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फैशन बनता बलात्कार ,(सो गई है आत्मा )

Posted On: 18 Dec, 2012 Others में

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आज सर्वाधिक  प्रचलित शब्द है,माडर्न  होना या आधुनिक जीवन जीना..बच्चे ,बूढ़े,युवा,स्त्री -पुरुष सब एक ही दिशा में दौड़ लगते नज़र आते हैं, ऐसा लगता है कि उनको एक ही भय है, कि कहीं हम  इस रेस में पिछड  न जाएँ.यही कारण है,हमारा रहन-सहन,वेशभूषा ,वार्तालाप का ढंग सब बदल रहा है.ग्रामीण जीवन व्यतीत करने वाले भी किसी भी शहरी के समक्ष स्वयं को अपना पुरातन चोला उतारते नज़र आते हैं.ऐसा लगता है कि अपने पुराने परिवेश में रहना कोई अपराध है.

समय के साथ परिवर्तन स्वाभाविक है,बदलते परिवेश में समय के साथ चलना अनिवार्यता है.भूमंडलीकरण के इस युग में जब “कर लो दुनिया मुट्ठी में “का उद्घोष सुनायी देता है,तो हम स्वयं को किसी शिखर पर खड़ा पाते हैं. आज मध्यमवर्गीय भारतवासी भी फोन ,इन्टरनेट,आधुनिक वस्त्र-विन्यास ,खान-पान ,जीवन शैली को अपना रहा है. वह नयी पीढ़ी के क़दमों के साथ कदम मिलाना चाहता है.आज बच्चों को भूख लगने पर  रोटी का समोसा बनाकर,या माखन पराठा  नहीं दिया जाता,डबलरोटी,पिज्जा,बर्गर ,कोल्ड ड्रिंक दिया जाता है,गन्ने का रस,दही की लस्सी का नाम यदा कदा  ही लिया जाता है.आधुनिकतम सुख-सुविधा,विलासिता के साधन अपनी अपनी जेब के अनुसार सबके घरों में हैं.बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में मोटा डोनेशन देकर पढाये  जा रहे हैं. परन्तु इतना सब कुछ होने पर भी हमारे  विचार वहीँ के वहीँ हैं. फिल्मों से यदि कुछ सीखा है तो किसी लड़की को सड़क पर देखते ही फ़िल्मी स्टाईल में उसपर कोई फब्ती कसना,अवसर मिलते ही उसको अपनी दरिंदगी का शिकार बनाना, ,अपराध के आधुनिकतम तौर तरीके  सीखना ,शराब सिगरेट  में धुत्त रहना आदि आदि ……. और हमारे विचार आज भी वही .पीडिता को ही    अपराधिनी मान लेना (यहाँ तक कि उसके परिजनों द्वारा भी),अंधविश्वासों से मुक्त न हो पाना,लड़की के जन्म को अभिशाप मानते हुए कन्या भ्रूण हत्या जैसे पाप में लिप्त होना,दहेज के लिए भिखारी बन एक सामजिक समस्या उत्पन्न करना आदि आदि .ये कलंक सुशिक्षित  शहरी समाज के माथे के घिनौने दाग हैं.

आज समाचार पत्र में पढ़ा कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने देश में घटित बच्चों के सामूहिक हत्याकांड से व्यथित हैं,और कड़े  से कड़े कदम उठाने के लिए योजना बना रहे हैं. और निश्चित रूप से वहाँ  इस घटना की पुनरावृत्ति बहुत शीघ्र नहीं होगी ,दूसरी ओर हमारे देश में  बलात्कार,किसी भी बहिन,बेटी की इज्जत सरेआम नीलाम होने जैसी घटनाएँ आम होती जा रही हैं.जिनमें से अधिकांश पर तो पर्दा डाल दिया जाता है,  जो  राजधानी,कोई भी गाँव ,क़स्बा,महानगर ,छोटे शहर की सीमाओं में बंधी हुई नहीं हैं,सुर्ख़ियों में तब आती है,जब मीडिया की सुर्खी बन जाती है,या फिर किसी वी आई पी परिवार से सम्बन्धित घटना होती है.

rapeपूर्वी उत्तरप्रदेशवासिनी ,देहरादून से पेरामेडिकल की छात्रा ,जो अकेली नहीं अपने मित्र के साथ राजधानी दिल्ली में रात  को 9.30 बजे   चलती बस में सामूहिक बलात्कार ,उत्पीडन का शिकार बनी और  दोनों की बर्बर तरीके से पिटाई के बाद उनको बस  से नीचे फैंक दिया गया.अब लड़की बदतर जीवन कम मौत के दोराहे पर खड़ी है,,जहाँ सर्वप्रथम  तो उसके जीवन का भरोसा नहीं ,यदि मेडिकल सुविधाओं के कारण जीवन बच भी गया तो तन +मन दोनों से ही घायल वो अपना शेष जीवन व्यतीत करने को अभिशप्त होगी.

इसके पश्चात एक अन्य समाचार पढ़ा जो इस घटना के बाद का ही है,

चलती बस में युवती के साथ गैंगरेप के बाद दिल्ली में दो और बलात्कार के मामले सामने आए हैं। पहला, पूर्वी दिल्ली के न्यू अशोक नगर इलाके का है, जहां एक युवक ने पड़ोस में रहने वाली लड़की के घर में घुसकर उसका बलात्कार किया और पुलिस को बताने पर तेजाब डालने की धमकी दी।

पुलिस ने मामला दर्ज करके आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी जब घर में घुसा तो लड़की अकेली थी, परिवारवालों के घर लौटने पर पीड़ित ने घटना के बारे में उन्हें बताया। घरवालों की रिपोर्ट के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए लड़के को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

दूसरी घटना, पुरानी दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके की है, जहां एक वहशी ने पड़ोस में रहने वाली सिर्फ 6 साल की बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया।

चादंनी महल पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद पुलिस ने बच्ची का मेडिकल कराया, जिसमें बलात्कार की पुष्टि होते ही आरोपी रशीद को गिरफ्तार कर लिया गया। आरोपी को तीस हजारी कोर्ट में पेश किया गया है। पिछले 48 घंटे में दिल्ली में बलात्कार की यह तीसरी घटना है।

