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chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

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ऐसा स्वदेश प्रेम अब खो गया है .महारानी लक्ष्मी बाई (जयंती 19 नवंबर )

पोस्टेड ओन: 18 Nov, 2012 जनरल डब्बा में

इतिहास से प्राप्त एक जानकारी के अनुसार एक प्रेरक उदाहरण के साथ अपने विचार प्रस्तुत करना चाहूंगी ,जिसके अनुसार बैरकपुर में मंगल पाण्डे को चर्बी वाले कारतूसों के बारे में सर्वप्रथम मातादीन ने बताया और मातादीन को इसकी जानकारी उसकी पत्नी एक नौकरानी के रूप में अंग्रेज अफसरों के यहाँ काम करने वाली  लज्जो ने दी। उस महिला को  उन अधिकारियों के काम करते हुए  यह सुराग मिला कि अंग्रेज गाय की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहे हैं,उसने अपने पति को ये सूचना पहुंचाई . इतना ही नहीं , 9 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह करने पर 85 भारतीय सिपाहियों को हथकड़ी-बेड़ियां पहनाकर जेल भेज दिया गया और अन्य सिपाही उस शाम को घूमने निकले तो मेरठ शहर की स्त्रियों ने उन पर ताने कसे, ये वर्णन कोई अतिश्योक्ति नहीं अपितु मुरादाबाद के तत्कालीन जिला जज जेसी विल्सन ने  लिखा है कि-,’महिलाओं ने कहा कि-छिः! तुम्हारे भाई जेल खाने में और तुम यहां बाजार में मक्खियां मार रहे हो? तुम्हारे ऐसे जीने पर धिक्कार है।’ इतना सुनते ही सिपाही जोश में आ गये और अगले ही दिन 10 मई को जेलखाना तोड़कर उन्होंने  सभी कैदी सिपाहियों को छुड़ा लिया और उसी रात्रि क्रांति का बिगुल बजाते हुए दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये, जहां से 1857 की क्रांति की ज्वाला चारों दिशाओं में फैल गई.

