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संवर गया ज्योति का जीवन (प्रेरक प्रसंग)

Posted On: 13 Dec, 2012 Others में

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शकुंतला आज बहुत खुश थी ,दुखियारी शकुंतला के जीवन में दुःख -विषाद का घना अंधकार रहा था ,पता नहीं खुशियों का  उसके जीवन से ३६ का आंकड़ा क्योँ बन गया था. परन्तु आज तो वह उड़ कर ज्योति को गले लगाने के लिए उत्कंठित थी . ज्योति घर पर नहीं थी .शकुंतला की मालकिन मधु जी ने उसका मुहं मीठा करते हुए कहा था, “तेरी ज्योति ने टॉप किया है शकुंतला और उसको नौकरी भी मिल गई है,बच्चों ने नेट पर उसका रिजल्ट देखा है.”शकुंतला के मुहं से शब्द नहीं निकले ,हाँ आसूं, जिनका उससे सगा संबंध था निकल पड़े .मधु जी बोली, अरे आज क्योँ रोती  है पगली, आज तो मुहं माँगी मुराद पूरी हुई है,तेरी तपस्या का फल मिला है.शकुंतला ने मधु जी के पैर पकड़ लिए ,बोली मालकिन सब आपके कारण है,मैंने उसको जन्म दिया है पर उसको यहाँ तक पहुँचाना बस आपके ही कारण हो सका है.मधु जी ने उसको समझाना चाहा ,परन्तु सभी जानते थे कि ये एक असलियत है.

मजबूरी की शिकार शकुंतला का पति शराब का आदि था, दो बच्चे कमाई  कुछ थी नहीं ,स्वयं शकुंतला गाँव की अनपढ़ औरत थी.एक तो  शहर में बस्ती का खराब  माहौल,पति द्वारा  दिन रात मारपीट करना ,बच्चों की भूख और उनके  अँधेरे भविष्य की लाचारी के कारण शकुंतला को लोगों के झूठे बर्तन मांजने और झाडू पोछे  के काम शुरू करने को विवश होना  पड़ा.पति तो उसकी गाढे पसीने की कमाई भी हड़पने को तैयार रहता था,अतः उसकी कमाई से तो रोटी का जुगाड ही मुश्किल से होता था.शकुंतला के स्वप्न अपने बच्चों के विषय में बहुत ऊंचे थे, वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर सम्मानपूर्ण जीवन  जीने के लिए तैयार करना चाहती थी. विशेष रूप से उसकी बेटी ज्योति जो बड़ी हसरत से सभी बच्चों को स्कूल जाते देखती थी और शाम को माँ से अपनी स्कूल जाने की इच्छा जाहिर करती थी.शकुंतला को बहुत जोर पड़ता था.  शकुंतला ने सोचा यदि एक दो घर में और काम शुरू कर दे,तो शायद अपने बच्चों को पढ़ा सके. वह अपने क्रूर और शराबी पति से भी वो बच्चों को दूर रखना चाहती थी.

