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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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भारत हो चाहे इंडिया बेटियां तो हमारी ही हैं. जागरण जंक्शन फोरम

Posted On: 9 Jan, 2013 Others में

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भारत में जन्म लेकर,यहीं के अन्नजल से बड़े हुए आधुनिकता का चश्मा पहने लोगों से यदि लोगों से उनके देश का नाम पूछा जाय तो वो इंडिया कहकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं,जो निश्चित रूप से एक अपमानजनक सत्य है,परन्तु इसके लिए उनको दोषी ठहराना न्यायसंगत कैसे माना जाय जबकि हमारे संविधान में लिखा गया है इण्डिया दैट इज  भारत . अर्थात संवैधानिक रूप से जिस तथ्य को हम स्वीकार कर रहे हैं,आज तक भी हमारी सरकारें स्वयम  को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया लिखती हैं तो ये प्रश्न उठाने का क्या औचित्य शेष रह जाता है …………. हमारे से श्रेष्ठ तो श्रीलंका और म्यांमार है,जिनको उनकी स्वाधीनता से पूर्व सीलोन और बर्मा के नाम प्रदान किये गए थे परन्तु अपनी राष्ट्रीयता का सम्मान करते हुए उन्होंने अपनी मौलिकता को अपनाया .जबकि हमारा देश, जो सभी क्षेत्रों में अपनी  समृद्ध धरोहर के लिए सम्पूर्ण विश्व के लिए आकर्षण का केन्द्र था आज भी उसी नाम  को ,अपमान को गले से लगाये हुए है.निश्चित  रूप से इसके लिए दोषी मान जाता है,ब्रिटिश शासन को ,परन्तु क्या कोई भी स्वदेश प्रेमी या विचारक मन से इस तथ्य को स्वीकार कर सकता है कि अंग्रेजों को भारत छोड़े हुए साढे छह दशक से अधिक समय हो गया और संविधान में अद्यतन 117 संशोधन हो चुके हैं परन्तु यह महत्वपूर्ण संशोधन नहीं हुआ. तो दोषी कौन हैं ?आखिर किसको विरोध है भारत को भारत कहने में ?
हमारी सभ्यता – संस्कृति और मानसिकता के आमूल चूल परिवर्तन के लिए निश्चित रूप से दोषी शिक्षा पद्धति है जिसके जनक लार्ड मैकाले ने  इस तथ्य को पहिचाना  किया  कि भारतीय संस्कारों पर प्रहार करके  ही हम अपना राज्य स्थायी कर सकते हैं,जिसका प्रमाण उसका ये प्रस्ताव  जो उसने ब्रिटिश संसद के समक्ष 1835 में प्रस्तुत किया ,

मैंने भारत के कोने-कोने की यात्रा की है और मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो या चोर हो। मैंने इस देश में ऐसी संपन्नता देखी, ऐसे ऊंचे नैतिक मूल्य देखे कि मुझे नहीं लगता कि जब तक हम इस देश की रीढ़ की हड्डी न तोड़ दें, तब तक इस देश को जीत पायेंगे और ये रीढ़ की हड्डी है, इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, इसके लिए मेरा सुझाव है कि इस देश की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को इसकी संस्कृति को बदल देना चाहिए. यदि भारतीय यह सोचने लग जाए कि हर वो वस्तु जो विदेशी और अंग्रेजी, उनकी अपनी वस्तु से अधिक श्रेष्ठ और महान है, तो उनका आत्म गौरव और मूल संस्कार नष्ट हो जाएंगे और तब वो वैसे बन जाएंगे जैसा हम उन्हें बनाना चाहते है – एक सच्चा गुलाम राष्ट्र . लार्ड मैकाले ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपनी शिक्षा नीति बनाई, जिसे आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली का आधार बनाया गया ताकि एक मानसिक रूप से गुलाम कौम तैयार किया जा सके, क्योंकि मानसिक गुलामी, शारीरिक गुलामी से बढ़कर होती है.
उसका ये स्वप्न पूर्ण हुआ और आज वो हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं,भले ही अंग्रेज शासक नहीं परन्तु पाश्चात्य जीवन शैली ,भाषा अपनाने के लिए एक होड है,जिसके परिणाम स्वरूप सब भाग रहे हैं कि कहीं हम पीछे न रह जाएँ.

