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तुम्ही हो माता ,पिता तुम्ही हो

Posted On: 17 Jun, 2012 Others में

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अपने पिता को शत शत नमन करते हुए,उन माँ का भी श्रद्धा स्मरण जिन्होंने हमारे जीवन में पिता की भी भूमिका निभाई,पिता की मृत्यु बहुत पूर्व  हो गई थी ,माँ की आयु भी कम थी और मुझको   तो पिता की शक्ल भी याद नहीं ,दुनिया में तो अब माँ भी नहीं है,परन्तु कितनी दक्षता से उन्होंने स्वयं को और अपने परिवार को संभाला,अतः मेरे लिए तो वही माता और वही पिता

साथ तुम्हारा छूट गया था ,परिवार अधर में था,

मुझको तो जीवन -मृत्यु का,कुछ ज्ञान नहीं था.
तुम  रोती थी,हमको अपने आंचल में छुपाती थी.
रुदन का कारण क्या है,नहीं हमको ये बताती थी.
कमाना  तुमको  ही था ,और घर भी संभालना था.
हम पर आयी हर मुसीबत की ढाल बन जाना था.
समाज के भेड़ियों से तुमको स्वयं को भी बचाना था.
हमारे  भविष्य को भी तुमको गढना औ  संवारना था.
कैसे संभाल लिया  माँ सब   तुमने पिता भी बनकर.
(कविता मुझको नहीं आती,अतः उस दृष्टि से कृपया  न देखें ,बस  अपने श्रद्धा सुमन अर्पण करने का प्रयास किया है.हाँ यदि इन पंक्तियों में यदि कुछ सुधार हो सकता तो कृतज्ञ रहूंगी. )

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61 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
July 6, 2012

बच्चे सदैव बच्चे ही रहते हैं और वे चाहे जितने बड़े हो जाएं परंतु असली प्रेम माता-पिता ही दर्शा सकते हैं। यौवन में भी जब घर के अन्य परिजन कुछ ख्वाहिशें रखते हैं तब भी रातों को वे जागकर अपने पुत्र-पुत्रियों की चिंता में व्यस्त रहते हैं। निश्चित तौर पर उनके ऋण को कभी नहीं उतारा जा सकता।

ajaykr के द्वारा
July 1, 2012

माँ हर ईश्वर से बड़ी हैं ईश्वर का कद माँ के आगे बौना लगता हैं ,या हर ईश्वर माँ में हैं ,सुंदर अभिव्यक्ति

Rahul Nigam के द्वारा
June 25, 2012

हमारे ह्रदय के भावो को उदगारो को समीक्षकों, आलोचकों एवं ज्ञानियों ने तरह तरह के नामों में कैद कर रखा है तथा उनको नियमो में बाँध रखा है पर वास्तव में मन की उड़ान को कभी किसी नाम के साथ या सीमा में बांधा नहीं जा सकता. हर रचना का अपना अलग नाम होता है, अपना नियम होता है और अपनी सीमाए होती है. आपने पिता तुल्य माँ को जिस भाव से श्रद्धा सुमन अर्पित किये है वे इतने पूर्ण है की इनमे न तो सुधार की गुंजाईश है और न ही इससे बेहतर कुछ हो सकता है. जो भी इसमें सुधार करने की कोशिश करेगा वह इसमें अपनी सीमा के साथ अपने नाम, काम, नियम के साथ रंग भरेगा. इसलिए आप के भावो को कोई और कैद कर सके ये मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है………. ब्लॉगिंग की बहुत आदत न होने से इसे देर से देखने की माफ़ी चाहता हूँ. माँ का दर्जा तो भगवान से भी ऊपर है और जब माँ पिता का भी स्थान लेले तो ये स्वरुप कितना अदभुत और अलौकिक होगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. और आपने तो साक्षात् दर्शन किये है. ऐसी माँ को तो मन मंदिर के साथ साथ घर के मंदिर में भी प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए. ऐसी माँ से कभी कुछ मांगना नहीं पड़ता ही इनका आशीर्वाद स्वतः जीवन पर्यंत रहता है.

    nishamittal के द्वारा
    June 26, 2012

    राहुल जी कई दिन बाद आज नेट ओं किया तो आपकी प्रतिक्रिया देखी.भावपूर्ण प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ.अभी नियमित होने में एक सप्ताह लगेगा मुझको मंच पर .

seemakanwal के द्वारा
June 24, 2012

प्रिय निशा सच में मां की महिमा का तो बखान ही नहीं किया जा सकता है ,तभी तो कहा गया है मां के पैरों तले जन्नत है ,देर से आने के लिए माफ़ी चाहती हूँ ..

