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chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

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शिक्षक की गरिमा में ह्रास क्यों?(जागरण जंक्शन फोरम)

पोस्टेड ओन: 2 Sep, 2012 जनरल डब्बा में

शिक्षक दिवस के सुअवसर   पर  भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधा कृष्णन जी (जिनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के  रूप में मनाया जाता है ) तथा   उन सभी शिक्षकों को मेरा  सादर नमन जो राष्ट्र हित में संलग्न रहकर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं. सामान्य रूप से भी शिक्षक और गुरु में गहन अंतर है .गुरु कोई भी हो सकता है,आध्यात्मिक गुरु ,किसी कला विशेष का ,किसी तकनीक का आदि आदि ,ये भी आवश्यक नहीं कि वो किताबी ज्ञान से सम्पन्न हो,जो अंतरतम को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित कर दे बस वही गुरु है,या जिस संदर्भ में शिष्यत्व ग्रहण किया है,उसकी भली भांति शिक्षा दे .और आधुनिक अर्थों में शिक्षक वह है जो  विद्यार्थी को पढ़ा दे तथा अच्छे अंकों में सफलता दिलवा दे.(क्षमा करें .आज शिक्षक के इसी स्वरूप को देखा जा रहा है)

शिक्षक दिवस के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करने से एक चर्चित किस्सा  प्रस्तुत कर रही हूँ.अंगरेजी दासता के युग की बात है,एक सुशिक्षित सज्जन को प्रशासनिक सेवा में  प्रमुख नियुक्ति मिली .कुछ समय के लिए वो अपने गाँव लौटे .उस समय वर्षा ऋतु के  कारण नदी में पानी बहुत अधिक चढ़ गया ,तैरना उन को आता नहीं था,नाव उस समय वहां उपलब्ध नहीं थी.गाँव से बाहर ही उनको कुछ और युवा ग्रामवासी मिल गये ,उन्होंने उनको बताया कि मैं डिप्टी(अर्थात प्रमुख अधिकारी) बन गया हूँ.वो लोग बहुत प्रसन्न हुए कि चलो अपने गाँव का कुछ फायदा होगा.उन्होंने उन डिप्टी सज्जन से कहा आप चिंता नहीं करें ,चलिए हम आपको नदी पार कराते हैं और उनको लेकर नदी के बीच में पहुंचें .अचानक उन लोगों में से किसी ऩे उनसे  पूछा  कि वो किस विभाग में डिप्टी बने हैं,उन सज्जन ऩे बताया शिक्षा विभाग में.ग्रामीण साथी बहुत निराश हुए और उन्होंने उनको नदी में ही गिरा दिया कि ये हमारे किस काम का.
ये एक किस्सा है उस युग का.परन्तु पूर्णतया हंसी में उड़ाने के योग्य नहीं.हमारे देश में शिक्षा का स्वरूप ऐसा ही रहा हो ऐसा नहीं है वर्तमान में .सबसे उपेक्षित है शिक्षा.शिक्षा जिससे किसी राष्ट्र का निर्माण होता है,विकास होता है,हमारा देश जो कभी विश्व गुरु था.सभी विद्याओं में अग्रणी , विश्व के अन्य देशों से विद्यार्थी हमारे विख्यात गुरुकुलों  तक्षशिला ,नालंदा,विक्रमशिला आदि में विद्यार्जन करने आते थे.(विभिन्न विद्याओं में अग्रणी होने की बात तो विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं)298860_279127102192214_1535685985_n_यही कारण है,कि हमारा देश सोने की चिड़िया था,इसका प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए क्योंकि इतिहास ही सबसे बड़ा साक्षी है ,जिसके अनुसार पहले मुस्लिमों ने,पुर्तगालियों,फ्रांसीसियों अन्य विदेशी आक्रांताओं ने किसी न किसी बहाने लूटा और अंत में अंग्रेजों ने तो यहीं अपना आधिपत्य  जमा लिया जिसके बाद उनको बाहर करने में हमारे देशभक्तों को अपने प्राणों से ही हाथ धोना पड़ा .शिक्षा के  इस दयनीय दशा में पहुँचने के कारकों पर यदि विचार किया जाय तो ....... हमारी शिक्षा व्यवस्था को प्रथम  हानि तो मुस्लिम आक्रमणकारियों  ने ही पहुंचाई जब उन्होंने हमारे गुरुकुलों को लूटा ,पुस्तकालयों को अग्नि के समर्पित कर दिया परन्तु अंग्रेज वो तो और भी धूर्त थे , ने तो हमारी उत्कृष्ट शिक्षा की जड़ों पर ही प्रहार किया जिसका प्रमाण है लार्ड मैकाले का ये कथन जो उन्होंने फरवरी 1835 में  ब्रिटिश संसद के सामने कहा था , कि, मैंने भारत के कोने-कोने की यात्रा की है और मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो या चोर हो। मैंने इस देश में ऐसी संपन्नता देखी, ऐसे ऊंचे नैतिक मूल्य देखे कि मुझे नहीं लगता कि जब तक हम इस  देश की रीढ़ की हड्डी न तोड़ दें, तब तक इस देश को जीत पायेंगे और ये रीढ़ की हड्डी है, इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, इसके लिए मेरा सुझाव है कि इस देश की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को इसकी संस्कृति को बदल देना चाहिए। यदि भारतीय यह सोचने लग जाए कि हर वो वस्तु जो विदेशी और अंग्रेजी, उनकी अपनी वस्तु से अधिक श्रेष्ठ और महान है, तो उनका आत्म गौरव और मूल संस्कार नष्ट हो जाएंगे और तब वो वैसे बन जाएंगे जैसा हम उन्हें बनाना चाहते है – एक सच्चा गुलाम राष्ट्र । लार्ड मैकाले ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपनी शिक्षा नीति बनाई, जिसे आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली का आधार बनाया गया ताकि एक मानसिक रूप से गुलाम कौम तैयार किया जा सके, क्योंकि मानसिक गुलामी, शारीरिक गुलामी से बढ़कर होती है। मैकाले की शिक्षा नीति 1947 तक निर्बाध रूप से जारी रही, आजादी के पश्चात भी हमने इसमें कोई परिवर्तन  करना उचित नहीं समझा और यूं ही इसे चलने दिया।अंग्रेज अपनी इस नीति में पूर्णतया सफल रहे और हमारे देशवासियों को उन्होंने ऐसे चश्मे पहिना दिए जिनके माध्यम से  आज हमें पाश्चात्य ज्ञान,पाश्चात्य विचारधारा,वेशभूषा ,रहन सहन ........