एक दिन शकुंतला से एक गृह स्वामिनी जिसके घर में वह काम करती थी ,कहा सामने बिल्डिंग वाली को काम के लिए एक महिला की जरूरत है.शकुंतला के पास काम अधिक था, परन्तु बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए वह उनसे बात करने चली गई.मधु जी सरल स्वभाव की लगी उसको .उन्होंने शकुंतला से उसके परिवार के विषय में पूछा तो उसने सब बता दिया.शकुंतला मेहनती ईमानदार तो  थी ही, काम भी सफाई से करती थी.मधु जी भी उसकी चाय आदि का ध्यान रखती,.एक दिन शकुंतला काम करते हुए बहुत उदास थी.मधु जी ने उससे पूछा क्या बात है,तुम्हारी तबियत खराब है,तो उसकी रुलाई फूट पडी .उसने बताया कि उसके पति ने उसको रात बहुत मारा और बेटी पर भी हाथ उठा दिया.शकुंतला को अपनी चोट इतना नहीं दुःख रही थी परन्तु बच्चों का भविष्य उसको अंधकार मय दिख रहा था.मधु जी ने उसको बड़ी कठिनाई से शांत किया.थोड़ी देर विचार कर  शकुंतला से उन्होंने कहा ,तू ज्योति को मुझे दे दे.मैं तेरी बेटी को पढ़ा लिखा कर बड़ा करूंगी.मधु जी के दो बेटे और थे.जो पढ़ाई व जॉब  आदि के करण बहुत दूर थे. “तेरी बेटी मेरे घर में नौकरानी की तरह नहीं रहेगी ,मेरी बेटी की तरह ही रहेगी.”,शकुंतला समझ नहीं पा रही थी ,क्या कहे ,अंततः उसने ‘कल  उत्तर दूँगी  मालकिन” कहकर  शकुंतला  घर  आ गई . वह जानती थी कि,उसका पति  इस बात को नहीं मानेगा ,घर में तूफ़ान मचा देगा ,परन्तु बेटी के भविष्य की सोचकर उसने अपने मन को कडा किया,अपनी बेटी को भी समझाया.ज्योति को भी अपने भाई से बहुत प्यार था ,अपने छोटे हाथों से थोड़े  बहुत काम वह कर देती थी.पढ़ाई की बात कहकर उसने ज्योति को तैयार किया, अगले दिन ज्योति को मधु जी के पास छोड़ आई .शकुंतला को  तसल्ली थी कि ज्योति उसकी नज़रों के सामने ही रहेगी.
ज्योति मधु जी के पास चली गई परन्तु उसके पिता ने घर में भी हंगामा किया और उसकी  माँ को भी  बहुत मारा ,फिर अपने दो चार शराबी साथियों को लेकर उसने मधु जी के घर के बाहर भी शोर गुल किया.परन्तु मधु जी के पति ने अपनी पहुँच के बल पर  पुलिस  को बुला कर उसको बंद करा दिया.ज्योति स्कूल बस में स्कूल जाती ,शकुंतला अपने सारे दुःख भूल गई  बेटी को प्रसन्न देख कर.कुछ समय बाद अपने पति के जेल से छूटने से पहले ही शकुंतला ये घर छोड़ कर दूसरी बस्ती में रहने चली गई.अब उसने बस्ती के ही स्कूल में अपने लड़के को भेज दिया. ज्योति की बुद्धि प्रखर थी.मधु जी के स्नेहपूर्ण व अपनेपन  से वह उनका पूरा कहना मानती .कभी  कभी माँ उससे आकर मिल जाती.ज्योति एक के बाद एक कक्षा उत्तीर्ण  करते हुए आगे बढ़ रही थी. मधु जी उसको बेटी की तरह ही रखती थी,बहुत प्रसन्न थीं वो..कभी कभी मधु जी के बेटे घर आते तो माँ को खुश देख कर उनको भी आनंद मिलता था.
ज्योति ग्रेजुएशन कर चुकी थी और बैंक  प्रतियोगिता परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया था.वही समाचार मधु जी ने शकुंतला को सुनाया  था. सभी बहुत प्रसन्न थे ज्योति का भाई भी पढ़ रहा था.पिता का तो पता  ही नहीं चला कि वो कहाँ गया ,उसके शराबी साथियों में से किसी ने बताया कि शराब के नशे में किसी ट्रक के नीचे आकार उसकी मृत्यु हो गई थी.ज्योति अब बैंक जाती थी .उसकी ट्रेनिंग चल रही थी. ज्योति को आज पहला वेतन मिला था उसने वेतन ला कर मधु जी को थमाया ,बहुत खुश हुई मधु जी परन्तु उन्होंने कहा ,इस पर तेरी माँ का हक है.शकुंतला ने उनके पैर पकड़ लिए और बोली नहीं मैडम मेरे पास रह कर तो ये जीवित भी बचती या नहीं ,शायद इसका बाप इसको बेच ही देता ,इस पर पूरा अधिकार आपका ही है.