इस प्रकार ,एक रूटीन के रूप में  ऐसे समाचार प्राय सुनने  और पढ़ने को मिलते  हैं.कुछ दिन विशेष कवरेज मिलती है,कुछ घोषणाएँ की जाती हैं,महिला संगठन आवाज बुलंद करते हैं,और फिर वही. .एक प्रश्न  उठता है कि इस असाध्य रोग का  निदान  क्या है?
यद्यपि कोई भी सजा,कोई भी आर्थिक सहारा किसी पीडिता का जीवन तो नहीं संवार सकता,तथापि    बलात्कार के अपराधी को जिस  कठोर दंड की संस्तुति की जाती है,वह है,फांसी,परन्तु फांसी से अपराध तो खत्म होगा नहीं ,वैसे भी हमारे देश में फांसी की सजा लागू होने में वर्षों व्यतीत हो जाते हैं,और इतने समय पश्चात तो आम आदमी की स्मृति से वो घटनाएँ धूमिल होने लगती हैं. अतः दंड इतना कठोर हो    फांसी या कोई अन्य ऐसा दंड जिसकी कल्पना मात्र से बलात्कारी का रोम रोम काँप जाए.
कठोरतम क़ानून ,त्वरित न्याय,जिसके अंतर्गत ऐसी व्यवस्था हो कि न्याय अविलम्ब हो. सशस्त्र महिला पुलिस की संख्या में वृद्धि,अपनी सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले पुलिस कर्मियों का निलंबन ,सी सी  टी वी कैमरे ,निष्पक्ष न्याय मेरे विचार से सरकारी उपाय हो सकते हैं.जब तक हमारे देश में न्यायिक प्रक्रिया इतनी सुस्त रहेगी अपराधी को कोई भी भय नहीं होगा,सर्वप्रथम तो इस मध्य वो गवाहों को खरीद कर या अन्य अनैतिक साधनों के बल पर न्याय को ही खरीद लेता है .अतः न्यायिक प्रक्रिया में अविलम्ब सुधार अपरिहार्य है., अन्यथा तो आम स्मृतियाँ धूमिल पड़ने लगती हैं और सही समय पर दंड न मिलने पर पीडिता और उसके परिवार को तो पीड़ा सालती ही है,शेष  कुत्सित मानसिकता सम्पन्न अपराधियों को भी कुछ चिंता नहीं होती.दंड तो उसको मिले ही साथ ही उस भयंकर दंड का इतना प्रचार हो कि सबको पता चल सके
महिलाओं की आत्मनिर्भरता ,साहस और कोई ऐसा प्रशिक्षण उनको मिलना चाहिए कि छोटे खतरे का सामना वो स्वयम कर सकें ,विदेशों  की भांति उनके पास मिर्च का पावडर या ऐसे कुछ अन्य आत्म रक्षा के साधन अवश्य होने चाहियें.
मातापिता को भी ऐसी परिस्थिति में लड़की को संरक्षण अवश्य प्रदान करना चाहिए.साथ ही संस्कारों की घुट्टी बचपन से पिलाई जानी चाहिए,जिससे  आज जो वैचारिक पतन  और एक दम माड बनने का जूनून जो लड़कियों पर हावी है,उससे वो मुक्त रह सकें.
ऐसे पुत्रों का बचाव मातापिता द्वारा किया जाना पाप हो अर्थात मातापिता भी ऐसी संतानों को सजा दिलाने में ये सोचकर सहयोग करें  कि यदि पीडिता उनकी कोई अपनी होती तो वो अपराधी के साथ क्या व्यवहार करते ,साथ ही सकारात्मक संस्कार अपने आदर्श को समक्ष रखते हुए बच्चों को  दिए जाएँ..
एक महत्वपूर्ण तथ्य और ऐसे अपराधी का केस कोई अधिवक्ता न लड़े ,समाज के सुधार को दृष्टिगत रखते हुए अधिवक्ताओं द्वारा  इतना योगदान आधी आबादी के  हितार्थ देना एक योगदान होगा.
जैसा कि ऊपर लिखा भी है पतन समाज के सभी क्षेत्रों में है,अतः आज महिलाएं भी  निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर या चर्चित होने के लिए  कभी कभी मिथ्या आरोप लगती हैं,ऐसी परिस्थिति में उनको भी सजा मिलनी चाहिए.
एक तथ्य और किसी नेत्री ने आज कहा कि दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा के विशेष प्रबंध होने चाहियें.केवल दिल्ली में ही भारत नहीं बसता ,सुरक्षा प्रबंध सर्वत्र होने चाहियें .

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79 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ram के द्वारा
January 30, 2013

आपका लेख बहुत अच्छा लगा. अगर पेरेंट्स घर में बच्चो को अच्छे संस्कार दे और महिला वर्ग की इज्जत करना सिखाये तो बलात्कार जैसी घटनाएं बंद हो सकती है.

    nishamittal के द्वारा
    January 30, 2013

    सही कहा आपने धन्यवाद

ram के द्वारा
January 30, 2013

जैसा कि ऊपर लिखा भी है पतन समाज के सभी क्षेत्रों में है,अतः आज महिलाएं भी निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर या चर्चित होने के लिए कभी कभी मिथ्या आरोप लगती हैं,ऐसी परिस्थिति में उनको भी सजा मिलनी चाहिए. आजकल लडकिया भी लडको को घूर कर और रस्ते चलते हुए भी अपनी आँखों से लडको की आँखों से मिलाती है, ऐसा करने से बुरे लडको को आत्मिक शक्ति मिलती है. इस तरह के लडको को लडकियो की इज्ज़त न करने की शक्ति मिलती है. लडकियों को भी अच्छा समाज तैयार करने में सहयोग अवश्य करना चाहिए. वे लडको की तरह सड़क छाप न बने.

    nishamittal के द्वारा
    January 30, 2013

    श्री राम जी ,पतन समाज में सर्वत्र है अतः सुधार सभी क्षेत्रों में अपेक्षित है.लड़के लड़कियां,बड़ी पीढी सभी धन्यवाद

vikaskhobra के द्वारा
December 29, 2012

i am sorry mam…mujhe aapki bhut achhi lagi ..aur maine abhi kuch dino pahle hi ye blog banaya tha…aur main sirf chek kar rha tha ki kaisa lagega… i am really soory mam… pls mujhe maaf kar dijiyega…

    nishamittal के द्वारा
    December 29, 2012

    कोई बात नहीं आपको लेख अच्छा लगा जान कर अच्छा लगा आपको कोई मदद चाहिए आप ले सकते हैं,परन्तु मेरे साथ या किसी अन्य के साथ ऐसा न करें.अब सब बात समाप्त .लिखना अवश्य जो भी संभव हो