वास्तव में देखा जाय तो वर्ग विहीन समाज दुनिया के किसी भी कोने में नहीं यहाँ तक कि ऐसा दिखावा करने वालों के लिए भी यह एक स्वप्न ही बनकर रह गया.अतः समाज में किसी न किसी रूप में वर्ग सदा विद्यमान रहे हैं.चाहे वह  वर्ग आर्थिक आधार पर बने हों,शासक-शासित ,शिक्षित-अशिक्षित ……………..परन्तु आज  हमारे देश में  वैचारिक ,आर्थिक सभी स्तरों पर भारत और इंडिया के रूप में विभाजन दिखता है.समय के साथ परिवर्तन अवश्यम्भावी और अपरिहार्य है,परन्तु आज स्थिति पूर्णतया भिन्न है.आज इंडिया का स्वरूप किसी विचारक के शब्दों में .“इंडिया वो है जो महानगरों की अट्टालिकाओं में बसा करता था और अब तेजी से छोटे शहरों में भी दिखने लगा है. इंडिया विकसित है. इसमें देश की जनसंख्या का इतना प्रतिशत है जिसे अँगुलियों पर गिना जा सके. उच्च आय वर्ग वाला तमाम सुख सुविधाओं से लैस. इनके शहर योजनाओं के अनुसार बसते हैं और अगर बिना योजनाओं के बदलते हैं तो उसे योजना में शामिल कर लिया जाता है .”इतना ही नहीं नित नूतन ब्रांड की गाडियां,विलासिता के साधन ,बच्चों को साहबी बनाने वाले इंटरनेशनल पद्धति का अनुसरण करने वाले शिक्षण संस्थान,पिता-पुत्री ,बहिन- भाई के रिश्तों को तिलांजली देते हुए,पब ,अश्लील नृत्यों और गानों पर शराब और अन्य नशीली वस्तुओं की गिरफ्त में फंसे युवा………………पडौसी का पडौसी को  जानना – पहिचानना केवल स्वार्थ वश .
भारत की यदि बात करें …………..
भारत, यह विकाससील है. इसमें आबादी का वो हिस्सा रहता है जो  ऊपर वर्णित इंडिया की रोजमर्रा की जरूरतों की आपूर्ति करता है. मसलन घरेलू काम करने वाली बाई, कार की सफाई करने वाला, दूध वाला, धोबी, महाअट्टालिकाओं के गार्ड, इलेट्रिशियन और प्लंबर आदि-आदि. भारत में रहने वाले के पास न अपना कहने को जमीं होती है और न कोई छत. वो झुग्गियों में रहता है, अवैध बस्तियों में या फिर शहर के कोने में बच गये पुराने किसी शहरी से गांव में.”   इसके अतिरिक्त  सक्षेप में  प्रतिदिन  कुआँ  खोदना और पानी पीना  इनकी नियती है. अवसर आने पर एक दूसरे के  काम आना ,सुख-दुःख को अपना मानना.
उपरोक्त वर्णित इंडिया और भारत के मध्य एक चिर परिचित  मध्यम वर्ग है जो उस शिखर को तो छूने में समर्थ नहीं और न ही भारतीय संस्कारों से स्वयम को पृथक रख पा रहा है,और न ही केवल भारतीय बन कर रहना चाहता है
.
बलात्कार का जहाँ तक संबंध है कि वो इंडिया में होते हैं भारत में नहीं ,पर विचार करने के लिए मेरे  विचार से ये अंतर,इसके पीछे मानसिकता को  समझना आवश्यक है.बलात्कार,अपहरण लड़कियों को विवाह मंडप से उठा लेना आदि प्रचलन में तो भारत इंडिया  सर्वत्र हैं, बस स्वरूप में अंतर है.अंतर है उस मानसिकता का  जो  भारत की जनता पर स्पष्ट है और वहाँ लड़की के साथ ऐसा होने पर शेष समाज उसको पचा नहीं पाता अतः उस लड़की या महिला का जीना दूभर हो जाता है,यहाँ तक कि इस पीड़ा को सहन करने के साथ,उसके परिजन ही उसको दोषी मान बैठते हैं .यहाँ तक कि वो कभी नींद की गोलियाँ खाकर चिर निंद्रा में सो जाती है,तो कभी चुन्नी  या साड़ी बांधकर पंखे से लटककर अपनी जान दे देती है और कई बार तो उसको उसके परिजन ही उसको विवश करते हैं,या उसको निर्दयता से मौत की नींद सुला देते हैं.अतः स्वयं लड़की या उसके परिजन लड़की का जीवन बर्बाद होने पर ,अपराधी का पता होने पर भी मुहं सिल लेते हैं.प्राय लड़की को धमकी दी जाती है कि ऐसा करने पर उसके परिवार को ही समाप्त कर दिया जाएगा.मरता क्या न करता .शिक्षा की कमी ,जानकारी का अभाव,परिवार की सुरक्षा ,बदनामी ,दबंगों का भय आदि कारणों से ये घटनाएँ सामने बहुत कम आती हैं.वैसे भी अस्पृश्यता का चलते हरिजनों को मंदिर और कुँए पर जाने की अनुमति न देने वाले दबंगों को हरिजनों की सुन्दर बेटियां को बर्बाद करते समय उनकी सोच बदल जाती  है,कोई परहेज छुआछूत आड़े नहीं आती.और यही कारण है कि कभी वहाँ निर्वस्त्र महिलाओं की परेड कराई जाती है,तो कभी उनके पति का वध कर दिया जाता है,कभी उनके घरों में आग लगा दी  जाती है.उपलब्ध आंकड़ों को यदि सही माना जाय तो क्रिमिनल ला जनरल के अनुसार कुछ हाई कोर्ट में 80% और सुप्रीम कोर्ट में 75% केसेज ग्रामीण क्षेत्रों में पंजीकृत है,इसी प्रकार गेंग रेप के मामलों का अधिक प्रतिशत भी ग्रामीण क्षेत्रों से है.