सभी कुछ सुन्दर,उपयोगी दिखता है और स्वदेशी गंवारू तथा पिछडा . दुर्भाग्य से स्वाधीनता के पश्चात भी हमारी शिक्षा प्रणाली में कोई परिवर्तन नहीं किया गया और उसी पद्धति को अपनाया गया.शिक्षा को सर्वथा उपेक्षित रखा गया .आज हमारी शिक्षा  केवल सरकारी या प्राइवेट सेवक तैयार करती है,नैतिक मूल्यों का शिक्षा में कोई स्थान नहीं.यही कारण है कि आज के विद्यार्थी का समाज या देश से जुड़ाव नहीं है,जो चिंताएं राष्ट्र हित में होनी  चाहियें ,उनसे कोसों दूर है वह . शिक्षा पूर्ण कर कमाऊ मशीन बन कर रह जाना और ऐशो आराम के साधनों के साथ जीवन बिताना या फिर विदेश चले जाना उसका लक्ष्य होता है.जिस समाज , जिस देश से वो सब कुछ प्राप्त करता है ,उसके प्रति कोई दायित्व समझने का उसके पास अवकाश कहाँ? शिक्षक को दोषी ठहराया जाता है कि आज शिक्षक व्यवसायिक बन चुके हैं,जो एक कटु सत्य है,परन्तु इस सबके पीछे निहित है वो मानसिकता जो इस दूषित शिक्षा प्रणाली के कारण सबकी  रग रग में बस गयी है,शिक्षक भी इसी मानसिकता का शिकार है,अतः उसका उद्देश्य भी वही अर्थोपार्जन और समृद्धि की और बढ़ना है,अपने परिवार को आधुनिकतम साधनों से सम्पन्न देखना है. यदि हम प्रारम्भ करें सरकारी स्तर से तो सर्वप्रथम शिक्षा विभाग  प्राय जिन मंत्रियों को सौंपा जाता है,उनको शिक्षा का अ ब स भी पता नहीं होता .नीति निर्माण वही घिसी पिटी ,या फिर विदेशों की नक़ल (जो हमारी आवश्यकता या परिस्थिति के अनुरूप बिल्कुल नहीं होती.) शिक्षक भी उसी वातावरण में शिक्षा प्राप्त कर शिक्षक बन जाता है तो उससे अपेक्षा करना ही  ही व्यर्थ है.निजी शिक्षण संस्थानों की आज बाढ़ आयी है जिसके कारण येन केन प्रकारेण तो शिक्षा दी  जा रही है परन्तु किस प्रकार ये सभी जानते हैं और उस पर एक पूरा आलेख भी कम है. सरकारी स्कूलों के शिक्षक सरकारी नौकर बनने को विवश है और निजी क्षेत्र  में   वहाँ के प्रबंधन के  वेतनभोगी सेवक ,जहाँ उनसे पूर्ण वेतन पर हस्ताक्षर करा कर आधा अधूरा वेतन दिया जाता है ,विद्यालयों में प्रवेश में मोटी धनराशि ,परीक्षाओं में नक़ल कराया जाना आदि सामान्य सी प्रक्रिया है.प्राथमिक स्तर पर ही यदि विचार करें तो उपलब्ध नेट या किताबी आंकड़ों के अनुसार आज भी देश में 9503 स्कूल बिना शिक्षक के हैं,122355  से अधिक विद्यालयों में पांच कक्षाओं पर एक शिक्षक है,,लगभग 42  हजार स्कूल भवन विहीन हैं और एक लाख से अधिक स्कूलों में भवन के नाम पर एक कमरा है.सरकारी स्कूलों में  अधिकांश प्रशिक्षित अध्यापक मासिक वेतन लेते हैं और रिश्वत के माध्यम से अपनी नियुक्ति ऐसे स्थान पर करवाते हैं जहाँ कभी अचानक होने वाले निरीक्षण में न पकडे  जाएँ .कहाँ तक विचार किया जाय शिक्षकों की नियुक्ति में गडबडी ,रिश्वत खुले आम व्याप्त है,इन सब व्यवस्थाओं के चलते शिक्षक को  पूर्ण समर्पित तथा कर्तव्य निष्ठ  मान कर चलना कपोल कल्पना ही हो सकती है.यही कारण है,ट्यूशन ,परीक्षाओं में धन लेकर पास करा देना आदि प्रवृत्तियां आम है.
माध्यमिक , स्नातक या फिर स्नातकोत्तर शिक्षण संस्थानों की बात की जाय तो वही स्थिति है,लिखित परीक्षा नेट या स्लेट उत्तीर्ण  करने के पश्चात तथा सभी वांछित मानदंड पूर्ण करने पर भी  आरक्षण और भ्रष्टाचार के चलते  नौकरी मिलती नहीं और  लाखों की रिश्वत देकर यदि नौकरी मिले तो निश्चित रूप से उस शिक्षक का ध्यान केवल भ्रष्ट साधनों से धनोपार्जन में ही लग सकता है.
.
शिक्षक दिवस मनाना एक औपचारिकता है , अन्य दिवसों की भांति ,विशेष रूप से पब्लिक स्कूल्स में बच्चों द्वारा कुछ रंगारंग कार्यक्रम आयोजित करना, कुछ सामजिक संस्थाओं द्वारा कोई आयोजन , कुछ उपहार आदि दिए जाना.सरकारी स्तर पर भाषण ,सिफारिशी या राजनैतिक जुगाड के आधार पर राज्यपाल या राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाना. हमारी संस्कृति में माता पिता तथा आचार्य को पूजनीय माना जाता है,जो एक सिद्ध सत्य है,क्योंकि राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका सर्वोपरि है.आज भी अपवाद स्वरूप कुछ शिक्षक सब ही स्तरों पर अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रहे हैं ,परन्तु तालाब को दूषित करने के लिए तो एक मछली ही पर्याप्त होती है और यहाँ तो प्राचुर्य ही ऐसे लोगों का है यदि इस कर्तव्य पथ पर चलते हुए शिक्षक अपने विद्यार्थियों को तैयार करे तो निश्चित रूप से भारतीय मनीषियों का भारत को पुनः विश्व गुरु के पद पर आरूढ़ होने का स्वप्न साकार हो सकता है .आवश्यकता है देश की परिस्थिति के अनुरूप अपनी शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने की ,शिक्षा को समाज से जोड़ने की तथा शिक्षा को यथार्थ में कर्तव्य बनाने की .  शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य तभी है,जब शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त अनियमितताओं को दूर कर शिक्षा सर्वसुलभ बनाई जाय केवल कागजों पर नहीं यथार्थ में .शिक्षक का आचार व्यवहार शिक्षार्थी के लिए आदर्श बन सके और इसके लिए वातावरण तैयार हो . (अपवाद सभी क्षेत्र में हैं ऐसे में यदि किन्ही कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक की भावनाओं को आघात पहुंचा हो तो मैं क्षमा चाहती हूँ.सभी आंकडें और चित्र नेट से साभार)

