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ऐसे क्रूर आतंकवादियों की फांसी का विरोध क्यों?(जागरण जंक्शन फोरम)

Posted On: 2 Dec, 2012 Others में

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बचपन में यदि अजनबी की अंतिम यात्रा जा रही हो तो अपनी माँ को सर पर पल्लू रखते देखा था ,उनसे पूछती थी कि ऐसा क्यों करती हैं आप.पता चला कि ये मृतात्मा के प्रति सम्मान होता है.मैं पूछती थी कि हम उनको जानते नहीं तो? वो कहती थीं ,यदि किसी की अंतिम यात्रा जा रही हो , तो ऐसा ही करना चाहिए.मेरा स्वयम का तो ये नियम बना ही परन्तु मैंने प्राय अधिकांश लोगों को किसी न किसी रूप में अपने सम्मान  भाव व्यक्त करते देखा.कुछ समय पश्चात कुछ नाटक ,सिनेमा या पुस्तकों में कहानियां पढते हुए देखा कि राक्षसों,असुरों,दैत्यों या ऐसे ही अन्य नराधमों (पुरुष-महिलाओं) के अंत पर प्रसन्नता व्यक्त की जाती ,उत्सव मनाये जाते.पुनः प्रश्न पूछा कि अब क्यों सब लोग खुशी मना रहे हैं ,पटाखे छोड़ रहे हैं,उत्सव मनाये जा रहे हैं,तो उन्होंने बताया कि ऐसे लोग दुष्टात्मा होते हैं,जो सको त्रास देते हैं,मानवता के शत्रु होते हैं.
यही उत्तर इस प्रश्न का है

क्या इंसानियत पर आघात है क्रूर हत्यारे की मृत्यु पर जश्न मनाना ?

मुंबई हमले के आरोपी कट्टर आतंवादी  अजमल कसाब को बुधवार की सुबह साढ़े सात बजे पुणे की यरवदा  जेल में फांसी पर लटका दिया गया. इससे पहले 2008 से मुंबई की ऑर्थर रोड जेल में बंदी  रखे गये कसाब को पुणे की यरवदा  जेल में पहुँचाया गया.

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अजमल  कसाब की क्षमा दान की अपील राष्ट्रपति  श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा निरस्त करने पर ही उसको मिली प्राणदंड की सजा क्रियान्वित हो सकी.  दुर्दांत  अजमल कसाब उन 10 पाकिस्तानी आतंकियों में से एक था, जिन्होंने सागर मार्ग से  मुंबई में प्रविष्ट  होकर 26/11 के दुष्कृत्य को सम्पन्न किया था. 26 नवंबर 2008 की रात को अजमल कसाब और 9 अन्य आतंकवादियों ने मुंबई के  दो होटलों, छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन, कामा अस्पताल, लियोपोल्ड कैफे और कुछ अन्य स्थानों पर हमला किया था. इन हमलों में 166 से ज्यादा लोग मारे गए थ और 300 अन्य घायल हुए थे. बाद में सुरक्षाबलों की कर्मठता,सजगता  और वीरता से   9 आतंकी मारे गए थे जबकि अजमल कसाब को  जीवित ही  बंदी बना लिया गया था

मई 2010 में अजमल आमिर कसाब को मुंबई हाई कोर्ट  ने फांसी की सज़ा सुनाई थी. कसाब को भारतीय दंड संहिता की चार धाराओं के अंतर्गत फांसी की सज़ा सुनाई गई, जबकि एक धारा के अंतर्गत उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई. विशेष अदालत के जज टहिलायनी ने निर्णय देते हुए कहा था  कि कसाब एक किलिंग मशीन है और अगर उसको  मौत की सज़ा नहीं सुनाई जाती है तो लोगों के न्याय पर से विश्वास उठ जाएगा. कसाब को हत्या, हत्या की साज़िश रचने, भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और आपराधिक गतिविधि निरोधक कानून के अंतर्गत मृत्युदंड दिया गया था . इससे पहले 3 मई 2010 को मुंबई की आर्थर रोड जेल में बनी विशेष अदालत ने कसाब पर लगे 86 आरोपों में से 83 आरोपों का सही पाया था.