उपरोक्त प्रसंग सबके साथ शेयर करने का कारण है कि पुरुष प्रधान समाज में सदा ये कहा जाता है , पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं.मेरा कहना है कि  होनहार पुत्रियां भी अपना परिचय अपने पालने में ही देती हैं.इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं मणिकर्णिका. 19 नवम्बर 1835  में काशी की भूमि पर उनका जन्म हुआ था.   जिनको प्यार से मनु या छबीली   पुकारा जाता था .इनके पिता   मोरोपंत ताम्बे  बिठूर में पेशवा बाजी राव की अधीनता में  कार्य  करते थे.मोरोपंत ताम्बे का जीवन सम्मानपूर्ण  ही था परन्तु पेशवा के पुत्र उनके साथ कभी कभी अपने दम्भ में उपेक्षापूर्ण व्यवहार करते थे.संस्कार सम्पन्न माता भागीरथी बाई का देहावसान हो जाने के कारण पिता के संरक्षण में राजदरबार में जाना और शस्त्र विद्या सीखना उनके खेल थे. जैसा कि महान कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी लक्ष्मी बाई पर लिखी रचना में कहा है,
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
अपनी   आकर्षक छवि तथा बालसुलभ  क्रियाओं के कारण मनु  राज दरबार में सबकी चहेती बनी रहती थीं .  राजपरिवार के बच्चों के साथ ही उनकी उत्तम शिक्षा दीक्षा हुई.अल्पायु में ही झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ उनका विवाह सम्पन्न हो गया, तथा मनु बन गईं  झांसी की रानी.मातृत्व का सुख तो आपको प्राप्त हुआ, परन्तु विधाता ने जिस प्रकार उनपर कृपा दृष्टि की थी,शीघ्र ही पहले पुत्र और फिर पति का साथ भी छूट गया और मात्र 18  वर्ष की आयु में वैधव्य का दुःख भी उनको झेलना पड़ा.
पति गंगाधर राव के जीवनकाल में ही उन्होंने  राजमहल की अपनी सखी-सहेलियों ,तथा सेविकाओं को महल में  सैन्य परीक्षण प्रदान करवा कर अपनी महिला  सैन्य टुकड़ी तैयार की.अंग्रेजों की क्रूर लोभी दृष्टि उनकी झांसी पर है,इसका अनुमान उनको था.पुत्र की मृत्यु के आघात से पति का मनोबल टूट गया था और यही कारण है कि राजा का  स्वास्थ्य प्रभावित हुआ और रानी को राजकाज पूर्ण  रूप से संभालना पड़ा.
लार्ड  डलहौजी की राज्य हड़प नीति को देखते हुए उन्होंने यद्यपि पुत्र को गोद लिया परन्तु अंग्रेज झांसी को हडपने का निश्चय कर चुके थे ,रानी गरजी “अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी.”और उनके इस निश्चय को पूर्ण करवाने में उनके एक प्रधान सहयोगी  बने ,तात्या टोपे.उनसे   रानी का परिचय बहुत पूर्व से ही था ,देशभक्त तात्या  ने रानी को समस्त गतिविधियों की जानकारी देने का कार्य किया . रानी स्वराज का स्वप्न देखती थीं. एक दिन तात्या टोपे ने समाचार दिया कि   उत्तर भारत के सिपाही और जनता आजादी के मतवाले बने हैं तथा क्रांतिकारी विद्रोही  बहादुरशाह ज़फर को अपना नेतृत्व सौपना चाहते हैं. तात्या ने यह भी बताया कि 31  मई सन 1857  को हर जगह पर विद्रोह की चिंगारी प्रज्वलित करने की योजना है,जिसके साथ ही अंग्रेजी  सत्ता का समूल नाश हो  जायेगा और स्वराज आ जाएगा.रानी को योजना तो उपयुक्त लगी परन्तु उन्होंने धैर्य रखने की प्रार्थना की.  जोश के साथ होश रखना भी आवश्यक है.  वो यही चाहती थी कि विद्रोहियों को   नियत तिथि तक संयम रखना चाहिए.
तात्या ने उनको बताया कि ग्रीष्म ऋतु के आगमन पर कमल के विकसित होने पर देश की संस्कृति के प्रतीक  के रूप मे कमल और श्रम   के प्रतीक  के रूप मे रोटी हर छावनी मे भेजी जायेगी। यह एक गुप्त संकेत होगा,जोड़ने के लिए और जागृति के लिए.अपनी सेना और सामग्री के  के साथ महारानी  31  मई  की प्रतीक्षा में थीं.परन्तु योजना का तात्कालिक परिणाम मन वांछित न हो सका,तथा समय से पूर्व ही क्रान्ति का विस्फोट हो गया. सामना तो विद्रोहियों ने अंग्रेजों का हर स्थान पर ही किया.
पारस्परिक मतभेद ,ईर्ष्या- द्वेष ,सामयिक लोभ देशभक्ति पर सदा की भांति भारी पड़ा .  देशद्रोही  एक हो कर मोर्चा नहीं संभाल सके. परन्तु झांसी का मोर्चा अंग्रेजो के लिए लोहे के चने चबाने वाला सिद्ध  हुआ,यद्यपि रानी ने अपने कोष का सभी स्वर्ण अंग्रेजों का मुहं तोड़ उत्तर देने के लिए सैन्य संसाधनों को जुटाने में व्यय कर दिया.रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं, उनका नामकरण ही उत्साह और उमंग से पूर्ण कर देता था ,कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख आदि. रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची  गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श ने अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर इस दायित्व का निर्वाह किया.रानी द्वारा की गई  क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी व  रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया. अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया.रानी को समाचार  प्राप्त हुआ  कि पीछे से तात्या  अपनी सेना के साथ   आ रहे हैं, रानी  प्रसन्न हो गई कि इधर किले से गोलो की वर्षा होगी, उधर पीछे से तात्या टोपे की मार से  अंग्रेज बीच मे पड़कर पिसकर रह जायंगे, परन्तु दुर्भाग्य से तात्या की सेना अंग्रेजों के सामने न ठहर सकी. इधर अंग्रेजो ने रानी के कुछ सरदारों को लोभ दे कर  भेद ले लिए तथा  दुर्ग पर संकट आ गया.  रानी के सब सरदार एक-एक शहीद हो रहे थे. रानी ने भी प्राणोत्सर्ग का निश्चय किया , मगर दूसरे ही पल उन्होने यह विचार छोड़ दियां. रानी ने तय किया कि उन्हें क्या करना है, अर्थात अंतिम घड़ी तक अंग्रेजो से लड़ना तथा  प्राण रहते संघर्ष करना है. उन्होने दामोदरराव को अपनी पीठ पर बांधा, हाथ मे नंगी तलवार ले , घोड़े पर सवार हुई. कुछ सवारों को साथ लिया, दुर्ग का फाटक खुलवाया और तीर की तरह अंग्रेज-सेना को चीरती हुई निकल गईं.अंग्रेजो ने बहुत पीछा किया, मगर वे रानी की धूल भी नही पा सके. हार कर वे लौटे, झांसी में घुसे और वहां उन्होने मनमानी लूटमार की, औरतों, बूढो और बच्चों का उन लोगो ने बड़ी बेरहमी से सड़को पर मारा.

