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ऐसे पति करवाचौथ की पूजा के अधिकारी !

Posted On: 30 Oct, 2012 Others में

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shubhkaamnayenअचल रहे अहिवात तुम्हारा
जब लगि गंग यमुन जलधारा।’ श्री रामचरित्र मानस की  इन सुन्दर पंक्तियों के साथ सभीको सुखद दाम्पत्य जीवन के लिए मंगलकामनाएं जिनमें माता कौशल्या सीता जी को आशीर्वाद देती हैं. और विवाह के लिए प्रतीक्षारत सभी के मनोरथ पूर्ण शीघ्र पूर्ण की कामना .

किसी विवाहित महिला को ये कहा जाना शायद  किसी गाली से कम नहीं लगता कि इसके पति ने इसको छोड़ दिया है.ये एक आम भाषा का शब्द है,और दुर्भाग्य से वैवाहिक सम्बन्धों में दरार आने का चाहे जो भी कारण रहा हो ,तिरछी नज़रें प्राय स्त्री की ओर ही उठती हैं,मानों उससे  ही कोई बहुत बड़ा अक्षम्य अपराध हुआ परिणाम स्वरूप उसका परित्याग किया गया है.क्या हो ऐसी ही परित्यक्ता कही जाने वाली पत्नी अपने उन्ही पति महोद्य के लिए करवाचौथ का व्रत रखती हो.

अभी पिछले दिनों संयोग से ऐसी ही दो महिलाओं से सम्पर्क हुआ जिनके माथे पर यही लेबल लगा था.दोनों में से एक का कसूर था उसका रूप रंग सामान्य होना ,और दूसरी का संतान न होना.आश्चर्य की बात कि सामान्य रूप रंग वाली महिला को उनके तथाकथित पतिदेव  और  उनके परिजन ही पसंद कर अपने घर सात फेरों के बंधन में बाँध कर लेकर आये थे,तथा वो एक बेटी के पिता भी  हैं. दूसरी महिला का निस्संतान रह जाने का कारण भी उनकी कोई शारीरिक विकृति नहीं अपितु कोई भयंकर एक्सीडेंट था जो पति के साथ जाते समय पति की लापरवाही वश हुआ था.
यद्यपि आर्थिक रूप से दोनों ही महिलाएं अब आत्मनिर्भर हैं,पहली किसी विद्यालय में शिक्षिका हैं , और दूसरी अपना बुटीक चलाती हैं,परन्तु दोनों ने  पुनर्विवाह नहीं किया ,जबकि दोनों के पति विवाहित जीवन व्यतीत कर रहे हैं.निस्संतान महिला के पति ने तो न्यायिक प्रक्रिया  से (जो स्वयं अधिवक्ता हैं) ने वैधानिक विवाह कर लिया है,जबकि दूसरी स्त्री के पति समाज की परवाह न  करते हुए किसी सुन्दरी के साथ रह रहे हैं.लोक लाज तो बहुत दूर की बात है उनको तो उस बेटी के भविष्य की भी चिंता नहीं जो अपनी माँ के साथ रहती है .उससे भी विडंबना कि जब इनमें से एक महिला के भूतपूर्व पति तो एक ही शहर में रहते हुए उनके हाल पूछने की औपचारिकता भी पूर्ण करने नहीं गए जब वो जिंदगी और मौत की लड़ाई अकेली लड़ रही थीं.
उपरोक्त विवरण देने का संदर्भ है कि ये दोनों  महिलाएं करवाचौथ का व्रत अपने उन्ही पतिदेव के लिए रखती हैं.एक सुहागिन पतिव्रता के रूप में इनका  अपने पति के लिए व्रत रखना और पूजा करना कुछ अटपटा सा  लगा,पति भी ऐसे !जो भर्तार नहीं पत्नी के सुख और जीवन  हर्तार हों .
पर्व एवं त्यौहार सम्पूर्ण विश्व में अपनी अपनी परम्पराओं ,सामजिक या धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप मनाये जाते हैं.हमारी विलक्षण भारतभूमि में तो पर्व और उत्सवों की धूम है.त्यौहार मनाने का उद्देश्य सभी चिंताओं से मुक्त हो कर हंसी खुशी जीवन व्यतीत करना तो है ही,साथ ही सामाजिकता को प्रोत्साहन देने व अपनी भावनाएं व्यक्त करने का भी एक साधन है.केवल मात्र हिन्दू संस्कृति ही ऐसी संस्कृति है जहाँ त्यौहारों पर अपनी नहीं अपितु परिवार की मंगल कामना करते हैं.रक्षाबंधन,दशहरा व भाईदूज पर जहाँ बहिनों द्वारा भाई के मंगल की कामना की जाती है,विवाह के पश्चात करवा चौथ ,तीज तथा कुछ अन्य पर्वों पर पति की कुशलता व दीर्घ आयु के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती है, और व्रत रखा जाता है, कुछ स्थानों पर अविवाहित लड़कियां भी अपने मंगेतर या भावी पति की कामना से ये व्रत करती हैं..और संकट चतुर्थी , अहोई अष्टमी तथा जीवितपुत्रिका आदि पर्वों पर माँ अपनी संतान के लिए.पूजा व व्रत आदि करती हैं..