इंडिया में रहने वाले अधिकांश जन अपेक्षाकृत  ऐसी घटनाओं से प्रभावित नहीं होते और घटनाएँ भी आम हैं  अतः प्राय  देख कर भी आँखें बंद रखी जाती हैं..आपाधापी ,भागदौड के चलते उनको इतनी फुर्सत नहीं कि व्यर्थ में  किसी के मामले में टांग अड़ाए. वैसे भी पडौसी ही पडौसी को नहीं पहिचानता . पढ़ाई या नौकरी के कारण परिवारों से बाहर रहते हुए लड़के -लड़कियां स्वयम को स्वतंत्र अनुभव करते हैं,और बुराई में सदा आकर्षण होता है,उधर फ़िल्में,इंटरनेट ,मोबाइल का दुरूपयोग , कुछ साथियों का उन्मुक्त जीवन ,लिव इन रिलेशनशिप में रहना ,मौज-मस्ती कोई झंझट नहीं आदि भी प्रभावित करते हैं, अतः  भटकाव अधिक है. परिणामस्वरूप जहाँ आम आँखें बुराई खोजती हैं,वो सामान्य दिखने लगता है.और मीडिया भी इस संदर्भ में अधिक सक्रिय रहता है, अतः प्राय घटनाएँ प्रकाश में अधिक आती हैं.
हाँ सत्यता इतनी अवश्य है,कि शराब का आम होता चलन सर्वाधिक उत्तरदायी है इन घटनाओं के लिए ,जिसके चलते व्यक्ति अपना तन तो खोखला करता ही है,उसको उचित-अनुचित में कोई अंतर नहीं दिखता और शैतान हावी रहता है उस पर.और यह कारण  भारत और इंडिया दोनों में प्रभावकारी है.इसके अतिरिक्त भी अश्लील-भद्दे गीत,संवाद दृश्य कुत्सित भावनाओं को जगाते हैं .इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया में  अधिकांश समाचार और दृश्य ऐसे ही होने के कारण भारत में भी यह प्रचलन बढ़ रहा है.

थोडा बहुत अंतर मिल सकता है तो उस भारत में जहाँ आधुनिक सुविधाओं  के नाम पर कुछ भी नहीं,न वहाँ फ़िल्में है,न अश्लील गीत और संवाद,न मोबाइल जहाँ पहले पेट भरने को रोटी चाहिए और जहाँ हम आप कोई नहीं पहुँच पाते .

बुराई का  रोग पनपना आसान है,परन्तु उसको समूल नष्ट करना असंभव और वो भी  हाँ,त्वरित ,कठोर ,निष्पक्ष न्याय  के रूप में रोक लगा सकते हैं.शेष तो परिवार के संस्कार ही तारणहार हैं.उत्तम है समस्या का निवारण न कि भारतीय पुलिस की तरह ये देखना कि किसका क्षेत्र है.क्षेत्र चाहे जो भी  हो बहिन बेटियां तो हमारी ही हैं.अतः बेटियों को सदाचार की शिक्षा देने के साथ लड़कों को भी संस्कारित करना और उत्तरदायित्व सौपना अनिवार्य है.



