिस कम्पनी में कार्यरत था ,उसके पास समय का बहुत अभाव था.अवकाश भी कब तक लिया जा सकता था.वंश के जन्म के समय आयी हुई उसकी मौसी कामिनी भी अधिक समय नहीं रुक सकती थी.किसी आया आदि के भरोसे नवजात शिशु को कैसे छोड़ा जाता.विकट समस्या थी.परिचितों ,मित्रों ने उसको दूसरे विवाह का सुझाव भी दिया परन्तु अपनी प्रिया रागिनी के अतिरिक्त अन्य किसी की कल्पना !
नवजात शिशु को तो हर पल देखभाल की आवश्यकता थी. एक मात्र सहारा कामिनी ही दिख रही थी .कामिनी सुशिक्षित थी ,अपने भविष्य के प्रति सजग कामिनी जॉब को लेकर बहुत उत्साहित थी. उसके सहपाठी ,सविनय ने उसके समक्ष विवाह प्रस्ताव भी रखा था. अभी उत्तर तो नहीं दे सकी थी कामिनी ,परन्तु मन ही मन वह बहुत प्रसन्न थी.सविनय का साथ पाकर कोई भी युवती स्वयं को धन्य मानती और यहाँ तो स्वयं प्रस्ताव ही सविनय की ओर से आया था..होनी को कौन टाल सका है.सबके समझाने पर रंजन और कामिनी को समझौता करना पड़ा वंश की खातिर और उनको विवाह सूत्र में बाँध दिया गया.
कठिन परीक्षा थी कामिनी की .अपनी बहिन की धरोहर जो स्वयं उसकी बहिन का ही प्रतिरूप था, के लिए अपने स्वप्न संसार को अपने ही हाथों से उजाडकर बहिन के पति को अपने पति रूप में स्वीकार किया था उसने.
पल भर में ही जीवनचर्या ही बदल गयी थी कामिनी की.
,वंश के प्रति उत्तरदायित्व के कारण उसके लिए जॉब संभव नहीं था ,दिन और रात में नवजात बच्चे के साथ व्यस्तता .रंजन को अपने सभी कार्य स्वयं करने की आदत थी परन्तु पत्नी के रूप में उसका भी ध्यान रखने में उसका सारा समय कहाँ चला जाता था,उसको पता ही नहीं लगता था.कोई भी पल एकाकी होने पर सविनय के साथ भावी जीवन बिताने के उसके स्वप्न भी उसके जीवन में झाँक लेते थे.
समय और व्यस्तता को घाव भरने वाला बहुत महत्वपूर्ण मलहम माना जाता है,ऐसा ही क्रम बनने लगा था कामिनी वंश,रंजन और गृहस्थी की चाहरदीवारी में रम गयी थी.वंश भी उसके साथ प्रसन्न रहता था..शिशु को जो भी अपनत्व प्रदान करता है,वही उसका अपना है.वंश बड़ा हो रहा था. कामिनी और वंश दोनों ही माता-पुत्र की भांति एक दूसरे को प्रिय थे.एक दिन जब उसकी नौकरानी ने न जाने किस कारण उसके जन्म के विषय में कुछ प्रश्न पूछ लिया तो , ऐसे मोड़ पर ही कामिनी ने एक महत्वपूर्ण निर्णय भविष्य की समस्याओं से बचने के लिए लिया और वह था परिवार को यहीं तक सीमित रखने का.सौतेली शब्द से उसको घृणा थी और वह अपने संसार को इस काली छाया से मुक्त रखना चाहती थी ,अतः उसको यही उपयुक्त लगा..रंजन ने भी उसके प्रस्ताव पर मुहर लगा दी थी.
.वंश के विद्यालय जाने का समय आ गया था.प्रखर मेधा का स्वामी वंश, कामिनी के परिश्रम,वात्सल्य व उसको समय देने के कारण बहुविध प्रतिभा सम्पन्न बन गया था.हर क्षेत्र में सफलता उसका अनुसरण करती थी.रंजन उसको देख कर प्रसन्न थे ,उत्साह वर्धन करते थे और सभी साधन उन्होंने रागिनी व वंश की सुख सुविधा हेतु उन्होंने जुटा रखे थे.
किशोरवय की ओर बढ़ते वंश पर कामिनी ने तन -मन धन सब कुछ न्यौछावर कर दिया था.स्कूल की शिक्षा पूर्ण कर वंश के अपना करियर निर्धारित करने का समय आ गया था.रंजन और कामिनी दोनों ही आदर्श माता-पिता की भांति वंश को सर्वोच्च शिखर पर देखना चाहते थे, इस समय वंश तो समयाभाव के कारण अधिक समय नहीं दे पाते थे,परन्तु कामिनी ने अपने सभी शौक ,इच्छाओं पर लगाम लगा दी थी.अंततः कामिनी की तपस्या सफल हुई. वंश को देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थान में प्रवेश मिल गया.समय पंख लगाकर उड़ रहा था .वंश की सफलताएँ ही कामिनी को उल्लसित रखती थीं.भाग्य भी ना जाने कैसा छल करता है ,अचानक हृदयाघात से रंजन ने उसका साथ छोड़ दिया .कामिनी का तो संसार ही उजाड़ गया.वंश भी बहुत दुखी था.उसके भविष्य का ध्यान रखते हुए कामिनी ने उसको अपने भविष्य को स्वर्णिम बनाते हुए अपने पिता की इच्छाएं पूर्ण करने को कहा.अपनी भावनाओं किसी प्रकार नियंत्रित किया.कामिनी को रंजन के कार्यालय में नियुक्ति का प्रस्ताव मिला ,अपने को व्यस्त रखने के इरादे से उसने नियुक्ति स्वीकार कर ली.अब कामिनी का समय घर और कार्यालय में बीत जाता था.