अजमल कसाब ने सितंबर में राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजी थी. इससे पहले 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले को अत्यधिक RARE  बताकर कसाब की फांसी की सजा पर मुहर लगा दी थी. जस्टिस आफताब आलम और सी. के. प्रसाद ने मुंबई हमले में पकड़े गए एक मात्र जिंदा आतंकी कसाब के बारे में कहा था कि जेल में उसने पश्चाताप या सुधार के कोई संकेत नहीं दिखाए. वह खुद को हीरो और देशभक्त पाकिस्तानी बताता था. ऐसे में कोर्ट ने माना था कि कसाब के लिए फांसी ही एकमात्र  उपयुक्त सजा है. जिस अपराधी पर इतने मामले लंबित हों क्या उसके निर्दोष होने की कल्पना की जा सकती है.एक धारा 302 पर जब मृत्युदंड सुनाया जा सकता है,तो ऐसे खूखार हत्यारे के समर्थन में खड़ा होना!

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इस संदर्भ में कोई भी आपत्ति करना मानवतावाद नहीं अपितु मानवता के प्रति घोर अन्याय है.जिस क्रूरात्मा  को इतना वीभत्स कृत्य सम्पन्न करने का कोई भी पश्चाताप नहीं उसके लिए दैत्य,राक्षस,असुर हत्यारा आदि कोई   भी संज्ञा कम है ,और ऐसे नरपिशाच की फांसी पर दुःख मनाने वाला कोई भी व्यक्ति उन निर्दोष नागरिकों ,सुरक्षा कर्मियों ,अधिकारियों के प्रति शत्रुता का निर्वाह कर ही रहा है,अपितु मेरे विचार से ऐसे समर्थकों को  देश द्रोही कहा जाना चाहिए.

कसाब के दंड को  4 वर्ष तक लटका कर  रखना भी कुछ अधिक सदाशयता या निरर्थक औदार्य का ही कार्य था और उस पर दुःख मनाना उससे भी अधिक घृणित कृत्य .मेरे विचार से एक फांसी इतने निर्दोष  लोगों के परिजनों के घाव भर नहीं सकती बस तनिक सा मरहम ही लगा सकती है.जिनकी मांग के सिन्दूर पूंछे हो,जिनके बच्चे अपने जन्म लेते ही या जन्म से  पूर्व ही अनाथ हो गए,जिन माताओं की गोद सूनी हो गई सदा के लिए ,जो बहिने अपने सहोदर भाईयों को खो चुकी हों उनको कसाब की फांसी बस यही सन्देश दे सकती है,कि ऊपर वाले के यहाँ देर है अंधेर नहीं.

कसाब का अंत हो गया,अफजल को भी देश का धन लुटाने के बाद सजा ,मिलेगी ही (यदि नेताओं की सद्बुद्धि रही तो) इसी प्रकार ओसामा ,सद्दाम ……………..आदि दस्युओं का अंत हुआ ,परन्तु इनको बढ़ावा देने वाले तथा अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इनको पालने वालों को क्या सजा मिली.आतकवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं,जिनके पीछे महा शक्तियों के स्वार्थ हैं ,ये तो एक मरता है और असंख्य पैदा होते हैं .रक्तबीज हैं.रक्तबीज आदि दैत्यों का संहार तो माँ दुर्गा ने किया था.आधुनिक आतंकवाद के रूप विविध और विकरालतम हैं.साइबर आतकवाद के माध्यम से आतंकवादियों की पहुँच गहरा रही है,और शेष सब असहायहैं. छोटे-बड़े,आम आदमी -खास किसी को किसी को एक पल का भरोसा नहीं कब किस रूप में कितने लोगों की सामूहिक चिताएं सज जाएँ.

आज अन्तराष्ट्रीय  स्तर पर कठोर  नीति निर्माण और उसके निष्पक्ष क्रियान्वयन की आवश्यकता है. आज आवश्यकता उन उपायों को खोजने की है जो आतंकवाद को पनपने पर रोक लगा सके. आज आवश्यकता है देश में  ख़ुफ़िया तन्त्र को मज़बूत और हाई टेक बनाने की, सुरक्षा बलों को आधुनिकतम साधनों से सुसज्जित करने की.नहीं तो एक के बाद एक ऐसे कांड होते रहेंगें,हाई अलर्ट जारी होते रहेंगें,और निर्दोष नागरिकों की बलि ली जाती रहेगी.हम इसी प्रकार कभी आतंकवादियों पर धन लुटाते रहेंगें ,प्लेन हाइजेक होते रहेंगें और आतंकवादी उनको कैद से  मुक्त कराते  रहेंगें और ये तथाकथित मानवतावादी जिनको सहानुभूति देशवासियों से नहीं इन दुष्टात्माओं से होती है इनके समर्थन में चिल्लाते रहेंगें

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashishgonda के द्वारा
December 12, 2012