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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

January 14, 2013

सार्थक एवं प्रेरक विचार आदरणीय निशा जी । हमारी शिक्षा पद्धति और बदलती मानसिकता के दुष्प्रभाव पर सुंदर अभिव्यक्ति । धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    January 15, 2013

    सिन्हा साहब आभार प्रतिक्रिया हेतु

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
January 14, 2013

निशा जी,बहुत ही विस्तार से आपने सफलता पूर्वक भारत और इंडिया का भेद समझाया है और हकीकत को बयां किया.बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

    nishamittal के द्वारा
    January 14, 2013

    धन्यवाद आपका .

shashibhushan1959 के द्वारा
January 13, 2013

आदरणीय निशा जी, सादर ! अपने सांस्कृतिक मूल्यों पर पिछले कई दशकों से किसी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया, न सरकार ने, न समाज ने, न परिवार ने ! सभी ने अपने पुराने संस्कारों को घटिया, दकियानूसी और बेकार कहकर इसका विरोध ही किया ! सरकार में बैठे लुच्चे-लफंगों ने एक अजीब तरह की कामुक संस्कृति का विकास किया, जो बाहर से तो बहुत चमकीला और सुन्दर दीखता है, पर उसके अन्दर जहर ही जहर भरा है ! इस पृथ्वी कि सभी चीजों कि एक मर्यादा होती है ! नदी कि मर्यादा उसके किनारे होते हैं ! एक किनारा भी छिन्न-भिन्न हो जाय तो वह नदी न होकर पानी का ढेर ही रह जाएगा और अतिशीघ्र विनष्ट हो जाएगा ! नदी, पर्वत, झील, पेड़, पौधे, जीव-जंतु सभी अपनी-अपनी मर्यादा में बंधे होते हैं ! जिसने भी इस मर्यादा को तोड़ने कि कोशिश की, उसका विनाश ही हुआ ! ठीक इसी तरह हमारी भी कुछ मर्यादाएं हैं, जिनका उचित अनुपालन ही समाज को सुव्यवस्थित रख सकता है ! जब मार्यादाएं टूटेंगी तो उथल-पुथल तो होगा ही ! अब समय है कि हम (सरकार, समाज और परिवार) सब मिलकर पुनः अपनी स्थिति पर चिंतन करें ताकि आने वाली पीढ़ी सुखी और सुव्यवस्थित हो सके ! सादर !

    nishamittal के द्वारा
    January 13, 2013

    मर्यादाओं का उल्लंघन सदा ही विनाशकारी होता है,परन्तु दुर्भाग्य से जब तक यह तथ्य समझ पाते हैं,बहुत देर हो चुकी होती है.बहुत दिन पश्चात प्रतिक्रिया हेतु आभार

January 12, 2013

सादर प्रणाम! भारत हो चाहे इंडिया बेटियां तो हमारी ही हैं………………………….बहुत अच्छा लगा आपका यह शीर्षक और भावना…………………………हार्दिक आभार……………..!

    nishamittal के द्वारा
    January 13, 2013

    शीर्षक और भावना पसंद करते हुए प्रतिक्रिया देने हेतु आभार

Santlal Karun के द्वारा
January 11, 2013

आदरणीया निशा जी, आप ने बलात्कार-जैसे घृणित, अमानवीय, क्रूरतम दुष्कर्म पर विस्तार से चर्चा की है, बड़े ही तार्किक और सुन्तुलित रूप में; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगलकामनाएँ ! “हमारी सभ्यता – संस्कृति और मानसिकता के आमूल चूल परिवर्तन के लिए निश्चित रूप से दोषी शिक्षा पद्धति है जिसके जनक लार्ड मैकाले ने इस तथ्य को पहिचान किया कि भारतीय संस्कारों पर प्रहार करके ही हम अपना राज्य स्थायी कर सकते हैं,जिसका प्रमाण उसका ये प्रस्ताव जो उसने ब्रिटिश संसद के समक्ष 1835 में प्रस्तुत किया |”

