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नारी तुम केवल श्रद्धा ही हो (करवा चौथ पर विशेष )

Posted On: 21 Oct, 2013 social issues में

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karva-c

अचल रहे अहिवात तुम्हारा
जब लगि गंग यमुन जलधारा।

श्री रामचरित्र मानस की  इन सुन्दर पंक्तियों के साथ सभी बहिनों को करवाचौथ के पावन पर्व पर सुखद दाम्पत्य जीवन के लिए मंगलकामनाएं. इन पंक्तियों में माता कौशल्या सीता जी को आशीर्वाद देती हैं ,जब तक गंगा यमुना में पानी है तुम्हारा सुहाग बना रहे .विवाह के लिए प्रतीक्षारत सभी के मनोरथ पूर्ण शीघ्र पूर्ण की कामना .करते हुए करवाचौथ की संक्षिप्त जानकारी के साथ कुछ विचार …………….

त्यौहारों और पर्वों के देश  भारत में करवाचौथ का महत्वपूर्ण स्थान है.यद्यपि उत्तर भारत में यह पर्व अधिक धूमधाम से मनाया जाता है परन्तु अब अपने व्यवसाय ,नौकरी के कारण देश के सभी भागों में विविध लोगों के बसने के कारण तथा मीडिया के प्रचार के कारण यह पर्व भी देश भर में देश के सभी भागों में लोकप्रिय है.

कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को  अपने सुहाग के लिए मंगलकामना करते हुए यह पर्व मनाया जाता है. करवा एक मिटटी का पात्र होता है,जिसमें जल भरकर रखा जाता है.और रात्रि में उसी करवे वाले जल से चन्दमा को अर्घ्य दिया जाता है. .अपनी शारीरिक सामर्थ्य व परम्परा के अनुसार महिलाएं इस व्रत को निर्जल ही करती हैं ,पक्वान्न तैयार किये जाते हैं .विशेष रूप से साज-श्रृंगार कर दिन में इसकी कथा या महातम्य सुना जाता है,अपनी श्रद्धेया सास  या नन्द को पक्वान्न ,वस्त्र आदि की भेंट दी जाती है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है.रात्रि में चन्द्रदेवता के उदय होने पर दर्शन कर और पतिदेव की पूजा कर ही व्रत का पारायण किया जाता है. त्यौहार मनाने का तरीका स्थानीय परम्पराओं के अनुसार थोडा भिन्न भले ही हो सकता है, जैसे कि पंजाबी संस्कृति में , मायका या ससुराल पक्ष की ओर से सरगी के रूप में पुत्रवधू के लिए वस्त्र-आभूषण,श्रृंगार सामग्री,चूड़ियाँ , पक्वान्न ,मेवे. फल आदि भेजे जाते हैं.सूर्योदय से पूर्व कुछ महिलाएं शगुन के रूप में कुछ खाकर मुहं भी मीठा करती हैं. दिन में एक स्थान पर एकत्रित हो कर कथा सुनती हैं और परस्पर थाली बदलती हैं,तथा रात्रि में चन्द्र दर्शन के समय चन्द्रदर्शन छलनी की आड में किया जाता है. थोडा बहुत स्थानीय प्रभाव परिलक्षित होता है,परन्तु मूलतः भावना वही है .मेहँदी, सोलह श्रृंगार कर सजना नवयुवतियों को बहुत भाता है .

आज थोड़ी सी चर्चा एक भिन्न परिप्रेक्ष्य में ……………….

एक उदाहरण के साथ कुछ अपने विचार रखना चाहूंगी.एक दिन मैं और मेरी भतीजी कहीं जा रहे थे ,मार्ग में एक वृद्ध महिला मिलीं.जिनको सादर प्रणाम करने पर उन्होंने बड़े स्नेह पूर्वक  मुझको आशीर्वाद दिया “तेरा सुहाग बना रहे ,भाई जीता रहे ,बेटा जीता रहे.” भतीजी को भी आशीर्वाद देते हुए कहा “तेरे पापा जीते रहें ,तेरा भाई जीता रहे.” भतीजी अधिक बड़ी नहीं थी उसने भोलेपन से पूछा “और मैं ?” “चल तू भी जीती रह” .बात वहीँ समाप्त हो गयी पर मेरे मन में एक उथल पुथल सी मच गयी संयोग से करवाचौथ का पर्व भी निकट है अतः चर्चा कर रही हूँ .