rani-lakshmi-baiअश्वारूढ , दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं. झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनको बंदी बनाने के लिए उनके पास पहुंचना चाहते थे.
रानी का विचार था  कि उन्हे ग्वलियर के किले पर अधिकार कर लेना चाहिए, मोर्चा जीतने की संभावना बन सकती है, किसी का ध्यान इस ओर नही गया था, सबने रानी की  योजना को सराहा.सेना के एक भाग का  संचालन स्वयं रानी ने लिया और ग्वालियर का किला रावसाहब के नियंत्रण में आ गया.  रावसाहब पंत प्रधान पेशवा बनें।
परन्तु भौतिक लिप्साओं से प्रभावित राव साहब इस उपलब्धि का लाभ न उठा सके और डूब गए नाच-रंग आदि मे . उनकी इस ढील के परिणाम स्वरूप राज्य मे अव्यवस्था फैल गई और फिरंगी सेना   ने  ग्वालियर के किले को  पुनः घेर लिया।अब सब लोग घबराये, रानी समझ गई कि अब कुछ भी शेष नहीं , फिर भी उन्होने साहस नहीं खोया , और अपने  साथियों से डट  कर सामना करने को कहा.   एक बार फिर उनके रण बांकुरे  कमर कसकर तैयार हो गये, मगर इस बार ग्वालियर के सरदारो ने ही धोखा दिया.मोर्चा भंग हो गया.
महाप्रयाण  की घड़ी आ गई थी , रानी ने अपने अवशिष्ट  सरदारों को इकटठा किया और उनसे कहा कि अब मैं आखिरी दांव लगाने जा रही हूं, याद रखना—मेरी लाश को गोरे स्पर्श भी न कर पायें . दामोदरराव को उन्होने एक विश्वास  पात्र   सरदार के हाथों सौंप दिया.एक ओर  अंग्रेजी सेना का युद्ध घोष हुआ ,दूसरी ओर  रानी भक्त अश्व स्वर्ग सिधार चुका था.  दूसरे  घोड़े पर सवार हो कर रानी  चली, थोड़ी ही दूर जाने पर उन्हे मालूम हो गया कि घोड़ा अड़ियल है. एक नाले पर घोड़ा अड़ गया. रानी को अग्रेजों ने घेर लिया, एक निशाना उनकी आंख मे लगा और  दूसरी चोट ने उनके प्राण हर लिये. तब तक सरदार आ पहुंचे. अंग्रेज  प्राण  बचाकर भाग निकले.
घायल रानी को कष्ट तो था,शारीरिक  भी और अपनी झांसी अंग्रेजों के हाथ में जाने का भी.  परन्तु  साहस ,शौर्य और पराक्रम की उस साक्षात देवी ने आत्मबल को बनाये रखा.एक  दिव्य तेज  की दीप्ति उनके मुखमंडल पर थी.  उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा औरउन्होंने अपने तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द कर लिए.. सरदारों ने रानी को घोड़े पर से उतारा और चिता जलाकर उनकी दाह-क्रिया कर दी. रानी का सपना उस समय पूरा न हो सका, लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नही गया.वह 18 जून 1858 का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी.  उनकी चिता सजाई  गई , उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी. रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं.स्वप्न तो उनका साकार नहीं हो सका परन्तु अपने प्राणों की आहुति इस यज्ञ में दे कर उन्होंने ये प्रमाणित किया कि भारत माँ की बेटियां भी अपनी जन्मभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगाना जानती हैं. वह स्वराज्य के महल की नींव का पत्थर बनीं.उनका बलिदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है.आज  फिर, देश को फिर ऐसे ही जोश ,बलिदान और समर्पण की भावना से सम्पन्न देशभक्तों की आवश्यकता है.