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

teacherbihar के द्वारा
September 11, 2012

(शिक्षा का अधिकार कानून के द्वारा यह व्यवस्था की गयी है की केंद्र सरकार शिक्षा पर व्यय होने वाली रकम का ६५% देगी तथा इसी कानून के तहत बिहार के लिये केंद्र सरकार द्वारा 50000 स्थाई शिक्षकों के नविन पद सिर्जित किये गए,साथ ही पुराने trained शिक्षकों को जल्द से जल्द स्थाई करने तथा untrained को ट्रेनिंग देकर एक वर्ष में स्थाई करने की बात भी कही (जैसा की मैंने न्यूज़ पेपर में पढ़ा) किन्तु जैसा की हमने समाचार पत्रों में पढ़ा है और जैसा की हम लोगो से सुन रहे है, हमारे आदरनिये शिक्षा मंत्री जी अपने विशेस प्रयासों से 50,000 seats को २ लाख में परिवर्तित करबा लिया साथ ही उन्होंने पुनः ये बात दुहराई की बिहार निकट भविस्य में स्थाई वेतनमान वाले शिक्षक नहीं रखना चाहता है ,उसे इसके लिए विशेष अनुमति प्रदान की जाये.केंद्र ने यह अनुमति प्रदान कर दी है तथा इस समय बिहार में दो लाख वेतनमान विहीन शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है )

teacherbihar के द्वारा
September 10, 2012

Teachers’ Association Observes ‘Insult Day’ Patna: The newly-appointed teachers’ association in Patna on Wednesday, instead of celebrating Teachers’ Day, observed an ‘Insult Day’ to press for their seven-point demand at a dharna held at Kargil Chowk. Observing a day-long fast to make their point, the protestors said that the teachers were getting less wage than the day labors in violation of the International Labor Law and other fair wage regulations. Demanding to implement fair wage act, association state president said that the Bihar government was intentionally keeping the wage lower than the day workers which was a slap on the teachers’ face.

    nishamittal के द्वारा
    September 10, 2012

    यदि ये वास्तविकता है तो अपमानजनक तथा भर्त्सना के योग्य है,जिसका विरोध होना चाहिए.

seemakanwal के द्वारा
September 9, 2012

आदरणीय निशा जी आज कल के शिक्षक अपने दायित्वों को भूल गये हैं जो की बहुत गलत है .

    nishamittal के द्वारा
    September 10, 2012

    सीमा जी यूँ तो अपवाद हर क्षेत्र में हैं परन्तु यथार्थ यही है कि गिरावट सर्वत्र है.धन्यवाद

Punita Jain के द्वारा
September 7, 2012

आदरणीय निशा जी, शिक्षा क्षेत्र के बारे में लिखा गया आपका यह लेख बहुत अच्छा लगा |विभिन्न विषयों का सूक्ष्म ज्ञान और उसको लिखने की कला में आपका जबाब नही |प्रंशसा के लिए हमारे पास शब्द कम पड़ जाते है|

    nishamittal के द्वारा
    September 10, 2012

    आपकी सराहना के लिए आभार पुनीता जी.

vijay के द्वारा
September 6, 2012

हमारे देशवासियों को उन्होंने ऐसे चश्मे पहिना दिए जिनके माध्यम से आज हमें पाश्चात्य ज्ञान,पाश्चात्य विचारधारा,वेशभूषा ,रहन सहन ……..सभी कुछ सुन्दर,उपयोगी दिखता है और स्वदेशी गंवारू तथा पिछडा ., आदरणीय माता जी नमस्ते ,आत्मा को जकझोर देने वाला लेख लिखा है आपने ,और मेरा ये व्यक्तिगत चिंतन है की यदि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में सुधार कर ले तो देश की आधी समस्याओं का समाधान हो सकता है | सुंदर विचारों से हमारा परिचय कराने के लिए धन्यवाद ,बधाई |

    nishamittal के द्वारा
    September 6, 2012

    धन्यवाद विजय जी

yogi sarswat के द्वारा
September 5, 2012

आदरणीय निशा जी मित्तल , सादर नमस्कार ! आपका लेख पढ़ा , या ये कहूं की आपका लेखन पढने के लिए ही आज नेट पर आया हूँ ! आपकी बातों से सहमत हूँ ! किन्तु कुछ बातें अपने मन की कहना चाहता हूँ ! आज सिर्फ शिक्षा को लेकर इतना संवेदनशील होना गैर जरूरी है ! वो पहले की बात थी की बच्चा , अच्छा या बुरा सिर्फ स्कूल या अपने माता पिता के सानिध्य में ही सीखता था , किन्तु आज उसके पास अन्य माध्यम भी हैं जो उसे उसके माता पिता या गुरु से बेहतर और ज्यादा तेज़ सिखा सकते हैं ! हमारे आस पास का वातावरण इतना बदल चूका है ( खराब हो चूका है ) की शिक्षा या गुरु के कहे शब्दों का , उसके द्वारा दी गयी शिक्षयों का कोई प्रभाव पड़ना नामुमकिन सा हो गया है ! अब जो शिक्षक बन रहे हैं वो भी उसी समाज और उसी वातावरण में पढ़े हैं , तो हम कैसे ये उम्मीद कर सकते हैं की सिर्फ शिक्षक ही शुद्ध निकलेगा इतने दूषित समाज से ?