वंश का एम् टेक भी पूर्ण हो गया और उसको मनोनुकूल नियुक्ति भी.अब कामिनी के समक्ष एक ही महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व शेष रह गया था वंश को विवाह सूत्र में बाँधने का.उसने वंश से ही उसकी पसंद के विषय में जानना चाहा तो उसने कोई विशेष रूचि प्रकट नहीं की.अंततः एक सुशिक्षित,सुदर्शना लड़की देख कर विवाह प्रस्ताव पर विचार किया.आज लड़की के माता-पिता उनसे मिलने आ रहे थे,खुश थी कामिनी.सभी विषयों पर बातचीत के पश्चात,अचानक ही लड़की की माँ बोली “हमने सुना है आप वंश की सौतेली माँ हैं,इसलिए थोडा संकोच है,लड़की देने में.”
कामिनी का चेहरा फक्क पड़ गया.काटो तो खून नहीं जैसी स्थिति हो गई उसकी.जिस दंश से वो आज तक स्वयं को बचाती रही थी ,वही जीवन के महत्पूर्ण मोड पर उसके सामने था.वंश भी स्तब्ध रह गया.वास्तविकता तो ये थी कि वह इस सच्चाई से परिचित नहीं था.उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जिस माँ को उसने सर्वस्व माना है,वह उसकी माँ नहीं .लड़की के परिजन तो वापस चले गए थे,परन्तु वातावरण बोझिल हो गया था.कामिनी भी इस झटके से स्वयं को असहज अनुभव कर रही थी और वंश ठगा सा रह गया था.
कामिनी ने स्वयं को संयत करते हुए वंश को सम्भालना चाहा तो वंश ने कुछ समय अकेला रहने की इच्छा व्यक्त की.समझदार कामिनी ने उसकी इच्छा का मान रखा और स्वयं अन्यत्र व्यस्त हो गयी.तीन चार दिन वंश अनमयस्क सा रहा ,कामिनी ने उसको यथार्थ से परिचित कराना भी चाहा.अभी वह तैयार नहीं कर पा रहा था स्वयं को.
उधर कामिनी किंकर्तव्यविमूढ़ सी यही निश्चय नहीं कर पा रही थी कि उसका अपराध क्या है,उसने तो अपना जीवन ,अपनी खुशियाँ ,अपने स्वप्न सबकी कीमत पर वंश का जीवन संवारा था और उसको क्या मिला उदासीनता ,बेरुखी .यदि वंश की माँ होती भी तो इससे अधिक और क्या कर सकती थी.यही सब प्रश्न उसके अंतरतम को झिंझोड़ रहे थे.
वंश संभवतः कामिनी के साथ सहज हो भी जाय परन्तु क्या अपना जीवन न्यौछावर करने वाली उसकी माँ का जन्मदात्री न होना उसका दोष है. वास्तव में समाज में कुछ पूर्वाग्रह भी रहते हैं.जन्म-मृत्यु तो विधि के हाथ में है,ऐसी विषम परिस्थिति में जिस नारी ने अपना सर्वस्व ही दांव पर लगा दिया, उसको सौतेली कहना नारी का अग्नि परीक्षा में असफल होना नहीं?