    nishamittal के द्वारा
    January 12, 2013

    आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार

yogi sarswat के द्वारा
January 11, 2013

इंडिया में रहने वाले अधिकांश जन अपेक्षाकृत ऐसी घटनाओं से प्रभावित नहीं होते और घटनाएँ भी आम हैं अतः प्राय देख कर भी आँखें बंद रखी जाती हैं..आपाधापी ,भागदौड के चलते उनको इतनी फुर्सत नहीं कि व्यर्थ में किसी के मामले में टांग अड़ाए. वैसे भी पडौसी ही पडौसी को नहीं पहिचानता . पढ़ाई या नौकरी के कारण परिवारों से बाहर रहते हुए लड़के -लड़कियां स्वयम को स्वतंत्र अनुभव करते हैं,और बुराई में सदा आकर्षण होता है,उधर फ़िल्में,इंटरनेट ,मोबाइल का दुरूपयोग , कुछ साथियों का उन्मुक्त जीवन ,लिव इन रिलेशनशिप में रहना ,मौज-मस्ती कोई झंझट नहीं आदि भी प्रभावित करते हैं, अतः भटकाव अधिक है. परिणामस्वरूप जहाँ आम आँखें बुराई खोजती हैं,वो सामान्य दिखने लगता है.और मीडिया भी इस संदर्भ में अधिक सक्रिय रहता है, अतः प्राय घटनाएँ प्रकाश में अधिक आती हैं. मैं मुश्किल में हूँ की मेरे अन्दर जो विचारों का तूफ़ान चल रहा है उसे बाहर निकल सकूँ ! लेकिन न वक्त इज़ाज़त दे रहा है और न ही ऐसी कोई पोस्ट मिली जिस पर खुलकर अपने विचारों को रख सकूँ ! आपको देखा तो लगा , मंजिल मिल रही है ! आपने एक बात इसी पैराग्राफ में कही है कि इंडिया के ज्यादातर लोग इन बातों पर कान ही नहीं देते ! बिलकुल ! और ऐसा भी नहीं है कि उनके यहाँ रिश्तों कि परवाह नहीं है ! लेकिन वो मस्त है ! हर सुविधा भोग रहे हैं लेकिन देश के हालात से अनभिज्ञ तो नहीं कहूँगा बल्कि ये कहूँगा कि कान हटा रखे हैं ! उनकी दुनिया सिर्फ कुछ पार्टियों तक या डिस्को तक सिमटी है और वो इसी से करोडपति बन रहे हैं क्यूंकि उनकी इस दुनिया में और कोई आसानी से प्रवेश भी नहीं पा सकता है ! कौन होगा जो महेश भट्ट कि बेटी से बुरा बर्ताव कर सके ? कौन होगा जो प्रियंका गाँधी से दुर्व्यवहार कर सके ? इसका मतलब एक इंडिया में दूसरा इंडिया भी बसता है ? जो उच्च वर्ग है ! और शायद वो इंडिया कहीं से है ही नहीं सिर्फ नागरिकता के अलावा ! एक हम हैं ! जो जहां जरुरत होती है , देश कि खातिर कभी जंतर मंतर पर पिटते हैं कभी इंडिया गेट पर ! कभी हम ही पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा काट दिए जाते हैं , कभी हम ही सोनिया गाँधी के वोट बन जाते हैं ! हम ही हैं जो खुद के ही बहन को नोचते हैं ( इसी भारत में ) , कभी हम ही हैं कि अपाने ही भाई बहन पर गोली चलाते हैं ! तो जो कुछ बुरा होता है वो इंडिया में ही होत्ता है ! पहले वाले इंडिया में दूसरे वाले में नहीं ! हम ही अपने अधिकार मांगते हैं तो गोली खानी पड़ती है , हम ही गोली चलाते हैं ! क्या गज़ब है ये इंडिया ! भारत निश्चित रूप से चैन से है ! क्यूंकि वहां उनकी पत्नी को हार नहीं चाहिए , उनके बच्चों को इंग्लिश स्कूल नहीं चाहिए , उनकी बेटी कि इज्ज़त अगर कोई लूटता है तो आह भी नहीं होती ! आह ! तो फिर सबसे ज्यादा पिसा कौन ? पिसा वो पहले वाला इंडियन , जो ओवर टाइम करके चार पासे बचाता है , जिसकी बेटी बाप के साथ काम करने को देर तक घर से बाहर रहती है ! पिसा वो जिसका बेटा , चाहता है कि मेरा बाप कितना काम करता है , अब न करे ! क्यूँ इस देश में सिर्फ महेश भट्ट जैसे ही रह सकते हैं जो औरों को नंगा करके अपनी बेटी को सुरक्षा दे सकता है ! जो लड़की का नंगा जिस्म सिर्फ पैसे बटोरने के लिए इस पवित्र हिंदुस्तान में दिखता है ! तब कहाँ चली जाती है मानवीयता , तब कहाँ चलि९ जाती है सोच ! या कि जो है नाम वाला , वो ही हिंदुस्तान का रखवाला ? कल को अगर महेश भट्ट मर जाएगा तभी हमारा मीडिया कहेगा बहुत महान फिल्मकार था ! आज भी तो हम राज कपूर को यही कहते हैं ?

