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जनाक्रोश से भी भयभीत नहीं हैं,नीरो बने सत्ताधीश!

Posted On: 24 Dec, 2012 Others में

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इतिहास के अनुसार वर्ष ६४ ईस्वीं में रोम में भयंकर आग लगी थी जो लगभग छह दिन तक जलती रही और इस आग में रोम के अधिकांश शहर बर्बाद हो गए थे , कुछ इतिहासकार इस विनाश के लिए  के लिए रोम के सम्राट नीरो को उत्तरदायी  मानते  है .इतिहासकारों के अनुसार   जब रोम जल रहा था सम्राट नीरो सब कुछ जानते हुए भी अपने में मगन होकर बांसुरी बजा रहा था. नीरो वास्तव में एक क्रूर और खूंखार शासक था , स्वार्थ के सामने   माँ-,बहिन,  पत्नी या किसी भी अन्य को मौत के घाट उतरवाने में उसको कोई संकोच नहीं होता था,ऐसे व्यक्तियों पर प्रजा के कष्टों का क्या प्रभाव पड़ता, आज देश के समक्ष यही स्थिति है,देश के समक्ष एक के बाद एक बड़ी समस्याएं सुरसा के मुख की भांति अपना विकराल मुख बाए खड़ी हैं.और हमारे शासक हैं कि  जो नीरो का अद्यतन संस्करण बन  अपने आमोद-प्रमोद,अपनी गद्दी संभालने में  ही  खोये हैं,उनको चिंता है,शिमला में मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने की ,न कि  मौत से टक्कर लेती एक पीड़ित बेटी की.यहाँ तक कि उनके पास उस जनता की समस्याएं सुनने की भी फुर्सत नहीं जिनके कारण वो ये शाही ठाठ बाट भोग रहे हैं.वास्तव में देखा जाय तो वर्तमान व्यवस्था तो नीरो के युग  से भी गई गुजरी है,क्योंकि नीरो  तो वंश परम्परा से शासक बना था और यहाँ तो जनता के आगे अपनी झोली फैलाकर वोट मांगकर गद्दी पर सवार हुए हैं.और जनता की आर्त करुण  पुकार सुनने को भी तैयार नहीं ,जबकि जिस राजधानी में ये गेंगरेप की कलंकित  घटना घटित हुई उस दिल्ली की मुख्यमंत्री एक महिला है.सतारूढ़ दल की अध्यक्षा महिला हैं,नेता विपक्षी दल महिला हैं,और  लोकसभा के स्पीकर पद पर भी  महिला ही आसीन है.

सम्पूर्ण घटनाक्रम समस्त स्तरों पर  अत्याधिक गंभीर,लज्जास्पद है,परन्तु दोषी आखिर कौन है. अपने जीवन को भी परिवार के लिए न्यौछावर करने वाली नारी को सम्मान सैद्धांतिक स्तर पर अधिक और व्यवहारिक स्तर पर अपेक्षाकृत कम ही मिला है.इसके लिए दोषी सामाजिक  ताना -बाना है.परन्तु  ऐसे अपमान की घटनाएँ आटे में नमक जितनी थीं परन्तु आज नमक अधिक और आटा लुप्तप्राय है.यही कारण है कि राजधानी दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं का आंकडा चिंताजनक है.प्रधान कारण पतनोन्मुख मानसिकता है वो मानसिकता  पुरुष,नारी समाज के हर वर्ग की है. अतः आगामी पीढ़ी पर ये संस्कारों का  रिक्त  कोष पता नहीं क्या कहर ढाएगा ये तो घोर  चिंता का विषय है..सम्पूर्ण परिवेश उसकी पृष्ठभूमि में है.आज सभी विज्ञापनों ,टी वी कार्यक्रमों ,फिल्मों  के सस्ते  अश्लील मनोरंजन और  पाश्चात्य अंधानुकरण  में खोया समाज तथाकथित आधुनिक  अपितु(माड)बनने के लिए व्याकुल है.फैशन के नाम पर युवक युवतियां यहाँ तक कि बच्चे भी शराब,नशे ,डिस्को,पब संस्कृति की गिरफ्त में है,और अपेक्षाकृत कम साधन सम्पन्न भी बर्बादी की कगार पर हैं.संस्कार  तो उपहास का विषय बन चुके हैं.