अंत में उन महान वीरांगना को सुभद्रा जी की इन पंक्तियों के साथ कोटिश नमन,

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।



Tags: महारानी लक्ष्मी बाई  

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepasingh के द्वारा
November 26, 2012

वन्दे मातरम आदरणीय निशा जी. इस लेख के माध्यम से महारानी लक्ष्मी बाईको इससे अच्छी श्रधान्जली और क्या होगी जो आपने दी है. लेख पर आपको बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    दीपा जी धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
November 25, 2012

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! देर से प्रातक्रिया देने के लिए माफी चाहूँगा!

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    आपने समय निकल कर पोस्ट पढी आपका आभार सिंह साहब

Malik Parveen के द्वारा
November 22, 2012

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। निशा नमस्कार , काश हर युग में ऐसी वीरांगनाएँ पैदा हों ….

    Malik Parveen के द्वारा
    November 22, 2012

    निशा जी नमस्कार , बहुत सुंदर रचना …. काश ! हर युग में ऐसी वीर बालाएं जन्म लें और देश का गौरव बढ़ाएं …..

    nishamittal के द्वारा
    November 22, 2012

    धन्यवाद प्रवीन जी.हाँ आज देश में सबसे बड़ा अभाव इसी भाव का है

    nishamittal के द्वारा
    November 22, 2012

    नमस्कार धन्यवाद आपका

mayankkumar के द्वारा
November 22, 2012

अद्भुत सोच, अद्भुत विषय-चयन …….. निशा जी आप महान हैं अपनी कलम से , अपनी प्रतिभा से , अमीर हैं शब्दों से ……. ! आपको सादर नमन !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! सधन्यवाद !!!!!!!!!!!!!!!!!!! कृपया हमारे ब्लॉग तक भी जावें !!!!

    nishamittal के द्वारा
    November 22, 2012

    धन्यवाद आपका.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 21, 2012

shraddheyaa निशा जी , साभिवादन !……. pahle भी प्रतिक्रया भेजी थी , कहीं गुम हो गयी ! पुनश्च !1

    nishamittal के द्वारा
    November 22, 2012

    आचार्य जी ,आभार पुनः कष्ट करने के लिए.

kumarpradeep के द्वारा
November 21, 2012

आदरणीय निशा जी वन्देमातरम. लक्ष्मी बाई की स्मृतिमें लिखे गये a आपके इस लेख की जितनी सराहना करे उतना कम.