करवाचौथ का व्रत उत्तरप्रदेश,उत्तराखंड,पंजाब,राजस्थान,गुजरात,दिल्ली ,हरियाणा व हिमाचलप्रदेश में विशेष रूप से मनाया जाता है,परंतू अब सम्पूर्ण भारत में ही नौकरी .व्यवसाय आदि के कारण अन्य प्रान्तों के लोग भी रहते हैं,और शेष दूरदर्शन व फिल्मों की मेहरबानी से देश के अन्य भागों में तथा भारत से बाहर विदेशों में रहने वाली भारतीय महिलाओं द्वारा यह व्रत किया जाता है. करवाचौथ से .एक दिन पूर्व महिलाएं मेहंदी आदि हाथों में रचाती हैं, करवा एक मिटटी का पात्र होता है,जिसमें जल भरकर रखा जाता है.और रात्रि में वही करवे वाले जल से चन्दमा को अर्घ्य दिया जाता है. .अपनी शारीरिक सामर्थ्य व परम्परा के अनुसार महिलाएं इस व्रत को निर्जल ही करती हैं ,पक्वान्न तैयार किये जाते हैं .विशेष रूप से साज-श्रृंगार कर दिन में इसकी कथा या महातम्य सुना जाता है,अपनी श्रद्धेया सास  या नन्द को पक्वान्न ,वस्त्र आदि की भेंट दी जाती है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है.रात्रि में चन्द्रदेवता के उदय होने पर दर्शन कर और पतिदेव की पूजा कर ही व्रत का पारायण किया जाता है. त्यौहार मनाने का तरीका स्थानीय परम्पराओं के अनुसार थोडा भिन्न भले ही हो सकता है, जैसे कि पंजाबी संस्कृति में , मायका या ससुराल पक्ष की ओर से सरगी के रूप में पुत्रवधू के लिए वस्त्र-आभूषण ,श्रृंगार सामग्री,चूड़ियाँ , पक्वान्न ,मेवे. फल आदि भेजे जाते हैं.सूर्योदय से पूर्व कुछ महिलाएं शगुन के रूप में कुछ खाकर मुहं भी मीठा करती हैं. दिन में एक स्थान पर एकत्रित हो कर कथा सुनती हैं और परस्पर थाली बदलती हैं,तथा रात्रि में चन्द्र दर्शन के समय चन्द्रदर्शन छलनी की आड में किया जाता है. थोडा बहुत स्थानीय प्रभाव परिलक्षित होता है,परन्तु मूलतः भावना वही है पति के लिए मंगलकामना.karva c श्रृंगार तो महिलाएं करती ही हैं,परन्तु अब व्यवसायिकता की दौड़ में मेहंदी और ब्यूटी पार्लर्स की चांदी रहती है,विशेष पैकेजस की व्यवस्था उनके द्वारा की जाती है,यही स्थिति मेहंदी लगाने वाले लोगों की रहती है. व्रत रखना और मंगलकामना करना निश्चित रूप से अपने मन की भावना है ,परन्तु ऐसे पुरुषों के लिए भूखा रहना किस प्रकार उचित कहा जा सकता है जिनके लिए पत्नी के प्रति न भावना,न प्रेम, न अपनत्व. पत्नी पति द्वारा प्रताडित रहे .छली जाय , पति दूसरी स्त्री के साथ रह रहा हो और पत्नी उसके लिए कष्ट सह रही हो.क्या ऐसे पति इस सम्मान,त्याग ,समर्पण के अधिकारी हैं?

फिल्मों के या दूरदर्शन धारावाहिकों के प्रभाव से अब पति भी पत्नी के साथ करवाचौथ पर व्रत रखने लगे हैं. और उपहार आदि दिलाने की व्यवस्था करते हैं. अपनी पत्नी से किसी भी कारण प्रदेश स्थित पतियों को इन्टरनेट के माध्यम से त्यौहार मनाने तथा विभिन्न साईट्स वेबकेम के माध्यम से परस्पर अपनी भावनाएं व्यक्त करने का सुअवसर प्रदान करती हैं.

अंत में  मेरा अनुरोध ,विनम्र आग्रह पुरुषवर्ग से (जो ऐसा नहीं करते ) उन भाईयों से,उन पतियों से और उन पुत्रों से जिनके लिए मंगल कामनाएं ,व्रत उपवास नारी द्वारा किये जाते हैं.,क्या उनका दायित्व नहीं कि वें भी नारी जगत के प्रति सम्पूर्ण दायित्व का निर्वाह करते हुए उनको वो मानसम्मान ,सुख. खुशी प्रदान करें जिनकी वो अधिकारी हैं.और वही व्यवहार करें जिसकी अपेक्षा वो उनसे अपने लिए करते हैं. अपनी उन बहिनों से भी जो पति के लिए व्रत तो रखती हैं परन्तु पति का अपमान करने में या अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार से चूकती नहीं.



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68 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Brahm Rana के द्वारा
September 23, 2016

जीवित्पुत्रिका या ‘जिउतिया’ व्रत का विशेष महत्व है। माताएं अपने संतान के दीर्घायुष्य की कामना से ये व्रत करतीं हैं। जैसे की इसके नाम से स्पष्ट है ये पुत्र को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। यह व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष के प्रदोष काल में किया जाता हैं। “