December 26, 2012

सादर प्रणाम! सार्थक सन्देश देता हुआ आअलेख……………………….हार्दिक आभार………………! .कृपया इसे भी पढ़ना चाहें…………………. http://follyofawiseman.jagranjunction.com/2012/12/24/%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AE-%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%8B/

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    धन्यवाद अलीन जी.

sudhajaiswal के द्वारा
December 25, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर अभिवादन, महज कठोर कानून के बन जाने से ही समस्या का निदान नहीं होगा इसके साथ ही कई सारे सकारात्मक बदलाव लाने होंगे जैसा कि आपने अपने आलेख में बताया और सबसे अहम भूमिका सरकार को निभानी होगी | आपके विचारों से मै पूरी तरह सहमत हूँ |

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    सहमती हेतु आभार सुधा जी.

December 23, 2012

बहत अच्छी प्रस्तुति , निशा जी ,

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 23, 2012

श्रद्धेया निशा जी , सादर अभिवादन !….आलेखान्तार्गत सुझावों को अगर मान लिया जाए तो अवश्य ही समाज की रूपरेखा बदल जायेगी ! पुनश्च !!

    nishamittal के द्वारा
    December 23, 2012

    जी हाँ सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार

bharodiya के द्वारा
December 23, 2012

नमस्कार निशाबहन आदमी तो पहले से ही जानवर था । राजा थक जाता था सजा दे कर । धर्म इस लिए लाया गया की राजा की सहायता करे । आदमी को भगवान से डरा के थोडा नैतिक बना दे, ताकी नियम से चले । वो सफल भी हुए । आबादी का मोटा हिस्सा भगवान के डर से सिधा चलने लगा । बाकी थोडे डफर टाईप के लोग रह गये उसे राजा ही निपट लेता था, सजा दे कर । जेल, पोलिस कोर्ट कचहरी वो डफर लोगों के लिए ही होता था । आज जानबूज कर आदमी को धर्म से अलग किया जा रहा है । जान बूज कर आदमी मी नैतिकता को तोडा जा रहा है । डफरों की आबादी बढाई जा रही है । समाज की संस्कृति में कला और साहित्य का बहुत बडा रोल होता है । ये पूरा भ्रमित लोगों के हाथ चला गया है । सामाजिक संघर्ष, नफरत, बडों का लिहाज छुडाना, नयी रोशनी की तहत नग्नता परोसना कला और साहित्यमें यही रह गया है । ये प्लानिन्ग के साथ हो रहा हैं, वरना क्या कारण है सेन्सरबोर्डमें लेफ्ट की विचारधारावाले लोग ही आते रहते हैं । कोइ हिन्दुवादी या मुस्लीमवादी क्यों नही आते । कमसे कम नग्नता तो रूक जाती । देशमे नग्नता का प्रवेशद्वार मुम्बई है । सेन्सरबोर्ड भी मुम्बई में है । बलात्कार का विरोध मुंबई में भी होना चाहिए । उस के अध्यक को बदलकर दो नये अध्यक्ष रखने की मांग होनी चाहिए । एक हिन्दुवादी और एक मुस्लिमवादी । सारी समस्या की जड नग्नता है, वो ही हटा सकते हैं । फ्रीडम ओफ एक्ष्प्रेशन खोखले शब्द है । वो तो अपना प्रदुषण छोड के पैसे कमा के साईड हो जाते हैं देश के युवा गलत राह पकड लेते हैं । आप ने अमरिका का जिकर किया । वहां लोकशाही को खतम करने के लिए मल्टिनेशनल कुछ भी कर सकती है । अमरिकी नागरिक दबंग है और वो ही अमरिका का भांडा फोड रहे हैं । स्कूली बच्चों की हत्या की आडमें वो जनता के पास से हथियार छीन लेना चाहते हैं । पूलिस राज तो वहां आ गया है और मजबूत करना चाहते हैं । भारत में अगर बलात्कारियों को फांसी की सजा करते हैं तो भारतमें बहुत उलट सुलट हो सकता है । पोलिस राज को न्योता देने बराबर है । कुछ बदमाश लोग लडकियों को हथियार बना के निर्दोष आदमीयों को ब्लॅकमेल कर सकते हैं । असली सोल्युशन यही है की नग्नता को रोका जाये । १२० करोड जनता पर प्रेशर लाने के बदले थोडे टीवी और फिल्मवालों को सिधा करना आसान होता है ।

    nishamittal के द्वारा
    December 23, 2012

    भरोदिया जी फिल्म लोबी हावी है सरकार पर क्योंकि मोटा पैसा मिलता है,अतः कोई नहीं सुनने वाला.और केवल फिल्में ही क्यों धारावाहिक,इंटरनेट वेबसाइट्स और न जाने कितने साधन है जिन्होंने संस्कृति को प्रदूषित किया है.धन्यवाद

surendr shukl bhramar के द्वारा
December 23, 2012

अतः दंड इतना कठोर हो फांसी या कोई अन्य ऐसा दंड जिसकी कल्पना मात्र से बलात्कारी का रोम रोम काँप जाए. कठोरतम क़ानून ,त्वरित न्याय,जिसके अंतर्गत ऐसी व्यवस्था हो कि न्याय अविलम्ब हो. आदरणीया निशा जी हर तरफ से यही आवाजें उठ रही हैं ..कठोरतम दंड फांसी की सजा ,,,लेकिन चोर गुनाहगार लम्पट इस तरह के कानून का साथ कहाँ देते हैं उन्हें तो अपनों की चिंता खा जाती है यही तो बेटे बेटियों को सिखा रखे हैं कल वे न फांसी पर लटक जाएँ … जबरदस्त आलेख …बधाई हो भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    December 23, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद शुक्ल जी ,बहुत समय पश्चात आपकी सुखद प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
December 23, 2012

गंभीर चिन्तन एवं संवेदना पूर्ण रचना

    nishamittal के द्वारा
    December 23, 2012

    धन्यवाद यतीन्द्र जी.