आदरणीया माँ जी! सादर चरण स्पर्श. बहुत ही आवश्यक और समयानुकूल आलेख के लिए समय दिया आपने जिससे हमारा ज्ञान भी बढ़ा है, अतः कह सकता हूँ एह एक जानकारीपूर्ण आलेख भी है. इसके लिए आभार…..(मैं जानता हूँ प्रतिक्रिया आलेखानुसार नहीं है क्षमा करियेगा.) मेरी “आभार” कविता पर पहुँच कर आशीष देने के लिए नीचे दिए लिक पर क्लिक करें- http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/12/12/%E0%A4%86%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0/

    nishamittal के द्वारा
    December 13, 2012

    धन्यवाद आशीष

vijay के द्वारा
December 12, 2012

आदरणीय माता जी नमस्ते ,सच में ऐसे दुष्ट को फासी ही सही सजा थी अगर इससे भी कठोर कुछ होता तो उसको दिया जाना चाहिए था आपके विचार से पूर्ण सहमती

    nishamittal के द्वारा
    December 12, 2012

    हार्दिक आभार विजय जी.

akraktale के द्वारा
December 4, 2012

आदरेया निशा जी                        सादर, मैंने आपके आलेख के साथ ही अब तक कि सभी प्रतिक्रियाएं भी पढ़ी हैं लगभग सभी ने आपके स्वर को ही मुखरित किया है. मै भी इस पक्ष में पूरी तरह हूँ कि जघन्यतम अपराधों कि सजा म्रत्युदंड हो और कसाब को फांसी हुई है तो यह होना ही था क्योंकि हमारे यहाँ मृत्युदंड के लिए फांसी  की ही सजा दी जाती है अन्य कोई विकल्प नही है किन्तु क्या इस पर विचार करने कि जरूरत नहीं है और यह तब और भी आवश्यक हो जाता है जब हम इसे माहात्मा गाँधी का देश कहते हैं अधिक विस्तार में मै नहीं जाऊँगा किन्तु इतना अवश्य ही कहूँगा कि फांसी मृत्यु दंड  देने का अमानवीय व विभत्स तरीका है. 

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    आदरनीय अशोक जी.फांसी क्रूरतम है परन्तु जिसने इतने लोगों को जीवित मौत के घात उतार दिया और कोई अफ़सोस उसको नहीं उसके प्रति इस भावना से सहमत नहीं और उस पर देश का पैसा बर्बाद करना,उसके भागने की सम्भावना बनी रहना कहाँ का न्याय है

manoranjanthakur के द्वारा
December 4, 2012

सुंदर प्रस्तुति … बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    धन्यवाद ठाकुर साहब

December 4, 2012

ममतामयी माता बहुत ही सार्थक लेख ,तार्किक सत्य ,दुष्ट विनाशक लेख के लिये आभार

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    धन्यवाद आपका .

bhanuprakashsharma के द्वारा
December 4, 2012

आदरणीय निशा जी, आपकी बातों से सहमत हूं। मानवता की बात होनी चाहिए, लेकिन गलती की सजा भी दी जानी चाहिए। जितनी बड़ी गलती उतनी ही सजा। यदि सजा नहीं मिलेगी तो समाज में आराजकता फैलेगी। ऐसे में आतंकी को मौत की सजा कोई गलत नहीं है, हां ये जरूर है कि सजा देने में देरी नहीं होनी चाहिए। 

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    सहमती हेतु धन्यवाद भानु जी,विलम्ब तो खतरे का भी सूचक है और अनावश्यक आर्थिक बोझ का भी

Dr S Shankar Singh के द्वारा
December 3, 2012

निशा जी, सादर नमस्कार. आपने ठीक लिखा है मानवतावादियों की सहानुभूति देशवासियों से नहीं दुष्टात्माओं से होती है मैं इन मानवाधिकारवादियों को दानावाधिकारावादी कहता हूँ. दूध का दूध और पानी का पानी करता हुआ एक अत्यंत ही सारगर्भित लेख के लिए बहुत बहुत बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    आदरनीय डॉ साहब आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ .

satya sheel agrawal के द्वारा
December 3, 2012

निशा जी .हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ही श्री बुराईयों की जड़ बनी हुई है ,वर्ना यदि शासक की इच्छा शक्ति हो तो देश में आतंक वाद को ख़त्म होने देर नहीं लगे.विस्तार से समस्या से परिचित कराने के लिए धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    समय देने के लिए धन्यवाद अग्रवाल साहब

sudhajaiswal के द्वारा
December 3, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर अभिवादन, बहुत ही सार्थक और विचारणीय लेख लिखा है आपने | आपके विचारों से मै पूरी तरह सहमत हूँ, आज ऐसे सख्त कानून के क्रियान्वयन की जरूरत है जिससे आतंकवाद जड़ से ख़त्म हो जाये | उम्दा लेख के लिए हार्दिक बधाई |