नारी जाति पर बढते अत्याचार देश के माथे पर कलंक की कालिमा को गहरा कर रहे हैं.दिन-रात,सुबह शाम,घर-बाहर ,यात्रा में ,अकेले,मातापिता  या किसी अन्य परिचित के  साथ होने पर भी अपमान सहने को विवश हैं.दिल्ली की गेंगरेप की घटना अभूतपूर्व नहीं,,श्रृखला की एक कड़ी है. श्रृंखला की कड़ियों की तो गणना भी करना असंभव है.क्योंकि कहीं नारी विवशतावश बलात्कार की पीड़ा को सहती है,तो कहीं सहकर उसको मौन रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है,कहीं वह पिता,भाई और सगे सम्बन्धियों से पीड़ित है तो कहीं उसके विलासी शौक उसको स्वयम ही देहव्यापार के लिए आदि बना चुके हैं.गाँव में भी दबंगों की दबंगई का शिकार वो होती रही है, उनको वस्त्रविहीन कर गाँव में घुमाने की घटनाएँ प्राय सुनी जाती हैं. सब कुछ जानते हुए ,देखते हुए सब मूक दर्शक बने रहते हैं.सर्वप्रथम तो घटना गाँव से बाहर भी नहीं आ पाती और प्रत्यक्ष गवाह यहाँ तक कि पीडिता और उसके परिजन भी अपना मुख सिल लेते हैं.

मीडिया का योगदान प्राय निष्पक्ष नहीं होता परन्तु इस घटना को सुर्खी बनाकर एक जोश जागृत करने के लिए श्रेय मीडिया को ही जाता है.जिसके कारण देश के कई भागों में प्रदर्शन हुए, राजधानी में विशाल जनसमुदाय  इंडिया गेट पर पहुंचा.  राजपथ पर प्रदर्शनकारियों की भीड़  उमड़ पड़ी  और ‘वी वॉन्ट जस्टिस’ (हमें इंसाफ चाहिए) से वातावरण गूँज उठा.”विनाशकाले विपरीत बुद्धि” जनसमुदाय की  समस्या सुनकर सांत्वना के दो बोल बोलने के स्थान पर  शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे जन समुदाय को  सत्ता के इशारे पर पुलिस ने कोहरे और शीत लहर के मौसम में अपनी असंवेदनहीनता,अहंकार और तानाशाही का परिचय देते हुए ठंडे  पानी की बौछार करनी शुरू कर दी। अश्रु गैस  के गोले भी छोड़े गये परन्तु आक्रोशित जनसमुदाय नहीं डिगा , तो उन्होंने बल प्रयोग करते हुए निहत्थे लोगों पर लाठियों का प्रहार करते हुए अंग्रेजों से भी क्रूर प्रमाणित किया स्वयं को.अंग्रेज तो विदेशी थे ,परन्तु ये काले अंग्रेज तो उनसे भी घातक और जहरीले हैं,जिनको इस कृत्य पर कोई अफ़सोस नहीं ,युवा,बच्चे महिलाएं किसी को भी नहीं बख्शा इन्होने.daman
रविवार को हुई तोड़ फोड,आगजनी  निश्चित रूप से निंदनीय है,परन्तु इसके लिए उत्तरदायी तो सरकार का गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ही है.वैसे भी ये कोई व्यवस्थित या एक संगठन का आक्रोश नहीं था,अपितु सभी प्रकार के लोग ,महिला संगठन इसमें भाग ले रहे थे, किसी एक नेतृत्व में उनका आंदोलन नहीं था.ऐसे में अनुशासन की बहुत अधिक आशा करना बेमानी है,क्योंकि असमाजिक तत्व ऐसे अवसरों का लाभ उठाने या ऐसे आंदोलनों में फूट डालने के लिए प्राय ऐसे हथियारों का प्रयोग करते आये हैं.ये   अनुशासन हीनता पूर्व प्रायोजित भी हो तो कुछ आश्चर्य नहीं.
समस्याएं,दोषारोपण होना कोई नयी बात नहीं.जब भी कोई घटना चर्चित होती है,माहौल गर्म होता है,तो उबाल आता है और कुछ समय पश्चात न केवल जोश ठंडा पड़ जाता  है,मानव स्वभाव के अनुसार घटना का चित्र ,प्रभाव धुंधला पड़ने लगता है.अतः  आवश्यकता है गंभीरता से सोचने की ,इस सांस्कृतिक प्रदूषण से अपने देश की रक्षा करने की ,और साथ ही सत्ताधीशों रूपी नीरो  को चेताने की कि जनाक्रोश को सस्ते में न लें.जन प्रतिनिधि के रूप में चुन कर आये ये जनता के स्वामी बनने की भूल न करें .  आज जिनके कानों पर जनता की पुकार से  जू नहीं रेंगती उनको यही जनता सबक सिखाने से नहीं चूकेगी.. सकारात्मक कारणों से किया गया आंदोलन ,जनाक्रोश जो आज उनको डिगाता नहीं इसकी उपेक्षा बहुत महंगी पड़ेगी .यदि कठोर कदम नहीं उठाये गए और स्वयम को संयमित नहीं किया तो  नारी जाति का गौरव पूर्णतया विलीन हो जाएगा  द्रौपदी, अहिल्या ,दामिनी वहशियों के हाथों बर्बाद होती रहेंगी और बेटियों का जन्म तो पूरी तरह से  अभिशाप ही बनकर रह जाएगा .मत भूलिए सृष्टि के विनाश का लक्षण है ये .

