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हिंदी का महत्व तो है , पर महारानी तो अंग्रेजी ही है. हिंदी दिवस पर

Posted On: 10 Sep, 2013 Others में

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हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ या ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है’ – क्या कहना है आपका

जिस थाली में खाना उसी में छेद करना मुहावरा उन अधिसंख्यक देशवासियों पर लागू होता है ,जो हिंदी में सोचते हैं, ,हिंदी सीख कर ही पलते बड़े होते हैं,हिंदी के माध्यम से अपने दैनिक व्यवहार करते हैं,हिंदी गाने सुनते हैं,हिंदी फिल्में देखते हैं ,हिंदी समाचार सुनते हैं,टी वी के हिंदी कार्यक्रम हिंदी के देखते हैं,हिंदी बिछाते ओढ़ते और हिंदी में स्वप्न देखते हैं,लेकिन स्वयम को हिंदी भाषी कहलाने में अपमान मानते हैं,अपने बच्चों को हिंदी सिखाना नहीं चाहते,उन स्कूल्स में बच्चों को प्रवेश दिलाकर स्वयम को आधुनिक मानते हैं जहाँ हिंदी शब्द बोलने पर दंड मिलता है.बड़े गर्व से कहते है हमारे बच्चों को हिंदी की गिनती नहीं आती,हमारे बच्चों को हिंदी वर्णमाला याद नहीं आदि आदि ………….

जब संस्कार ऐसे मिलेंगें घुट्टी में तो कैसे सीखे नई पीढी  अपनी माँ का सम्मान करना ?हिंदी हर भारतवासी के लिए माँ के समान ही है, वही हिंदी जो  हिंदी हर भारतीय के माथे की बिंदी होनी चाहिए,जो हिंदी में विश्व में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख भाषाओं में एक है, हिंदी को प्रोत्साहन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिल रहा है  तथा वहाँ पढाई भी  जा रही है , परन्तु दुर्भाग्य से उस माँ का हर कदम कदम पर अपमान होता है.


>,हिंदी के प्रति कुलीन परिवारों में तो हीन भावना है ही ,निर्धन वर्ग भी अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने बच्चों को भूखा रह कर भी अंग्रेजी स्कूल में पढाने की कामना रखता और यथासंभव पूरा करता है .स्कूल अंग्रेजी माध्यम का हो भले ही  वो गली मौहल्लों में घर घर खुले हुए स्कूल ही  हों.उनमें पढ़ाने वाली शिक्षिकाएं 1000 रुपए मासिक वेतन पर पढ़ा रही हो अप्रशिक्षित हों.बस बच्चा अंग्रेजी के टूटे फूटे शब्द बोल ले गलत या सही का तो न उनको पता न बच्चों को .वो प्रसन्न हैं   कि बच्चा अंग्रेजी सीख रहा है.

मध्यमवर्गीय परिवारों में भी ये रोग बहुत गहराई से पैठ बनाये हुए है. बस बच्चा अंग्रेजी कविता  सुना दे ,जिसको    रटने में उसका और स्वयम मातापिता का सम्पूर्ण समय बीत जाता हो ,  मातापिता का मस्तक गर्वोन्नत हो जाता है .बच्चों पर दोहरी मार को लेकर झींकना मंज़ूर है,स्कूल्स द्वारा लागू  मनचाही फीस और अन्य व्यय को लेकर अपने बजट को बिगाड़ना पड़े  परन्तु स्कूल का  माध्यम अंग्रेजी ही हो. दूसरे शब्दों में  यदि कहा जाय कि हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले वो बच्चे हैं जिनके पास बिलकुल ही साधन नहीं हैं तो अतिश्योक्ति नहीं  ,( साधन होते हुए भी बच्चों को केवल अंगेजी माध्यम का दास न बनाना अपवाद स्वरूप ही है.)