sharad के द्वारा
November 5, 2012

बढ़िया ब्लॉग !! दरअसल त्योहारो और उपवासो की जड़े हमारी लाइफ मे bahut गहरी है इसमें कोई शक नहीं हे और यही बात हमें औरो से अलग भी करती हे…. करवा चौथ पर कई आर्टिकल्स और ब्लोगर्स के ब्लॉग्स को पढने के बाद इस विषय के साथ साथ बाकी त्योहारो और उपवासो के बारे मे काफी डिस्कसन हुआ और हमारी नज़र मे उसका सारांश कुछ इस प्रकार है…… –>हिन्दू त्योहारो के बिना नही रह सकता , होली को रंगो द्वारा चेहरे कलरफुल होने की वजह से छोड़ दे, –> दिवाली को पटाखो की आवाज़ की वजह से छोड़ दे, –>दशहरा ताजा तरीन दुर्गा – महिषासुर विवाद की वजह से बंद कर दे, –>समाज मे आई चारित्रिक गिरावट की वजह से रक्षा बन्धन भी त्याग दे, –> नारी पर अत्याचार के खिलाफ करवा चौथ भी खतम, –>अहोई अष्टमी भी कुछ कपूत औलादों या कलियुगी माताओ के चलते बहिष्कार कर दे –>यानि हर त्योहार / पर्व / उपवास को किसी ना किसी वजह से मनाना बंद कर दे तो मित्रो क्या ऐसा नही लगेगा कि हम जीना भूल गये है ?? –>आखिर तीज त्योहारो को छोड़ कर कब 5-10 लोग इकट्ठा हो पाते है ?? फिलहाल करवा चौथ तक ही बात सीमित करते है पाठक मित्रो आप सभी काफी बुढिमान है और आपकी तर्कपूर्ण बातो से एक बात अवश्य सामने आती है कि “करवा चौथ” पर महिलाओ की तरफ से इस उपवास को रखने से जयदा नाराजगी इस बात की है कि आखिर उनका जीवनसाथी उपवास पर क्यो उनके साथ नही है…..हमारे विचार से निचे लिखी दो बातो से करवा चौथ पर बिना वजह का वाद-विवाद टला जा सकता हे 1-हमे अपनी पत्नियो को करवा चौथ व्रत रखने के लिये दवाब नही बनाना चाहिये और इसे उनकी इच्छा पर छोड़ देना चाहिये 2-अपनी इच्छा से व्रत रखने वाली नारियो के पतियो को कुछ ऐसा अलग हट के जरूर करना चाहिये ताकि उनकी पत्नियो को ए लगे कि करवा चौथ पर उनके पति उनके साथ है (इसे वे साथ-2 उपवास, प्यारे गिफ्ट, पर्याप्त समय देकर यादगार बना सकते है)…धन्यवाद

Anshu gupta के द्वारा
November 4, 2012

वाह जी वाह क्या खूब लिखा है आपने……सब कुछ सच है!मगर कभी कभी इन महिलाओ को दिल से न चाहते हुए भी सामाजिक परंपरा के निर्वहन हेतु ये ब्रत करना पड़ता है.कभी कभी इस ब्रत के माध्यम से ही वह अपने टूटते हुए रिश्ते को बचने का प्रयास करती hai …….

    nishamittal के द्वारा
    November 4, 2012

    अंशु जी , सर्वप्रथम तो आपकी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ ,आपकी यह बात तो मैं मानती हूँ कि कुछ मामलों में शायद ऐसा भी हो,परन्तु मैं जिन महिलाओं की बात कर रही हूँ वो दोनों ससुराल से अलग रहकर भी अपने मन से ही रखती हैं.

sudhajaiswal के द्वारा
November 3, 2012

आदरणीया निशा जी,सादर अभिवादन, जो पति अपनी पत्नी को जीवन के बीच सफ़र में छोड़ दे ऐसे पति के लिए व्रत रहना मेरे विचार से निरर्थक है| उम्दा लेख के लिए बधाई|

    nishamittal के द्वारा
    November 4, 2012

    धन्यवाद सुधा जी सहमती के लिए.

D33P के द्वारा
November 3, 2012

नमस्कार निशा जी …..करवाचौथ पर आपका ये ब्लॉग ……कितने सवाल है ………….विषय वाकई विचारणीय है. क्या ये व्रत रखना मजबूरी है या केवल परंपरा .या दिखावा ?मैंने ऐसे कई पति पत्नी देखे है …..रोज़ चीखते चिल्लाते है, लड़ते है पर साल के एक दिन ऐसा लगता है इनसे ज्यादा प्यार किसी और जोड़े में हो ही नहीं सकता …..क्या औचित्य है इस व्रत का ?रिश्ते व्रत से नहीं बनते रिश्ते आपसी समझ ,प्रेम और सामंजस्य से बनते है आज मैंने फेसबुक पर किसी पुरुष ने अपनी पत्नी के व्रत रखने पर और चाँद का इंतज़ार करने पर अपना ये स्टेटस लिखा देखा ….. ” bager paani piye anna ka ek dana bhi bager khaaye , kaisi haalat hoti hai har koi nahi jaan sakta hai…thanks ……you are great!!!!!!…..believe me i cant do it for you sorry …although i love you too much but ……..” यहाँ अंत में लिखा शब्द “but ” कुछ समझ नहीं आया

    nishamittal के द्वारा
    November 4, 2012

    अगर नकारात्मक अर्थ न लगायें तो बट का अर्थ शायद यही होगा की मैं तुमसे प्यार बहुत करता हूँ पर भूखा रहना मेरी क्षमता के बाहर है,या तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम मुझसे अधिक है लेकिन मैं इससे सहमत नहीं क्योंकि प्रेम किसी प्रदर्शन का मोहताज नहीं लेकिन झगडे कारण तो परिस्थिति पर निर्भर करता है परन्तु मेरे अनुसार ये एक सुन्दर परम्परा है, परन्तु उपरोक्त श्रेणियों के पति के लिए नहीं .धन्यवाद