    nishamittal के द्वारा
    September 5, 2012

    योगी जी आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा थी और आपने तो चढा दिया चने के झाड पर कि आप मेरा पोस्ट पढ़ने आये हैं ,ज्यादा कुप्पा हो जाऊँगी फूल कर तो जिम जाना पड़ेगा या कोई अन्य क्लास ज्वाइन करनी पड़ेगी. योगी जी मैंने शिक्षक को अकेले दोषी नहीं ठहराया यही लिखा है कि जब सम्पूर्ण समाज का ढांचा ही बिगड़ा हुआ है,शिक्षक भी उसी व्यवस्था का शिकार है,जो शिक्षक आयोग को कई लाख की भेंट चढा कर नियुक्त हो कर आता है, उससे कैसे आशा करें कि वो भ्रष्ट साधन अपनाने से परहेज करेगा.बी टी सी के संदर्भ में भी लिखा है लिखित परीक्षा नेट या स्लेट उत्तीर्ण करने के पश्चात तथा सभी वांछित मानदंड पूर्ण करने पर भी आरक्षण और भ्रष्टाचार के चलते नौकरी मिलती नहीं और लाखों की रिश्वत देकर यदि नौकरी मिले तो निश्चित रूप से उस शिक्षक का ध्यान केवल भ्रष्ट साधनों से धनोपार्जन में ही लग सकता है. लगता है आजकल व्यस्तता के कारण आप नेट पर नहीं दिख रहे हैं.शुभकामनाएं धन्यवाद

ashokkumardubey के द्वारा
September 4, 2012

निशाजी शिक्छक दिवस पर आपका लेख बहुत ही प्रेरणादायक और उत्तम है आशा है सिक्छा से जुड़े लोग भी इस लेख को पढेंगे और जो आवश्यक सुधारों की जरुरत आज सिक्छा के छेत्र में अपेक्छित है उसको प्राप्त करने में कोई कारगर कदम सरकार और स्वयंसेवी संसथान द्वारा उठाये जायेंगे प्राईवेट विद्यालयों द्वारा भी ऐसे शिक्छकों का चयन किया जाये जो सिक्छा के मूल्यों को जानते हों तभी वे बच्चों एवं विद्यार्थियों को वांछित सिक्छा दे पाएंगे जिससे हमारे भावी विद्यार्थी एक इमानदार , और जिम्मेवार नागरिक के रूप में उभरें और इसको तभी पाया जा सकता है जब हमारी सिक्छा ब्यवस्था सर्व सुलभ हो और हमारी संस्कृति को प्राथमिकता देते हुए चरित्रवान विद्यार्थियों को अग्रणी सिक्छा का अवसर दिया जाये इसमें हमारे पूरे समाज का दायित्व बनता है की फिर से ऐसी सोंच बने की सिक्छा पाकर आज का विद्यार्थी केवल पैसे कमाने की मशीन ही न बन जाये हमारे भावी बिद्यार्थी चरित्रवान और एक अच्छा इन्सान बन्ने की मिसाल पेश करें आपके द्वारा लिखी गयी लार्ड मैकाले की कही बात बहुत सटीक लगी और हमारे देश का दुर्भाग्य हीं कहलायेगा की हमारे देश के सिक्छक आजादी के इतने सालों बाद भी इस कहावत को झूठा साबित नहीं कर पा रहे और दुनिया को दिखलाते की हमारे सांस्कृतिक धरोहर हमारी , पौराणिक परम्परा गुरु शिष्य सम्बन्ध फिर से कायम हो और सिक्छक न कहलाकर गुरु कहलाने लगे गुणवत्ता पूर्ण सिक्छा दे ताकि हमारे जीवन में फिर किसी और गुरु की तलाश न रह जाये . एक बहुत अच्छा लेख जिसपर जितनी भी सहमती जताई जाये जितनी बातें लिखी जाये कम है आपके लेख की हर लाईन एक सच को उजागर करती है .पढने के बाद ज्ञानवर्धन होता है कम से कम मेरा साथ तो यही सच है

    nishamittal के द्वारा
    September 5, 2012

    आदरनीय अशोक जी,आपको लेख से सहमती है,लेख अच्छा लगा इसके लिए आभारी हूँ.शिक्षा व्यवस्था सुधरने पर और अपने देश के अनुकूल होने पर शायद देश की आधी समस्याओं का समाधान स्वत हो जाएगा.

vinitashukla के द्वारा
September 4, 2012

शिक्षा के व्यवसायीकरण होने का परिणाम, बहुत ही बदतर है. यह ऐसी व्यवस्था को पुष्ट कर रहा है, जिसमें मेधा का ह्रास होता जा रहा है. बड़ी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं( यथा आई. ए. एस., मैनेजमेंट, आई. आई. टी. आदि) में बैठने के लिए परीक्षार्थी को, कोचिंग कक्षाओं का आसरा लेना ही पडता है. गरीब व मेधावी छात्र इन कोचिंग- इंस्टीट्यूट्स की फीस नहीं भर पाते और उनके सपने अधूरे ही रहते हैं. आपने बहुत संजीदा एवं सुंदर तरीके से वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खडा किया है. बधाई निशाजी.

    nishamittal के द्वारा
    September 5, 2012

    विनीता जी,आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ,सच में आज कोचिंग का व्यवसाय एक उद्योग बन चुका है परन्तु बहुत से मेधावी छात्र उन की फीस भरने में समर्थ नहीं ऐसे में शिक्षकों का कर्तव्य बनता है

prabhatkumarroy के द्वारा
September 4, 2012

शिक्षक दिवस के अवसर पर निशा मित्तल ने शानदार सार्थक और पठनीय लेख प्रस्तुत किया। निशा मित्तल और जागरण ब्लाग के बहुत सारी शुभकामना।

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद राय साहब

punita singh के द्वारा
September 4, 2012

सुंदर और शिक्षाप्रद लेख के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद पुनीता जी.