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pradeep gautam के द्वारा
January 3, 2013

apko yahlekh chhapnane ke lie dhanybad aaj navyuvak samaj me kisi bhi prakar ka abhdra aacharan ko bardast nahi karenge ab sarkar ko samajhdari se ek sashkt kanun banana bahut jaruri hai nhi to ham yuva aaj gandhi ji anusaran na karke bhagat singh banane ke lie majboor ho jayenge

    nishamittal के द्वारा
    January 3, 2013

    प्रथम सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद आपका प्रदीप जी.

Santlal Karun के द्वारा
December 31, 2012

सत्ता की कठोरता और उसकी मगरूरी पर विचार-प्रधान आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगल कामनाएँ ! “आज जिनके कानों पर जनता की पुकार से जू नहीं रेंगती उनको यही जनता सबक सिखाने से नहीं चूकेगी.. सकारात्मक कारणों से किया गया आंदोलन ,जनाक्रोश जो आज उनको डिगाता नहीं इसकी उपेक्षा बहुत महंगी पड़ेगी .यदि कठोर कदम नहीं उठाये गए और स्वयम को संयमित नहीं किया तो नारी जाति का गौरव पूर्णतया विलीन हो जाएगा द्रौपदी, अहिल्या ,दामिनी वहशियों के हाथों बर्बाद होती रहेंगी और बेटियों का जन्म तो पूरी तरह से अभिशाप ही बनकर रह जाएगा .”

    nishamittal के द्वारा
    December 31, 2012

    हार्दिक आभार आदरनीय संतलाल जी,शुभकामनाएं

satish mittal के द्वारा
December 28, 2012

नमस्कार मैडम आज देश की जनता का दर्द शायद ही सत्ता में बैठे लोग समझ पा रहें हें ऐसा उनका जनता के बीच उनकी संवाद हीनता की वजह से पहले प्रधानमंत्री लोक सभा से आता था पर अब तो राज्य सभा से प्रधानमंत्री आ रहें हें इस लिए जनता की बीच उनका जाना शायद ही हो यही कारन हें आज देश में लोकतंत्र होते हुए भी लोगों को ट्यूनीशिया इजिफ्त की तरह आन्दोलन करना पद रहा हें

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2012

    सहमत हूँ परन्तु ऐसी अव्यवस्था के लिए उत्तरदायी हम ही हैं धन्यवाद

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
December 28, 2012

ममता मयी प्रणाम ,बास्तव मे बहुत ही सटीक आलेख ,कोरवो के पक्ष धरो के लिये

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2012

    धन्यवाद अनुराग जी.

alkargupta1 के द्वारा
December 27, 2012

निशाजी , सत्ता के मद में उन्मत्त अपने होशोहवास को भी खो देने वाले इन सत्ताधीशों की तो जितनी कटु आलोचना की जाये थोड़ी ही है ………यह जनाक्रोश व्यर्थ नहीं जायेगा…… समसामयिक विचारणीय आलेख के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2012