Santlal Karun के द्वारा
December 22, 2012

आदरणीया निशा मित्तल जी, बलात्कार-जैसे अपराध और उससे जुड़े न्यायिक मानदंड पर विस्तृत-वैचारिक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “यद्यपि कोई भी सजा,कोई भी आर्थिक सहारा किसी पीडिता का जीवन तो नहीं संवार सकता,तथापि बलात्कार के अपराधी को जिस कठोर दंड की संस्तुति की जाती है,वह है,फांसी,परन्तु फांसी से अपराध तो खत्म होगा नहीं ,वैसे भी हमारे देश में फांसी की सजा लागू होने में वर्षों व्यतीत हो जाते हैं,और इतने समय पश्चात तो आम आदमी की स्मृति से वो घटनाएँ धूमिल होने लगती हैं. अतः दंड इतना कठोर हो फांसी या कोई अन्य ऐसा दंड जिसकी कल्पना मात्र से बलात्कारी का रोम रोम काँप जाए.”

    nishamittal के द्वारा
    December 23, 2012

    आभारी हूँ आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए संतलाल जी.

Rajesh Dubey के द्वारा
December 22, 2012

हमारे यहाँ कानून का दुरूपयोग के मामले ज्यादा हो रहे हैं. पुलिस अपने जवाबदेही पर खरा नहीं उतरती है. पुलिस अपराधियों के हाथों बिक जाती है. मौजूदा व्यवस्था चिंतनीय है.

    nishamittal के द्वारा
    December 22, 2012

    सही कहा आपने धन्यवाद राजेश जी.

    nishamittal के द्वारा
    December 22, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी

kpsinghorai के द्वारा
December 22, 2012

निशाजी आपने हकीकत को उजागर किया है। पिशाची हरकतों के बावजूद आधुनिकता का ढोंग…. समाज का घिनौना चेहरा बनती जा रही ऐसी घटनाओं पर विराम जरूरी है और इसमें कड़े कानून के साथ सामाजिक दायित्वों का निर्वाह जरूरी है। ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साध लेने की आदत छोड़ने ही पड़ेगी और ऐसा करने वालों को कठोरतम दंड न केवल मिलना चाहिए बल्कि इसमें तेजी भी दिखनी चाहिए तभी कुछ सुधार हो सकता है। ऐसी घटनाएं जब राजधानी में हो सकती हैं तब अन्य स्थानों की बात ही क्या करना..

    nishamittal के द्वारा
    December 22, 2012

    जी हाँ मान्यवर सिंह साहब , इतने बबंडर के पश्चात भी हमारे शहर में ही परसों तीन घटनाएँ और घटित हुई,यही दर्शाता है कि कोई भय ,लज्जा या संवेदना शेष नहीं रही.और उन मामलों का क्या जो जग जाहिर हो ही नहीं पाते.धन्यवाद

Ravinder kumar के द्वारा
December 21, 2012

निशा जी, नमस्कार. आपका शुभ नाम लिखने में त्रुटी हो गई है. क्षमा चाहता हूँ.

    nishamittal के द्वारा
    December 22, 2012

    रविन्द्र जी क्षमा वाली कोई बात नहीं,

Ravinder kumar के द्वारा
December 21, 2012

सीमा जी, सादर नमस्कार. हम अपने देश और संस्कृति पर बड़ा गर्व करते हैं. हमारा इतिहास ही ऐसा रहा है. हमने महिलाओं को कभी परदे में नहीं रखा. हमारे यहाँ महिलायें राज-काज के कार्यों में बराबर सहयोग करती रही हैं. हम कन्याओं को देवी के रूप में पूजते रहे हैं. तो बलात्कार, छेड़-छाड़ जैसे घृणित कार्य कैसे हमारे समाज में घर कर गये ? कोई तो कारण है इसके पीछे. पुलिस, न्यायालय, कड़ी सजा सब ठीक है. लेकिन क्या फांसी देने से, किसी को नपुंसक बना देने से बलात्कार नहीं होंगे. फांसी के डर से अपराधी पीड़िता की हत्या भी कर सकता है. निशा जी, मेरे कहने का तात्पर्य है के हम दुनिया को मुट्ठी में भर तो लेना चाहते है लेकिन कहीं कोई बड़ी चूक हम कर रहे हैं. तकनीक में, शिक्षा में, सुविधाएं जुटाने में हम निरंतर प्रगति कर रहे हैं. लेकिन हमारे संस्कार गर्त में गिरते जा रहे हैं. हम अपने बेटों को मोबाइल और मोटर साइकिल देते हैं लेकिन कभी ये नहीं देखते के वो इन सुविधाओं का कैसे प्रयोग कर रहा है. मनोरंजन और दर्शकों की मांग का बहाना लेकर अश्लीलता परोसने से बचना होगा. हमारी संस्कृति इस प्रकार की अश्लीलता को स्वीकार नहीं कर सकती. हमें अपने बच्चों को संस्कारित करना होगा. उन्हें संयम का पाठ पढ़ाना होगा. उन्हें सेक्स की शिक्षा नहीं, योग और अध्यातम की शिक्षा देनी होगी. हम पूर्व के वासी है, हमें पश्चिम का अन्धानुकरण छोड़ना होगा.

    nishamittal के द्वारा
    December 22, 2012

    आपसे सहमत हूँ रवि न्द्र जी.संस्कार देने वाले ही संस्कार आदि को पिछड़ा कहकर पश्चिम का अन्धानुकरण करना चाहते हैं/ आधुनिक फिल्मों,टी वी कार्यक्रमों ,विज्ञापनों ने उनकी सोच पर भ्रमजाल में डाल रखा है .झूठी तथाकथित आधुनिकता ने सबको अपनी मृग तृष्णा में उलझा रखा है.संस्कार आयें कहाँ से आभार

seemakanwal के द्वारा
December 21, 2012

आज आधुनिकता की दौड़ में स्त्री महज़ भोग की वस्तु बन गयी है .जरूरत है देश की ऐसे सख्त कानून की जिससे ये हैवानियत बंद हो सके . जया जी का रोना भी वर्मा जी को बुरा लगा तुरंत गाली से नवाज़ दिया वर्मा जी क्या अपशब्दों के बिना बात नहीं होती .