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”  नारी पूजनीया,वन्दनीया,प्रात स्मरणीया है, आदि शक्ति है, सृष्टि निर्मात्री है ,नदी ,गौ,जननी ,धरती माँ ,प्रकृति आदि सभी रूपों में नारी की महानता का बखान करते ग्रन्थ उपलब्ध हैं.आदि  शक्ति के रूप में तो नारी सदा पूजी गयी है,इसी प्रकार शेष सभी  अलौकिक रूपों में  वो पूजी जाती है.

आधुनिक नारी की बहु विध भूमिकाओं की एक छवि bl17Rash1_JPG_1146463e

लौकिक  रूप में भी  .बेटी,बहिन,पत्नी,माँ समस्त रूपों में परिवार को जोड़े रखने में नारी का ही  प्रधान योगदान रहता है. गृहणी से ही घर है.  भाई  और पिता के लिए  उनके  दीर्घायु ,स्वस्थ रहने की कामना करने वाली बेटी और बहिन,कुल की लाज बचाने की जिम्मेदारी लिए पतिगृह  जाती है वही बेटी.यहाँ उसके सशक्त  हों या निर्बल  कंधों पर भार होता है पति के घर का.जहाँ उसको न  केवल परिवार का उत्तरदायित्व संभालना होता है,अपितु वर्तमान में तो आर्थिक जिम्मेदारी भी उठाती है.समस्त परिजनों को प्रसन्न रखना उनके प्रति आदर सम्मान,स्नेह ,ममता ,दया और अपनापन रखना और माँ बनकर  अपनी संतान का लालन –पालन. ,बच्चों की पढाई –लिखाई संस्कार प्रदान करना आदि आदि और उस सब के पश्चात भी उसका चेहरा खिला रहे. ( एक आदर्श नारी से ऐसी अपेक्षाएं सबको  रहती हैं) ,

अपने पति ,संतान की मंगलकामना  और कुशलता की चाह के साथ वह   विविध  व्रत –उपवास करती है.करवा चौथ, गौरा  तीज आदि ऐसे ही व्रत हैं जो पति की दीर्घायु के लिए अपनी क्षमतानुसार या परम्पराओं के अनुसार करती है.इसी प्रकार संतान के मंगल की चाह में भी  वो अहोई अष्टमी,जीवित पुत्रिका व्रत,संकट चतुर्थी आदि  व्रत -उपवास, मन्नत आदि के साथ  भूखी प्यासी रहकर अपने अन्य कार्यों को भी सम्पन्न करती है .भूखी रहकर तथा अहर्निश कठोर परिश्रम कर अपने परिवार के लिए अन्नपूर्णा  संतान के उज्जवल भविष्य के लिए  माँ सरस्वती  , परिस्थिति विशेष में  इन सब व्यवस्थाओं के लिए लक्ष्मी जी  और परिवार पर आने वाले संकट के समय दुर्गा ,महाकाली   की  भूमिका का  निर्वाह भी करती है.दुर्गम,पहाडी क्षेत्रों में तो कठिनतम कार्य करना नारी की दिनचर्या है .

कहानी और समस्या यही से प्रारम्भ होती है.पति शराबी,ऐयाश,रोज पत्नी को पीटने वाला, गाली – गलौज करने वाला , परनारी के साथ ऐश करने वाला , घर बैठ कर पत्नी की कमाई से ही मौज उड़ाने वाला हो तब भी पत्नी तो उसके लिए व्रत रखे और पत्नी प्रेम के दो बोल को भी तरसे. कैसी  विडंबना है ये !

नारी जीवन और दुर्भाग्य का तो  तो जन्म जन्मान्तरों का साथ बन चुका है,जबकि    जन्म से पूर्व ही इसी महान स्त्री स्वरूप की  हत्या कर दी जाती है,तो अबोध बच्ची से प्रौढा होने तक भी उसका नारी स्वरूप उसका शत्रु रहता है.  केवल घर के बाहर ही नहीं, भीतर भी वह उतनी ही असुरक्षित है.अपने मनोनुकूल शिक्षा प्राप्त करने से अधिकांश परिवारों में उसको इसलिए वंछित कर दिया जाता है कि कहीं उसके साथ कुछ अनहोनी न हो जाय. चलती बस से उसको उतार कर,दिन के उजाले में भी उसके अपने कहे जाने वाले तथा  समाज के भेडिये उसकी बोटी बोटी नोचने को तैयार रहते हैं. अपने अनुरूप जीवन साथी चुन लेने पर कभी जाति धर्म के नाम पर उसको सरे आम फांसी दी जाती है,उस पर अमानुषिक अत्याचार होते हैं. ससुराल में भी दहेज़ के नाम पर प्रताड़ना मिलती है,तो सर्व गुण सम्पन्न होने पर भी दहेज़ लोभियों का पेट न भर पाने के कारण उसकी बारात लौट जाती है.कभी उसको बेटे की माँ न बन पाने  पर उसको छोड़ने की धमकी दी जाती है.