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65 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

omdikshit के द्वारा
March 12, 2012

निशा जी , नमस्कार. मेरा कहने का तात्पर्य यह था की ऐसी कहानी तो प्रायः सुनी और देखी जाती है.मेरा मतलब कुछ और नहीं था.एक ही कहानी पर अनेक फिल्म बनती है.लेकिन केवल अच्छे निदेशन वाली फिल्म ही चलती है.आप ने बहुत अच्छी शैली में प्रस्तुत किया है,यह केवल आप जैसी अच्छी लेखिका ही कर सकती है.यदि आप को मेरे शब्द अच्छे नहीं लगे,तो मैं वापस लेता हूँ.

vikasporwal के द्वारा
March 10, 2012

 नमस्कार निशा जी, अत्यंत मार्मिक रचना आपकी, कामिनी के चरित्र ने बहुत प्रभावित किया I वास्तव में माँ का प्यार देने के लिए जननी होना जरुरी नहीं,बस भावनाए होनी चाहिए,वंश का थोड़ा गुमसुम होना जायज है, पर कामिनी को सौतेली कहना, उस से नाराज होना कामिनी के त्याग और प्रेम को अपमानित करना है I

    nishamittal के द्वारा
    March 10, 2012

    आपकी प्रथम परन्तु सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद विकास जी.वंश ने कामिनी को सौतेली नहीं कहा परन्तु शायद अचानक ही हुए इस रहस्योद्घाटन पर वह स्तब्ध रह गया.

Amar Singh के द्वारा
March 4, 2012

बहुत सुन्दर कहानी, माँ तो माँ होती है. चाहे उसने जन्म दिया हो या न दिया हो, प्रेम का रिश्ता खून से भी अधिक मजबूत होता है. पर जो प्रेम को न समझ सका उसने जीवन का बहुत कीमती रतन यु ही पत्थर समझ कर गवा दिया. http://singh.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2012

    प्रेम का मोल पहिचानना सबका भाग्य नहीं धन्यवाद अमर सिंह जी बहुत समय बाद आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.

    ashok kumar dubey के द्वारा
    March 5, 2012

    सगा और सौतेला शब्द तो समाज के बनाये हुए शब्द हैं जो की समाज द्वारा थोपे गए रिश्ते हैं माता कभी कुमाता नहीं होती हाँ पूत कपूत हो सकता है ऐसा वेदों और उपनिषदों में लिखा है प्रेम का मतलब ईश्वर से है अतः प्रेम की कोई अलग परिभाषा नहीं हो सकती और आज के सामजिक परिवेश में प्रेम शब्द लुप्तप्राय है , एक अच्छी कहानी आपने लिखी है .

    nishamittal के द्वारा
    March 5, 2012

    अशोक जी सही कहा आपने ,परन्तु यहाँ तो दोष समाज की दृष्टि का है,धन्यवाद

shashibhushan1959 के द्वारा
March 4, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर ! ये तो कामिनी का दुर्भाग्य और वंश की मूर्खता कही जायेगी ! मार्मिक प्रसंग !