D33P के द्वारा
November 3, 2012

नमस्कार निशा जी …..करवाचौथ पर आपका ये ब्लॉग ……कितने सवाल है ………….विषय वाकई विचारणीय है. क्या ये व्रत रखना मजबूरी है या केवल परंपरा .या दिखावा ?मैंने ऐसे कई पति पत्नी देखे है …..रोज़ चीखते चिल्लाते है, लड़ते है पर साल के एक दिन ऐसा लगता है इनसे ज्यादा प्यार किसी और जोड़े में हो ही नहीं सकता …..क्या औचित्य है इस व्रत का ?रिश्ते व्रत से नहीं बनते रिश्ते आपसी समझ ,प्रेम और सामंजस्य से बनते है आज मैंने फेसबुक पर किसी पुरुष ने अपनी पत्नी के व्रत रखने पर और चाँद का इंतज़ार करने पर अपना ये स्टेटस लिखा ” bager paani piye anna ka ek dana bhi bager khaaye , kaisi haalat hoti hai har koi nahi jaan sakta hai…thanks ……you are great!!!!!!…..believe me i cant do it for you sorry …although i love you too much but ……..” यहाँ अंत में लिखा शब्द “but ” कुछ समझ नहीं आया

    nishamittal के द्वारा
    November 4, 2012

    धन्यवाद

manjusharma के द्वारा
November 2, 2012

निशा तुम्हारा लेख पढ़ा तो आख्नों में आंसू ही आंसू आये कंही अपना दर्द दिखाा तो कंहीऔर सबका सुंदर लेखपर थैंक्स औरहार्दिक shun कामनाएं भगवान सब को सदा सबकेसाथ ही रखे

    nishamittal के द्वारा
    November 2, 2012

    आदरनीय मंजू जी,मेरी दो मित्र के जीवन की वास्तविक घटनाएं हैं ये.मेरे मन में बहुत दिनों से खटक रहा था ये अतः मंच पर प्रस्तुत कर दिया.ब्नाहुत दिनों से आपकी कोई रचना या पोस्ट नहीं आयी

krishnashri के द्वारा
November 2, 2012

आदरणीय महोदया , सादर , बहुत ही सुन्दर निवेदन . ताली तो दोनों हाथों से बजती है , नाव दोनों हाथों से खेई जाती है असली सुख तो यही है . धन्यवाद .

    nishamittal के द्वारा
    November 2, 2012

    आदरनीय श्री कृष्ण जी बहुत दिन बाद आपकी सुखद प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.मंच पर स्वागत है आपका .आभार

MAHIMA SHREE के द्वारा
November 2, 2012

आदरणीया निशा मैम, सादर नमस्कार बहुत ही सही प्रश्न चिन्ह उठाया आपने … हमारे समाज में बचपन से ही लड़कियों के मन में त्याग . समर्पण और पति ही सबकुछ है जैसे पाठ पढ़ा दिए जाते है इसलिए उन्हें पति नहीं भी चाहता है .या त्याग भी देता है तभी मन के अंदर बैठे संस्कार और भावनाएं ऐसे व्रत करने को मजबूर या कहे इन रिवाजो का अवहेलना नहीं कर पाती .. जैसा आपने उदहारण में आपने उन दो शिक्षित महिलाओ के बारें में लिखा है …. आज २प्रतिशत क्षित युवा अपनी पत्नोयों के साथ उनके लिए व्रत रखने लगे हैं जो एक आशा की किरण की तरह है पर ये बड़े पैमाने पे जबतक नहीं हो जाता तबतक ये एक तरफ़ा स्वार्थपूर्ण ही कहा जाएगा .. आपने अंतिम में पुरषों से और महिलाओ से जो अनुरोध किया है उसमे मेरी भी आवाज शामिल है … और पूरा समर्थन है .. बहुत साड़ी बधाई और शुभकामनाएं आपको करवा चौथ की … साभार

    nishamittal के द्वारा
    November 2, 2012

    महिमा श्री सहमती हेतु आभार.पति भी यदि व्रत रख रहे हैं तो उससे अधिक महत्वपूर्ण है कि वह पत्नी की भावनाओं को समझे अपने प्रति उसके सम्मान को टेकन ग्रांटेड न ले.समर्थन हेतु धन्यवाद.

आर.एन. शाही के द्वारा
November 2, 2012

श्रद्धेया निशा जी, करेंट अफ़ेयर्स (समसामयिक विषय) पर आपका पुन: एक विचारोत्तेजक लेख पढ़ने को मिला, बहुत-बहुत बधाई ! आपके विचार से सहमत हूँ कि करवा चौथ का व्रत नारी द्वारा उसी पुरुष के लिये शोभनीय है, जो उसे वास्तविक अखंड सौभाग्य का अनुभव कराने के योग्य हो । अन्यथा तो रस्म अदायगी के लिये जैसा कि आपने कहा कि कुमारियाँ भी कहीं-कहीं इस व्रत को रख ही लेती हैं । मुझे अफ़सोस है कि मेरे लिये किसी ने आजतक इस व्रत को नहीं रखा, सिवाय तीज व्रत के । फ़िर भी, मेरी शुभकामनाएँ अखंड सौभाग्यवती स्त्री समाज के लिये सदैव रही हैं, और रहेंगी भी । मेरी दो विवाहित पुत्रियों में से एक यह व्रत नियमित रूप से करती है, और तैयारियों एवं अन्य रस्मों को देखकर बड़ा सुखद लगता है । अब वो दिन लद चुके जब पुरुष की दादागिरी और अपमान झेलकर भी स्त्री उसे पति-परमेश्वर का दर्ज़ा देते हुए, आँचल से आँसुओं की धार पोंछते हुए भी उसके दीर्घायु होने की कामनाओं के साथ करवा चौथ का व्रत किया करती थी । कई तो अब तभी व्रत रखती हैं, जब ‘वे’ भी उपवास के साथ उसकी तैयारियों में सहयोग करें । बराबरी वाली फ़ीलिंग का बोलबाला होता जा रहा है । मैं कम से कम दो ऐसे सज्जनों को जानता हूँ, जिनकी यदि प्रत्येक माह में कम से कम एक बार बेलन वाली धुनाई न हो, तो दोनों में दूरियाँ बढ़ने लगती हैं । घटना घटित होने के बाद आपसी प्रेम पुन: सामान्य हो जाता है । दाम्पत्य की अवधारणा एवं मानदंड बदलते जा रहे हैं, जो आधी आबादी के सापेक्ष एक शुभ संकेत है । शेष दलित पुरुषवर्ग हेतु आपने अपनी आखिरी पंक्ति में अपने वर्ग को जो चेतावनी जारी की है, उसके लिये मेरा हार्दिक आभार स्वीकार करें ।

