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बलिदानी गुरु तेग बहादुर (गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस २४ नवम्बर )

Posted On: 23 Nov, 2012 Others में

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GuruTeghBahadurS1नमन और स्मरण बलिदानी गुरु  तेग बहादुर जी का.

धर्म,देश और मानवता के नाम पर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले परम त्यागी महापुरुषों में सिख गुरुओं का आदर्श स्तुत्य है,इसी श्रृंखला में सिखों के नवम गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है .
गुरु हरगोबिन्द जी के पांचवें पुत्र त्यागमल वीर और साहसी तो बाल्यकाल से ही थे ,किशोरावस्था में अपने पिता के साथ मुगलों का वीरता पूर्वक सामना करने के कारण इनके पिता को इनके तेग अर्थात तलवार का धनी होने का परिचय प्राप्त हुआ तो इनका नाम तेग बहादुर रख दिया गया.
युद्ध की हिंसा और रक्तपात से क्षुब्ध होकर आप वैराग्य और साधना की ओर उन्मुख हुए तथा बाबा बकाला नामक स्थान पर साधना में 20  वर्ष तल्लीन रहे.अष्ठम सिख गुरु हरकिशन जी द्वारा आपको अपना उत्तराधिकारी घोषित करने पर उनके अनुयायिओं ने उनको खोज कर उनसे उत्तरदायित्व संभालने का अनुरोध किया और आप सिखों के नवम गुरु पद पर अभिषिक्त हुए.
आध्यात्मिक उपदेश देते हुए तथा जन कल्याण के कार्यों को सम्पन्न करते हुए आप देश में विविध स्थानों पर भ्रमण करते रहे और इन्ही के पुत्र गोविन्द सिंह( जिनका बचपन का नाम बाला प्रीतम था ) का पटना में 1666 में जन्म हुआ
गुरु तेग बहादुर के महान बलिदान का प्रसंग जो उनको विश्व में आद्वितीय बनता है इस प्रकार है,औरंगजेब के दरबार में एक काश्मीरी पंडित प्रतिदिन गीता के श्लोक सुनाते थे ,क्योंकि कट्टर धर्मांध केवल इस्लाम को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म मानता था,अतः उन पंडित को उन श्लोकों की व्याख्या उसी रूप में करनी होती थी कि औरंगजेब का अहंकार तथा धर्मान्धता को चोट न पहुंचे.कुछ दिन पंडितजी के अस्वस्थ होने के कारण उनके पुत्र को इस दायित्व का निर्वाह करना था .उन्होंने गीता के बहुत सारे श्लोक बादशाह को उनके मौलिक अर्थ सहित सुनाये ,तो औरंगजेब को ज्ञात हुआ कि हिन्दू धर्म ग्रन्थ श्रेष्ठ हैं .धर्मांध औरंगजेब ये सहन न कर सका और उसकी कट्टरता और भी बढ़ गयी. उसने आदेश दिया कि सभी लोग इस्लाम स्वीकार करें और राजादेश का पालन न करने पर अमानवीय अत्याचारों का तांडव प्रारम्भ हुआ.
काश्मीरी पंडितों ने गुरु के पास जाकर अपनी व्यथा सुनायी और अपनी रक्षा करने के लिए अनुरोध किया.गुरु चिंतातुर हो समाधान पर विचार कर रहे थे तो उनके नौ वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम(गोविन्द सिंह ) ने उनकी चिंता का कारण पूछा ,पिता ने उनको समस्त परिस्थिति से अवगत कराया और कहा इनको बचने का उपाय एक ही है कि मुझको प्राणघातक अत्याचार सहते हुए प्राणों का बलिदान करना होगा .वीर पिता की वीर संतान के मुख पर कोई भय नहीं था कि मेरे पिता को अपना जीवन गंवाना होगा.
उपस्थित लोगों द्वारा उनको बताने पर कि आपके पिता के बलिदान से आप अनाथ हो जायेंगें और आपकी माँ विधवा. ,बाला प्रीतम ने उत्तर दिया ‘यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएँ विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है”
अबोध बालक का ऐसा उत्तर सुनकर सब आश्चर्य चकित रह गये और गुरु तेग बहादुर ने निश्चिन्त होकर उन काश्मीरी पंडितों से कहा ,कि आप जाकर औरंगज़ेब से कह ‍दें कि यदि गुरु तेग़ बहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेग़ बहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे’. औरंगज़ेब के लिए  यह  चुनौती
उसकी धर्मान्धता पर कडा प्रहार था .