गृहणियां भी जो हिंदी का प्रयोग बचपन से अपने घरों में देखती सुनती  हैं,  गलत बोले या सही हिंदी शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर ही स्वयम को स्मार्ट समझती हैं.एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ,दुकानदार,रिक्शे वाला  के सामने भी अंग्रेजी के शब्द बोलने वाला ग्राहक  वी आई पी होता है.(जबकि  उसको  स्वयम  उन शब्दों का अर्थ नहीं पता  )

औरों को क्या कहा जाय हमारे नेता अंग्रेजी में भाषण देकर स्वयम को विद्वान् समझते हैं,ये बात मैं दक्षिण भारतीय नेताओं की नहीं कर रही हूँ अपितु उत्तर भारतीय नेताओं की भी यही मनोवृत्ति है. युवा पीढी के रोल माडल कहलाने वाले फ़िल्मी अभिनेता अभिनेत्रियाँ  जिन हिंदी फिल्मों से  प्रसिद्धि प्राप्त कर स्टार बनते हैं,धनकुबेर बनते हैं ,किसी भी समारोह में अंग्रेजी में ही बोलेंगें.इन सबसे बढ़ कर प्रशासनिक अधिकारी जो कहलाते जनसेवक हैं लेकिन हिंदी में व्यवहार नहीं करते अंगरेजी जानते हुए भी हिंदी में बोलने वाले नेता,अभिनेता ,अधिकारी अपवाद स्वरूप ही हैं.

मेरे विचार से आम आदमी की इस मानसिकता पर यदि विचार करें तो इसका कारण है हमारी गुलामी की मानसिकता जो हमारे मनोमस्तिष्क पर छायी है .लम्बे समय तक दासता की जिन्दगी जीते हुए हमारी शिक्षा प्रणाली लार्ड मैकाले के सिद्धांत के आधार पर तैयार हुई .दुर्भाग्य से स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी नीति निर्माताओं की आँखों पर दासता का ही पर्दा रहा और उसी शिक्षा प्रणाली को जारी रखा गया. तद्पश्चात भी कठोर निर्णय शक्ति न होने और राजनीति के दुश्चक्र ने हिंदी को अपने ही देश में बेगाना बनाये रखा.

अंगरेजी के प्रति मोह का एक अन्य कारण है ,श्रेष्ठ पदों पर बैठे अधिकारी या ग्लेमर की दुनिया के वे  लोग ,जिनको व्यक्ति  टी वी, फिल्मों राजनीति  या अन्य क्षेत्रों  में सफलता के शिखर पर पहुँचते देखता है और फिर अंग्रेजी रंग ढंग अपनाते देखता है,जिनके बच्चे पंचतारा जिन्दगी जीते हैं. स्वयम को और अपनी आने वाली पीढी को भी सफलता के शिखर पर देखने की कामना हर व्यक्ति का स्वप्न होता है अतः वह अनुसरण करते हुए अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहता है. विदेश गमन की चाह भारतीयों का  एक ऐसा मोह है,जिसके कारण अंगरेजी उनके दिलो दिमाग पर छाई रहती है.और वो ये मान बैठता है कि उनके बच्चे आगे की पढाई अच्छी तरह करके उच्च  पद नहीं प्राप्त नहीं कर सकेंगें.

अपनी भाषा को सीखना सरल होता है जिसके लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता ,परन्तु हमारी मानसिकता दोषपूर्ण हो जाने के कारण आज हमारे  अधिकांश बच्चे रट कर आगे बढ़ते हैं,जिसमें उनका दोगुना समय बर्बाद होता है .hindi

.अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढना प्रवीणता प्राप्त करना कभी भी अनुचित नहीं  अंगरेजी  क्या अपितु  विश्व की जितनी भाषाएं भी सीखी जा सकें सीखनी चाहिए,ज्ञान तो जितना बढाया जाय उतना ही उत्तम है,परन्तु अपनी उस  भाषा को हीन मानते हुए नहीं जिसके कारण हमारा अस्तित्व है.