Rahul Nigam के द्वारा
September 4, 2012

निशाजी, शिक्षक दिवस मनाना एक औपचारिकता है सहमत हूँ आपसे. वैसे न केवल शिक्षक – ‘हिंदी’ व ‘बाल’ भी ऐसे दिवस है जिनकी केवल खानापूरी होती है. देखा जाये तो वर्तमान में हर कार्य की प्रष्ठभूमि व्यावसायिक होती जा रही है. मेरे एक मित्र जो शिक्षक है आजकल tution के जरिये करोडपति है. उन्होंने अपने शुरूआती दौर में कहा था कि जब हमारे पढाये छात्र पैसा कमा रहे है तो हम गरीब क्यों रहे हम अभी से उनसे मोटी फीस लेकर उन्हें पैसा कमाने की मशीन बना देगे………और उन्होंने कर भी दिखाया उन्होंने अपने छात्रो को मशीन ही बना डाला…….. जब लोगो का उद्देश्य ही भटक जाये तो समाज किस दिशा में जायेगा? आज जितने लोग भी नौकरी कर रहे है वे नहीं जाते कि उनकी ड्यूटी क्या है उन्हें तो बस याद रहता है अपना कार्यकाल का समय और वेतन दिवस. फिर भी कुछ शिक्षक, माता-पिता आज भी ऐसे है जिनके त्याग और परिश्रम से मन श्रद्धा से भर आता है और उनके दिए संस्कारों से आज आप जैसे लगनशील, जुझारू व्यक्तित्व हमारे मध्य मौजूद है. पुनः सादर नमन.

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    राहुल जी,धनार्जन अनुचित तो नहीं बशर्ते हम जो भी काम कर रहे हैं उसके प्रति ईमानदारी हो.परन्तु ट्यूशन पढ़ाकर यदि शिक्षक उनका ज्ञानवर्धन कर रहा है तब भी ठीक है ,परन्तु जहाँ ट्यूशन के नाम पर नक़ल के ठेके छोड़े जा रहे हैं है,पैसे लेकर बच्चों के अंक बढाये जाते हैं वहां तो बर्बादी के अतिरिक्त कुछ नहीं.ऐसे शिक्षक सम्मान उन छात्रों से भी नहीं प्राप्त कर पाते जिनको ऐसे अनुचित साधनों से लाभ पहुंचाते हैं.सौभाग्य से मेरी आदरनीय शिक्षिकाएं मेरा आदर्श रही हैं,धन्यवाद

bharodiya के द्वारा
September 4, 2012

निशा बहन नमस्कार एक शिक्षक का परिचय देता हुं । ये पवन गुप्ताजी है । एक आदर्श शिक्षण्शास्त्री । http://www.youtube.com/watch?v=igN4mAKmF88&feature=related

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    आदरनीय भारोदिया जी,ऐसे अपवाद स्वरूप महानुभाव बिरले हैं और सदा आदरनीय व नमन के योग्य हैं.धन्यवाद

chaatak के द्वारा
September 3, 2012

निशा जी, शिक्षक को अब शिक्षक रहने ही कहाँ दिया गया है वो तो सिर्फ सरकारी बाबू बनकर रह गया है सो उसका आचरण भी उसे कार्यों के अनुकूल हो चला है, क्या इसमें कोई शक है कि इंसान में ही परिवेश के साथ अनुकूलन की सर्वाधिक क्षमता होती है? अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    चातक जी बहुत दिन बाद आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त कर सुखद लगा.आपसे सहमत हूँ इसलिए तो लिखा है कि हमारे यहाँ सबसे उपेक्षित शिक्षा है और यही कारण है,कि शिक्षकों को फालतू समझ कर इन कार्यों में नियुक्त किया जाता है.

kpsinghorai के द्वारा
September 3, 2012

निशाजी,  आपने सही ही लिखा कि जिस देश में शिक्षा की कमान ऐसे मंत्री सम्भाले हों जो खुद क..ख..ग.. नहीं जानते हैं। अभी हाल ही में एक शिक्षा मंत्री के पुत्र-पुत्री भी फेल हो गए तो उन्होंने अधिकारियों को हटा दिया। जाहिर है कि शिक्षा के नाम पर केवल डिग्री दी जा रही है। हम अभी तक शिक्षा की असली परिभाषा तक नहीं गढ़ पाए हैं। जो चला आ रहा है बस उसी को सत्य मान लिया है। जब तक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव नहीं होगा तब तक कैसे तमाम दावे गढ़ सकते हैं क्या नौकरी लगना ही शिक्षा का उद्देश्य है?…बेहद सुंदर लेख,… सादर आभार

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    वैसे तो हम अरे यहाँ सब ही मंत्रालय ऐसे ही चहेतों को बांटकर अपना धनकोष बढ़ाने का कार्य होता है,नौकरी लगना शिक्षा का उद्देश्य नहीं है,परन्तु ये भी सत्य है कि मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण होनी भी आवश्यक हैं. डिग्रियां किस प्रकार फर्जी प्राप्त की जाती हैं,ये भी एक पृथक विषय है.धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए.