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    धन्यवाद सुधा जी प्रतिक्रिया के लिए.

yogi sarswat के द्वारा
December 3, 2012

कसाब को मारे जाने का भय जितना रहा होगा उससे ज्यादा पाकिस्तान की सांस अटकी पड़ी रही होगी , जब तक वो जिन्दा रहा ! आपने जिन विषयों को सबसे आखिर में उठाया है , ओ सोचने को मजबूर करते हैं लेकिन क्या एक आतंकवादी को मारकर हम ये समझ सकते हैं की अब भारत आतंकवाद से अछूता है ? अब भारत पर आतंकवादी हमला नहीं होगा ? लेकिन मैं कसाब के पक्ष में नहीं हूँ ! आपको गाँधी के शब्दों पर विचार करना होगा – की पाप को मारो , पापी को नहीं ! हमें कसाब को मारना ही था , मार देना अनेक लोगों का नजरिया हो सकता है , ख़ुशी हो सकती है लेकिन असली ख़ुशी तो तब है जब हम आतंकवाद से मुक्त हों , हर जगह जाने के लिए आजाद हों ! आप सिर्फ कसब को मारकर इस दंश से मुक्त माहि हो सकते ! कश्मीर में आज भी वो लोग मौजूद हैं जो कश्मीर को भारत से अलग देखना चाहते हैं ! लेकिन हमारी सरकार उन्हें वीजा देती है , पाकिस्तान जाने को पैसा देती है ! इसका मतलब सरकार ही सबसे बड़ी आतंकवादी है ? आपको याद होगा – कश्मीर में मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी के अपहरण कर्ताओं को छोड़ दिया गया था और वो स्वयं का किया गया ड्रामा था ! ऐसे लोग अगर भारत में मौजूद हैं तो कसाब जैसे लोगों की क्या औकात ? कसाब जैसे लोगों को मारा जा सकता है लेकिन सईद जैसे लोगों कप पला जा सकता है ! गज़ब का खेल है ये भी ! कसाब , जो पढना लिखना भी नहीं जानता था , उसको बरगला लिया ! लेकिन बरगलाने वाले लोग कौन था , कहाँ हैं वो आज ? क्या पता उन्ही में से कोई कल को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बन जाए तो क्या हम उसे आमंत्रित नहीं करेंगे ? कल को उन्हीं में से कोई भारत के कश्मीर का मुख्यमंत्री बन जाए तो उसे हम स्वीकार नहीं करेंगे ? हम १५ अगस्त और २६ जनवरी को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहरा सकते और हम कहते हैं हम आज़ाद हैं ? ये दिखने की आज़ादी है आदरणीय निशा जी ! ये कहने की आज़ादी है ! ये कागजों तक सिमटी आज़ादी है ! ऐसे कसाब पूरे भारत वर्ष में मौजूद हैं ! हमें कसाब के साथ साथ कसबियत को ख़त्म करना होगा !

    nishamittal के द्वारा
    December 3, 2012

    आपने सही कहा है,योगी जी,नेताओं को देश से अधिक चिंता है,अपनी स्वार्थपूर्ति की यही कारण है कि आतंकवाद का खात्मा असंभव प्रतीत हो रहा है,जिस दृढ इच्छाशक्ति की ,उसका सर्वथा अभाव है कसाब का अंत हो गया,अफजल को भी देश का धन लुटाने के बाद सजा ,मिलेगी ही (यदि नेताओं की सद्बुद्धि रही तो) इसी प्रकार ओसामा ,सद्दाम ……………..आदि दस्युओं का अंत हुआ ,परन्तु इनको बढ़ावा देने वाले तथा अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इनको पालने वालों को क्या सजा मिली.आतकवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं,जिनके पीछे महा शक्तियों के स्वार्थ हैं ,ये तो एक मरता है और असंख्य पैदा होते हैं .रक्तबीज हैं.रक्तबीज आदि दैत्यों का संहार तो माँ दुर्गा ने किया था.आधुनिक आतंकवाद के रूप विविध और विकरालतम हैं.साइबर आतकवाद के माध्यम से आतंकवादियों की पहुँच गहरा रही है,और शेष सब असहायहैं. छोटे-बड़े,आम आदमी -खास किसी को किसी को एक पल का भरोसा नहीं कब किस रूप में कितने लोगों की सामूहिक चिताएं सज जाएँ. आज अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कठोर नीति निर्माण और उसके निष्पक्ष क्रियान्वयन की आवश्यकता है. आज आवश्यकता उन उपायों को खोजने की है जो आतंकवाद को पनपने पर रोक लगा सके. यही मेरा अभिप्राय है,धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
December 2, 2012