भारतेंदु हरीश चन्द्र जी की इन पंक्तियों के साथ इस आलेख को विराम ,जिसमें अपनी भाषा के महत्व पर  सुन्दर शब्दों में प्रकाश डाला गया है

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

उन्नति पूरी है तबहि, जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहूँ न ह्यौंहिं सोच।
लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय।।

इक भाषा इक जीव इक मति, सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।

तेहि सुनि पावैं लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और मंह, कबहू नाहीं होय।।

-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

विष्णु तोडकर के द्वारा
April 14, 2015

अपनी हिंदी भाषा में व्यवहार करना, बोलना, प्यार करना, हिंदी फिल्म देखना अच्छा लगता है, हिंदी मालिकाएं देखना अच्छा लगता है, अपने भारत के आय पी एस अफसर भी हिंदी में कार्य करने के लिए हां करते परंतु जब असली काम करने का वक्त आता है तो, हिंदी मे कार्य करने में मुह फेर लेते है, और जो हिंदी मे कार्य करना चाहता है उसकी लायकी कम करते है, लेकीन हमें गर्व है की हम भारतीय है और हमारी मातृभाषा हिंदी जो अभी हमारे प्रधानमंत्रीजी हिंदी में भाषण देकर अपनी हिंदी भाषा को रोशन कर रहें हैं ।  जय हिंद, जय भारत…

bdsingh के द्वारा
September 20, 2013

हिन्दी केअनादर के लमहों को आपने व्यक्त किया। हिन्दी कहती है—- जितना भी चाहो,जाओ मुझसे दूर। लौटोगे,रह न पाओगे मुझसे दूर।।

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2013

    बहुत सुंदर पंक्तियाँ आभार प्रथम प्रतिक्रिया के लिए

nishamittal के द्वारा
September 18, 2013

यमुना जी का कमेन्ट भी नहीं आया पोस्ट पर मैं उनका कमेन्ट यहाँ कॉपी पेस्ट कर रही हूँ , आपकी बातों से सहमत हूँ निशाजी.हिन्दी का सम्मान तो हिन्द वासी ही करेंगे. साभार  जागरण जंक्शन से अनुरोध कृपया मेरी दो व्यवस्थाएं ठीक करने का कष्ट करें .टोटल कमेंट्स में अंतर डेशबोर्ड और साईट पर ,और कुछ लोगों के कमेन्ट न आ पाना आभार

    nishamittal के द्वारा
    September 20, 2013

    आभार यमुना जी

nishamittal के द्वारा
September 16, 2013

जागरण पर मेरी पोस्ट पर कुछ तकनीकी समस्या के कारण कुछ ब्लोगर्स के कमेन्ट नहीं पहुँच रहे हैं . योगी सारस्वत जी का सन्देश और प्रतिक्रिया मैं जी मेल से कोपी करके यहाँ पोस्ट कर रही हूँ मैं जब आपका ब्लॉग खोल रहा हूँ तो वहां बहुत तकनीकी समस्या आ रही है ! आपसे अनुरोध करता हूँ की आप मेरे नाम से इस प्रतिक्रिया को अपने ही हाथ से अपने ब्लॉग पर लगायें और कहीं मेरा नाम दे दें ! अंगरेजी के प्रति मोह का एक अन्य कारण है ,श्रेष्ठ पदों पर बैठे अधिकारी या ग्लेमर की दुनिया के वे लोग ,जिनको व्यक्ति टी वी, फिल्मों राजनीति या अन्य क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर पहुँचते देखता है और फिर अंग्रेजी रंग ढंग अपनाते देखता है,जिनके बच्चे पंचतारा जिन्दगी जीते हैं. स्वयम को और अपनी आने वाली पीढी को भी सफलता के शिखर पर देखने की कामना हर व्यक्ति का स्वप्न होता है अतः वह अनुसरण करते हुए अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहता है. विदेश गमन की चाह भारतीयों का एक ऐसा मोह है,जिसके कारण अंगरेजी उनके दिलो दिमाग पर छाई रहती है.और वो ये मान बैठता है कि उनके बच्चे आगे की पढाई अच्छी तरह करके उच्च पद नहीं प्राप्त नहीं कर सकेंगें. और होता क्या है इनके पद चिन्हों पर चलने की कोशिश में हम अपनी मात्र भाषा को धीरे धीरे छोड़ते चले जाते हैं ! बहुत सटीक लेखन आदरणीय निशा जी मित्तल !