    nishamittal के द्वारा
    November 22, 2012

    आपका धन्यवाद प्रथम प्रतिक्रिया के लिए

Santlal Karun के द्वारा
November 21, 2012

आदरणीया मित्तल जी, पहले तो विश्व की अद्वितीय एवं ऐतिहासिक हुतात्म वीरांगना पर इस उत्कृष्ट लेख के लिए आप को हार्दिक साधुवाद व सदभावनाएँ ! दूसरे महारानी के पौरुष तथा बलिदान पर बहुत कुछ लिखा गया है और उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की जितनी भी प्रंशसा की जाए कम है | किन्तु तीसरे, महारानी के जीवन की एक विडंबना पर किसी का ध्यान नहीं जाता, जो मुझे कचोटती है | १३ वर्ष की कमसिन उम्र की कन्या का विवाह ५० वर्ष से अधिक उम्र वाले पुरुष के साथ कहाँ तक उचित है ? परिपक्व उम्र की मानसिकता के साथ यदि कोई स्त्री अपने से ३७ वर्ष अधिक उम्र वाले पुरुष के साथ विवाह का निर्णय लेती है, तो कोई आपत्ति नहीं, किन्तु महारानी के जीवन की इस विसंगति पर छोटे-बड़े इतिहासकारों का ध्यान क्यों नहीं गया, जिसका निर्णय निर्दयी पिता की मत्त्वाकांक्षा ने लिया हो ? क्या कच्ची उम्र की ऐसी विसंगति किसी नारी के जीवन, उसके सुख-दु:ख, सफलता-असफलता पर प्रभाव नहीं डालती ? क्या प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम की असफलता में इस विसंगति का किंचित भी हाथ नहीं ? क्या किसी नारी के जीवन की ऐसी अनकही मार्मिक पीड़ा, जिसे ह्रदय में दफनाने के अतिरिक्त कोई चारा न रहा हो, पीड़ा नहीं होती ? क्या इतिहास की ऊँचाई सिर्फ तेग-तलवार और मारकाट का मोहताज होती है ? या फिर इस विषय पर चर्चा न करना के लिए जीवनीकारों-इतिहासकारों का तिर्यक दृष्टिकोण जिम्मेदार है ? आप स्वयं एक नारी हैं, महारानी की जीवनी की विशेषज्ञा हैं, नारी-जीवन की विसंगतियों तथा वेदनाओं को भली-भाँति समझती हैं — महारानी के जीवन से जुड़े मेरी इस वेदना पर आप की क्या राय है ? कृपा कर स्पष्ट करें |

    nishamittal के द्वारा
    November 21, 2012

    मान्यवर संतलाल जी,आपने एक ऐसी विडंबना की और ध्यान आकृष्ट किया है जो विचारणीय है.इसबेमेल विवाह का क्या कारण रहा होगा,इसका उल्लेख तो इतिहास में मुझको कहीं नहीं मिलता,,परन्तु उद्देश्य रानी के पराक्रम ,सूझ-बूझ,शौर्य और कुशल नेतृत्व पर प्रकाश डालना था.परन्तु ये मेरी कमी रही कि जब उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय दिया था तो ये प्रसंग भी लिखना चाहिए था. इस विडंबना का उल्लेख नहीं किया गया..बहुत बहुत आभार आपका.

    jlsingh के द्वारा
    November 25, 2012

    आदरणीय संतलाल जी, सादर अभिवादन! जहाँ तक मैं समझता हूँ, इतिहास और साहित्य में अंतर होता है! जिस सम्वेदना की दृष्टि से आप देख रहे हैं वह साहित्यिक और सामाजिक संवेदना है! इतिहासकार इसे अनदेखी कर देते हैं. जिस काल की यह घटना है उस समय विवाह पूर्ण रूपेण पिता या अभिभावक पर ही अवलंबित था! पर आज के सन्दर्भ में इसकी व्याख्या और परिचर्चा अवश्य होनी चाहिए! आपके संवेदन शील विचार को नमन!

Lahar के द्वारा
November 21, 2012

प्रिय निशा जी सप्रेम नमस्कार वीररस से ओत – प्रोत लेख …

    nishamittal के द्वारा
    November 21, 2012

    धन्यवाद लहर जी.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 21, 2012

लाजवाब

    nishamittal के द्वारा
    November 21, 2012

    धन्यवाद

अजय यादव के द्वारा
November 20, 2012

आदरणीय निशा जी,सदर प्रणाम | जब जब देश को जरूरत हुयी हैं वीरांगनाओ ने दुर्गा का रूपधारण किया हैं | कुछ समय पहले सीमा सुरक्षा बल में कार्य करने वाली एक महिला अधिकारी से मिला ,उनके तेज और पराक्रम से बहुत प्रभावित हुआ | बहुत ही रोचक शैली में लिखी गयी कहानी |

    nishamittal के द्वारा
    November 20, 2012

    अजय जी ये कोई कहानी नहीं क्योंकि कहानी में तो काल्पनिक घटनाओं को भी जोड़ा जाता है,ये तो इतिहास से मिली जानकारी के आधार प्रस्तुत यथार्थ जानकारी है.प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
November 20, 2012