लौकिक रूप में जो नारी अपनी हर खुशी हर इच्छा परिवार के लिए न्यौछावर कर देती है क्या उसकी कुशलता की कामना करते हुए कोई व्रत या पूजा समाज में निर्धारित की गयी है.इसका उत्तर   सर्वथा नहीं है .ये कैसा नियम है कैसा क़ानून जिसमें समाज ,परिवार के लिए सदा दात्री  के रूप में नारी को केवल कागजी सैद्धांतिक रूप में ही सम्मान मिलता है ,व्यवहारिक रूप में नहीं

(इस आलेख के साथ मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगी कि परम्पराओं का पालन करना मुझको बहुत प्रिय है और साथ ही   त्यौहार मनाना भी .वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारी की समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए  तथा समाज के  दृष्टिकोण को  आधार बनाकर  ये प्रश्न आपके समक्ष रखा है.सवाल व्रत रखने या न रखने का नहीं प्रश्न है एक विचारधारा का. नारी के महत्व को स्वीकार किया जाय ,उसको पूजा की नहीं व्यवहारिक  सम्मान की आवश्यकता  है ,जिसकी वह अधिकारिणी है .)

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रतिभा द्विवेदी के द्वारा
March 9, 2016

भूखी उठती तुझे खिलाती अपने आँचल मैं तुझे छिपाती मज्जा अपनी काट काट के खुद खटती पर तुझे जिलाती कैसे करते मर्दन मान उसका क्यों न तुझको लज्जा आती घर चलाती वंश बढ़ाती सुचरित्र सुआचरण कर कुल परिवार का मान बढाती करो न अरुचि नारी चित्रण क्यों कसते हो फब्ती स्वच्छ करो अपने नयनो को नारी में मुझे माँ दिखती

    nishamittal के द्वारा
    March 9, 2016

    आदरणीया प्रतिभा जी , सार्थक रचना है आपकी ,ब्लॉग पर आने हेतु आभार

vijay के द्वारा
October 26, 2013

bahut hi sunder rachna apne jo prashn utaye hai lagta hai mere man ki baat ko shabdo me uker diya mujhe aakhari vala hissa bahut pasand aaya badhai

    nishamittal के द्वारा
    October 26, 2013

    धन्यवाद पसंद करने हेतु लेख को

bhanuprakashsharma के द्वारा
October 25, 2013

जिस दिन संपूर्ण समाज से नारी पर अत्याचार बंद हो जाएंगे, उस दिन करवाचौथ जैसे त्योहारों को साल में एक बार मनाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। क्यों न ऐसे त्योहार हर दिन ही मनाए जाने चाहिए। हर दिन नारी सम्मान से जिए।

    nishamittal के द्वारा
    October 27, 2013

    सही कहा धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
October 24, 2013

आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! मैं भी इस विचार का समर्थक हूँ को नारी को उसका अपना सम्मान मिलना ही चाहिए और इसकी शुरुआत अपने घर से, परिवार से, समाज से करनी होगी! सादर!

    nishamittal के द्वारा
    October 24, 2013

    आभार सहमती के लिए सिंह साहब

yogi sarswat के द्वारा
October 24, 2013

कहानी और समस्या यही से प्रारम्भ होती है.पति शराबी,ऐयाश,रोज पत्नी को पीटने वाला, गाली – गलौज करने वाला , परनारी के साथ ऐश करने वाला , घर बैठ कर पत्नी की कमाई से ही मौज उड़ाने वाला हो तब भी पत्नी तो उसके लिए व्रत रखे और पत्नी प्रेम के दो बोल को भी तरसे. कैसी विडंबना है ये ! ये भी सिर्फ भारत की ही नारी कर सकती है ! उदहारण सहित अपनी बात को बेहतरीन रूप से प्रस्तुत किया है आपने आदरणीय निशा जी मित्तल !