R K KHURANA के द्वारा
September 3, 2012

प्रिय निशा जी, पंजाब में एक कहावत मशहूर है की “गुरु बिना गत नहीं ते शाह बिना पत नहीं” सच कहा है की गुरु नीना गति नहीं होती ! राम कृष्ण खुराना

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    आदरनीय खुराना जी गुरु की महत्ता पर पंजाबी कहावत से परिचित करने के लिए धन्यवाद

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 3, 2012

आदरणीय निशा जी। आपके विचारों से सहमत हूं। आज शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त बनाने की जरूरत है। आज शिक्षा व्यवसाय बनती जा रही है। वहीं हम भी शिक्षक दिवस को महज औपचारिकता निभाते आ रहे हैं। आपने कही कहा है कि- शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य तभी है,जब शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त अनियमितताओं को दूर कर शिक्षा सर्वसुलभ बनाई जाय केवल कागजों पर नहीं यथार्थ में .शिक्षक का आचार व्यवहार शिक्षार्थी के लिए आदर्श बन सके और इसके लिए वातावरण तैयार हो .। तथ्यपूर्ण जानकारी देने के लिए आपका आभार। 

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    आभार वैचारिक सहमती और मेरे आलेख पर प्रथम प्रतिक्रिया हेतु,भानुप्रकाश जी.

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
September 3, 2012

निशा जी ,हमेंशा की भांति एक उत्कृष्ट लेख

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद रीता जी.

pitamberthakwani के द्वारा
September 3, 2012

निशा जी, आप एक अच्छी लेखिका है,शिक्षकों के बारे में अपने विचारों के साथ इस बात को भी जोड़ दे की जिस टीचर का अपना चरित्र सही नहीं है,वह क्या बच्चों का चरित्र निर्माण करेगा? देश के तथा कथित चरित्र निर्माण कर्ताओं को नमन तो क्या इस दिन को भी मनाने की प्रथा भीख़त्म होनी चाहीये .

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    आपने सही कहा है,चरित्र के सन्दर्भ में शिक्षक विद्यार्थी के लिए आदर्श होता है,अतः उसका चरित्रवान होना आवश्यक है

Chandan rai के द्वारा
September 3, 2012

निशा जी , आपने हमारे देश की चरमराती शिक्षा प्रणाली की कलाई खोल दी है ! बेहतरीन लेख !

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद चन्दन राय जी.

rekhafbd के द्वारा
September 3, 2012

आदरणीय निशा जी ,आपके विचारों से पूर्णतया सहमत ,आरक्षण और भ्रष्टाचार के चलते नौकरी मिलती नहीं और लाखों की रिश्वत देकर यदि नौकरी मिले तो निश्चित रूप से उस शिक्षक का ध्यान केवल भ्रष्ट साधनों से धनोपार्जन में ही लग सकता है.,आज के परिवेश में सार्थक लेख ,बधाई

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    रेखा जी सहमती हेतु धन्यवाद

yamunapathak के द्वारा
September 3, 2012

आदरणीय निशाजी नमस्कार आपके ब्लॉग ने बहुत ही सुन्दर ढंग से शिक्षक और उनकी स्तिथि को स्पष्ट रूप से मंच पर रखा.लोर्ड मैकाले की policy ने वाकई हमारी पुरातन संस्कृति को अघात पहुँचाया .मैंने आज ही इस विषय पर ब्लॉग लिखा है . साभार

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    यमुना जी बहुत दिन पश्चात आपके दर्शन हुए.धन्यवाद आपका ब्लॉग अभी देखती हूँ

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
September 3, 2012

आप ने सच कहा वातावरण तैयार करना होगा | श्रद्धेया निशा जी ! आज शिक्षा के में क्षेत्र सुधार के नाम पर नित नए प्रयोग पर प्रयोग हो रहे हैं जो घातक हैं ! आप के सुझाव मूल्यवान हैं ! सादर हार्दिक आभार !!

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद आचार्य जी.

vikramjitsingh के द्वारा
September 3, 2012

पूर्णतया सहमती…… सादर……मातेश्वरी….

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद विक्रम जी.

satya sheel agrawal के द्वारा
September 3, 2012

निशा जी ,हमेशा की भांति अपने आलेख के माध्यम से हमारे ज्ञान में बढ़ोतरी की है .प्रस्तुत लेख के लिए अपने काफी परिश्रम किया है.आपकी सटीक लेखनी के लिए आपको धन्यवाद देता हूँ .जहाँ तक शिक्षा का प्रश्न है हमारे देश में भ्रष्टाचार अपनी चर्म सीमा पर है अतः शिक्षा विभाग भी कैसे अछूता रहा सकता है.

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    शिक्षा का भ्रष्टाचार तो बहुत बड़ा कारण है हमारे देश का वांछित विकास न हो पाने का.धन्यवाद सत्यशील जी.

dineshaastik के द्वारा
September 3, 2012

आदरणीय निशा जी आपके विचारों से पूर्णतः सहमत। शिक्षा का व्यापारीकरण होने से इसका स्तर बहुत ही गिर गया है। इसके लिये हमारी शासन व्यवस्था भी जिम्मेदार है, जो केवल वोट की राजनीति तक ही सीमित है।

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी.

D33P के द्वारा
September 3, 2012

निशा जी नमस्कार आजकल लोग स्कूल इसलिए नहीं खोलते कि उनके अन्दर बच्चो को शिक्षित करने का जज्बा है .अब तो जिसके पास रोजगार नहीं है उसके लिए अदद जरिया है पैसा कमाने का बस एक स्कूल खोल लो और मोटी फीस वसूलो हो गया काम !और फिर इन्हें ही क्या दोष दे सरकार खुद कितनी सतर्क है इसका अंदाज़ा भी इसी बात से लग जाता है ,आये दिन शिक्षको को पोलिओ अभियान ,चुनाव आदि ,और नहीं तो स्कूल में ही बच्चो के पोषाहार की व्यवस्था करो !बच्चो को पड़ने के अलावा सब काम तो शिक्षक करते है !स्कूल में पड़ने से ज्यादा वो ट्यूशन पर ज्यादा जोर देते है जिससे वेतन के अलावा उनकी कमी का जरिया भी बना रहे !आजकल जीना और रोटी खाना आसन है पर बच्चो की शिक्षा के लिए मोटी फीस भरना ज्यादा मुश्किल है ! क्रान्तिकारी लेख के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    बिलकुल सही कहा दीप आपने आज ये एक कमाऊ व्यवसाय है,पूर्व प्राथमिक से लेकर तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षा संस्थानों के क्षेत्र में.सरकारी शिक्षक तो उसी बाबू के रूप में है जो काम न करने की स्दंस्कृति का आदि बन चुका है और यदि कोई काम करना भी चाहता है तो वो उसी माहौल के चलते उसी व्यवस्था का आदि बन जाता है