    nishamittal के द्वारा
    June 26, 2012

    धन्यवाद सीमा जी ,आपकी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए.

lata kamal के द्वारा
June 24, 2012

नमस्कार निशा जी ,बहुत ही सुंदर भाव .सच है माँ होती ही ऐसी है .और माता या पिता को कोई भी भाव समर्पण करने के लिए किसी विशेष भाषा की आवश्यकता नहीं होती है बस निर्मल भाव होने चाहिए .मैं अपने देश वापस आ गयी हूँ .वहां भी आप सबको पढ़ती रही बस लिखना नहीं हो पाया .जब कम्पूटर को छोड़ कर हमने लैपटॉप से दोस्ती की तब तक बच्चों के लिए वो पुराना हो गया .अब उनकी पूरी दुनिया फ़ोन मैं सीमित है और मैं चाह कर भी फ़ोन से नहीं लिख पाई .

    nishamittal के द्वारा
    June 26, 2012

    लता जी ,आज बहुत दिन बाद आपसे सम्पर्क हुआ मैं आजकल पुणे में हूँ.२ जुलाई को लौटूंगी.कई बार आपको सन्देश DIYA परन्तु अब उत्तर न मिलने का कारण समझ में आया.धन्यवाद

santosh kumar के द्वारा
June 24, 2012

Phol tume bheja hai kat me phol nhi mera dil hai Pretm mera tu bhi likna kya ye tre kabil hai hai payar chipa hai kat me jitna jitna sagar me moti … chum hi leta hat tumhra jo tum mere pas hoti …………………………………..

santosh kumar के द्वारा
June 24, 2012

Duniya me kitna gam hai par mera gam kitna kam hai koi kosi ko rota hai dukh sukh ka ye sangam hai mera gam kitna kam hai duniya me kitna gam hai mera gam kitna kam hai koi ek hajaro mai syad hi khush hota hai ……………………………………

    nishamittal के द्वारा
    June 26, 2012

    संतोष जी आपकी प्रतिक्रिया अभी देखी संदर्भ समझ नहीं सकी,

yamunapathak के द्वारा
June 23, 2012

nishajee नमस्कार,आप कहाँ हो आजकल आपके कोई नए ब्लॉग नहीं दिख रहे हैं .prateekshaa kar rahee hun.

    nishamittal के द्वारा
    June 26, 2012

    यमुना जी ,आजकल पुणे में बेटे के पास हूँ थोडा घूमने फिरने के कारण समय नहीं मिल पा रहा है/अगले सप्ताह मिलते हैं.धन्यवाद

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 23, 2012

आदरणीया निशा जी बहुत खूबसूरत जज्बात चाहे पिता माता की भूमिका निभा दे या माँ पिता की …हालत जो भी हों वे हमारे मन में गहरी पैठ बना लेते हैं महान हैं वे हर साँसों में उनका नाम होना चाहिए और अंत तक पूजा … पिता के प्यार से वंचित हो भी माँ ने आप को सब कुछ दिया और आज आप रौशनी दे रही हैं समाज को उन माँ और पिता श्री को मेरा नमन …शुभ कामनाएं भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    June 26, 2012

    सुरेन्द्र जी नमस्कार आपकी भावपूर्ण प्रतिक्रिया हेतु आभार.आजकल शहर से बाहर हूँ अतः मंच पर आना नहीं हो पा रहा है

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर प्रणाम  सुंदर भावों से युक्त रचना प्रस्तुति…. हार्दिक आभार….. क्षमा चाहूँगा…इधर कुछ दिनों से मेरी उपस्थिति नगण्य ही है… जिससे अपनी प्रतिक्रियाएं नहीं दे सका.

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद अजय जी

shiromanisampoorna के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर श्री राधे ” मात-पिता,गुरु ,प्रभु चरणों में प्रणवत बारम्बार , हम पर किया बड़ा उपकार ” के भाव के साथ आपके भाव को वंदन करती हूँ एक कर्मठ माँ के संस्कार के हम सब को दर्शन हो रही है कोटि-कोटि वंदन

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    शिरोमणि जी धन्यवाद

June 19, 2012

सादर प्रणाम! साथ तुम्हारा छूट गया था ,परिवार अधर में था, मुझको तो जीवन -मृत्यु का,कुछ ज्ञान नहीं था. तुम रोती थी,हमको अपने आंचल में छुपाती थी. रुदन का कारण क्या है,नहीं हमको ये बताती थी. कमाना तुमको ही था ,और घर भी संभालना था. हम पर आयी हर मुसीबत की ढाल बन जाना था. समाज के भेड़ियों से तुमको स्वयं को भी बचाना था. हमारे भविष्य को भी तुमको गढना औ संवारना था. कैसे संभाल लिया माँ सब तुमने पिता भी बनकर.