    ईश्वर करे ऐसे ही हो अलका जी धन्यवाद

yogi sarswat के द्वारा
December 27, 2012

मीडिया का योगदान प्राय निष्पक्ष नहीं होता परन्तु इस घटना को सुर्खी बनाकर एक जोश जागृत करने के लिए श्रेय मीडिया को ही जाता है.जिसके कारण देश के कई भागों में प्रदर्शन हुए, राजधानी में विशाल जनसमुदाय इंडिया गेट पर पहुंचा. राजपथ पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ उमड़ पड़ी और ‘वी वॉन्ट जस्टिस’ (हमें इंसाफ चाहिए) से वातावरण गूँज उठा.”विनाशकाले विपरीत बुद्धि” जनसमुदाय की समस्या सुनकर सांत्वना के दो बोल बोलने के स्थान पर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे जन समुदाय को सत्ता के इशारे पर पुलिस ने कोहरे और शीत लहर के मौसम में अपनी असंवेदनहीनता,अहंकार और तानाशाही का परिचय देते हुए ठंडे पानी की बौछार करनी शुरू कर दी। अश्रु गैस के गोले भी छोड़े गये परन्तु आक्रोशित जनसमुदाय नहीं डिगा , तो उन्होंने बल प्रयोग करते हुए निहत्थे लोगों पर लाठियों का प्रहार करते हुए अंग्रेजों से भी क्रूर प्रमाणित किया स्वयं को.अंग्रेज तो विदेशी थे ,परन्तु ये काले अंग्रेज तो उनसे भी घातक और जहरीले हैं,जिनको इस कृत्य पर कोई अफ़सोस नहीं ,युवा,बच्चे महिलाएं किसी को भी नहीं बख्शा इन्होने. असल में सत्तानशीनों और पुलिस को ये लगता है की वो जो भी कर रहे हैं लोग उसे सही मान लेंगे और कोई विरोध नहीं होगा ! आज हकीकत बिलकुल उलट है , लोगों के पास सरकारी आंकड़ों और स्रोतों के अलावा भी बहुत मजबूत माध्यम हैं ! मैं कभी कभी दूरदर्शन देख लेता हूँ ! उस पर सरकार की वाह वाही के अलावा और कुछ नहीं होता , समझ आ जाता है की सरकार का नियंत्रण है लेकिन और न्यूज़ चैनल अपनी बात को रखते समय सरकार का पक्ष नहीं लेते जिससे कुछ हद तक सत्य का पता चलता है ! जो लोग ऐसे आंदोलनों में रहते हैं , उन्होंने अपना एक अलग ही नजरिया तैयार किया हुआ है , वो अपने दोस्तों से इस बात पर मशविरा करते हैं और १0-२० लोग इकठ्ठा होते हैं ! ये वो लोग हैं जिनके पास I -pad और I phone होते हैं ! ये नए तरह की समाज सेवा है या नए तरह का आन्दोलन ! या नए तरह के आन्दोलन की भूमिका बन रही है , अभी से कुछ कहना मुश्किल भी है और बेजा भी है ! मैं नाम तो नहीं बताऊंगा लेकिन आप को नयी बात से परिचय कराता हूँ ! दिल्ली और उसके आस पास के शहरों में जो छात्र है ( सब नहीं ) , या जो प्रोफेशनल्स हैं , उनके अपने विचार हैं ! वो लोग किसी न किसी ग्रुप से जुड़े हैं , मैं भी उनमें से ही हूँ कभी कभी के लिए ! ये लोग आपको रेस्तौरेंट में भी मिल जायेंगे , और जंतर मंतर पर आन्दोलन करते हुए भी दिखेंगे ! एक नया वर्ग तैयार हो रहा है , और आपको सही बताऊँ तो इनकी कोई महत्वाकांक्षा भी नहीं होती की ये राजनीती में आना चाहते हैं ! मुझे कभी कभी ऐसे लोगों से मिलकर ख़ुशी भी होती है की हम जिन्हें बिगाड़ा नवाब समझ रहे थे असल में वो असली हिंदुस्तानी हैं ! धड़ल्ले से एङ्गिलिश बोलते हैं तो लगता है संस्कार नहीं हैं , लड़के लड़कियां साथ चलते हैं तो लगता है आवारा हैं ! लेकिन आप कभी उनके संपर्क में आयें तो पता चलेगा ये उनसे अच्छे हिंदुस्तानी हैं जो कहते कुछ हैं करते कुछ हैं !