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2012

    आपने सही कहा शशिभूषण जी.धन्यवाद

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 4, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर प्रणाम काफी दिनों बाद आपकी राजनीती से हट कर एक बहोत ही दिल को छु लेने वाला लेख आया है वास्तविकता है की कोई माँ किसी को कितना भी प्यार कर ले जननी के प्रति जो मानव का लगाव होता है वो इस प्रेम को थोड़ा फीका कर देता है …………………….दुःख तो होता है उस माँ को जिसने लगन से बिना किसी स्वार्थ के ऐसा किया हो किन्तु …………जब “यसोधा” मैया इसकी अपवाद नहीं बन पायी तो फिर “कामिनी” तो फिर भी एक सधाहरण नारी है ……………..प्रेम ही सब कुछ है …..बाकि सब रिश्ते नाते बाद में बचपन में एक कहानी पढ़ी थी ………….”जहां प्रेम मिले” बस वो ही सत्य है …….. आपकी निशब्द मार्मिक रचना पर आपको नमन …………..और देर से प्रतिक्रया के लिए माफ़ी

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2012

    आनंद जी ,हाँ मैं भी एक ही विषय पर लिखते लिखते थोडा एकरसता का अनुभव कर रही थी .अचानक ही किसी परिचित से इस घटना के विषय में पता चला और आप लोगों से शेयर किया .धन्यवाद प्रतिक्रिया हेतु

nishamittal के द्वारा
March 3, 2012

आपका आभार सुन्दर उदाहरणों सहित प्रतिक्रिया हेतु.

dineshaastik के द्वारा
March 3, 2012

भावपूर्ण, हृदय को उद्देलित एवं आँखें नम कर देने वाली रचना निःसंदेह ही सराहनीय है।

    nishamittal के द्वारा
    March 3, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी.

sinsera के द्वारा
March 3, 2012

आदरणीय निशा जी प्रणाम. माँ तो बस माँ ही होती है, देवकी या यशोदा या फिर पन्ना धाय. और फिर सब से ऊपर मदर टेरेसा .कौन कहे गा की ये माएं न थीं.. दोष समाज का है जो भावना को महत्व देना ही नही जानता.वैसे कैकेयी जैसी कुछ माओं ने विमाता का नाम बदनाम कर रखा है लेकिन कुछ का दृष्टान्त ले कर सब को बांच देना सभ्यता की पहचान नहीं…. आप ने समाज को एक अच्छा संदेश दिया है, साधुवाद…

minujha के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीय निशाजी , प्रणाम बहुत अच्छी कहानी..,ऐसी बातें समाज के काले पक्ष को उजागर करती है,जहां लोग ये भूल जाते है कि जन्म देने वाले से बङा पालने वाला होता है

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    आपके कमेन्ट पर मुझको उस गीत की पंक्तियाँ याद आ रही हैं,एक ने तुझको जीवन दिया और एक ने जीवन संभाला …………धन्यवाद मीनू जी.

Rachna Varma के द्वारा
March 2, 2012

निशा जी कहानी अत्यंत अच्छी और भाव पूर्ण है |

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद रचना जी.

Jayprakash Mishra के द्वारा
March 2, 2012

अच्छी बात

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद जयप्रकाश जी.

Santosh Kumar के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीय निशाजी ,.सादर प्रणाम क्या लिखूं ?…कुछ नहीं !..अग्नि परीक्षा का परिणाम सिर्फ वंश के पास है …समाज भावनाओं और त्याग को समझने में गलती करता ही है ..