    nishamittal के द्वारा
    September 16, 2013

    धन्यवाद योगी जी सहमती के लिए .कुछ और लोगों की प्रतिक्रियाएं मेल में हैं उनकी अनुमति के बाद पोस्ट करूंगी

meenakshi के द्वारा
September 15, 2013

हिन्दी की वर्तमान स्थिति का सत्य वर्णन किया है , बहुत-२ बधाई ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    nishamittal के द्वारा
    September 16, 2013

    धन्यवाद मीनाक्षी जी

deepakbijnory के द्वारा
September 15, 2013

एक एक शब्द सत्य है

    nishamittal के द्वारा
    September 15, 2013

    धन्यवाद प्रथम प्रतिक्रिया हेतु

Bhagwan Babu के द्वारा
September 15, 2013

हिन्दी की हो रही दुर्दशा पर सटीक प्रकाश डाला है आपने… बधाई..

    nishamittal के द्वारा
    September 15, 2013

    धन्यवाद

vaidya surenderpal के द्वारा
September 14, 2013

बहुत ही सटीक और सारगभित आलेख। हिन्दी के प्रति स्वाभिमान की भावना को जागृत करके ही इसे राष्ट्रभाषा का स्थान पर स्थापित किया जा सकता है। आभार आपका।

    nishamittal के द्वारा
    September 15, 2013

    आभार सुरेन्द्र जी

Malik Parveen के द्वारा
September 14, 2013

निशा जी सादर नमस्कार हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा अत: हम सबको इसका सम्मान करना चाहिये और अपनाना चाहिए… पर आजकल अन्धानुकरण में लगे हैं हम और दूसरी भाषाओं का प्रयोग अपने लिए सम्मानजनक समझते हैं ! दूसरी भाषाएँ भी बोलिये पर अपनी मातृभाषा का सम्मान कीजिए …. सभी को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !! बधाई निशा जी …

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2013

    प्रवीन जी पूर्णतया सहमत हूँ आपके विचार से ज्ञानकोष तो जितना बढे बहुत उत्तम अतः अधिकतम भाषाओं का ज्ञान होना बहुत अच्छा है पर हिंदी की कीमत पर नहीं धन्यवाद

Santlal Karun के द्वारा
September 14, 2013

आदरणीया निशा जी, संविधान के 343 वें अनुच्छेद तथा आठवीं अनुसूची में संशोधन ( जिसे 26 जनवरी 1950 से ठीक 15 वर्षों बाद अर्थात 26 जनवरी 1965 को संशोधित करने का उल्लेख संविधान में ही था और फिर समय बढ़ा दिया गया ) मात्र से बहुत कुछ संतुलित हो सकता है और फिर कुछ वर्षों बाद पूर्ण संतुलन की कुंजी है, उसका प्रयोग किए बिना भाषा की स्थिति ही नहीं देश का मौलिक और अपेक्षित विकास भी संभव नहीं है | आप ने अपने इस लेख में नब्ज़ पे काफी-कुछ हाथ रखा है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2013

    संतलाल जी अभिवादन ,आभार ,हिंदी की जिस व्यथा की और आपका संकेत है वो दूसरे आलेख में है.