girl-child-395x300.gif अब ज्योति की जिंदगी में एक उत्साह था.शकुंतला मन ही मन उसके विवाह के विषय में सोचती थी.मधु जी से कैसे बात करे समझ नहीं पा रही थी.आज बहुत दिन बाद जब वह ज्योति  से मिलने पहुँची तो मधु जी ने स्वयं ही उससे बात प्रारम्भ की .”ज्योति की अब शादी कर देनी चाहिए हमको .उन्होंने शकुंतला से कहा तू ज्योति से बात कर कि उसकी कोई पसंद है क्या?” शकुंतला ने कहा  मैडम शादी उसकी मर्जी से नहीं होगी.परन्तु मधु जी ने उसको समझाया बच्चे बडे हो जाएँ तो उन पर अपनी इच्छा थोपना गलत है.ज्योति से पूछा गया तो उसने स्पष्ट रूप से मना कर दिया और कहा कि उसने इस दृष्टिकोण से कभी सोचा ही नहीं.अंत में मधु जी ने स्वयं ही ये बीडा उठाया और सुयोग्य वर खोज कर ज्योति के विवाह की तिथि सुनिश्चित कर दी .
शादी में कोई कसर  उन्होंने नहीं छोड़ी ,धूम धाम से उन्होंने ज्योति की शादी की.घर, वर सब बहुत अच्छा था. .कन्यादान  भी उन्होंने स्वयं किया , उनकी दोनों बेटों,पति  ने  विवाह में बढ़ चढ कर भाग लिया.शकुंतला से उन्होंने कन्या दान के लिए  कहा तो उसने ,मना कर दिया . ज्योति विदा हो कर दूसरे शहर में चली गई.
किसी ने मधु जी से सवाल किया जब आपने ही ज्योति को पाला तो अपने बेटे से उसकी शादी क्योँ नहीं की.बहुत सुन्दर उत्तर उन्होंने दिया .उन्होंने कहा,”ज्योति की ओर मेरे पुत्र भी किसी अनुचित दृष्टि से न देख सकें अतः उनको मैंने सदा यही संस्कार दिए कि वो बहिन के रूप में सदा उसका सम्मान  और स्नेह करें ,अतः ये  कैसे संभव था.”
ऐसे लोग समाज में बिरले ही होते हैं, और ऐसे कार्यों की जो निस्वार्थ भाव से किये जाएँ जितनी भी सराहना की जाय कम है.कन्यादान की इच्छा  अपनी बेटी  न होने पर  बहुत लोगों के मन में होती है,परन्तु सामर्थ्य  होने पर पहले किसी ;लड़की को सुशिक्षित बनाकर आत्मनिर्भर बनाना और उसका विवाह सम्पन्न करना महान कृत्य है. साथ ही बेटी को बोझ मान कर कन्याभ्रूण को नष्ट करने वालों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है.सबका भाग्य ज्योति जैसा नहीं होता परन्तु यदि हम चाहें तो अपनी परिस्थिति के अनुसार ऐसा कुछ सकारात्मक काम कर हम स्वयं को तथा विषम परिस्थितियों में रह रहे अपने कर्मियों की सहायता कर सकते हैं.
(ये कोई काल्पनिक कथा नहीं वास्तविक घटना है,कथा  का पुट अवश्य प्रदान किया गया है)

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64 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
December 20, 2012

आदरेया निशा जी                          सादर, यदि यह काल्पनिक कथा न होकर सत्य घटना है तो और भी सुन्दर हो जाती है क्योंकि आज समाज में इतनी उदारता कहीं शेष है मालुम तो पडता है. बहुत ही मार्मिकता के भाव देकर आपने इसे प्रस्तुत किया है. इतनी सुन्दर प्रस्तुति पर आपको कोटि कोटि बधाइयाँ.

    nishamittal के द्वारा
    December 20, 2012

    आदरनीय अशोक जी ये वास्तविक घटना है,और मुझको बहुत सुखद लगा जब किसी और से बात करते हुए पता चला कि उनकी किसी परिचित जो नॉएडा में रहती है,इसी प्रकार लडकी को अपने पास रखा और फिर उसकी शादी अपनी लडकी की तरह की.ऊपर वाली घटना हमारे शहर की है.आभार