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद बहुमूल्य प्रतिक्रिया हेतु.

malkeet singh "jeet" के द्वारा
March 2, 2012

आदरनीय ,आपकी कहानी को कल से कई बार पढ़ चूका हूँ ,पर एक समर्पित माँ के लिए क्या लिखू सोच नहीं पा रहा ,माँ तो सिर्फ माँ ही है इसके आलावा इश्वर की अमूल्य दें माँ को कोई और नाम देना संभव ही नहीं है

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    बिलकुल सही कहा आपने जीत जी धन्यवाद

Amita Srivastava के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीया निशा दी नमस्कार कहानी पढ़ते -२ एक जगह आकर दिल पर चोट लगती है “जब लडकी की मां पूछती है कि आप तो वंश की सौतेली मां है | हमे अपनी सोच अपने पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर किसी रिश्ते को परिभाषित करना चाहिए | ह्र्दयस्पर्शी कहानी मंच पर रखने के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद अमिता सार्थक प्रतिक्रिया हेतु.

vikramjitsingh के द्वारा
March 2, 2012

निशा जी, वन्दन, क्या कहूं, सदा की तरह एक उत्कृष्ट रचना, लगता है, केवल पात्र ही बदले हैं, बाकि तो सब कुछ अपना ही है, लेकिन आपने इसका अंत नहीं किया, या, इसका अंत कभी हो ही नहीं सकता, रहा सवाल नारी का, तो यही कहूँगा, नारी ह्रदय इतना विशाल है, कि इसका आदि-अंत आज तक कोई नहीं पा सका, धन्यवाद, निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    अंत क्यों नहीं किया इसका उत्तर आपने स्वयं ही दे दिया है,विक्रम जी.

alkargupta1 के द्वारा
March 2, 2012

निशा जी , समाज में व्याप्त अति संकीर्ण विचारधारा का मर्म स्पर्शी कहानी के रूप में यथार्थ चित्रण किया है ……मातृ वात्सल्य व त्याग की अति उत्तम अभिव्यक्ति के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद अलका जी.

akraktale के द्वारा
March 2, 2012

निशा जी सादर नमस्कार, सुन्दर कहानी, समाज के घिनौने चहरे को बेनकाब करती है. क्योंकि ऐसा होते अक्सर देखा जाता है. फिरभी बेटे को दुखी होने के बजाय अपनी माँ पर गर्व होना चाहिए. ये उसकी शिक्षा पर निर्भर करता है.

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    आपने सही कहा परन्तु मेरे विचार से कुछ सत्य अचानक जब सामने आते हैं , तो प्रभावित पात्र भी कुछ निर्णय नहीं ले पाता.धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
March 2, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर अभिवादन! दिल को झकझोड़ कर रख देनेवाली अत्यंत ही मार्मिक एवं कारुणिक कहानी हम सबके सामने रक्खा है. इस दर्द और करुणा को सहन करना हर किसी के वश की बात नहीं होती.पर माँ तो सिर्फ माँ होती है चाहे वह यशोदा माँ हो या देवकी माँ!……

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    सही कहा सिंह साहब आपने परन्तु समाज में नकारात्मक मानसिकता सम्पन्न लोगों की कमी नहीं.धन्यवाद

Meenakshi srivastava के द्वारा
March 2, 2012

Nisha ji saprem abhiwadan , Hamaare samajik vichardharaon se awgat karati aapki ye kahani bahut achhi lagi . Aise rishto ke liye kisi naye ” sambodhan ” ki awashyakta hai . Awashya hamare sochne ki disha men naye parivartan ki aawashyakta hai ; jo hame achhe parinaam de sakne men madadgaar sabit sakte hain . Bahut- 2 mubarq. Meenakshi Srivastava

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    मीनाक्षी जी ,बहुत सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ.

March 2, 2012

निशा जी नमस्कार ! बहुत ही मार्मिक कहानी और आज के समाज का यथार्थ चित्रण …..अच्छा लगा पढ़के आपकी सुंदर अभिव्यक्ति !!! बहुत बहुत बधाई हो आपको !!!