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रोत्साहन हेतु धन्यवाद अनिल जी

jyotsna singh के द्वारा
June 19, 2012

आदरणीय निशा जी, आपके पिता की असमय मृत्यु के बारे में जान कर दुःख हुआ.पर सच मान में इतनी शक्ति है कि पिता के न रहने कि दशा में वह माँ और पिता दोनों का पात्र बखूबी निभा ले जाती है.ऐसी माओं को शत शत नमन. jyotsna

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद ज्योत्स्ना जी.

rekhafbd के द्वारा
June 18, 2012

आदरनीय निशा जी ,अपनी माँ के प्रति आपके भावों को मेरा नमन ,आपकी यह कविता पढ़ कर मुझे अपनी दादी की याद आ गई ,उन्होंने भी कुछ ऐसी ही जिंदगी जी थी ,आपकी माँ के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करती हूँ ,आभार

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रोत्साहन हेतु आभार रेखा जी

Punita Jain के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय निशा जी अपनी माँ में ही आपने अपने पिता को देखा है , इसलिए आज माँ को याद कर निकली आपकी कलम से सुन्दर भावपूर्ण कविता है | —–आपकी माता जी को भी नमन ,जिन्होंने अपने दुःख को छुपाकर पिता के कर्तव्य को भी निभाया है |

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद आपका पुनीता जी

yamunapathak के द्वारा
June 18, 2012

nishajee आपकी इस कविता के भाव दिल के बहुत करीब हैं यही बात इसे सर्वाधिक सुन्दर बनाती है

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद यमुना जी

mparveen के द्वारा
June 18, 2012

निशा जी नमस्कार, सुंदर भावों से युक्त रचना……. आपकी भावनाओं और माता जी को शत शत नमन निशा जी …

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद प्रवीन जी.

alkargupta1 के द्वारा
June 18, 2012

निशाजी , माता-पिता को बहुत ही भावपूर्ण श्रद्धा सुमन अर्पित किये हैं….. दोनों को मेरा श्रद्धावनत नमन….

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रोत्साहन के लियेआभार अलका जी

yogi sarswat के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय निशा जी मित्तल , सादर नमस्कार ! कविता कहने से नहीं , आपके भावों से ये लेख आपकी यादों को समेटे हुए लगता है ! नमन आपके भावों को. नमन माता और पिता जी को

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद योगी जी

satya sheel agrawal के द्वारा
June 18, 2012

निशा जी,आप अपनी भावाभिव्यक्ति में पूरी तरह से सफल रही हैं कविता की तकनिकी जानकारी आवश्यक नहीं है.

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रोत्साहित करने के लिए धन्यवाद सत्यशील जी.

मनु (tosi) के द्वारा
June 18, 2012

भावों मे कुछ कमी नहीं है , शब्दो की त्रुटि कोई मायने नहीं रखती ma’am … आपकी माता जी को नमन मेरा …. सादर !!!

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद पूनम जी

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीया निशा जी , सादर माता पिता भगवान् हैं , भाव देखते हैं शिल्प नहीं . नमन आपके भावों को. नमन माता और पिता जी को

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    प्रोत्साहित करने के लिए आभार कुशवाह जी.

vikramjitsingh के द्वारा
June 18, 2012

सत्य वचन…. सादर…..मातेश्वरी

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद विक्रम जी

jlsingh के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय निशा मैडम, नमस्कार! माता पिता के याद का क्षण भावुक कर देता है हर मन को … माता पिता को आपने भावपूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित किया है ,..श्रद्धेय आत्माओं को कोटिशः प्रणाम …सादर

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    सिंह साहब धन्यवाद

चन्दन राय के द्वारा
June 17, 2012

निशा जी , मन की सच्ची भावना ,स्नेह ,दर्द ,तड़प , यही तो कविता के प्राण होती है , आपकी रचनाशिल्प हर दृष्टि में श्रेष्ठ है , पर में आपसे इक आग्रह करूंगा ,यदि आप हे पिता ! शब्द से कविता की शुरुआत करे *** हे पिता !साथ तुम्हारा छूट गया था , परिवार अधर में था, मुझको तो जीवन -मृत्यु का, कुछ ज्ञान नहीं था. *** बहुत उम्दा रचना आपकी