आदरणीया ,..सादर प्रणाम सदैव की तरह शानदार लेख ,…रानी लक्ष्मीबाई भारत की शिखर महानायिका हैं ,…तमाम कठिनाइयों के बावजूद जीते जी हार न मानने का प्रण उन्होंने पूरा किया था ,…नारी शक्ति कदापि भी कमजोर नहीं है ,…प्रेरणास्पद व्यक्तित्व पर शानदार लेख के लिए हार्दिक अभिनन्दन ….सादर वन्देमातरम

    nishamittal के द्वारा
    November 20, 2012

    संतोष जी ,रानी लक्ष्मी बाई यदि आजकल के नेताओं जैसे व्यक्तित्व वाली होती तो अंग्रेजी पेंशन के बल पर सामान्य जीवन बिता सकती थी उनकी पिट्ठू बन परन्तु उन्होंने राज महल का स्वर्ण भी युद्ध की तैयारियों में व्यय कर दिया.

vijay के द्वारा
November 20, 2012

आदरणीय माता जी नमस्ते , रोगटे खड़े करने वाली प्रस्तुति आज के वर्तमान हालात में हमें अनेको लक्ष्मीबाई की जरुरत है देश के वर्तमान हालात तत्कालीन हालात से ज्यादा भिन्न नहीं है देशभक्त विरागना को नमन 

    nishamittal के द्वारा
    November 20, 2012

    सही कहा आपने .धन्यवाद विजय जी.

yogi sarswat के द्वारा
November 20, 2012

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार। आपने एक बात बहुत सही कही की पुत्रियों के पाँव भी पालने में दिख जाते हैं ! लक्ष्मी बाई का ही प्रभाव था की लोग आज भी झाँसी को नहीं भूल पाए हैं ! ये मेरा सौभाग्य रहा है की मैंने अपने जीवन काल के ४ वर्ष उस नगरी में रानी लक्ष्मी बाई के किले के टेल गुजरे हैं ! आज भी लोग उन्हें याद करते हैं , रानी की वज़ह से भी और उनकी वीरता की वज़ह से भी ! बहुत सुन्दर आलेख , आदरणीय निशा जी मित्तल !

    nishamittal के द्वारा
    November 20, 2012

    आपके झांसी प्रवास के विषय में जानकार अच्छा लगा योगी,जी,प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
November 19, 2012

निशा जी लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार। वीरांगना लक्ष्मी बाई को शत शत नमन

    nishamittal के द्वारा
    November 20, 2012

    धन्यवाद रेखा जी,सच में सुभद्रा जी की इस कृति की प्रशंसा के लिए सभी शब्द कम हैं.

kpsinghorai के द्वारा
November 19, 2012

निशाजी, मेरा यह सौभाग्य है कि मैं इस वीरांगना की कर्मस्थली से जुड़ा हूं। जालौन जनपद के ही कालपी में यमुना तट के किनारे रानी लक्ष्मीबाई का युद्ध हुआ था। वहां पर उनका शस्त्रागार भी बना था, जिसमें कुछ शस्त्र रखे थे। हालांकि अब यमुना नदी के कटाव से खतरा उत्पन्न हो गया है। वैसे महिलाएं कभी कमजोर नहीं रहीं। रानी लक्ष्मीबाई ने आजादी की जो लौ जलाई थी वह शोला बनकर अंग्रेजों पर टूटी और आज हम आजादी का सुख भोग रहे हैं।…सुंदर प्रस्तुति.साभार…

    nishamittal के द्वारा
    November 20, 2012

    ये तथ्य जान कर बहुत अच्छा लगा की आपकी कर्मस्थली कालपी है.सुखद प्रतिक्रिया हेतु आभार.

akraktale के द्वारा
November 19, 2012

आदरेया निशा जी                       सादर, रानी झांसी आज भी हमारे ह्रदय में अमर हैं हम सभी भारतवासी उनके बलिदान के लिए ऋणी हैं. कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान  कि  अद्भुत रचना में वे सदैव ही अमर रहेंगी. आपने जों विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया उसके लिए आपको धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    November 20, 2012

    समय देने के लिए आभार अशोक जी.

ashishgonda के द्वारा
November 19, 2012

प्रणाम माँ जी! “रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,” जानकारी पूर्ण और रोचक आलेख के लिए धन्यवाद.  ईश्वर करे हम आपके विचारों से यूँ ही अवगत होते रहें. आपके उम्र की महिलाओं को इतना ज्ञान भगवान का दिया हुआ वरदान ही कहा जाएगा. चरणस्पर्श

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    धन्यवाद आशीष .