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    बाली जी.धन्यवाद आपका.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 1, 2012

“हमने सुना है आप वंश की सौतेली माँ हैं,इसलिए थोडा संकोच है,लड़की देने में.” कामिनी का चेहरा फक्क पड़ गया.काटो तो खून नहीं जैसी स्थिति हो गई उसकी.जिस दंश से वो आज तक स्वयं को बचाती रही थी ,वही जीवन के महत्पूर्ण मोड पर उसके सामने था.वंश भी स्तब्ध रह गया.. बहुत कुछ हो जाता है न चाहते हुए भी निशा जी कौन उन्हें समझाए जो मानवता को ताक पर रख देते हैं ..अपनी ही कहते हैं अहंकार भरे राह चलते हैं ….दर्द भरी कहानी और सोचने पर मजबूर करती हुयी …. इस स्थिति में लोग क्या अच्छा करें ? राधे राधे भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    राधे राधे शुक्ल जी.यथार्थ प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

chaatak के द्वारा
March 1, 2012

निशा जी, मानवीय संबंधो की गुत्थियों को समझने का न तो कोई फार्मूला कभी था और न ही कभी बन पायेगा| सगा और सौतेला तो सिर्फ शब्दों का खेल है कभी इसका कोई मतलब नहीं होता तो कभी इसमें दुनिया भर के सारे भाव भरे होते हैं| अच्छे लेखन पर बधाई!

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    चातक जी कुछ रिश्ते कुछ ऐसी ही पहेली होते हैं जिनको समझना और समझाना कठिन है.

March 1, 2012

सादर प्रणाम! उसको सौतेली कहना नारी का अग्नि परीक्षा में असफल होना नहीं? …कुछ सवालों के जवाब नहीं होते जिनमे से यह एक है…….माँ की ममता की सुन्दर प्रस्तुतीकरण ……हार्दिक आभार.

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद अलीन जी.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 1, 2012

आदरणीया महोदया , सदर अभिवादन शब्द नहीं हैं , वंश की माँ न होना ही अच्छा था . क्यों कि जिस माँ ने त्याग किया उसका ही मान नहीं रख सका, हो सकता है कि वो अपनी मान को भी मान न दे पाता . बधाई प्रस्तुति हेतु.

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    ये तो मै नहीं कह सकती कि अपनी जन्मदात्री के साथ उसका क्या व्यवहार होता परन्तु उस माँ के लिए किसी आघात से कम नहीं जिसने अपने जीवन को ,अपनी खुशियों को दांव पर लगा दिया.

sadhana thakur के द्वारा
March 1, 2012

आदरणीय निशा जी ,दिल को छु लेने वाली कहानी .सच लिख है आपने कभी -कभी इंसान अपना पूरा जीवन होम कर देता है ,और अंत में खुद को ठगा सा महसूस करता है .बहुत अच्छी कहानी ……..

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद साधना जी.सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 1, 2012

बहुत मार्मिक कहानी,आदरणीय निशा जी.माँ तो माँ होती हैं,उन्हें सौतेली या अपनी कहकर उनकी ममता का उपहास करना ही है.आपने सही कहा कि वास्तव में समाज में कुछ पूर्वाग्रह भी रहते हैं.जन्म-मृत्यु तो विधि के हाथ में है,ऐसी विषम परिस्थिति में जिस नारी ने अपना सर्वस्व ही दांव पर लगा दिया, उसको सौतेली कहना नारी का अग्नि परीक्षा में असफल होना नहीं?

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    समाज में रिश्तों को जोड़ने वाले कम और तोड़ने वाले अधिक हैं जो रिश्तों में दरार पैदा करते हैं.धन्यवाद झा जी.

mparveen के द्वारा
March 1, 2012

निशा जी नमस्कार, कहानी बहुत ही कारुणिक है.. एक औरत के त्याग को दिखाती रचना . माँ ने तो सोतेलापन नहीं दिखाया पर इस समाज का क्या करें जो बिना सच्चाई जाने ही अपने फैसले सुना देता है . कामिनी ने अपनी साडी जिंदगी लुटा दी सिर्फ उस एक ताने से बचने के लिए पर आखिर वो ताना मिल ही गया …. बहुत सुंदर !!!