    jlsingh के द्वारा
    January 11, 2013

    आदरणीय योगी जी, सादर अभिवादन! हम आपकी प्रतिक्रिया, जहाँ भी होती है जरूर पढ़ते हैं! “मैं मुश्किल में हूँ की मेरे अन्दर जो विचारों का तूफ़ान चल रहा है उसे बाहर निकल सकूँ ! लेकिन न वक्त इज़ाज़त दे रहा है और न ही ऐसी कोई पोस्ट मिली जिस पर खुलकर अपने विचारों को रख सकूँ !” इसी बात का तो मैं इंतज़ार कर रहा हूँ की आप खुलकर लिखें अपने विचार को टुकड़ों के बजाय संतुलित रूप से सहेज कर सबके सामने रखें! फिर भी लावा तो पिघल ही रहा है कभी न कभी बहार तो आयेगा ही! वैसे फेसबुक पर आपके रोचक जोक्स मन को हल्का करते हैं!

    nishamittal के द्वारा
    January 12, 2013

    सिंह साहब आपने सही कहा .योगी जी की प्रतिक्रिया सदा मिलती है ,बहुत सोच विचार कर [प्रतिक्रिया देते हैं वैसे भी कुछ ब्लोगर मित्र ऐसे हैं जिनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहती है.

    nishamittal के द्वारा
    January 12, 2013

    योगी जी,आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया की सदा प्रतीक्षा रहती है.आपने जिस विषाक्त वातावरण और उसके कारण समाज पर पड़ते दूषित प्रभाव को बताया है.इन्म्डिया और भारत का अंतर समाज की कुछ कडवी सच्चाई के साथ बताने हेतु धन्यवाद .हाँ आपकी प्रतिक्रिया छोटे से उत्तर में समाहित नहीं हो सकती उसके लिए यदि हम एक चर्चा चला सके तो कुछ सकारात्मक सामने आ सके .प्रयास करती हूँ यदि आप सभी का सहयोग मिले

    yogi sarswat के द्वारा
    January 12, 2013

    आदरणीय श्री जवाहर सिंह जी एवं निशा जी मित्तल सुप्रभात ! आशा है आशीर्वाद मिलेगा ! आज बहुत दिनों के बाद सुबह सुबह ही कम्पुटर पर हूँ तो ऐसा लग रहा है जैसे मन मांगी मुराद मिल रही हो ! पिछला एक महिना ज्यादा व्यस्त रहा ! लेकिन इसके बावजूद मैंने कोशिश करी की मैं आप जैसे महान और सम्मानित ब्लोग्गर्स द्वय के लेख पढ़ सकूं ! आप दोनो से मुखातिब हूँ ! श्री जवाहर सिंह जी का आभारी हूँ की उन्हें मेरे लेखन के साथ साथ मेरी प्रतिक्रिया भी आकर्षित करती है ! ये मेरे लिए एक पुरस्कार है ! आप दोनो विद्वजनों का आशीष इस बात का प्रमाण देता है की इस उखड़ती बिगड़ती दुनिया में अच्छे गुरु भी हैं ! बस पहिचान करने की जरुरत है ! मैं तो सिर्फ बच्चों को इंजीनियरिंग ही पढ़ा सकता हूँ लेकिन आप सब हम जैसे नए लोगों , नए तरुवारों को अपना आशीष देकर इस मंच को शोभायमान कर रहे हैं ! आदरणीय निशा जी मित्तल , मैंने आपको एक अनुरोध किया था की आप जागरण से कुछ बात करें ! आपकी बात का ज्यादा महत्व रहेगा ! श्री जवाहर सिंह जी फेसबुक पर जो जोक्स कभी कभी चिपकाता हूँ उसका सिर्फ एक ही मकसद है की इस गम और दुःख की घडी में शायद किसी के चेहरे पर कुछ पल के लिए मुस्कराहट आ सके ! मुस्कराहट , जीवन जीने की उर्जा है इसलिए कुछ प्रयास करता रहता हूँ और आपका आशीर्वाद मिलता है तो लगता है प्रयास सार्थक हुआ ! बहुत बहुत आभार , मेरे शब्दों को मान सम्मान देने के लिए !