गुरु तेग़ बहादुर दिल्ली में औरंगज़ेब के दरबार में स्वयं गए. औरंगज़ेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेग़ बहादुर जी नहीं माने तो उन पर अमानवीय अत्याचार किये गए. किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया,उनके दो शिष्यों का उनके समक्ष ही वध कर दिया गया. गुरु तेग़ बहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, परन्तु उन्होंने पराजय नहीं मानी. औरंगजेब से कहा- ‘यदि तुम ज़बर्दस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए.”
कट्टर ,धर्मांध औरंगजेब क्रोध से आग बबूला हो गया और उसने तेग बहादुर जी का चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से शीश काटने का आदेश दिया और गुरु तेग बहादुर 24  नवम्बर 1675  को शहीद हो गये.ऐसे आदर्श  नगण्य  हैं.उनके बलिदान स्थल पर ही गुरुद्वारा बना है जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहब है.
गुरु तेग बहादुर जी ने सरल हिंदी में सर्वधर्म समभाव का उपदेश देते हुए कुछ पदों और साखी की भी रचना की जो गुरु ग्रन्थ साहब में संग्रहित हैं.
आज ऐसे बलिदानियों का मिलना दुर्लभ है. काश्मीरी पंडित और सम्पूर्ण मानवता उनके बलिदान को कैसे विस्मृत कर सकती है.परन्तु दुर्भाग्य आज काश्मीरी विस्थापित,हमारी  व्यवस्था के पंगु ,भीरु और अकर्मण्य होने के कारण अपने घर से दूर और लाचार है

(उपरोक्त जानकारी पुस्तकों और नेट पर आधारित है )

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52 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vikramjitsingh के द्वारा
November 28, 2012

”चूँ कार अज हमा हीलते दर-गुजशत – हलाल असत बुर्दन बा शमशीरे-दस्त” (उपरोक्त श्लोक दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखित ग्रन्थ ”श्री दशम-ग्रन्थ’ से लिया गया है….जिसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह से है………”जब ज़ुल्म असहनीय हो जाये….और किसी भी तरह से ज़ालिम ज़ुल्म करने से बाज़ ना आ रहा हो……और जब उसको समझाने के सभी रास्ते बंद हो चुके हों…..तो….उस ज़ालिम के ज़ुल्म को खत्म करने के लिए…….हाथ में तलवार उठाना…..बिलकुल जायज़ है…….और इस कारज (शुभ-कार्य) से कभी भी घबराना नहीं चाहिए……) तो क्या मातेश्वरी…….आप इस बात से सहमत हैं की….वर्तमान समय ‘बलिदान’ होने का नहीं…अपितु ‘जालिमों की बलि’ लेने का है……क्योंकि अब भी तो ज़ुल्म ही हो रहे हैं…..गरीब जनता पर…..उनके मुंह से निवाला तक छीना जा रहा है……आम आदमी को दाने-दाने को मोहताज़ कर के रख दिया है,,,,,इन बईमान और ज़ालिम नेताओं ने…../// आदरणीय मातेश्वरी……आप का लिखा हुआ आलेख अति उत्तम और प्रशंसा के काबिल है…….आपको इस उत्कृष्ट आलेख के लिए हमारा शत-शत नमन….. श्री वाहेगुरु जी का खालसा…..श्री वाहेगुरु जी फ़तेह……

    nishamittal के द्वारा
    November 29, 2012

    आपने सिख धर्म से उद्दृत कर मेरी जानकारी में वृद्धि की है,हिंसा फैलाने से हानि अपनी ही है,मारे निर्दोष जाते हैं और दोषी खिलखिलाते हैं,आभार आपका

vijay के द्वारा
November 28, 2012

आदरणीय माता जी नमस्ते ,गुरु तेगबहादुर को नमन ,आज ऐसे महापुरुषों का मिलना दुर्लभ है जो निर्स्वार्थ भाव से मानवता के लिए अपना जीवन त्याग गए वर्तमान समय के महापुरुष भी कोई नफरत फेलाता है तो कोई जातिवादी तो कोई धार्मिक उन्माद फेलाता हुआ मिल जायेगा सच में जमाना बहुत बदल गया है | विषयपरक,ज्ञानवर्धक लेख के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    November 29, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद विजय जी.

yogi sarswat के द्वारा
November 28, 2012

आपने कितना सही लिखा है की आज ऐसे महा बलिदानियों का मिलना मुश्किल ही नहीं , असंभव है ! कुछ लोग होते हैं जो अपने जीवन को दूसरों के लिए होम कर जाते हैं और अपने पीछे छोड़ जाते हैं एक कभी न ख़त्म होने वाली कहानी ! और एक आज का वक्त है , इन्ही लोगों के वंशज आज के समय में कुछ चंडी के सिक्कों की खातिर धर्म छोड़ देने या बिक जाने को तैयार बैठे हैं ! आपको हमेशा की तरह एक बेहतरीन लेखन के लिए बधाई आदरणीय निशा जी मित्तल !

    nishamittal के द्वारा
    November 28, 2012

    योगी जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ.परन्तु मैं सोचती हूँ आज ऐसे महा मानवों का अकाल क्यों हो गया है.

shashibhushan1959 के द्वारा
November 26, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर ! बलिदानी गुरु तेग बहादुर जी के सम्बन्ध में बहुत जानकारी भरी रचना ! इस वीर नरपुंगव को मेरा हार्दिक नमन !