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    November 2, 2012

    आदरणीय सर , सादर नमस्कार आपकी टिपण्णी बड़ी ही रोचक लगी :) )). मेरा सुबह से ही मूड ख़राब था .. ठीक हो गया ..:)

    nishamittal के द्वारा
    November 2, 2012

    आदरनीय शाही जी ,विचारपूर्ण और रोचक प्रतिक्रिया पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.आपने अपने लिए व्रत न रखने की बात कही है,तो मेरे विचार से उसका कारण तीज का व्रत आपके लिए रखा जाना होगा.क्योंकि कुछ स्थानों पर तीज का व्रत ही होता है करवाचौथ नहीं मनाते.मेरे परिचितों में भी कुछ लोग तीज का व्रत बहुत श्रद्धापूर्वक करते हैं परन्तु करवा चौथ नहीं मनाते.इसी प्रकार संतान के लिए कुछ स्थानों पर जीवित पुत्रिका व्रत होता है,तो कुछ स्थानों पर अहोई अष्टमी.पश्चिमी उत्तरप्रदेश में संतान के लिए संकट चतुर्थी का भी व्रत होता है.करवाचौथ की लोकप्रियता का कारण मीडिया,धारावाहिक और फ़िल्में हैं और कुछ बाजारवाद ने भी इसकी लोकप्रियता बढ़ाई है.आपके परिवार में आपकी बेटियां करवाचौथ मनाती हैं जानकार बहुत अच्छा लगा,मेरी शुभकामनाएं सभी के लिए.और आपका आभार सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए.

    nishamittal के द्वारा
    November 2, 2012

    चलो महिमा श्री जी एक लाभ और हुआ कि खराब मूड दिलचस्प प्रतिक्रिया से ठीक हो गया

    आर.एन. शाही के द्वारा
    November 2, 2012

    आप दोनों का ही धन्यवाद !

    nishamittal के द्वारा
    November 4, 2012

    आभार आपका पुनः समय देने के लिए.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 1, 2012

बेहतरीन सामायिक रचना

    nishamittal के द्वारा
    November 2, 2012

    धन्यवाद चतुर्वेदी जी.

yamunapathak के द्वारा
November 1, 2012

प्रिय निशाजी नमस्कार एक सार्थक सन्देश के साथ आपने ब्लॉग की इतिश्री की है,विषय वस्तु वाकई विचारणीय है. सुन्दर प्रस्तुति. साभार

    nishamittal के द्वारा
    November 2, 2012

    आपका धन्यवाद यमुना जी.

vikramjitsingh के द्वारा
November 1, 2012

आदरणीया मातेश्वरी……सादर प्रणाम…… चलिए आज एक कथा सुनाते हैं…..आपको……./// ”एक बार श्री लक्ष्मी जी का वाहन ‘उल्लू’ उनसे रूठ गया…..बहुत पूछने पर भी मान नहीं रहा था…..आखिर उसे बोलना ही पड़ा…..बोला….”हे देवी….सारा जगत आपकी पूजा करता है…..लेकिन आपके वाहन (उल्लू) अर्थात ‘मेरी’ तरफ कोई फूटी आँख से भी नहीं देखता…..बस इसी बात का अफ़सोस है मुझे…..कम से कम ‘देवी’ के वाहन की ‘पूजा’ ना सही ‘कदर’ तो अवश्य ही होनी ही चाहिए…….” तो ‘देवी जी’ ने भी बहुत सोचा….कि बात तो अवश्य ही पते की……कर रहा है ‘ये’…./// बहुत सोचने के बाद ‘देवी जी’ ने कहा……’अवश्य…./// आपकी समस्या का समाधान हमने खोज लिया है….” आज के बाद ‘हमारी’ पूजा से 8-10 दिन पहले ‘आपकी’ पूजा का ‘वरदान’ आपको दिया जाता है…../// ‘इसी’ दिन ‘आपकी’ (दुनिया के सारे उल्लुओं की) पूजा की जाया करेगी…..!” बस उसी दिन से ‘इस’ दिन को ‘करवाचौथ’ का नाम दे दिया गया……. (उम्मीद है…..आपको समझने में कोई दिक्कत नहीं आएगी…….) सादर…. मातेश्वरी…….

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    वाह विक्रम जी वाह क्या कहानी बताई है रोचक और मनोरंजक वाहक होते हैं,पति वाहन नहीं और उल्लू वाहन है.खैर बहुत दिनों से आपकी प्रतिक्रिया मिस कर रहे थे,आपने एक ही में कमी पूर्ण कर दी बहुत बहुत धन्यवाद

अजय यादव के द्वारा
November 1, 2012

निशा जी ,सादर प्रणाम | बहुत सुंदर लेखन …..मुझे पति शब्द थोड़ा कम अच्छा लगता हैं ….करोड़ पति =करोड़ रुपयों का मालिक ,लखपति =लाख रुपयों का मालिक ,संजना {महिला}का पति =यानी संजना का मालिक …….. हमसफर ज्यादा better लगता हैं |{बिलकुल जरुरी नही की आप सहमत हों मेरी बात से ,माफ किजियेंगा ]……. करवाचौथ एक बहुत प्यारी प्रथा हैं ,हर पुरुष और नारी को इस दिन व्रत रहना चाहिये {मैं नही कहना चाहता की इससे देश का अनाज पेटुओ से बचता हैं}… महिला का अपने हमसफर के प्रति प्रेम ज़ाहिर ,लगाव जाहिर एवं उसकी लम्बी उम्र की कामना का प्रतीकात्मक एक बहुत ही अनूठा पर्व हैं …. …….. शादी तो नही हुयी पर करवाचौथ को व्रत रहने का प्लान किया हुवा हैं …….