    nishamittal के द्वारा
    January 13, 2013

    योगी जी कल भी मैंने आपके बाद वाले कमेन्ट का उत्तर दिया था परन्तु फिलहाल वहाँ नहीं है.जागरण से निवेदन करते हुए सुझाव दिया जा सकता है,बशर्ते सब लोग तैयार हों .सम्मान देने के लिए धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 11, 2013

आदरणीया निशा जी सादर अभिवादन में आपके विचारों से पूरी तौर से सहमत. भारत हो या इंडिया बेटी बेटी ही होती है. बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    January 11, 2013

    सहमती हेतु आभार आदरनीय कुशवाह जी.

akraktale के द्वारा
January 11, 2013

आदरेया निशा जी सादर, इंडिया और हिन्दुस्तान को सभी अपनी अपनी तरह परिभाषित कर रहे हैं. जबकि बात इतनी है कि जो हमारी प्राचीन संस्कृति से दूर होकर विदेशी संस्कृति के करीब हुए है उन्हें ही हम इंडिया कह सकते हैं. इसको किसी एक आधार पर समझ पाना मुश्किल है. सरकार कि निष्ठा किसके प्रति है यही समझ नही आ रहा है तो फिर देश के नाम बदलने के बारे में उनकी सोच होगी ऐसा मानना भी मुमकिन नही है. सरकार कुछ भी करे यदि देश के नव धनाढ्य लोग यदि इस बात को समझ सकें कि दौलत भले कितनी आ जाए हमें अपने संस्कार नही गवाने है तो फिर कोई इण्डिया कहीं नही दिखेगा हर और हिन्दुस्तान ही नजर आएगा. 

    nishamittal के द्वारा
    January 11, 2013

    आदरनीय अशोक जी जहाँ तक मैं समझती हूँ सरकार निष्पक्ष दृष्टिकोण नहीं अपनाती कुछ तो हमारी क़ानून व्यवस्था में खामियां जिसके चलते इस काण्ड का अपराधी आराम से बच जायेगा और कुछ नेताओं के बयान अरे भई बेटियां हमारी हैं इसमें विवाद क्यों? उदहारण के रूप में आज हमारे छोटे से शहर में एक गैंग रेप काण्ड हुआ ,बेटी माँ का साथ जा रही थी ,किशोरी पूरे वस्त्र पहिने थी आम परिवार की थी पीछे से ७ कार सवार लड़के पीछे से आये एउर उसको ले गये बाद में बदहवास स्थिति में सड़क पर डाल दिया ये घटना दिन के बारह बजे की है ये भारत की ही घटना है

    akraktale के द्वारा
    January 13, 2013

    सादर, मैंने यही कहने का प्रयास किया है कि हम गाँव और शहर से इसको विभाजित नहीं कर सकते हैं. संस्कारों में बदलाव कि जरूरत है.युवाओं ने जो दिल्ली और देश में अलख जगाई है यदि इसको जारी रखा जाए तो अवश्य ही घटनाओं के बाद कि सख्ती और सजा पर हम कुछ संतुष्ट दिखें किन्तु घटना कि रोक थाम के लिए आवश्यक है कि संस्कारों में बदलाव पर कार्य हो. 

    nishamittal के द्वारा
    January 13, 2013

    आभार पुनः विचार व्यक्त करने हेतु.निश्चित रूप से बहुत कुछ प्रयासों की आवश्यकता है,परन्तु दुखद तो ये है की जोश एक बार आता है और पुनः वही .इसके बाद प्रतिदिन कुछ न कुछ घटनाएँ गैंग रेप की प्रकाश में आ रही हैं यहाँ तक कि एक केस में तो उस लडकी की हत्या भी कर दी गयी.परन्तु कुछ भी नहीं हो पा रहा है,घटना भी उसको पता है,जिसकी दृष्टि उस समाचार पर चली गयी.न जाने क्या होगा .

Mohinder Kumar के द्वारा
January 10, 2013

निशा जी, सार्थक लेख के लिये बधाई. यदि इस घटना से हट कर हम विचार करें तो बेटियों पर यह समाज और घर के सदस्य कम अत्याचार नहीं कर रहे. दहेज के लिये हत्या, भ्रूण हत्या, आनर किलिंग और घरेलू हिंसा के लिये कौन जिम्मेदार है. इस समाज के दो चेहरे हैं एक स्वंय के लिये एक दूसरों को दिखाने के लिये. समाज में परिवर्तन के लिये हमें स्वंय को बदलना होगा और आने वाली पीढी को स्वस्थ संस्कार देने होंगे. लिखते रहिये.