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    आभार आदरनीय शशिभूषण जी.

mayankkumar के द्वारा
November 26, 2012

आपकी रचना में एक अलग आकर्षण है ……….. पढ़कर कृतज्ञ हुआ ……. !!!! सधन्यवाद …… !

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद मयंक जी

yamunapathak के द्वारा
November 25, 2012

आदरणीय निशाजी आपका यह ब्लॉग भी सदा की तरह बेहद प्रशंसनीय और ज्ञानवर्द्धक है.पिछला ब्लॉग भी मैंने पढ़ा.इतनी जानकारी एकत्र करना और उसे शब्द बद्ध कर मंच पर पाठकों को उपलब्द्ध करना आपकी लेखनी और निष्ठां दोनों की तरफ ही नतमस्तक कर देता है. आपका अतिशय धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद यमुना जी प्रतिक्रिया के लिए.

satya sheel agrawal के द्वारा
November 25, 2012

ज्ञानवर्द्धक जानकारी देने के लिए धन्यवाद ,निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद सत्यशील जी.

jlsingh के द्वारा
November 25, 2012

गुरु तेग बहादुर जी ने सरल हिंदी में सर्वधर्म समभाव का उपदेश देते हुए कुछ पदों और साखी की भी रचना की जो गुरु ग्रन्थ साहब में संग्रहित हैं. आज ऐसे बलिदानियों का मिलना दुर्लभ है. काश्मीरी पंडित और सम्पूर्ण मानवता उनके बलिदान को कैसे विस्मृत कर सकती है.परन्तु दुर्भाग्य आज काश्मीरी विस्थापित,हमारी व्यवस्था के पंगु ,भीरु और अकर्मण्य होने के कारण अपने घर से दूर और लाचार है! आदरणीय महोदया, सादर नमन!!!

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    विचारपूर्ण प्रतिक्रिया और सदा मिलने वाले सहयोग के लिए आभार

shalinikaushik के द्वारा
November 25, 2012

सिक्ख धर्म हमारे लिए सदैव से श्रृद्धा का विषय रहा है आपने यहाँ ऐसी शानदार प्रस्तुति दी है इसके लिए हम आपके आभारी हैं .गुरु पूर्णिमा की बधाई निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    आपको भी गुरु पर्व की बधाई.धन्यवाद

Ravinder kumar के द्वारा
November 24, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर नमस्कार. सूरा सो पहचानिए जो लड़े दीन के हेत पुर्जा पुर्जा कट मरे कबहूँ ना छाडे खेत ऐसा ही उदाहरण सिख गुरुओं ने हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है. उनका जीवन हमें सदा प्रेरित करता रहेगा. गुरु तेग बहादुर के जीवन पर प्रकाश डालते लेख के लिए आप को बधाई और शुभकामनाएं. नमस्ते जी.

    jlsingh के द्वारा
    November 25, 2012

    सूरा सो पहचानिए जो लड़े दीन के हेत पुर्जा पुर्जा कट मरे कबहूँ ना छाडे खेत रविंदर कुमार जी, सादर नमन!

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    सुन्दर पंक्तियों सहित प्रतिक्रिया हेतु आभार आपका

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद सिंह साहब

Santlal Karun के द्वारा
November 24, 2012

आदरणीया निशा मित्तल जी, बलिदानी व्यक्तित्व गुरु तेग बहादुर और उनके कृतित्व पर गवेषणात्मक, अत्यंत संदेशपरक पठनीय आलेख, साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “कट्टर ,धर्मांध औरंगजेब क्रोध से आग बबूला हो गया और उसने तेग बहादुर जी का चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से शीश काटने का आदेश दिया और गुरु तेग बहादुर 24 नवम्बर 1675 को शहीद हो गये.ऐसे आदर्श नगण्य हैं.उनके बलिदान स्थल पर ही गुरुद्वारा बना है जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहब है.”

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    आभार संतलाल जी.समय देने के लिए

seemakanwal के द्वारा
November 24, 2012

गुरु तेग बहादुर के जीवन पर लिखे आलेख के लिए हार्दिक आभार . सादर ..

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद सीमा जी.

vinitashukla के द्वारा
November 24, 2012

गुरु तेगबहादुर के अभूतपूर्व बलिदान और उनके जीवन पर प्रकाश डालती हुई प्रेरक एवं ज्ञानवर्धक पोस्ट. बधाई निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    आभार विनीता जी.