jlsingh के द्वारा
September 3, 2012

आदरणीय निशा जी, नमस्कार! आपके जन्म दिन की बधाई और ढेरों शुभकामना! भारतीय मनीषियों का भारत को पुनः विश्व गुरु के पद पर आरूढ़ होने का स्वप्न साकार हो सकता है. आवश्यकता है देश की परिस्थिति के अनुरूप अपनी शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने की, शिक्षा को समाज से जोड़ने की तथा शिक्षा को यथार्थ में कर्तव्य बनाने की . शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य तभी है,जब शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त अनियमितताओं को दूर कर शिक्षा सर्वसुलभ बनाई जाय केवल कागजों पर नहीं यथार्थ में .शिक्षक का आचार व्यवहार शिक्षार्थी के लिए आदर्श बन सके और इसके लिए वातावरण तैयार हो. आपके विचार समयानुकूल हैं, जरूरत है अमल करने की! बहुत ही महत्वपूर्ण लेख! बधाई!

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    बिलकुल सही कहा आपने बिना व्यवहार में लाये कोरे सिद्धांत कंजूस के उस धन की भांति व्यर्थ हैं,जो नष्ट हो जाता है और किसी के काम नहीं आता.धन्यवाद

Ramesh Bajpai के द्वारा
September 3, 2012

शिक्षक दिवस मनाने का औचित्य तभी है,जब शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त अनियमितताओं को दूर कर शिक्षा सर्वसुलभ बनाई जाय केवल कागजों पर नहीं यथार्थ में .शिक्षक का आचार व्यवहार शिक्षार्थी के लिए आदर्श बन सके और इसके लिए वातावरण तैयार हो आदरणीय निशा जी बहुत ही पैनी नजर से इस विषय पर विचार आये है |सामयिक पोस्ट ,बधाई

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    आदरनीय बाजपेयी जी आव्भार सुखद प्रतिक्रिया का.

akraktale के द्वारा
September 2, 2012

निशा जी          सादर नमस्कार, हमारे देश की प्रचलित शिक्षा ही नहीं क़ानून भी मेकाले के जमाने के हैं. हमारे राजनेताओं और खासकर कांग्रेस के नेताओं को इस पर सर्वाधिक गर्व है. शिक्षा की पद्धति के बारे में कहें तो आज की स्थिति में शिक्षक स्वयं अपने मन से पढ़ाएंगे इस बात की कोई उम्मीद नहीं है. इसका बड़ा कारण ये है की बार बार पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाता है शिक्षकों को कभी कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता. शिक्षकों से शिक्षा के अतिरिक्त चुनाव के कार्य, दोपहर भोजन व्यवस्था के कार्य, जनगणना जैसे कार्य लिए जाते हैं. शैक्षणिक सत्र को इसाई मिशनरी के स्कूलों की देखादेखी लंबा कर दिया गया है. ऐसे कई कारण है जो शिक्षक की पढ़ाने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं. जब तक ये सारे कारण दूर नहीं किये जाते सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को दोष देने का कोई अर्थ नहीं है. निजी स्कूलों के शिक्षको के विषय में तो आपने लिखा ही है.

seemakanwal के द्वारा
September 2, 2012

निशाजी आप ने सच ही कहा है आज शिक्षक दिवस बीएस उपहार लेने तक रह गया है .

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    आदरनीय अशोक जी,आपने एक गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया है,जो मुझसे छूट गयी थी .इसके पीछे भी मूल कारण शिक्षा का महत्व हीन मानना है.विद्यालयों में पढ़ाई नहीं हो रही है तो उसकी कोई चिंता नहीं है .एक कहावत है कुछ लोहा खोटा और कुछ लोहार और इससे कितनी हानि पहुँच रही है जिसका अनुमान हम लगा ही नहीं पा रहे हैं.धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद सीमा जी ,क्षमा करें आपकी व अशोक जी की प्रतिक्रिया का क्रम थोडा गलत हो गया है.

rajuahuja के द्वारा
September 2, 2012

माननीया निशा जी ओज-पूर्ण आलेख, साधुवाद ! सचमुच हमारी दोष पूर्ण शिक्षा-नीति एक बहुत बड़ा कारण है ! लोग इस तथ्य को समझते हैं, बदलाव भी चाहते हैं, लेकिन शायद बदलाव की दिशा में हमारे प्रयास सार्थक नहीं ! आज की शिक्षा पद्धती में नैतिक-मूल्यों को कत्तई अनदेखा कर दिया गया है ! व्यावहारिक-ज्ञान / राष्ट्र-प्रेम का पूर्णतया आभाव है ! अगर कुछ है तो मात्र प्रतिस्पर्धा केवल प्रतिस्पर्धा ! स्वयं को सबसे आगे स्थापित करने की मानसिकता ! इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ! किस काम की ऐसी शिक्षा-पद्धति जो जीवन की दिशा ही बदल दे ! जिसके समक्ष नैतिक-मूल्यों का कोई स्थान ही न हो ! शायद यही वजह है की आज सेंट मेरी एंग्लो-इन्डियन हायर सेकेंडरी स्कूल चेन्नई की नवीं कक्षा का छात्र अपने अध्यापक की न्रुशंस हत्या कर देता है ! माधव कालेज उज्जैन में प्रोफ़ेसर सबरवाल की हत्या ! अभी कल-परसों ही रांची में छात्रों द्वारा कुलपति के कार्यालय का दरवाज़ा तोड़ उनके कार्यालय पर कब्ज़ा कर लिया और एक छात्र उनकी कुर्सी पर विराजमान हो गया ! आखिर क्यों कर हो रहा है यह सब ? कदाचित शिक्षा का व्यवसाई कारण / शिक्षा-पद्दति में नैतिक-मूल्यों के समावेश न होना / समाज के बदलते दृष्टी- कोण के साथ-साथ मीडिया का प्रभाव और उन्मुक्त व्यवहार ! स्मरण रहे शिक्षक की उपेक्षा भी छात्र को अवज्ञाकारी बनाती है !