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    बहुत अच्छे अजय जी,जिस सौभाग्यशालिनी हमसफर के लिय्रे आप व्रत रखने जा रहे हैं,उनको मेरी बधाई अवश्य दें आखिर उनके प्रति पूर्णतया समर्पित हमसफ़र उनको मिलने जा रहा है,ईश्वर करे आप सदा एक दुसरे के प्रति यूँ ही समर्पित रहें.आपकी व्याख्या पसंद आयी.धन्यवाद

alkargupta1 के द्वारा
November 1, 2012

निशाजी , इस आलेख द्वारा बहुत ही अच्छा सन्देश उन महिलाओं व पुरुषों को दिया है जो इस त्यौहार की गरिमा को समझ कर भी नहीं समझ पाते हैं …..जहाँ सम्बन्ध मधुर होते हैं व एक दूसरे के प्रति मान सम्मान की भावना होती है वहां इस त्यौहार का महत्त्व अधिक बढ़ जाता है…….सार्थक सन्देश के साथ अर्थपूर्ण आलेख की प्रस्तुति केलिए बधाई … करवा चौथ की आपको हार्दिक शुभकामनायें !

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    आपका आभार अलका जी और हार्दिक शुभकामनाएं सुन्दर पर्व की .

nishamittal के द्वारा
November 1, 2012

रेखा जी ब्लॉग पर प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ

rekhafbd के द्वारा
November 1, 2012

आदरणीया निशा जी अंत में मेरा अनुरोध ,विनम्र आग्रह पुरुषवर्ग से (जो ऐसा नहीं करते ) उन भाईयों से,उन पतियों से और उन पुत्रों से जिनके लिए मंगल कामनाएं ,व्रत उपवास नारी द्वारा किये जाते हैं.,क्या उनका दायित्व नहीं कि वें भी नारी जगत के प्रति सम्पूर्ण दायित्व का निर्वाह करते हुए उनको वो मानसम्मान ,सुख. खुशी प्रदान करें जिनकी वो अधिकारी हैं.और वही व्यवहार करें जिसकी अपेक्षा वो उनसे अपने लिए करते हैं. अपनी उन बहिनों से भी जो पति के लिए व्रत तो रखती हैं परन्तु पति का अपमान करने में या अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार से चूकती नहीं., बहुत ही सुंदर शब्दों से सजा हुआ सार्थक लेख ,बधाई

yogi sarswat के द्वारा
November 1, 2012

परम आदरणीय निशा जी मित्तल , सादर नमस्कार ! मैं बहुत पढ़ने वालों में से हूँ , न न सिलेबस नहीं , साहित्य और राजनीती की बहुत सी किताबें , बहुत से लेख , बहुत से लोगों को पढ़ा है मैंने ! समय बहुत रहता है मेरे पास और शौक भी है पढने का ! आप लगातार लिखती हैं , और हमेशा सामाजिक विषयों पर लिखती हैं , कहाँ से लाती हैं इतनी उर्जा ? मैंने किसी को नहीं देखा , लगातार लिखते हुए और हमेशा सार्थक , सटीक , पैनापन और प्रभावी लिखना ! आप जो भी विषय चुनती हैं , समय के हिसाब से ! मैं लेख के विषय में बहुत ज्यादा नहीं जानता ! मेरे यहाँ भी करवा चौथ का व्रत होता है लेकिन बस इतना ही मतलब होता है की खाने को पकवान मिलेंगे ! हहहाआआआअ ! मजाक कर रहा हूँ ! लेकिन आपको ऐसा नहीं लगता – की ये त्यौहार अब फेशन ज्यादा बन गया है ? सजना सवरना आवश्यक है लेकिन किसी को देख कर अपने आपको भी उसी श्रेणी में लेकर आना कहाँ तक उचित है ? इस त्यौहार पर महिलाएं अपने पति की लम्बी आयु के लिए व्रत रखती हैं – लेकिन मैंने ऐसा भी देखा है की करवा चौथ के ही दिन वो और दिनों से ज्यादा लड़ती है अपने पति से ! वज़ह ! मेरे लिए आपने इस बार हार नहीं दिया , वो पड़ोसन तो कितना बढ़िया हार लेकर आई है , उसके हसबेंड की सैलरी तो आपसे भी कम है ! आप मुझे कुछ दिलवाते भी नहीं हो ? ये कैसा विचार है ! मुझे मालूम है की अगर ये प्रतिक्रिया मेरी पत्नी ने पढ़ ली तो मेरा करवा चौथ मन जायेगा ! हहहाआआआअ लेकिन जो मुझे सच्छा लगती है , मैंने बयान कर दी !