lata kamal के द्वारा
December 18, 2012

नमस्कार निशा जी ….बहुत ही उम्दा कहानी नुमा लेख . अच्छे लोग अभी हैं इस दुनिया में.मधु जी जेसे लोगों ने पूरा विश्वास हटने नहीं दिया है और आप जैसे लोग उनका काम हम लोगो के सामने ला कर उनका काम सार्थक कर रहे हैं और कुछ लोगों का हौसला भी बढ़ा रहे हैं .आपके लेखन की तारीफ़ करना …..छोटे मुंह बड़ी बात होगी .बहुत व्यस्तता के बीच आज पढने का मौका मिला तो सबसे पहले यही ब्लॉग खोला .शायद आप विश्वास न करें पर सबसे पहले आपको ही पढना चाहती थी .लेख के शीर्षक ने बता दिया कि यह आपका ही लेख होगा .पढ़ कर लगा कि इस व्यस्तता ने यदि मुझे कुछ दिया है तो बहुत कुछ लिया भी है .मन को संतोष हुआ कि आज अपने लिए मैंने थोडा समय निकाला . आगे भी कोशिश करुँगी .आशा है सभी सानंद होंगे .धन्यवाद…..

    nishamittal के द्वारा
    December 18, 2012

    लता जी,,बहुत अंतराल के पश्चात आज आपकी सुखद,सुन्दर सप्रयास दी प्रतिक्रिया ने मुझको भावुक बना दिया है.अपने व्यस्ततम क्षणों में आप स्मरण रखती है,जान कर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई.आपका स्नेह यूँ ही बना रहे.ऐसी आकांक्षा है,प्रतिक्रिया अच्छा लगता है,परन्तु आपका स्नेह बहुमूल्य है.आभार ,शुभकामनाएं

Shish Pal Singh के द्वारा
December 18, 2012

आप ने बहुत ही बढ़िया लेख लिखा है जिस की इस समाज को जरुरत है ! आज समाज के लिए ये एक उदहारण है कि कोई छोटा बड़ा नहीं है और लेख में वो सब्द के आप ने अपने बेटे से शादी क्यों नहीं कि उसका जबाब बहुत ही उत्तम था आज इसी उदहारण को लेकर अपने बच्चो को यही शिक्षा देनी चाहिए ! एक बार फिर आप को धन्यवाद !

    nishamittal के द्वारा
    December 18, 2012

    शीश पल जी नमस्कार,आभार आपकी प्रथम सुखद प्रतिक्रिया के लिए.

Madan Mohan saxena के द्वारा
December 17, 2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति .बहुत बधाई आपको .

    nishamittal के द्वारा
    December 18, 2012

    धन्यवाद मदनमोहन जी.

Santlal Karun के द्वारा
December 16, 2012

आदरणीया निशा जी, ‘संवर गया ज्योति का जीवन’ अभाव, विपिन्नता और पिता की मद्यपान की लत से त्रस्त कन्या-जीवन की बाधाग्रस्त, किन्तु सामाजिक समाधान का ताना-बाना लिए हुए फिल्म-शैली की कथा-पटकथा है, जो वर्षों से हमारे जनसंख्या बहुल देश में थियेटर, फिल्म, कहानी आदि में प्रेरक रूप में घटित हो रही है | पर वास्तविकता की ज़मीन पर ऐसी घटनाएँ बहुत कम हैं | एक और प्रेरणा के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “शादी में कोई कसर उन्होंने नहीं छोड़ी ,धूम धाम से उन्होंने ज्योति की शादी की.घर, वर सब बहुत अच्छा था. .कन्यादान भी उन्होंने स्वयं किया , उनकी दोनों बेटों,पति ने विवाह में बढ़ चढ कर भाग लिया.शकुंतला से उन्होंने कन्या दान के लिए कहा तो उसने ,मना कर दिया . ज्योति विदा हो कर दूसरे शहर में चली गई. xxxxxxxxxxx ऐसे लोग समाज में बिरले ही होते हैं, और ऐसे कार्यों की जो निस्वार्थ भाव से किये जाएँ जितनी भी सराहना की जाय कम है.कन्यादान की इच्छा अपनी बेटी न होने पर बहुत लोगों के मन में होती है,परन्तु सामर्थ्य होने पर पहले किसी ;लड़की को सुशिक्षित बनाकर आत्मनिर्भर बनाना और उसका विवाह सम्पन्न करना महान कृत्य है. साथ ही बेटी को बोझ मान कर कन्याभ्रूण को नष्ट करने वालों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है.सबका भाग्य ज्योति जैसा नहीं होता परन्तु यदि हम चाहें तो अपनी परिस्थिति के अनुसार ऐसा कुछ सकारात्मक काम कर हम स्वयं को तथा विषम परिस्थितियों में रह रहे अपने कर्मियों की सहायता कर सकते हैं. (ये कोई काल्पनिक कथा नहीं वास्तविक घटना है,कथा का पुट अवश्य प्रदान किया गया है)”