Rajesh Dubey के द्वारा
November 19, 2012

तेईस साल की उम्र में जब मन भोग की तरफ भागता है, तब महारानी लक्ष्मी बाई नें देश प्रेम में अपने को कुर्बान कर दिया. पुत्री हो कर अपने सम्पूर्ण पीढ़ियों को अमर करने वाली लक्ष्मी बाई के देश प्रेम से हमें तमाम सीखें मिलती है. ऐसी वीरांगना को शत-शत नमन.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    सही कहा आपने जिस आयु में मन संसार में पूर्णतया लिप्त होता है,उस आयु में पति और पुत्र के होते हुए स्वयम को अपनी मातृभूमि के लिए समर्पित करना !परन्तु हमारे देश में अधिकांश क्रांतिकारियों ने अपना जीवन होम किया है भटकने वाली आयु में धन्यवाद .

omdikshit के द्वारा
November 19, 2012

आदरणीया निशा जी, नमस्कार. सही कहा आप ने….ऐसा देश -प्रेम…लेकिन मैं यह जोड़ना चाहूँगा कि अब तो ..स्वजन-प्रेम ,लक्ष्मी-प्रेम और देह-प्रेम ,देश-प्रेम पर भारी पड़ रहा है.हो भी क्यों न? रानी लक्ष्मीबाई को ..शोहरत के सिवाय सब कुछ गंवाना पड़ा.लेकिन आज के नुमाइंदों को शोहरत ,भले ही बदनामी के रूप में हो,के साथ कई पुश्तों के लिए धन की प्राप्ति भी हो रही है.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    इसीलिये तो कहा है दीक्षित जी की ऐसा देश प्रेम आज दुर्लभ है.धन्यवाद

sinsera के द्वारा
November 19, 2012

आदरणीय निशाजी नमस्कार, जानकारी पूर्ण लेख लिखने के लिए आपको शत शत धन्यवाद.. झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई का जीवन परिचय तो सभी ने पढ़ा है लेकिन उनका जन्म दिवस 19 नवम्बर को है ये शायद ही कोई जानता हो..आजकल तो लोग इस तिथि को केवल इंदिरा गाँधी और सुष्मिता सेन के जन्म दिवस के रूप में ही जानते हैं..

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    सरिता जी,देश के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वालों के प्रति ऐसी मानसिकता कृतघ्नता की ही द्योतक है.पाठ्यपुस्तकों में भी ऐसी जानकारियाँ लुप्त हो रही हैं.धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 19, 2012

आदरणीया निशा जी सादर अभिवादन सादर नमन उस महान वीरांगना को. सादर नमन आपके महती प्रयास को. नारी क्यों कहती अबला अपने को क्या नहीं उसे निज शक्ति का ज्ञान न हि दुर्गा न ही भवानी लक्ष्मी बाई को जान लक्ष्मी बाई को जान क्यों न ये ऐसी बनती जनना है इसी मही पर क्यों न ऐसी वीरांगना जनती.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    सुन्दर पंक्तियों के साथ प्रतिक्रिया के लिए आभार आपका ,कुशवाह जी.

pritish1 के द्वारा
November 19, 2012

ऐसा देश प्रेम कभी खोता नहीं है अमर रहता है अमर रहेगा…………परम आदर्श रानी लक्ष्मीबाई अपने लक्ष्य को पूरा करने पुन: अवतरित होंगी………..क्यूंकि भारत आज भी गुलाम है उनकी झांशी आज भी गुलाम है………@@

    pritish1 के द्वारा
    November 19, 2012

    वन्दे मातरम वन्दे मातरम

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    सही कहा प्रीतिश आपने परन्तु मैं आज के समय में देशप्रेम के जज्बे की बात कर रही हूँ.धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    वन्दे मातरम