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    योगी जी सर्वप्रथम तो आपकी रोचक चुटीली लेकिन सच्चाई के बहुत करीब प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ.हाँ ऐसी पत्नियों के लिए लिखा है अंतिम पंक्ति पढ़ लें कृपया.आभूषण आदि के लिए लड़ने वाली जहाँ तक बात है,ऐसी महिलाएं भी संख्या में कम नहीं ,परन्तु योगी जी इसका कारण बाज़ार है न कि पर्व .वैसे तो लड़ाई भी वहीँ होप्ती जहाँ प्यार अधिकार होता है.हाँ आपकी पत्नी से बात अवश्य करनी पड़ेगी और शिकायत भी क्योंकि पत्नी की बुराई मैं कैसे सहन कर सकती हूँ.धन्यवाद चने की झाडी पर चढाने के लिए.

bhanuprakashsharma के द्वारा
November 1, 2012

आदरणीय निशा जी, करवाचौथ के माध्यम से सुंदर संदेश व सामाजिक कुरितियों पर प्रहार। 

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    धन्यवाद भानु जी

shashibhushan1959 के द्वारा
November 1, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर ! करवाचौथ व्रत के सम्बन्ध में काफी जानकारी भरी रचना ! मैं मूल रूप से भोजपुर, बिहार का निवासी हूँ, और वहाँ पहले इस व्रत का कोई नामोनिशान नहीं था ! फिल्मों में जरूर देखते थे ! हाँ, जीवित्पुत्रिका और छठ व्रत की बहुत मान्यता है ! अब करवा चौथ भी प्रचलन में आने लगा है ! आदरणीय अशोक जी की टिप्पणी बहुत समीचीन है ! पति-पत्नी अगर अंतर्मन से जुड़े हैं, तो फिर दूरियां भी कोई महत्व नहीं रखती ! हार्दिक आभार !

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    आदरनीय शशि भूषण जी,मीडिया,धारावाहिक और फिल्मों ने सभी पर्वों का स्वरूप बदल दिया है,साथ ही सम्पूर्ण देश को परिचित भी करा दिया है,सभी ऐसे पर्वों के मूल में भावना परिवार कल्याण की ही है,स्वरूप भले ही भिन्न हो .धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 31, 2012

आदरणीया निशा जी करवा चौथ की हार्दिक शुभ कामनाएं बहुत सुन्दर सन्देश और जानकारियाँ आप ने दीं लोग इन सब बातों पर ध्यान दें पति पत्नी के सम्बन्ध सदा मधुर रहें तो घर परिवार बच्चे समाज सब कुछ बनता ही है सुख होता है कितना भी तनाव हो दुःख दर्द हो एक दूजे को समझ के उसमे शरीक हों दिल से अपनापन दिखे तो मन का बोझ हल्का हो जाता है थकन मिट जाती है सुख उपजता है बहुत कुछ ….सुन्दर आलेख और छवियाँ … भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    धन्यवाद शुक्ल जी सुन्दर सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु.

akraktale के द्वारा
October 31, 2012

आदरेया निशा जी                        सादर, परन्तु अब व्यवसायिकता की दौड़ में मेहंदी और ब्यूटी पार्लर्स की चांदी रहती है, दूरदर्शन धारावाहिकों के प्रभाव से अब पति भी पत्नी के साथ करवाचौथ पर व्रत रखने लगे हैं.                         आपने जो उपरोक्त पंक्तियों में लिखा है उससे यह अनुमान लगाना सहज हो जाता है कि दिखावे को कितना अधिक महत्त्व दिया जाने लगा है. यही परिस्थिति उन अभागी महिलाओं कि है जो श्रद्धा से नहीं बल्कि लोकलाज के लिए  यह व्रत रखती होंगी.                         पति पत्नी का रिश्ता मधुर होता है इस मधुरता को बनाए रखने के लिए सिर्फ एक दिन नहीं वरन सदैव ही दोनों को एक दूसरे कि भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. 

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    दिखावे की महिमा सभी पर्वों में है ,आपसे सहमत हूँ की एक दिन नहीं पारस्परिक विशवास प्रेम और अपनापन परिवार की नींव हैं धन्यवाद

pritish1 के द्वारा
October 31, 2012

अपने छोटे से पोस्ट में आपके गहरे सन्देश पर पाठकों को अवश्य विचार करना चाहिए……..भारत में स्त्रियों का सम्मान विशेष है अच्छा है हम अपनी प्राचीन भारत की और फिर से लौट चलें चारों और सुख और समृद्धि अपने आप स्थापित हो जाएगी………ॐ वन्दे मातरम

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    आभार प्रतिक्रिया हेतु प्रीतिश

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 31, 2012

शब्दों की जीवंत भावनाएं… सुन्दर चित्रांकन.

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    धन्यवाद मदनमोहन जी

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 31, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर अभिवादन प्रश्न तो आपका यक्ष प्रश्न है. नारी सदेव त्याग की मूर्ति कही गयी है. शायद ये त्रासदी उसे ही झेलनी होती है, अर्थात त्यागी जाती है. लेख हेतु बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    आभार कुशवाह जी.

vinitashukla के द्वारा
October 31, 2012

आपने सही कहा निशा जी, पत्नी से विमुख और असम्वेदनशील पतियों के लिए, करवा- चौथ का व्रत रखने का कोई औचित्य नहीं है. वह व्यक्ति – जो एक ही जनम में निभा नहीं पाया; जन्म- जन्मान्तरों तक साथ कैसे निभाएगा? एक ज्वलंत और सार्थक चर्चा पर बधाई निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    सहमती हेतु धन्यवाद विनीता जी.