    nishamittal के द्वारा
    December 16, 2012

    आदरनीय संतलाल जी आपकी प्रेरणास्पद प्रतिक्रिया प्राप्त का बहुत सुखद ;लगा..आभार

ANAND PRAVIN के द्वारा
December 16, 2012

आदरणीय निशा मैम, सादर प्रणाम बेटियों के लिए आपकी करूँ कथा …..को सलाम किन्तु अब वक़्त बदल रहा है आने वाला कल शायद इतना जटिल ना हो इनके लिए…….क्युकी अब बेटियों ने सरहदों को लांगना आरम्भ कर दिया है…..

    nishamittal के द्वारा
    December 16, 2012

    आनंद जी आप जिस परिद्रश्य को देख रहे हैं वो अभी बहुत सीमित है.वास्तविक जीवन में आज भी बेटियां पराश्रित ,भेद् भाव वाली जिंदगी जी रही हैं.धन्यवाद

manju sharma के द्वारा
December 16, 2012

निशा जी आपकी कहानी में सत्य के दर्शन हैं अपनों का दुःख है समाज का दर्पण है अति सुंदर अद्भुत शिक्षाप्रद रचना पर आपको हार्दिक बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 16, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका ,सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए.

SwaSaSan के द्वारा
December 16, 2012

निशाजी; आपकी हर रचना इतनी प्रेरक होती है कि लगता है आपका नाम निशा नहीं रौशनी होना चाहिए था! मुझे भी ‘ज्योतियों’ को तलाशते २५ वर्ष हो चुके हैं…. सीमित साधनों के साथ कुछ ‘ज्योतियों’ को प्रकाशित रहने में सहायक होने का अवसर भी इश्वर ने दिया है…. मगर किसी ‘ज्योति’ को ‘ज्योति’ सा बनने में सहायक होने की आकांक्षा अपूरित है…. दो लाईना और… जिन्हें चाहिए स्वर्ग मरकर, माँगें मौत की मन्नत; चाहने वालों को दुनिया में ही है जगह जगह जन्नत ! •Charchit Chittransh •Founder •स्व सा सन swasasan.इन,swasasan.कॉम •(स्वप्न साकार संकल्प / संघ ) (स्वतंत्रता साकार संघ/संकल्प )

    nishamittal के द्वारा
    December 16, 2012

    सर्वप्रथम तो आपकी बहुत अरसे पश्चात प्राप्त प्रतिक्रिया हेतु आभार,(मैं शिकायत नहीं कर रही हूँ ,आप जो काम कर रहे हैं वो इन छोटे छोटे कामों से बहुत महत्वपूर्ण है.) आपने सही कहा है कि कहीं बार कोई काम करने चाहे तो सुपात्र नहीं मिलते.आपकी सुन्दर जन कल्याणकारी भावनाएं ,कामनाएं अवश्य फलीभूत होंगी.आपकी खूबसूरत पंक्तियों के लिए पुनः आभार .

vinitashukla के द्वारा
December 15, 2012

इतने सुंदर प्रेरक प्रसंग से रूबरू कराने के लिए आभार निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    December 16, 2012

    धन्यवाद विनीता जी.

SushmaGupta के द्वारा
December 15, 2012

निशा जी,एक अत्यंत महत्पूर्ण प्रेरक सन्देश देती हुई है ज्योति के जीवन की कहानी …इस सार्थक आलेख हेतु बहुत वधाई…

    nishamittal के द्वारा
    December 16, 2012

    धन्यवाद सुषमा जी.

sudhajaiswal के द्वारा
December 15, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर अभिवादन, बहुत ही सुन्दर सन्देश देती हुई कहानी, ऐसे ही लोगों से समाज में इंसानियत जिन्दा है, हार्दिक बधाई|

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    धन्यवाद सुधा जी,इंसानियत को जीवित रखने वाले ऐसे लोगों के दम पर ही समाज में आस्था बनी रहती है न

minujha के द्वारा
December 15, 2012

बहुत अच्छा संदेश देती रचना,बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    धन्यवाद मीनू जी.