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    चन्दन राय जी आपके द्वारा प्रदत्त प्रोत्साहन और सुझाव के लिए आभारी हूँ.बहुत सुन्दर सुझाव है आपका.

akraktale के द्वारा
June 17, 2012

निशा जी सादर नमस्कार, अवश्य ही बहुत कठिन समय आपकी माताजी ने देखा होगा. आपकी कविता की पंक्तियाँ कह रही हैं की आप अपनी रचना में माताजी के लिए अपने मन के सारे श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाह रही हैं, सारी भावनाएं हम पढ़कर महसूस कर रहे हैं, इसलिए यही कहूंगा रचना में कोई त्रुटी नहीं है और इसी बहाने आपकी कोई कविता हमें पढने भी मिली. आपकी माताजी के लिए कुछ सुमन मैंने भी अर्पित करने की कोशीश की है शायद आपको पसंद आये. टूटा जब आकाश तेरा माँ परिवार सफ़र में था, टूटीकिश्ती पतवार भी छूटी परिवार भंवर में था, नैनो से बह निकला तम का तरल,बहुत बेसबर था, सारे अनजानों के साए थे गरल, और मै बेखबर था, जीवन की गहराइयों का ना था भान भी मुझको, कैसे जानू तेरी सिसकियों की तलहटी में क्या था, मझधारों से लड़कर तुने माँ हमें पार लगाया था, तुफानो में भी किश्ती बहाना माँ हमें सिखाया था, आज मेरे उन्नत ललाट का माँ तेज यह कहता है, धरती हो कर भी माँ आकाश बन हमें दिखाया था,

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    आदरनीय अशोक जी आप[की सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु,प्रोत्साहन हेतु आभारी हूँ,आपने भावों को सुन्दर शब्द दिए बहुत बहुत धन्यवाद ,काश मुझमें भी इतनी प्रतिभा होती .चलिए मंच पर रहते रहते शायद कुछ सुधार हो जाय.

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 17, 2012

यदि आज मीरा बाई और लता दीदी के बीच भजन गायन की प्रतियोगिता करवाई जाए तो लता दीदी जीत जायेगी लेकिन हम सभी जानते है की मीरा बाई ने गिरधर कों अपने उन्ही टूटे फूटे भावो से प्राप्त कर लिया था आपकी भावनाए अच्छी लगी , नमन http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    सु नदर प्रतिक्रिया हेतु आभार राजकमल जी.

minujha के द्वारा
June 17, 2012

आपकी  भावनाओं और आदरणीय माता जी दोनों को नमन.

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद मीनू जी

Santosh Kumar के द्वारा
June 17, 2012

आदरणीया ,.सादर प्रणाम माता पिता को आपने भावपूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित किया है ,..श्रद्धेय आत्माओं को कोटिशः प्रणाम …सादर

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    आपका धन्यवाद संतोष जी

meenakshi के द्वारा
June 17, 2012

निशा दी सस्नेह अभिवादन . दिनेश जी की बात से में सहमत हूँ आपने बड़ी भाव- पूर्ण ढंग से अपनी माँ के बारे में वर्णन किया.मेरी और से भी उस महान आत्मा को कोटि -कोटि प्रणाम. मीनाक्षी श्रीवास्तव

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद मीनाक्षी जी.

Rajesh Dubey के द्वारा
June 17, 2012

जिसने भी माता-पिता की कमी को अहसास नहीं होने दिया वह नमन योग्य है. भावपूर्ण रचना.

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    धन्यवाद राजेश जी.

dineshaastik के द्वारा
June 17, 2012

आदरणीय  निशा जी प्रथम  तो भावपूर्ण  प्रस्तुति के लिये बधाई। द्वितीय  कविता के संबंध  में कहना चाहूँगा कि मेरा मानना है कि कविता में भाव प्रधान होते हैं शब्द नहीं। मेरा मानना है कि कविता को छंद मुक्त होना चाहिये। भावहीन  कविता का रस, औचित्य, छंद, अलंकार, आदि का श्रृंगार वैसा ही है जैसे कुरूप नायिका का सौलह श्रृंगार। कविता के संबंध  में दो पंक्ति- आभूषणों से इसके, तन को नहीं  सजाओ, ये सादगी तो इसकी, संसार मोह लोगी।

    nishamittal के द्वारा
    June 20, 2012

    दिनेश जी अपूर्णता होने के बाद भी आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए आभारी हाँ प्रोत्साहित करने से कुछ सकारात्मक होता ही है कभी न कभी होगा.पुनः धन्यवाद


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