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    हाँ सीमा जी आपने सही कहा हैवानियत कैसे रुकेगी टेढा प्रश्न है उम्मीद पर दुनिया जिन्दा है.धन्यवाद

Narendra Verma के द्वारा
December 21, 2012

लड़कियों को छेड़ना या उनसे बलात्कार करना अपराध है | लेकिन लड़कियों को छेड़ने के लिये “उकसाना” भी तो अपराध है | हमारे देश में आजकल जितनी भी फिल्में बनती हैं, उन सभी में फिल्म का हीरो—- लड़कियों को छेड़ते और परेशान करते हुये दिखाया जाता है ———- इन दश्यों को देखकर आम जनता बहुत खुश होती है | फिर जनता के मन में भी वैसा ही करने की इच्छा पैदा होती है | इस प्रकार से देश में “लड़कियों और महिलाओं के प्रति अपराध” बढ़ जाते हैं | दिल्ली में एक लड़की के साथ में गैंग रेप हुआ तो—— राज्य सभा में “जया बच्चन” टसुये बहा रही थी | लेकिन इसी “जया बच्चन” का——— पति (अमिताभ बच्चन) और पुत्र (अभिषेक बच्चन) ——— यह दोनों फिल्मों में लड़कियों से छेड़खानी और उनका अपहरण करते रहते हैं | इसलिये ओ हरामजादी “जया बच्चन”—– राज्य सभा में टसुये बहाकर नाटक मत दिखा, पहले अपने पति और पुत्र के सिरों को फोड़ —– उनको सुधार | सरकार को चाहिये कि———- दिल्ली में हुये गैंग रेप के आरोपियों को जो भी सजा दे, वही सजा—– अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन—– को भी दे |

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    मान्यवर मेरा आपसे विनम्र निवेदन है,की आप जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं वो भी किसी महिला के प्रति अभद्रता और निरादर ही दर्शाती है, हमारी संस्कृति ये संस्कार अच्छे नहीं मानती.मैं मानती हूँ की फिल्मों का प्रभाव आजके वातावरण के लिए उत्तरदायी है,परन्तु इसका अर्थ ये नहीं कि हम गाली गलौज पर उतरें.आपने प्रथम प्रतिक्रिया दी उसके लिए आभार.

minujha के द्वारा
December 21, 2012

आदरणीय निशा जी आपका हर निदान उत्तम है ,पर मैंआपकी सबसे पहली बात से शत प्रतिशत सहमत हुं कि सज़ा त्वरित और ऐसी हों कि उसकी कल्पना से ही विकृत मानसिकता वाले कीङों की रूह कांप जाए..

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    मीनू जी धन्यवाद सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए

Sushma Gupta के द्वारा
December 21, 2012

निशाजी,बलात्कार की इस गंभीर समस्या के प्रति आपका चिन्तन एवं संवेदना आज प्रत्येक भारतीय की है, इस ओर न केवल सरकार वल्कि समाज में अपने-अपने स्तर से सभी को ध्यान देना होगा …

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    सुषमा जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका.

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    आभार सुखद प्रतिक्रिया के लिए.आपका ब्लॉग अवश्य पढूंगी

satya sheel agrawal के द्वारा
December 21, 2012

निशा जी .निरंतर हो रहे बलात्कार हमारी प्रशासनिक कमजोरी और न्याय में विलम्ब के परिणाम हैं,जब तक न्याय प्रणाली और पुलिस विभाग की कार्यशैली में सुधार नहीं होता जब तक कोई भी सजा अपराधों को नहीं रोक सकती.सार्थक लेख के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    धन्यवाद अग्रवाल साहब ,त्वरित ,निष्पक्ष न्याय ,कठोर क़ानून और मर्यादा ही अंकुश लगा सकते हैं

bhanuprakashsharma के द्वारा
December 21, 2012

निशा जी, सादर। सार्थक लेख व समस्या के समाधान के लिए बहुउपयोगी विचार। बलात्कार जैसे कृत्य पर अंकुश लगाने के लिए हमारी न्याय प्रणाली में भी बदलाव होना चाहिए। ऐसे मामले जल्द निस्तारित हों और दोषियों को यदि सख्त सजा हो तो ऐसे घटनाओं में कुछ अंकुश जरूर लग सकता है। 

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    सहमती के लिए आभार आपका.

yamunapathak के द्वारा
December 21, 2012

आदरणीय निशा जी नमस्कार आपका आलेख हर दृष्टिकोण से समस्या का समाधान देता हुआ एक दिशा निर्देशन करता है. साभार

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    यमुना जी धन्यवाद

akraktale के द्वारा
December 21, 2012

आदरेया निशा जी सादर, सर्वाधिक जरूरत है पुलिस व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया में सुधार लाने की. ऐसे मामलों में टेली कनेक्टिविटी के जरिये अदालत काम करे ताकि पीडिता को न्यायालय में उपस्थित नहीं होना पड़े यही व्यवस्था पुलिस कि भि होना चाहिए और ये कोई बड़ा काम नहीं है.आज संचार कि क्रान्ति से यह सब आसान  है. त्वरित न्याय और कठोर दंड का न्यायाधीशों द्वारा पालन किया जाना चाहिए. इस तरह के मामलों को दो जजों के सम्मुख प्रस्तुत होना चाहिए. यह न्याय प्रक्रिया को गति देगा साथ ही निष्पक्षता कि संभावनाएं भी प्रबल होंगी. इंसान के मन में डर जरूरी है. वस्त्रों और खानपान पर बात निरर्थक ही लगती है क्योंकि आवश्यकता आचरण बदलने कि है. 

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    आपके सुझाव उपयोगी हैं,परन्तु कभी कभी लगता है कुछ नहीं कर पा रहे हैं असहाय हैं हम ,धन्यवाद .आचरण बदले बिना कुछ संभव नहीं परन्तु वो प्रक्रिया रातों रात नहीं हो सकती.

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 21, 2012

मेरे हिसाब से रेप एक क्रत्‍य नहीं बल्कि एक ऐसी सोच है जो बचपन से ही ऐसे कुकर्मियों के दिमाग में घर कर जाती है और इसका जिम्‍मेदार हमारा समाज भी कहीं न कहीं है। हमारी पोस्‍टस का भी अवालोकन करें लिंक : http://www.praveendixit.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    धन्यवाद प्रवीन दिक्षीत जी.अवश्य

chaatak के द्वारा
December 20, 2012

केवल दिल्ली में ही भारत नहीं बसता ,सुरक्षा प्रबंध सर्वत्र होने चाहियें| इसमें कोई दो राय नहीं है मांग बिलकुल सही है लेकिन राजनीति इस पर हावी है| आपके स्वर में एक स्वर मेरा भी|

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    स्वर से स्वर मिलाने हेतु आभार चातक जी.

omdikshit के द्वारा
December 20, 2012

आदरणीया निशा जी,नमस्कार. सख्ती से यदि वर्तमान कानून ही लागू किया जाय और निर्णय एक माह के अन्दर हो तो भी डर बनेगा.लोकतंत्र में किसी का अंग-भंग करने का कानून नहीं बन सकता,अन्यथा ‘नपुंसक’ बनाना ही सबसे बड़ी सजा होगी.