Santosh Kumar के द्वारा
December 15, 2012

आदरणीया ,.सादर प्रणाम वास्तविक घटना की बहुत सुन्दर प्रस्तुति ,..समाज में निःस्वार्थ सेवा करने वाले प्रेरणास्रोत अक्सर मिल जाते हैं ,..किन्तु इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने वाली मधु जी की जितनी वंदना की जाय कम है ,..सुन्दर प्रेरक कथा के लिए बहुत आभार …सादर

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    आभार प्रतिक्रिया हेतु.

ashishgonda के द्वारा
December 15, 2012

आदरणीया माँ जी! सादर चरणस्पर्श, जब भी कभी मन निराश होता है, या ऐसा लगता है कि सफलता किताबों की बातें हैं तो आपके ब्लॉग पढता हूँ,इसीलिए हमेशा इसे सेव करके रखता हूँ,,,इससे मैं खुद को पुनः उर्जावान महसूस करता हूँ…उसी की तरह ये भी बहुत ही मार्गदर्शित करता आलेख है…..ईश्वर से विनती है कि आपकी कृपा यूँ ही बनी रहे क्योंकि मेरे लिए तो भगवान बाद में माँ-बाबूजी पहले हैं….. प्रणाम.

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    बहुत सुन्दर विचार ,माता-पिता भी धन्य होते हैं,ऐसी संतान से.ईश्वर करे तुम्हारी सद्भावना सदा बनी रहे.सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु आभार

ajaykr के द्वारा
December 15, 2012

बहुत प्रेरक ,समाज में मधु जैसे लोगों कि बहुत आवश्यकता हैं,

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    धन्यवाद अजय जी.

D33P के द्वारा
December 15, 2012

आदरणीया निशा जी. शानदार प्रस्तुति सादर ,

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    धन्यवाद दीप जी .

jlsingh के द्वारा
December 15, 2012

आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! अच्छे लोगों का सामना भी अक्सर अच्छे लोगों से ही होता है! आपकी सत्यकथा बहुत ही ह्रदय ग्राही और प्रेरक है! आपके प्रति सम्मान की भावना इसी प्रकार बढ़ती जाती है! निश्चित ही आप महान हैं!

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    आपकी सद्भावनाओं और सम्मानपूर्ण भावनाओं हेतु आभार

pritish1 के द्वारा
December 14, 2012

कन्या बचाओ ” से सम्बंधित एक बेहतरीन कथानक आपने प्रस्तुत किया ; जो प्रशंसनीय है……..आपने सच में ज्योति और शकुंतला के रूप में जो चरित्र यहाँ दिए हैं , प्रेरणादायक है ! आपकी रचनायें ऐसे ही सदैव हमारा मार्गदर्शन करती रहें………….आभार वन्दे मातरम

    nishamittal के द्वारा
    December 15, 2012

    धन्यवाद प्रीतिश सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए.

seemakanwal के द्वारा
December 14, 2012

निशाजी ये कथा अवश्य ही सत्य होगी क्यों की मैं भी ऐसे एक ,दो लोगों को जानती हूँ जिन्होंने ऐसे ही प्रेरक कम किये है ,काश हम लोग इनसे कुछ सीखते .

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    सीमा जी,समाज में आज भी प्रकाश पुंज के रूप में प्रेरक व्यक्तित्व विद्यमान हैं.जिनसे समाज में आस्था बनी रहती है.धन्यवाद.

Ashish Mishra के द्वारा
December 14, 2012

प्रेरक रचना. बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    ्धन्यवाद आशीष

Malik Parveen के द्वारा
December 14, 2012

नमस्कार निशा जी , रोचक न शिक्षाप्रद प्रसंग …. “बेटी बचाओ भविष्य बचाओ ” बधाई !!