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    मोहिन्दर जी प्रतिक्रिया हेतु आभार.पहले खुद सुधरें तभी तो आगामी पीढ़ियों के लिए आदर्श प्रस्तुत कर सकेंगें

Manju sharma के द्वारा
January 10, 2013

Nisha ji Your artical is very gd so lengthy discription really appreciable ati sunder rachna Manju Sharma

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    thanks a lot for your nice comments

jlsingh के द्वारा
January 9, 2013

आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! हमेशा की तरह विस्तृत विवेचना के साथ सार्थक विचार परक आलेख! अब इन दो बुजुर्गों (श्री मोहन भागवत और आशाराम बापू) का क्या कहें जो समस्या को सुलझाने के बजाय अपनी ऑंखें मूँद लेना चाहते हैं. “जाके पैर न फटे बिवाई. सो क्या जाने पीड़ पराई”. इनमे से या जितने भी बयान बीर बयान दे चुके हैं उनमे से किसी की अपनी बहन या बेटी के साथ यह घटना हुई होती, तब उनके यही बयान उल्टा होते!…चाहे जो हो हल हम सबको मिलकर ढूंढना है और यह शुरुआत अपने घर से ही करनी होगी! आपकी सारगर्भित आलेख के लिए आपका आभार!

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    सटीक प्रतिक्रिया हेतु आभार सिंह साहब,राजनीति से हट कर किसी की पीड़ा को समझना इंसानियत है और वो संभवतः नेताओं और साधू संतों में नहीं रही.

Rajesh Dubey के द्वारा
January 9, 2013

भारत कोई कहे, या इण्डिया, आर्यावर्त, या हिंदुस्तान, देश का विभाजन करने वाले अपनी बोली में इसे सौ टुकड़ों में बाँट दें, हजार नाम दे, पर देश यहाँ के वासियों का है. इसे टुकड़ा होने से बचाना है. बेटियां यहीं की हैं और देश की इज्जत है.

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    धन्यवाद राजेश जी.

seemakanwal के द्वारा
January 9, 2013

सच ही कहा बेटियां तो हमारी है चाहे भारत हो या इण्डिया .जब तक हर शख्स अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेगा तब तक ये अपराध समाप्त नहीं होंगे . विचारपरक लेख . धन्यवाद .

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    धन्यवाद सीमा जी

Ashish Mishra के द्वारा
January 9, 2013

दरअसल यह सबिधान संशोधन इसलिए नहीं हुआ की इससे किसी के वोट बैंक पर कोई फर्क नहीं पड़ता. न मायावती के, न मुलायम के न सोनिया के और न भाजपा के. इस देश में सिर्फ वही कम होता है ज्निसे किसी के वोट बैंक पर असर पड़ता है.

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    बिलकुल सही कहा आपने आशीष जी.धन्यवाद

deepasingh के द्वारा
January 9, 2013

पूर्णतः सार्थक लेख आदरणीया निशा जी साधुवाद. वन्देमातरम.

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    वन्देमातरम ,आभार दीपा जी.

ajaykr के द्वारा
January 9, 2013

बहुत ही सार्थक और सटीक लेखन !उम्दा विश्लेषण |

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    आभार अजय जी.

vinitashukla के द्वारा
January 9, 2013

भारत और इंडिया का, गहराई से विश्लेष्ण करता हुआ, सुंदर, जानकारीयुक्त लेख. सच कहा आपने-’ भारत हो या इंडिया, बेटियां तो हमारी हैं. ‘ बधाई एवं साधुवाद.

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    आभार विनीता जी.

alkargupta1 के द्वारा
January 9, 2013

निशाजी , इस आलेख की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम ही है…. ‘इण्डिया’ और ‘भारत’ के कटु सत्य को दर्शाया है …..और अंतिम पंक्तियाँ अति सराहनीय हैं जिसमें प्रत्येक परिवार के लिए एक उत्तरदायित्व की भावना लड़के व् लड़कियों को समान रूप से संस्कारित करने का अच्छा सुझाव दिया है…. विश्लेषणात्मक उत्कृष्ट आलेख की प्रस्तुति के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    January 10, 2013

    सुन्दर सकारात्मक और त्वरित प्रतिक्रिया हेतु आभार


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