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    राज जी आपने एक सटीक तथ्य की और ध्यान आकृष्ट किया है,प्रतिस्पर्धा भी सकारात्मक हो तो कोई हानि नहीं परन्तु आज ये नकारात्मक बन चुकी है,मुझको आगे निकलना है तो सही परन्तु इसके लिए दुसरे को कोई भी हानि पहुँचाना ,कोई भी साधन अपनाना नैतिक मूल्यों के पतन को दर्शाता है आपसे सहमत हूँ धन्यवाद विचारपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए.

alkargupta1 के द्वारा
September 2, 2012

Nishaaji , aaj ke paridrishy maen satyta ki kasauti par bilkul khara utarata hai aapka yah aalekh…. saarthak post ke liye badhayi

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद अलका जी.

अजय यादव के द्वारा
September 2, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर प्रणाम | हमारे इलाहाबाद जनपद में मान्यता प्राप्त /गैर मान्यता प्राप्त विद्यालयो की भरमार हैं |यहाँ अध्यापक होने के लिए आपकी शिक्षा नही स्किल देखी जाती हैं |यहाँ शिक्षको की योग्यता के नए मापदंड हैं ,आप चाहे हाईस्कूल ही पास हों ,पर यदि इंटर के छात्रो को ४० मिनट बंधे रख सकते हैं ,आप चाहे हाईस्कूल ही पास हों ,पर यदि इंटर के छात्रो को ४० मिनट बंधे रख सकते हैं ,तो माना जाता हैं की आपमें इन्टर तक पढाने की योग्यता हैं |{http://avchetnmn.jagranjunction.com/2012/07/02/%E0%A4%86%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AF%E0%A4%B9-%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA-%E0%A4%AD%E0%A5%80/} मैंने इस विषय पर लिखा हैं |परन्तु आपका लेख कई प्रकार से मेरी जानकारियों को बढ़ाया ,जिसके लिए सादर आभार |शिक्षक दिवस सिर्फ दिखावे की औपचारिकता हैं जिसका कनेक्सन टीचर को गिफ्ट देकर खुस करना ही रह गया हैं |

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    क्लास को बांधे रखना यदि सकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त है,तो बहुत उत्तम परन्तु आजकल प्रोफेशनल रूप से अपने व्यवसाय को चलाने के लिए ऐसे बहुत से अनैतिक कृत्य भी होते हैं,जो विद्यार्थी के लिए हानि प्रद है.धन्यवाद

Ravinder kumar के द्वारा
September 2, 2012

आदरणीया निशा जी, नमस्कार. वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर विचार और चिंतन करते लेख के लिए आप को बधाई. आप का लेख सत्य की कसौटी पर खरा उतरता है. निशा जी, मैं भी एक शासकीय शिक्षक हूँ और आप ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर जो जो प्रश्न उठाये हैं वो सभी वास्तविक हैं. मोटा वेतन पाने वाले शिक्षक जब सारा दिन कुर्सी तोड़ते हैं तो मन पीड़ा से भर जाता है. आप ने हर बार की तरह बड़ा ही सार्थक लिखा है. आप को बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं. नमस्ते जी.

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    एक शिक्षक के रूप में आपने व्यहारिक पक्ष की भी जानकारी दी धन्यवाद रविन्द्र जी.आपको शिक्षक दिवस की शुभकामनाये व बधाई

manjusharma के द्वारा
September 2, 2012

निशा जी आपका लेख वास्तव में सराहनीय समय की मांग के अनुसार सारगर्भित और प्रशंशनीय है जो जीवन को सही दिशा दे मुसीबतों से बाहर निकलने की सीख दे अवगुणों से हमें दूर रखे चाहे वो छोटा या बड़ा वही सच्चा गुरु है

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 2, 2012

आदरणीया निशा मित्तल जी सादर प्रणाम,,,,,,,,,हाँ इधर कुछ अति ब्यास्तता के चलते आप लोगों का दर्शन नहीं कर पा रहा था,,,,,,,,,,,,,,धन्यवाद!

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    धन्यवाद धर्मेश जी.

Himanshu Nirbhay के द्वारा
September 2, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर अविभादन…शिक्षा पद्धिति, शिखा और शिक्षक पर ये सारगर्भित, विचारयुक्त आलेख से परिचय करने के लिए कोटि कटी धन्यबाद.. देश मैं शिक्षा और शिक्षक की बर्तमान दश और निरंतर गिरते हुए स्टार के अनेक कारन हैं…. प्रथम तो शिक्षा पद्धिति का अप्रासंगिक होना.. सिक्षा विभाग के प्रधान का अशिक्षित होना….(ज्यादातर शिक्षा मंत्रियों की खुद शिक्षा का पता नहीं, यहाँ शिक्षा का अर्थ अंकपत्रो या डिग्रियों से नहीं है ) शिक्षको के स्वयं के आचरण, मूल्यों और चरित्र का हनन होना..(अपवाद सभी क्षेत्र में) परिवार द्वारा बच्चों को संस्कारित न करना,……जब हम ही गुरुओं को मान नहीं देंगे तो हमारी अगली पीड़ी हमसे क्या सीखेगी…. बहुत से अन्य कारन हैं जो समयाभाव तथा प्रतिक्रिया के अधिक लम्बे हो जाने की वजह से संभव नहीं….. पुन: आपको नमन

    nishamittal के द्वारा
    September 4, 2012

    हिमांशु जी आपकी प्रथम विचारपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए आभार.आपने कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है,जो समस्या का मूल हैं.




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