November 24, 2012

निशा जी सादर नमस्कार | आपके लेख द्वारा गुरु तेग बहादुर जी के बारे में इतनी ज्ञान परक और ऐतिहासिक जानकारी पढ़ने को मिली। बहुत ही बेहतरीन लेख |बधाई स्वीकार करें ! सादर आभार |

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    डाक्टर साहब आभार

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 24, 2012

औरंगजेब से कहा- ‘यदि तुम ज़बर्दस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए.” कट्टर ,धर्मांध औरंगजेब क्रोध से आग बबूला हो गया और उसने तेग बहादुर जी का चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से शीश काटने का आदेश दिया और गुरु तेग बहादुर 24 नवम्बर 1675 को शहीद हो गये. आदरणीया निशा जी बहुत सुन्दर आलेख .गुरु तेगबहादुर से सच बोलने कहने वाले समाज के लिए कुर्बान रहने वाले लोगों को शत शत नमन … बधाई भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद शुक्ल जी सुन्दर प्रेरक प्रतिक्रिया हेतु.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 24, 2012

समसमायिक सार्थक जानकारी

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद चतुर्वेदी जी.

अजय यादव के द्वारा
November 24, 2012

आदरणीया ,सादर प्रणाम | गुरु तेग बहादुर जी के बारे में पढ़कर,काफी कुछ जाना .बहुत ही ज्ञान परक और संकलन योग्य ,बेहतरीन लेख |बधाई और सादर आभार | सादर नमन अजय

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद डाक्टर यादव जी.

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 23, 2012

निशाजी, रानी लक्ष्मीबाई के बाद गुरु तेग बहादुर से जुड़ा यह पोस्ट देशप्रेम से ही जुड़ा है। निश्चित तौर पर इन महान विभूतियों के बारे में जानकारी प्रस्तुत कर आपने अच्छा कार्य किया है। साभार…

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद सिंह साहब ,उनको स्मरण रखना हमारा परम कर्तव्य है .

Sushma Gupta के द्वारा
November 23, 2012

निशा जी,गुरु तेगबहादुर जी,के बलिदान -दिवस पर इतनी अनमोल विस्तृत जानकारी के लिए आप अत्यधिक प्रसंसा की पात्र है…आज के युग -सन्दर्भ में नई पीडी के लिए इसीप्रकार की जानकारियाँ आवश्यक हैं |

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद सुषमा जी.

akraktale के द्वारा
November 23, 2012

आदरेया निशा जी                      सादर,गुरु तेग बहादूर साहब ने जीवन में बहुत अच्छे संदेश दिए हैं. उनके बलिदान को देश नहीं भूल सकता.गुरु जी के बलिदान दिवस पर उनके जीवन कि जानकारी साझा करने के लिये आभार.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    आदरनीय अशोक जी आभार.

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
November 23, 2012

ममता की मूरत को प्रणाम ,बहुत ही सार्थक लेख व जानकारी आभार

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद अनुराग जी.

ashishgonda के द्वारा
November 23, 2012

प्रणाम माँ जी! बहुत ही जानकारियों का एकत्रण कर सार्थक आलेख के लिए आभार. कहा ढूंढता जानकारियों को आपने ढूंढ दी इसके लिए भी धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद आशीष

Mohinder Kumar के द्वारा
November 23, 2012

निशा जी, इन्हीं महान बलिदानों के बूते पर हम इस स्वतन्त्रा के अधिकारी हुये हैं और फ़िर भी इसकी कीमत को नहीं जानते और आज के नेता इस देश को फ़िर से पराधीनता की और अग्रसर कर रहे हैं. समसमायिक सार्थक लेख के लिये आभार.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार मोहिन्दर जी.

bhanuprakashsharma के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय निशा जी, गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान से सभी देशवासियों को प्रेरणा लेकर उनके सिद्धांतों व आदर्शों पर चलने का संकल्प लेना चाहिए। यही ऐसी विभूतियों को सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। 

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    सहमति आपसे ,धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 23, 2012

गुरु तेग बहादुर जी ने सरल हिंदी में सर्वधर्म समभाव का उपदेश देते हुए कुछ पदों और साखी की भी रचना की जो गुरु ग्रन्थ साहब में संग्रहित हैं. आज ऐसे बलिदानियों का मिलना दुर्लभ है. काश्मीरी पंडित और सम्पूर्ण मानवता उनके बलिदान को कैसे विस्मृत कर सकती है.परन्तु दुर्भाग्य आज काश्मीरी विस्थापित,हमारी व्यवस्था के पंगु ,भीरु और अकर्मण्य होने के कारण अपने घर से दूर और लाचार है आदरणीय निशा जी, सादर अभिवादन आपके इन उत्क्रष्ट कार्यों को सादर नमन. बहुत जानकारी मिलती है. बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    November 26, 2012

    धन्यवाद कुशवाह जी सुन्दर सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु


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