    jlsingh के द्वारा
    December 27, 2012

    आदरनीय योगी जी, नमस्कार! आपका एक एक कर कई रहस्योद्घाटन मैंने इसी मंच पर पढ़े, … कुछ अपने विचार भी अवश्य दें – समाधान की तरफ …आखिर सही रास्ता क्या है ? अगर ये नवयुवक विरोध करने सड़कों पर उतरे हैं, तो उनका बहुत बड़ा त्याग है, जो इस कड़ाके की ठंढ में भी डटे हुए हैं … हम-आप अपनी रोजी-रोटी, परिवार, समाज में ही मशगूल हैं … समय मिला तो इन्ही मीडिया, फेसबुक, ब्लॉग आदि के माध्यम से अपने विचारों का आदान- प्रदान कर लेते हैं …. एक बात मैं कहना चाहता हूँ, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी से … वे क्या कर रही हैं? मोदी जी के शपथ समारोह में जो जश्न का माहौल दिखा, उसे कम किया जा सकता था. पी एम … पी एम… चिल्लाने के बावजूद भी उन्हें पी एम के दावेदार के रूप में न पेश करना … जिस बलात्कार पर पूरा देश उद्वेलित है, उस पर उनकी चुप्पी क्या कहती है?…. मैं अपना विचार रख रहा हूँ … कांग्रेस से हम सभी आहत हैं, पर विकल्प क्या है! आज प्रधान मंत्री का पेट्रोल, डीजल, एल पी जी. के मूल्यों में बढ़ोत्तरी की घोषणा करना आवश्यक था काया?… ये हो क्या रहा है???? आदरणीय निशा जी से मेरा अनुरोध है कि ये बातें योगी जी तक अवश्य पहुंचाएं और अपना भी मंतव्य दें! सादर आभार!

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2012

    वैसे योगी जी,मुझको तो लगता है की शेष चेनल्स भी पक्षपात पूर्ण व्यवहार अधिक करते हैं,निष्पक्ष तो मुझको कोई भी चॅनल नहीं दीखता.परन्तु बस दूरदर्शन तो पूर्णतया सरकारी प्रवक्ता ही है.आपने जिन लड़कों या ग्रुप की बात कही है मई दिल्ली में नहीं रहती इसलिए अधिक नहीं जानती परन्तु इतना अवश्य है , युवा वर्ग ही उचित मार्ग दर्शन के साथ देश को संभाल सकता है.धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2012

    सिंह साहब मैं तो अपनी हर पोस्ट में यही लिखती हूँ की देशवासियों के पास ठोस विकल्प नहीं होने के कारण ही देश सुधरता नहीं धन्यवाद .वैसे एक पोस्ट इस संदर्भ में और लिखने जा रही हूँ .

seemakanwal के द्वारा
December 26, 2012

न जाने इन लोगों को अभी और किस कयामत का इंतजार हैं . साधुवाद .धन्यवाद .

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    आभार सीमा जी.

minujha के द्वारा
December 26, 2012

आदरणीय निशा जी सच कहा आपने जनाक्रोश के प्रति सरकार का इतना ठंढा रवैया अच्छा संकेत तो नहीं ही है,शायद मौसम की ठंढक का असर इनके दिमाग पर भी हो गया है,विचारणीय आलेख

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    उनके दिमाग तो सदा ही जमे रहते हैं मीनू जी धन्यवाद

Dr S Shankar Singh के द्वारा
December 26, 2012

आपने सही कहा है गैंगरेप की घटना के पीछे प्रधान कारण पतनोन्मुख मानसिकता है आगामी पीढ़ी पर ये संस्कारों का रिक्त कोष पता नहीं क्या कहर ढाएगा ये तो घोर चिंता का विषय है.. संस्कार विहीन समाज से और क्या अपेक्षा की जा सकती है. हमें हर घर में अपने बेटों को बहनों की और स्त्रियों की इज्ज़त करना सिखाना पड़ेगा. नहीं तो भयानक दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे. मैं स्वयं तीन बेटियों का बाप हूँ. आज कल के हालात देख कर हम सब आतंकित हैं.. दामिनी के साथ जो कुछ जघन्य अपराध घटित हुआ उसका दंड फांसी से अलावा कुछ नहीं हो सकता. दंड ऐसा हो जो अपराधी के दिल में दहशत पैदा करे. कि लोग अपराध करने के बारे में सोचना भी भूल जायं . आपने एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है. इसके लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    आदरनीय डॉ साहब आपकी सकारात्मक सह्मति पूर्ण प्रतिक्रिया हेतु आभार