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    जिस लोकतंत्र में लोक का ही हित नहीं सधता ,कैसा लोकतंत्र है वो.धन्यवाद

Ashish Mishra के द्वारा
December 20, 2012

सुझाव अच्छा है , पर एक बात सोचें कि हम उस देश के नागरिक हैं जहाँ कि संसद कि साथ बलात्कार होता है …पूरे देश के साथ बलात्कार होता है …………….देश कि अस्मिता के साथ बलात्कार होता है और एक दो बार नहीं जब- तब होता है ……………..और हमारी सरकार में बैठे लोग सिर्फ तमाशा देखते हैं ……..कुछ करते नहीं सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाते हैं ……… अम्रेरिका की और एक बार आंख उठाकर देखा गया ……अफगानिस्तान तबाह हो गया…पूरा देश. !!!!!!! दोबोरा कोशिश करने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा. मगर हमारे देश में इस रोज का काम है …….. वह तो बलात्कार करने वाले किसी राजनेता के वंशज नहीं है वरना अभी तक तो पीड़ित लड़की की बखिया उखाड़ी जाने लगती …..कोई शोर शराबा नहीं होता. ……. ऐसे पंगु कानून में जो हो सकता है वही हो रहा है ….किसी हो कोई भय नहीं है ………….

    nishamittal के द्वारा
    December 20, 2012

    पूर्णतया सहमत हूँ आशीष आपकी प्रतिक्रिया से, यदि आप ध्यान से देखें तो ये पोस्ट में लिखा भी है,कि मामला मीडिया में उछलने के कारण इतना चर्चित हो गया अन्यथा इव टीजिंग और ऐसी घटनाएँ आम होती जा रही हैं,क्योंकि मानसिकता कुत्सित हो चुकी है,और शेष सब मूक दर्शक बने रहते हैं.धन्यवाद विचारपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए

ajaykr के द्वारा
December 20, 2012

आदरणीया ,सादर प्रणाम कुत्सित मानसिकता और आयातित खुलापन काफी हद तक जिम्मेदार हों सकते हैं पर पूरी तरह से तो बिल्कुल भी नही |आज ८० वर्ष कि वृध्हा या ६ वर्ष कि बालिका ,कोई सुरक्षित नही |हैवानियत का कारण मिडिया ,फिल्मे और साहित्य हैं , फिल्मे और साहित्य किसी भी राष्ट्र का दर्पण होता हैं ,आजकल जिस तरह से फिल्मे बनायीं जा रहीं हैं और सेंसर बोर्ड के द्वारा पास हों रही हैं ,बहुत ही शर्मनाक हैं ,वैसे तो रिमोट अपने हाथ में हैं ,[बुरी हैं तो मत देखो ] लेकिन हर व्यक्ति कि अपनी सोच होती हैं |देश कि ज्यादतर जनसंख्या अच्छे बुरे में अंतर करने के बजाय अंधानुकरण करने में हीं लगी रहती हैं ,अगर पड़ोसी ने किया तो …..करेंगे ,खुद कुछ भी करने में डरते हैं “लोग क्या कहेंगे”?इसी में परेशान रहते है|एडल्ट फिल्मे ,१८+ वाले देख सकते हैं ,पर हर फिल्म में एडल्ट फिल्मो कि तरह कामुक सीन देखने से छोटे बच्चो पर बहुत बुरा असर पड़ता हैं ,वैसे एडल्ट फिल्मे बने भी तो एजुकेशनल हों ,नही तो जब आम आदमी जब पहले से ही इतना कामुक हैं की किसी सड़क चलते स्त्री का बलात्कार कर देता हैं तो उस समाज में कामुक फिल्मे सिर्फ आग में घी का काम ही कर सकती हैं ,और ‘द्विअर्थी संवाद’ अभिवयक्ति के साधन ‘भाषा’ का बलात्कार के देतीं हैं |आज सिनेमा घरों में देसी कामुक फिल्मो कि सारी टिकटें बिक जाती हैं,पहले भी बिक जाती थी ,पर दर्शक वर्ग में आज देश के कर्णधार बढ़ गए हैं | http://avchetnmn.jagranjunction.com/2012/12/19/%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%A6%E0%A4%AE-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A5%98%E0%A5%8D/

    nishamittal के द्वारा
    December 20, 2012

    आपके सभी विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ अजय जी,अश्लीलता अब फेशन बन रही है,अडल्ट फिल्मों का अर्थ मात्र अश्लीलता है,अब तो धारावाहिक भी कुछ कम नहीं हैं,जो हम परिवारों के साथ देखते हैं,रही सही कसर इंटरनेट की अश्लील वेब साईट्स पूर्ण कर देती हैं,टी वी पर दिखाए जाने वाले कॉमेडी प्रोग्राम जिनका उद्देश्य बस सस्तापन के अतिरिक्त कुछ नहीं.धन्यवाद विस्तृत प्रतिक्रिया हेतु.

yogi sarswat के द्वारा
December 20, 2012

बात अगर आज के समय में करें तो आपने एक पोस्टर देखा होगा आदरणीय निशा जी मित्तल जिस पर लिखा था “नज़र तेरी बुरी और पर्दा में करूँ ” ! ठीक बात है , मान लेते हैं ! लेकिन क्या सिर्फ इस बात को ऐसे ही कहा जा सकता है ? ठीक है आप पर्दा नहीं कर सकते , पर्दा मत करिए लेकिन कम से कम हमारी माँ बहनों की इज्ज़त तो मत उछालिये ! आप समझ नही पा रही होंगी की मैं क्या कहना चाहता हूँ ! मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूँ हर किसी को अपनी ज़द में रहना चाहिए , आप अगर मर्यादा तोड़ते हैं तो उसका दुष्परिणाम ही मिलता है ! लेकिन दिल्ली का काण्ड इतना वीभत्स है की उसमें दोषियों को अगर फंसी भी दी जाए तो शायद वो भी कम रहेगी !