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    प्रवीन जी आपने सही कहा है,समाज में जोड़ने वाले कम तोड़ने वाले अधिक हैं.धन्यवाद

Tamanna के द्वारा
March 1, 2012

निशा जी,,, बहुत सुंदर कहानी… जीवन में मां का स्थान कभी और कोई नहीं ले सकता.. जन्म देने वाली मां ने हमें जीवन दिया है जिसका ऋण हम कभी नहीं उतार सकतें. लेकिन जिसने हमारी परवरिश की है उसके लिए मान-सम्मान कम नहीं होना चाहिए. वंश को एक अच्छी मां मिली..लेकिन वंश जैसी किसमत भी कम लोगों की ही होती हैं.

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    सही तमन्ना जी,वंश जैसा भाग्य सबका नहीं होता,परन्तु पालने वाली माँ यशोदा का कृष्ण जी के जीवन में महत्व हम सब जानते हैं,धन्यवाद

Sumit के द्वारा
March 1, 2012

बहुत सुंदर

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    धन्यवाद सुमित जी.

omdikshit के द्वारा
March 1, 2012

निशा जी ,नमस्कार. जन्म देने वाली माँ महान होती है,लेकिन पालने वाली का स्थान उससे ऊपर होता है.कहानी नई नहीं है,लेकिन सुंदर शब्दों में पिरो कर आपने ,इसे मार्मिक बना दिया है.बधाई .

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    ॐ जी न तो मैं कोई कहानी कार हूँ न ही मैंने कोई मौलिकता का दावा किया है,कहानी मेरी एक परिचित से सम्बन्धित है,उसको ही शब्दों में पिरोया है,वैसे भी कहानी के ताने-बाने दैनिक जीवन में घटित होने वाली घटनाओं पर आधारित होते हैं.धन्यवाद

yogi sarswat के द्वारा
March 1, 2012

निशा जी , सादर नमस्कार ! आप ज्यादातर ऐसी रचनायें लाती हैं , जो लगती हैं की अरे ये तो हमारे उनके साथ हुआ था , ऐसा घटना तो फलां के साथ हुई थी ! कहने का अर्थ ये की आप अपने आस पास की घटनाओं / जिन्हें सामाजिक जागरूकता कह सकते हैं , के मोतियों को पिरोकर एक सुन्दर माला बना देती हैं ! बहुत बहुत शुक्रिया !

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु आभार.लेकिन सभी कथाएं जीवन में घटित होने वाली घटनाओं पर आधारित होती हैं धन्यवाद ,ऐसी ही एक घटना को मैंने प्रस्तुत किया है.

satish3840 के द्वारा
March 1, 2012

बहुत ही भावुक व् मार्मिक लिखा है मैडम निशा जी आपने वास्तव में ! पर आज समाज सोतेली माँ को ऐसे ही ठेस पहुचाता है / लेकिन जन्म देने से पालने वाले का अधिकार सहीं ज्यादा है/ देवकी ने कृषण को जन्म अवश्य दिया परन्तु यशोदा को भला कोन भुला सकता है , जिसने कृषण की एक एक मुस्कान पर अपना सब कुछ निछावर कर दिया / आपकी इस कहानी में इस माँ का त्याग वो हाँ जो शायद एक सगी माँ भी न कर पाए / अच्छी पोस्ट के लिए धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    बहुत सुन्दर उदाहरण के साथ प्रतिक्रिया देने के लिए आभारी हूँ.

tosi के द्वारा
March 1, 2012

निशा जी बेहद भावुक और यथार्थ के करीब … बधाई लीजिये

    nishamittal के द्वारा
    March 2, 2012

    आपने बधाई दी और हमने लपकी धन्यवाद


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