Mohinder Kumar के द्वारा
November 19, 2012

निशा जी, किसी भी सेवा भाव या कठिन कार्य के लिये एक जनून की आवश्यकता होती है और देश प्रेम भी इसी श्रेणी में आता है. आज नवयुवकों को सब सुख सुविधायें प्राप्त हैं तो वह देश प्रेम का आलाप क्यों आलापेंगें और क्यों देश की सरहदों पर मुश्किलों का सामना करेंगे. आज भी अधिकतर गरीब परिवारों से ही लोग सेना में भरती होते हैं. प्रेरक प्रसंग के लिये आभार.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    धन्यवाद मोहिन्दर जी.आपने सही कारण बताया है.

Ashish Mishra के द्वारा
November 19, 2012

अभिनेत्रियों को अपना आदर्श मानने वाली नयी नयी पीढ़ी को सीख देता लेख. मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी कर उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यबाद.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु आभार आशीष जी.

November 19, 2012

ममता की मूरत को प्रणाम , देश की वीरांगना को बहुत ही अच्छी जयंती की श्रधांजली और भलती की अलख जगाती प्रस्तुति के लिये बधाई ,,

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    धन्यवाद हिमांशु जी.

vinitashukla के द्वारा
November 19, 2012

रानी लक्ष्मी बाई की कहानी किसी भी युग में प्रासंगिक रहेगी. उनका अप्रतिम शौर्य, पीढ़ियों तक; स्वाभिमान और पराक्रम की मिसाल बना रहेगा. प्रेरक और ज्ञानवर्धक आलेख के लिए, बधाई निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    सहमती के लिए आभार धन्यवाद आपका.

bharodiya के द्वारा
November 19, 2012

भारत की बदनसीबी रही है की हर युगमें विर के साथ नपुंसक, देशभक्तो के साथ गद्दारों ने जनम लिया है ।

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    और यही हमारी विजयश्री में बाधक बना है.धन्यवाद भारोदिया जी.

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 19, 2012

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। निशाजी, सुंदर पंक्तियों के साथ…देशप्रेम को जगाने वाली नसीहत देती प्रस्तुति….अब फिर भी भेद समझें तो क्या करें.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    सुभद्रा कुमारी चौहान की ये रचना एक कालजयी रचना है,जिसकी एक एक पंक्ति उनके चरित्र को अभिव्यक्त करती है.धन्यवाद सिंह साहब

alkargupta1 के द्वारा
November 18, 2012

निशाजी , रानी लक्ष्मीबाई के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदत्त व भारत की बेटियों के लिए प्रेरणास्पद अति महत्त्वपूर्ण आलेख की प्रस्तुति के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद अलका जी.

Ravinder kumar के द्वारा
November 18, 2012

निशा जी, नमस्कार. देशप्रेम से परिपूर्ण लेख के लिए आप को बधाई. रानी लक्ष्मी बाई, रानी पद्मिनी, दुर्गा भाभी जैसी कितनी ही वीरांगनाएँ थीं जिन्होंने देश की अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी. निशा जी, वे माताएं भी वन्दनीय हैं जो अपने पुत्रों में देश प्रेम के संस्कार भरती हैं. हर बलिदान के पीछे, जिस पर पूरा देश गर्व करता है, उन सब के पीछे भारत माँ की बेटियां ही होती हैं. जय भारती. नमस्कार.

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    बेटियों के महत्व को सुन्दर रूप से अभिव्यक्त करने पर आभार

Sushma Gupta के द्वारा
November 18, 2012

प्रिय निशा जी ,रानी लक्ष्मीबाई के बिषय में सबिस्तार उनकी वीर गाथाओं का सहज ,मनोहारी बिबरण आज के युग संधर्वमें बहुत दुर्लभ व् प्रासंगिक है,इसे हमें समझना होगा….बहुत -बहुत शुभकामनाओं सहित….

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    धन्यवाद सुषमा जी विचारपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए

seemakanwal के द्वारा
November 18, 2012

ओजपूर्ण लेख .रोम -रोम में देशभक्ति का जज्बा जगाताआलेख . हार्दिक धन्यवाद . सादर ..

    nishamittal के द्वारा
    November 19, 2012

    आभार सीमा जी.




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