    nishamittal के द्वारा
    December 20, 2012

    योगी जी जहाँ तक मैं आपका इशारा समझ सकी हूँ तो मेरे विचार से आपका संकेत अमर्यादित वस्त्र-विन्यास की और है,मैं सहमत हूँ आपसे परन्तु योगी जी ये एक मात्र कारण नहीं अन्यथा,अबोध बच्चियां,प्रोढ़ महिलाएं या घर में रहती युवती शिकार न बनती मैंने इसीलिये पोस्ट में ३ समाचारों का उल्लेख किया है.हाँ वस्त्र-विन्यास शालीन होना चाहिए.धन्यवाद

    yogi sarswat के द्वारा
    December 21, 2012

    आदरणीय निशा जी मित्तल , कल जल्दी में आपकी पोस्ट पर मैं अपने विचार पूरी तरह से नहीं लिख पाया ! आज इस विषय पर बात करनी है ! पहली बात तो आपको बधाई की आपने इतने गर्म माहौल में अपनी बात को रखने की हिम्मत जुटाई ! दूसरे , आज न जाने क्यूँ हम अपने आपको असहाय महसूस करते हैं ! लड़कियां अपने आप को मॉडर्न दिखाने के फेर में अपनी गरिमा को भूल गयी हैं तो पुरुष अपनी ओच्छि मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं ! मैं जिस संस्थान में पढाता हूँ उसके आस पास शाम होते ही लड़कियां लड़कों के गले में बाहें डालकर बियर की बोतल थामे राह चलते चलते गाल पर चुम्बन भी कर देती हैं , ये कौन सी संस्कृति है , ये कैसा खुलापन है ? हम अगर रोकना भी चाहें तो कोई भी हमें अपने २-४ साथियों को बुलाकर पीट भी सकता है या बेईज्ज़त कर सकता है ! ऐसे मैं कौन होगा जो इस पंगे में पड़ना चाहेगा ? ऐसे में सरकार या कानून कितना भी कुछ कर ले , कुछ नहीं हो सकता ! आपको याद होगा ,२००१ में धनञ्जय को फंसी लगाने के कुछ समय तक ऐसी घटनाएं बहुत हद तक बंद हो गयी थीं , किन्तु आज का समय अलग है ! हाँ , ये जरुइर है की फंसी से कुछ समय तक इस पर रोक लग सकती है लेकिन पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकता ! कुछ लोगों ने कहा की ऐसे पुरुषों को नपुंसक कर दिया जाये ! फिर ? क्या ये नहीं होगा की लोग इसका दुरूपयोग करने लगेंगे ? आप पुरुषों को दोष दे सकते हैं हर बात के लिए , लेकिन अपनी व्यवस्था को नहीं ! अपने कानून को नहीं ! कानून तो ये भी कहता है की “लिविन रिलेशनशिप ” में रहने वाली लड़की अगर शिकायत करती है तो उसे भी बलात्कार कहा जायेगा ! ये कैसी बात हुई ? आप रात में अश्लील फिल्में दिखने के लिए कानून लाना चाहते हैं , आप महेश भट्ट को सनी लीओन को लेकर उसका जिस्म खुले आम दिखाने की परमिशन देते हैं , आप वैस्याओं को इस देश का रोल मोडल बना रहे हैं , और फिर लड़कियां कहें की “नज़र तेरी बुरी और पर्दा में करूँ ” ? जब किसी लड़की को ये लगता है की मल्लिका शेहरावत या सनी लीओन बनकर ज्यादा पैसा कमाया जा सकता है तब कोई लड़की किरण बेदी बनने का ख्वाब नहीं देखेगी , वो चाहेगी की वो कैसे भी उनके जैसी बने ? और उनके जैसी बनने के लिए उसे कपडे उतरने होंगे , तब कहाँ और कैसे शील बचा रह सकता है ? मैंने मल्टी नेशनल कंपनियों के दफ्तोरों में कपड़ों का जो बुरा हाल देखा है उसे बयान नहीं कर सकता ! कपडे , वो घुटनों के ऊपर तक पहने घूम रही हैं और लड़कों से कहा जा रहा है की कण्ट्रोल तुम करो ! ये क्या है भाई ! लेकिन मुश्किल ये हैं की ऐसी बात करने वाले १८ वीं शताब्दी के हो जाते हैं ! इनका खामियाजा हमारी माध्यम वर्ग की बहन बेटियों को भुगतना पड़ता है ! कभी ऐसा नहीं हुआ की पूजा भट्ट पर किसी ने ऐसी कोशिश करी हो क्यूंकि उसके साथ बॉडी गार्ड चलते हैं लेकिन जिसने पूजा भट्ट की फिल्म के किरदार को बिना वस्त्र के देखा है वो उस किरदार को तो नहीं पा सकता इसलिए वो अपनी हवस , कहीं और पूरी करता है ! मैंने बहुत लिखा है आज , लेकिन अंत में कठोर शब्दों के लिए क्षमा चाहते हुए सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ की हर किसी को अपनी मर्यादा समझनी होगी , पुरुष को भी और लड़की को भी ! तभी कुछ निदान संभव है !

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    योगी जी , पतनोन्मुख समाज का जो आँखों देखा चित्र आपने प्रस्तुत किया है,उसकी कल्पना भी लज्जा से भर देती है,आज सर्वत्र यही स्थिति दिखती है,बस अंतर इतना है,महानगरों में अधिक और खुले आम जबकि छोटे शहरों में कम और लुका छिपी.परन्तु पतन तो सर्वत्र है,तभी तो घर में बैठी ८-९ साल की बच्ची को पिता डरा कर या लोभ से अपनी हवस का शिकार बनाता है,श्वसुर पुत्रितुल्या वधु को शोषण करता है,और दरिंदे मासूम बच्चियों को नहीं बख्शते.मेरा अभिप्राय लड़कियों की उछ्र्न्ख्लता का समर्थन कदापि नहीं है,मैं पूर्णतया विरोधी हूँ.परन्तु आज आयतित खुलेपन ,फिल्मों,धारावाहिकों की अश्लीलता और रही सही नेट की मेहरबानी से संस्कारों से रहित सब लोग इस गंदे कूप में छलांग लगाने को तैयार हैं.धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    December 20, 2012