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद प्रवीन जी सुखद प्रतिक्रिया हेतु.

yogi sarswat के द्वारा
December 14, 2012

समाज में सच में ऐसे दरिन्दे भी हैं जो अपने बच्चों से बढ़कर शराब को अहमियत देते हैं ! लेकिन कुछ “अनमोल ” रत्न इस सबसे प्रभावित हुए बिना जिंदगी में अपनी एक राह बना पाते हैं , धन्य हैं वो ! आपने सच में ज्योति और शकुंतला के रूप में जो चरित्र यहाँ दिए हैं , प्रेरणादायक है !

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    जीवन में प्राय अच्छा+ बुरा का मिश्रण चलता है,पर फिर भी कुछ लोग मार्गदर्शक या जीवन को संवारने वाले मिल ही जाते हैं.धन्यवाद योगी जी आपके सदा मिलने वाले सहयोग हेतु आभार.

December 14, 2012

MAMTA MAYI BAHUT HI UMDA AUR ROCHAK PRASTUTI BADHAI

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद हिमांशु जी.

Jaynit Kumar के द्वारा
December 14, 2012

Waah..!! Mann gadgad ho gayaa ye rachna padh-kar.. :)

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद जय्नित जी

mayankkumar के द्वारा
December 14, 2012

पिछली रचनाओं की तरह इस रचना में आपकी कलमकलाकारी मन को भा गई है ााााा हमारी नई रचना पर भी प्रति्क्रिया करने का कष्‍ट करें ।।।।।।।।।।।। सधन्‍यवाद ।।।

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद मयंक .

meenakshi के द्वारा
December 13, 2012

निशा जी , सप्रेम अभिवादन ! ” कन्या बचाओ ” से सम्बंधित एक बेहतरीन कथानक आपने प्रस्तुत किया ; जो प्रशंसनीय है ; प्रेरक है. बहुत-२ बधाई स्वीकार करें ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद मिनाक्षी जी,आपको बहुत परिश्रम करना पड़ता है,कमेंट प्रोब्लम के कारण फिर भी आप समय देती हैं .

bhanuprakashsharma के द्वारा
December 13, 2012

आदरणीय निशा जी। प्रेरक व रोचक कहानी। साथ ही इसके पात्र मधु को शत-शत नमन।

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद भानु प्रकाश जी.

alkargupta1 के द्वारा
December 13, 2012

भावनात्मक प्रेरणास्पद प्रसंग है निशाजी श्रेष्ठ प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद अलका जी.

bhanuprakashsharma के द्वारा
December 13, 2012

आदरणीय निशा जी। दुखियारी शकुंतला की कहानी का सुखद अंत। प्रेरक व रोचक कहानी। साथ ही इसके पात्र मधु को शत-शत नमन।

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद भानु जी.

rekhafbd के द्वारा
December 13, 2012

आदरणीया निशा जी अपनी बेटी न होने पर बहुत लोगों के मन में होती है,परन्तु सामर्थ्य होने पर पहले किसी ;लड़की को सुशिक्षित बनाकर आत्मनिर्भर बनाना और उसका विवाह सम्पन्न करना महान कृत्य है. साथ ही बेटी को बोझ मान कर कन्याभ्रूण को नष्ट करने वालों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है,प्रेरणा देती हुई कहानी को बहुत सुंदर शब्दों से लिखा है ,बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    सुखद प्रतिक्रिया और समय देने के लिए आभार

omdikshit के द्वारा
December 13, 2012

आदरणीया निशा जी, नमस्कार. भाव-पूर्ण एवं सुन्दर प्रस्तुति.

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    धन्यवाद ॐ जी प्रतिक्रिया हेतु

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 13, 2012

अपने बेटे से उसकी शादी क्योँ नहीं की.बहुत सुन्दर उत्तर उन्होंने दिया .उन्होंने कहा,”ज्योति की ओर मेरे पुत्र भी किसी अनुचित दृष्टि से न देख सकें अतः उनको मैंने सदा यही संस्कार दिए कि वो बहिन के रूप में सदा उसका सम्मान और स्नेह करें ,अतः ये कैसे संभव था.” शानदार कथा. बधाई, प्रस्तुति हेतु. सादर , आदरणीया निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    December 14, 2012

    सुखद प्रतिक्रिया हेतु आभार कुशवाह जी.


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