आदरणीया निशा जी आतकवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं,जिनके पीछे महा शक्तियों के स्वार्थ हैं ,ये तो एक मरता है और असंख्य पैदा होते हैं .रक्तबीज हैं.रक्तबीज आदि दैत्यों का संहार तो माँ दुर्गा ने किया था.आधुनिक आतंकवाद के रूप विविध और विकरालतम हैं.साइबर आतकवाद के माध्यम से आतंकवादियों की पहुँच गहरा रही है,और शेष सब असहायहैं. छोटे-बड़े,आम आदमी -खास किसी को किसी को एक पल का भरोसा नहीं कब किस रूप में कितने लोगों की सामूहिक चिताएं सज जाएँ.,सार्थक लेखन

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    रेखा जी धन्यवाद बहुत बहुत

shalinikaushik के द्वारा
December 2, 2012

निशा जी ये भारत है .मैं पहले भी कसाब मामले पर एक अन्य के आलेख पर कह चुकी हूँ की यहाँ जब कोई काम हो जाये तब भी बबाल होता है जब न हो तब भी बबाल होता है .एक दुष्ट को उसके किये का फल मिल गया ये ख़ुशी की बात है मानवता की बात वहां करनी चाहिए जहाँ मानवीय तत्व हो .कसाब दुष्ट था और उसे अपने किये का फल मिल गया भले ही राजनीति वजह से .सार्थक प्रस्तुति .बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए शालिनी जी.

kpsinghorai के द्वारा
December 2, 2012

निशाजी, आपने बिल्कुल सत्य लिखा है, यह सही है कि मानवता होनी चाहिए परंतु अगर कोई इसकी हदें पार कर जाता है तो फिर उसके प्रति मानवीयता बरतने की जरूरत नहीं रह जाती क्योंकि अगर एक ओर मानवता का शोर रहेगा और दानवता फैलाई जाएगी… तो उसमें नरमी की आवश्यकता ही क्या। सुंदर प्रस्तुति…

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    धन्यवाद सिंह साहब

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 2, 2012

सार गर्भित लेख जो बचे हैं उन्हें भी दंड बधाई. आदरणीया निशा जी , सादर

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    आपने सही कहा है,धन्यवाद कुशवाह जी.

vinitashukla के द्वारा
December 2, 2012

बिलकुल सही कहा आपने, निशा जी. दुष्टात्माओं के लिए शोक नहीं मनाना चाहिए. देश के शत्रु के साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति जताना, देश के प्रति द्रोह और कृतघ्नता जैसा है. एक सार्थक, सारगर्भित लेख हेतु बधाई एवं साधुवाद.

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    आभार विनीता जी.

yamunapathak के द्वारा
December 2, 2012

aadarneeya nishaa जी इस विषय पर सभी ब्लॉग पढ़े.लिखने के लिए वक्त नहीं दे पाई.आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ. मेरा भी यही मानना है कि क्या अच्छा है क्या बुरा इससे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किसी ख़ास सन्दर्भ में क्या उचित है क्या अनुचित .आपका ब्लॉग इस बात पर बहुत सही है. साभार

    jlsingh के द्वारा
    December 3, 2012

    आदरणीया निशा जी, सादर अभिवादन! आदरणीया यमुना जी की बातों के साथ पूर्ण सहमती!

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    यमुना जी,.उचित अनुचित और परिस्थितियां दोनों शायद उलझ रहे हैं,क्योंकि एक आतंकवादी जिसका अपराध सिद्ध हो चूका है,निर्दोष लोगों की जानें इरादतन ले चूका है,और यहाँ तक की कोई पश्चाताप उसको नहीं ,यदि वो जीवित है तो शायद कुछ और जिंदगियां इसी प्रकार बर्बाद कर सकता है उसके लिए मानवता की पुकार करने वाले लोग मेरी दृष्टि में मानवता वादी हैं ही नहीं.धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    December 4, 2012

    सिंह साहब सहमती के अनुसार आपकी प्रतिक्रिया का उत्तर भी यही है.धन्यवाद


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