    धन्यवाद

December 20, 2012

ममता मयी माता प्रणाम , जैसा कि हम जानते है की नारी का स्वरुप भगबान से लगाया जाता है और जब भगबान की इतनी भर्तसना और दुर्दशा हो तो इसके जिम्मेदार लोगो को कुछ खास सजा देनी होगी ,और इसके साथ विज्ञापनो मे नारी के रूपों को बदलना होगा ,तथा नारी को स्वं को भार तीय लिबासो मे ढककर रखना होगा क्यौकी पहली कहाबत है कि दिये जले मर्द अपने घर भले ,,इसी तरह अब यह कहाबत कुछ मायने मे नारी को भी स्वीकार कर लेनी चाहिय ,,,और अपने सम्मान की रक्षा स्वं भी करनी होगी ,,,बहुत अच्छा आलेख बधाई ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,जैसा कि ऊपर लिखा भी है पतन समाज के सभी क्षेत्रों में है,अतः आज महिलाएं भी निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर या चर्चित होने के लिए कभी कभी मिथ्या आरोप लगती हैं,ऐसी परिस्थिति में उनको भी सजा मिलनी चाहिए. एक तथ्य और किसी नेत्री ने आज कहा कि दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा के विशेष प्रबंध होने चाहियें.केवल दिल्ली में ही भारत नहीं बसता ,सुरक्षा प्रबंध सर्वत्र होने चाहियें .

    nishamittal के द्वारा
    December 20, 2012

    हिमांशु जी,आपकी प्रतिक्रिया का उत्तर तुरंत ही दे रही हूँ .नारी को शालीन रूप में देखना स्वयं को भी अच्छा लगता है,अतः वस्त्र-विन्यास शालीन होना चाहिए परन्तु वर्तमान में इन अपराधों का एक मात्र कारण यही नहीं.इस घटना के तुरंत बाद ही दो उदाहरण और भी दिए है,जिसमें वहशियों ने अबोध छोटी बालिका को अपना निशाना बनाया और इसी प्रकार एक अन्य मामले में घर में घुस कर अपने कुत्सित इरादे पूर्ण किये.धन्यवाद

Roshni के द्वारा
December 19, 2012

नमस्कार निशा जी, ye जो भी घटना हुई और इससे पहले अब तक जो भी होती ई है सब ही बड़ी निंदनीय है … दिल दहलाने वाली .. इन लोगों को तो जल्द से जल्द मौत की सजा होनी चहिये और वोह भी सार्वजानिक …. ताकि दूसरों को भी सबक मिले और कोई भी इस तरह का अपराध न कर सके … आभार

    nishamittal के द्वारा
    December 20, 2012

    रौशनी एक लम्बे अरसे बाद तुमको देख कर अच्छा लगा,कड़ी सजा का समर्थन करने के लिए आभार

alkargupta1 के द्वारा
December 19, 2012

निशा जी , इन वहशी दरिंदों की दरिंदगी की कोई सीमा नहीं ये बेख़ौफ़ घूम रहे हैं….. आज देश इस दिल दहला देने वाले जघन्यतम कुकृत्य से आक्रोश के समंदर में डूबा हुआ है जो जायज़ है.लेकिन क्या त्वरित कानूनी कार्यवाही होगी प्रश्नचिह्न ? लगा हुआ है ….. आपने इस आलेख में ऐसे सुझाव दिए हैं जो विचारणीय हैं व ऐसी स्थितियों का सामना करने के लिए इन पर अमल करना अति आवश्यक है……. सामयिक उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    त्वरित,निष्पक्ष और कठोर दंड विधान ही अंकुश लगा सकता है.धन्यवाद अलका जी.

jlsingh के द्वारा
December 19, 2012

आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! आपके चिंता जायज है …. संसद सत्र चालू होने के चलते बस वाली घटना की ज्यादा चर्चा हुई … मीडिया में भी खूब बहस चली …इसके पहले भी ऐसे जघन्यतम अपराध दिल्ली या देश के दूसरे भागों में होती रही है, पर अब तक कोई शख्त कानून और त्वरित सुनवाई भी नहीं हो रही है. गृह मंत्री का आश्वाशन कि “इस केस की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में की जायेगी” तत्काल सराहनीय तो कहा जा सकता है, पर परिणाम आने के बाद ही कुछ और कहा जा सकता है! मेरे विचार से न्याय प्रक्रिया में देरी और निचली अदालतों के बाद उपरी अदालतों का हस्तक्षेप, लचीले कानून, और अपराधी के रसूख के अनुसार सजा का निर्धारण, हर तरह के अपराधों को बढ़ावा देता है. अगर जल्द सजा का ऐलान हो तो अपराध पर अवश्य अंकुश लगेगा …. पर यह कानून और ब्यवस्था बनाएगा कौन, जब कूंए में ही भंग पडी हो?????? हमारी महिला समाज को जागरूक होना होगा और हम सब को भी अपने स्तर पर पहल करने की जरूरत है. बाबा रामदेव के अनुसार इस देश में यौन शिक्षा की नहीं योग शिक्षा की जरूरत है!

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    सिंह साहब आपके विचारों से सहमत हूँ,कानूनों की हमारे देश में कमी नहीं कमी है तो सक्रियता,इच्छा शक्ति,और देश हित को सर्वोपरि रखने की.और नारी के प्रति सम्मान भावना की.धन्यवाद

vinitashukla के द्वारा
December 18, 2012

अपराधियों को अब सजा का भय नहीं रह गया है- इसी से वे इस प्रकार के कुकृत्य करने से बाज नहीं आते. ऐसे हादसों को रोकने हेतु आपने जो सुझाव दिए हैं; सराहनीय हैं. इस सार्थक, समसामयिक पोस्ट पर हार्दिक साधुवाद निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    बिलकुल सही कहा विनीता जी.धन्यवाद

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 18, 2012

आदरणीया निशा जी, बेबाक बात..बेबाक रचना.. मै इस विषय से जुड़े अपने एक पुराने पोस्ट को पुनः मंच पर प्रस्तुत करने जा रहा हूँ.. आशा करता हूँ आप लोग फिर मेरे विचारों से सहमत होंगे.. आकाश तिवारी

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    धन्यवाद आकाश जी.आपके विचारों से सहमती पूर्णतया.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 18, 2012

आदरणीया निशा जी सादर अभिवादन आपकी पीड़ा में में भी शरीक हूँ सार्थक लेख बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 21, 2012

    आपकी सहमती हेतु आभारी हूँ कुशवाह जी.


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