vinitashukla के द्वारा
December 26, 2012

जनाक्रोश की उपेक्षा करना, नीरो जैसी असंवेदनशीलता की निशानी ही है. आन्दोलनकारियों को सांत्वना देने कोई सरकारी प्रतिनिधि नहीं आया, उलटे बल- प्रयोग द्वारा उन्हें दबाने का प्रयत्न किया गया. प्रभावी, समसामयिक लेखन पर बधाई निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    सत्ता में मदांध सत्ताधीशों के पास जन समस्यों को समझने का ही समय नहीं समाधान कैसे करेंगें धन्यवाद विनीता जी.

bhanuprakashsharma के द्वारा
December 25, 2012

आदरणीय निशा जी। यह गंभीर विषय है कि जब सारा जनमत सुलग रहा होता है तो उस मुद्दे पर संसद में चुप्पी रहती है। जैसे देश की हर दिन घटने वाले घटनाओं से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। यह विचारणीय प्रश्न है। सुंदर लेख के लिए साधूवाद। 

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    धन्यवाद भानु जी.

Rajesh Dubey के द्वारा
December 25, 2012

सामाजिक बुराइयों पर प्रहार समाजसुधार के लिए जरुरी है. नशा और आधुनिकता के नाम पर युवापीढ़ी बर्बाद हो रही है. पब में नशापान और आधुनिकता के नाम पर नंगापन आखिर समाज को क्या दे रही है?

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    सहमती पूर्ण विचारों के साथ प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद राजेश जी.

akraktale के द्वारा
December 24, 2012

आदरेया निशा जी सादर,सरकार का लगातार जनता के प्रति रवैया असंवेदनशील होता जा रहा है. यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है.

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    सहमती आपसे अशोक जी आभार

rita singh'sarjana' के द्वारा
December 24, 2012

निशा जी , पता नहीं कब तक नीरो की तरह बांसुरी बजाती रहेगी l आपका कहना सही लगता हैं -”यदि कठोर कदम नहीं उठाये गए और स्वयम को संयमित नहीं किया तो नारी जाति का गौरव पूर्णतया विलीन हो जाएगा द्रौपदी, अहिल्या ,दामिनी वहशियों के हाथों बर्बाद होती रहेंगी और बेटियों का जन्म तो पूरी तरह से अभिशाप ही बनकर रह जाएगा .मत भूलिए सृष्टि के विनाश का लक्षण है ये .”

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    धन्यवाद रीता जी,बहुत दिन पश्चात आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई.

ashishgonda के द्वारा
December 24, 2012

आदरणीया माँ जी! सादर चरणस्पर्श. वर्तमान समस्या पर लेखन करने आपने अत्यंत सराहनीय कार्य किया. आपको इस ज्ञानवर्धक आलेख के लिए धन्यवाद. बहुत दुखी हैं सब पर क्या करें प्रशासन हाथ बाँधे है और हम लाचार… “चप्पे चप्पे पर है दुशासन पर कहीं कृष्ण का पता नहीं. कृष्ण बने हैं अंधे आज, फिर कैसे करे नारी राज….” (इसकी पहली पंक्ति श्री प्रदीप कुशवाहा जी के कविता से ली है वहाँ भी ये प्रतिक्रिया हुई है.)

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    आशीष कुशवाह जी की पंक्तियों के साथ सार्थक प्रतिक्रिया पर आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 24, 2012

आदरणीया निशा जी, सादर अभिवादन मेरी भावनाओं से आप अवगत ही हैं. मेरे पास कहने को अब शेष नहीं. जब कमिटी ही बनानी थी, ठोस कदम उठाने थे तो इतना इन्तजार क्यों.किया गया. बाकी बात आपने लिख दी है. सहमत . बांसुरी ही बजाती रही सरकार. आभार , बधाई

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2012

    कुशवाह जी सादर अभिवादन ,अब पछिताय क्या होत है जब चिड़िया चुग गयी खेत और वैसे उनको तो पछतावा नहीं लीपा पोती है बस .धन्यवाद.


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