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
September 14, 2013

निशा जी,आपके लेखन में जो गंभीरता और ज्ञान भरा होता है वह अनुकरणीय है ,अपने हिंदी के बारे में हमारे समाज की मानसिकता का यथार्त स्वरूप पेश किया है.धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2013

    आपका आभार सहमती हेतु

jlsingh के द्वारा
September 13, 2013

आदरणीया महोदय, सादर अभिवादन! मेरी प्रतिक्रिया कहाँ गुम हो गयी, नहीं जानता. पर इस आलेख को मैं पहले पढ़ चूका हूँ. खैर आपने बहुत बारीकी से हर बिंदु का विश्लेषण कर हमारी/कुलीन वर्गों की लिप्शा को भी खंघाला है. खैर हिंदी का प्रचलन बढ़ रहा है, इसमें मीडिया और हिंदी ब्लोगिंग का भी योगदान है इसे नकारा नहीं जा सकता! मेरा भी ही यही मानना है की हिंदी में सोंचें, हिंदी में लिखे और हिंदी पढ़े तभी हिंदी जन भाषा बनेगी .. ससम्मान!

    nishamittal के द्वारा
    September 13, 2013

    सिंह साहब न जाने क्या समस्या है मेल पर सन्देश आता है प्रतिक्रिया का और न ब्लॉग में न डेशबोर्ड पर .मैं कई लोगों को दे चुकी हूँ पर मिल नहीं रही . सहमती हेतु आभार

vijay के द्वारा
September 12, 2013

आदरणीय माता जी नमस्ते, हर वर्ग , समाज की अपनी एक भाषा होती है जो वहा का कुलीन,उच्च वर्ग खुद को थोडा अलग दिखने के लिए प्रयोग करता है जैसे इंडिया में इंग्लिश जबकि यही भाषा की जन्मभूमि इंग्लैंड में फ्रेच भाषा को वहा वही सम्मान प्राप्त है जो इंग्लिश को इंडिया में है सब आत्मग्लानी और एक पूर्वाग्रहयुक्त मानसिकता का खेल है बहुत सुंदर आलेख काश हम इंग्लिश के प्रभाव से मुक्त हो सके

    nishamittal के द्वारा
    September 12, 2013

    विजय जी आपने फ्रेंच भाषा की जो बात कही जानकारी बढ़ाने हेतु धन्यवाद .लेकिन मेरा मानना है कि भाषा ज्ञान उसको सीखना,प्रवीणता प्राप्त करना बहुत सुन्दर और उपयोगी है परन्तु दुखद तो है कि जो हिंदी हमारी मातरभाषा है उसके प्रति सम्मान का लोप होना और उसके स्थान पर प्रधानता अंग्रेजी को देना गलत है जो आज हर वर्ग में दीखता है. धन्यवाद ,

aman kumar के द्वारा
September 12, 2013

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। आपके सभी लेख सम्पूर्णता से विषय को समेटते है आपका आभार

    nishamittal के द्वारा
    September 12, 2013

    धन्यवाद अमन जी

alkargupta1 के द्वारा
September 11, 2013

निशाजी , हिंदी को जो सम्मान मिलना चाहिए नहीं मिल पा रहा है अपने ही घर में सम्मान से वंचित है ….आज के समय के लिए आपका यह आलेख अर्थपूर्ण व बहुत महत्त्वपूर्ण है उत्कृष्ट आलेख की प्रस्तुति के लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    September 12, 2013

    धन्यवाद अलका जी

ashokkumardubey के द्वारा
September 11, 2013

निशा जी हमेशा की तरह आपका आलेख महत्वपूर्ण मुद्दों का उल्लेख कर रहा है जो आज हिंदी भाषा के ज्ञान और प्रचार प्रसार के लिए जरूरी है आपका यह आलेख अति सराहनीय है खासकर आपने भारतेंदु जी की कविता के माध्यम से जो कहा है वह अतुलनीय है हमरे देश का दुर्भाग्य ही कहलायेगा जो समृद्ध और विद्वान् वर्ग अंग्रेजी भाषा को ज्यादा तरजीह देने में ही अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा है क्यूंकि बड़ों की देखा देखि होती है अतः पहले समृद्ध लोग जब हिंदी को अपनाएंगे इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देंगे तो गरीब और माध्यम वर्ग भी इससे प्रेरित होंगे .हिंदी को पढने में रूचि लेंगे

    nishamittal के द्वारा
    September 12, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद आदरनीय दुबे जी सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु

Madan Mohan saxena के द्वारा
September 11, 2013

सुन्दर ,सरल ,,बहुत उम्दा रचना। कभी यहाँ भी पधारें। सादर मदन

    nishamittal के द्वारा
    September 12, 2013

    धन्यवाद मदन जी

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 10, 2013

आदरणीया निशा जी …हिंदी अंग्रेजी का अच्छा तुलनात्मक विश्लेष्ण ..सच में बहुत कुछ अभी सार्थक कदम उठाने होंगे सरकार द्वारा तो विश्वास बढेगा ..शिक्षा पुस्तकें रोजगार …पुरस्कार ..हर बिभागों में इस का प्रयोग … बहतु सुन्दर और सार्थक आलेख सदा सा .. भारतेंदु जी की बातें मन को छू जाती हैं इक भाषा इक जीव इक मति, सब घर के लोग। तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।। जय हिंदी जय हिन्द भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    September 12, 2013

    आभार आदरनीय शुक्ल जी

ushataneja के द्वारा
September 10, 2013

आदरणीया, आपका लेख बहुत ही सुन्दर है| परन्तु, एक बात अच्छी नहीं लगी कि 1000 रु. मासिक वेतन लेने वाली अध्यापिका … क्या अध्यापिका का वेतन ही बच्चे की शिक्षा का स्तर तय करता है? क्या 30 हज़ार लेने वाली अध्यापिका से पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी दुनिया जीत लेते हैं?

    nishamittal के द्वारा
    September 10, 2013

    आदरणीया उषा तनेजा जी,क्षमा करे मेरा अभिप्राय ये नहीं जो आप समझ रही हैं अपितु इसका अर्थ ये है गली मोहल्लों वाले या अन्य ऐसे स्थान स्थान पर खुले स्कूलों में शोषण होता है प्राय जहाँ दैनिक वेतन पर कार्य करने वाले श्रमिकों से भी कम वेतन उनको दिया जाता है उनको केवल उतने ही दिन के लिए नियुक्त किया जाता है जितने दिन विद्यालय चलता है अतः जॉब की असुरक्षा और स्वयम शिक्षिकाओं का प्रशिक्षित न होना निश्चित रूप से शिक्षा के स्तर पर प्रभाव डालता है.अपवाद स्वरूप ऐसी शिक्षिकाएं या शिक्षक हो सकते हैं जो इतने कम वेतन में भी पूर्ण निष्ठां से बच्चों के साथ न्याय कर पाते हैं.प्रश्न ३० हजार वाले शिक्षक या १००० रुपये वाले शिक्षक का नहीं प्रश्न इस बात का है कि इतने कम वेतन पर कार्य करने वाला सामन्यतया शिक्षित नहीं होगा ,वैसे तो शिक्षा देने वाले के लिए आवश्यक नहीं कि वो पूरा पढ़ा लिखा हो तभी शिक्षा दे सकेगा परन्तु बेसिक योग्यताएं होनी तो अनिवार्य हैं ही ,३० हजार या ८० हजार अर्जित करने वाले शिक्षक भी कितना न्याय कर पाते हैं ,यदि आप शिक्षा क्षेत्र में हैं तो मुझसे बेहतर जानती होंगी आभार प्रथम प्रतिक्रिया एवं अपनी विचारधारा रखने का .यदि संतुष्ट नहीं तो कृपया बताएं पुनः क्षमा सहित


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