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
October 31, 2012

विवाह वह संस्था है जिसमें पति-पत्नी बराबर के भागीदार हैं। अगर इनमें से कोई भी गड़बड़ या दूसरे के प्रति उतना ही समर्पित नहीं है तब इसमें दोष आ जाता है। ऐसे में पतियों के लिए भी जरूरी है कि सामान्य कारणों पर वे प्रताड़ना को छोड़ सहयोग का रवैया अपनाएं वरना अकेले पत्नी ही क्यों व्रत रखें। निशाजी, आपने सही मुद्दे को उठाया है इसके लिए साभार। जिम्मेदारी ही व्यक्ति को अधिकार प्रदान करती है और अगर कोई जिम्मेदार नहीं है तब उसे अधिकार देने की भी जरूरत नहीं है।

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    सहमती हेतु आभारी हूँ सिंह साहब,

Santlal Karun के द्वारा
October 30, 2012

“अंत में मेरा अनुरोध ,विनम्र आग्रह पुरुषवर्ग से (जो ऐसा नहीं करते ) उन भाईयों से,उन पतियों से और उन पुत्रों से जिनके लिए मंगल कामनाएं ,व्रत उपवास नारी द्वारा किये जाते हैं.,क्या उनका दायित्व नहीं कि वें भी नारी जगत के प्रति सम्पूर्ण दायित्व का निर्वाह करते हुए उनको वो मानसम्मान ,सुख. खुशी प्रदान करें जिनकी वो अधिकारी हैं.और वही व्यवहार करें जिसकी अपेक्षा वो उनसे अपने लिए करते हैं. अपनी उन बहिनों से भी जो पति के लिए व्रत तो रखती हैं परन्तु पति का अपमान करने में या अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार से चूकती नहीं.” “करवाचौथ” पर ज्ञानवर्धक, उपयोगी आलेख; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    jlsingh के द्वारा
    October 31, 2012

    करत करत अभ्यास से जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान! आपने अंतिम पैराग्राफ में दोनों स्त्री पुरुष को सामान रूप से एक दुसरे के प्रति सम्मान, प्रेम और आदर भाव रखने का सन्देश देती हैं … यही होना भी चाहिए. आखिर पति पत्नी रूपी दोनों समान पहिये से ही जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती है! साधुवाद!

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    आभार संतलाल जी.आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए.

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    आभार सिंह साहब आपके सहयोग व सद्भावनाओं के लिए.

Aniket mishra के द्वारा
October 30, 2012

निशा जी नमस्कार बहुत सुन्दर रचना जो व्यक्ति के जीवन को छू कर गुजर रही है बहुत बहुत सुन्दर रचना ……….. http://aniketknp22.jagranjunction.com/2012/10/27/11/

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    धन्यवाद अनिकेत जी.

Rajesh Dubey के द्वारा
October 30, 2012

कारवां चौथ पर बहुत सुन्दर जानकारी आपने दी है. ऐसे ब्रत पर पति की जिम्मेवारी होती है की पत्नी की भावनाओं का ख्याल रखे.

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    धन्यवाद राजेश जी.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
October 30, 2012

निशा जी सादर अभिवादन, विचारणीय पोस्ट. आपका आह्वान निश्चित ही विचारणीय है. ऊपर जिन महानुभावों का उदहारण आपने दिया है, मझे लगता है, वे अपवाद स्वरुप ही है. लेकिन ये भी सच है की शोषण को शिकार आज भी महिलाये ही ज्यादा हैं. असल में हमारा समाज आज भी पुरुष प्रधान ही है. इसी का असर दीखता है. फिर भी अन्धानुकरण, बाजारवाद, असमानता आदि पर इस पोस्ट के माद्ध्यम से विचार अवश्य करना चाहिए. साथ ही पोस्ट में आपने करवाचौथ पर विस्तृत जानकारी भी दी है. मेरी ओर से आपको पोस्ट और करवाचौथ दोनों की मुबारकबाद. http://siddequi.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    धन्यवाद सिद्दीकी जी शुभकामनाओं व प्रतिक्रिया हेतु.

Malik Parveen के द्वारा
October 30, 2012

निशा जी नमस्कार, बहुत सुंदर रचना … आपको भी करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाये … व्रत रखना या न रखना हो सकता है कही कही पर रिवाज हो , हमारी माताएं और हमारी दादी ने कभी ये व्रत नहीं रखा शायद हमारे यहाँ नहीं होता होगा लेकिन फिर भी वो अपनी पति की हर बात मानती थी और दिल से इज्ज़त करती थी शायद उसका कारण भी हमारे दादा या पिता जी का प्यार और स्नेह रहा होगा … व्रत रखे या न रखे लेकिन दिल से इज्ज़त उन्ही की होती है जो इसके लायक हो और उन पतियों को तो गर्व होना चाहिए जिनकी लम्बी उम्र के लिए पत्नियाँ व्रत रखती हैं और भगवान् से हर जन्म में उनको पाने की प्रार्थना करती हैं ! लेकिन हर पति लायक नहीं होता … सभी बहनों को करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनायें ! और भाइयों को बधाई की उनको भगवान् का दर्ज़ा उनकी पत्नियाँ देती हैं और उनके लम्बे जीवन की कामना करती हैं ! धन्यवाद…..

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    परवीन जी व्रत रखना तो एक परम्परा है कुछ परम्पराएँ ऐसी हैं जो हमको दुनिया में श्रेष्ठ बनती हैं,परन्तु इसका अर्थ नहीं की जो व्रत नहीं रखते उनमें परस्पर प्रेम नहीं.धन्यवाद आपका.

October 30, 2012

ममता की मूरत को कोटि कोटि प्रणाम , बहुत ही अच्छी प्रस्तुति उन सभी पत्नी ब्रता ,और पति ब्रताओ के लिये ,जो इस व्रत रूपी सम्मान के हक़दार है ,बधाई और करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाए ,,,,,,,,,,‘करवा चौथ’ परम्पराओं को ढोता त्यौहार प्रेम और समर्पण का प्रतीक है करवाचौथ का व्रत

    nishamittal के द्वारा
    November 1, 2012

    हिमांशु जी धन्यवाद आपका


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