    nishamittal के द्वारा
    October 24, 2013

    धन्यवाद योगी जी

sadguruji के द्वारा
October 24, 2013

आदरणीय निशामित्तल जी आप का लेख आज के समय की नारी की समस्याओं को उजागर करता है.आपने लेख के अंत में बहुत सही कहा है कि-”परिवार के लिए सदा दात्री के रूप में नारी को केवल कागजी सैद्धांतिक रूप में ही सम्मान मिलता है ,व्यवहारिक रूप में नहीं”आपने प्रश्न उठाया है कि क्या नारी कि कुशलता की कामना के लिए कोई व्रत या पूजा समाज में निर्धारित कि गई है?मेरे विचार से नवरात्र और दिवाली ऐसे पर्व हैं जो स्त्री को सम्मान देने के लिए ही बनाये गए हैं.स्त्री की कुशलता के लिए पुरुष भी पूजा प्रार्थना करते हैं.किसी पुरुष में लाख दुर्गुण हों,परन्तु स्त्री और बच्चे सभी को प्रिय होते हैं.उनकी कुशलता के लिए अपने अपने ढंग से सभी पूजा करते हैं.पति-पत्नी का एक दूसरे के लिए व्रत रखना जरुरी नहीं है,बल्कि एक दुसरे से प्रेम और मित्रता का भाव रखना जरुरी है.आप के लेख का एक अनछुआ पहलु ये है कि नारी को व्यवहारिक रूप से सम्मान मिले,इसके लिए हर परिवार की स्त्रियाँ पहले एक दूसरे का सम्मान करें.स्त्री-स्त्री का सम्मान करे और एक दूसरे के दुःख-दर्द में भागीदार बने,समाज में स्त्री का सम्मान बढ़ाने की शुरुआत यहीं से करनी चाहिए.जिस दिन स्त्रियाँ संगठित हो जाएँगी उस दिन पुरुष और सरकार भी उसे सम्मान देने को मजबूर हो जायेंगे.आप का लेख व् भाषाशैली दोनों बहुत अच्छे हैं.बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    October 24, 2013

    आदरनीय महोदय ,सर्वप्रथम तो प्रथम प्रतिक्रिया हेतु आभार,साथ ही मैं ये कहना चाहूंगी की मैंने अंत में एक पंक्ति ये भी लिखी है .”सवाल व्रत रखने या न रखने का नहीं प्रश्न है एक विचारधारा का. नारी के महत्व को स्वीकार किया जाय ,उसको पूजा की नहीं व्यवहारिक सम्मान की आवश्यकता है ,जिसकी वह अधिकारिणी है” इस विचारधारा से मैं कदापि सहमत नहीं .कि केवल व्रत रखना ही प्रेम या निष्ठां का प्रतीक है,दिखावा परस्पर प्रेम और सम्मान का प्रतीक नहीं .मेरा मन्तव्य मात्र इतना है कि जिस नारी शक्ति की हम अमूर्त रूप में पूजा करते हैं उसको अपने मूर्त रूप में सम्मान की जरूरत है ,तभी ,कन्या भ्रूण हत्या,बलात्कार,दहेज़ ,नारी उत्पीडन समाप्त हो सकेगा .

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 23, 2013

श्रद्धेया , नमन !….. आस्था और श्रद्धा से भरपूर आलेख ! सादर !

    nishamittal के द्वारा
    October 23, 2013

    आभार आदरनीय आचार्य जी

omdikshit के द्वारा
October 21, 2013

पहले तो आप सभी को…बधाई.आप के विचार ,विचारणीय है.

    nishamittal के द्वारा
    October 23, 2013

    धन्यवाद दीक्षित जी .

ashokkumardubey के द्वारा
October 21, 2013

निशा जी दुर्भाग्य वश आज नारी को जो सम्मान समाज में मिलना चाहिए वह मिलता नहीं हमारी शिक्षा – दीक्षा में ही कुछ खोट हो गया है जो दुश्चरित्र लोगों की संख्या दिनोदिन बढ़ती जा रही है और यही कारन है आज नारी प्रताड़ित है आपने बहुत ही प्रेरणादायक आलेख लिखा है आपका धन्यवाद आपको करवा चौथ की धेर्र सारी बधाई

    nishamittal के द्वारा
    October 23, 2013

    आभार आपकी शुभकामनाओं हेतु

manishsingharaghav के द्वारा
October 21, 2013

दीदी आपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा . हमारे समाज में सबसे बड़ी बिडम्बना तो यही है कि आज भी नारी को सीता जैसी बनने का उपदेश देते हैं पर अफ़सोस लडकों को राम बनने का उपदेश कोई नहीं देता . आज हम चाहें कितना भी मोर्डन हो गये हैं चाहे कितनी भी शिक्षित परिवार सही फिर भी बहिन को ही चाहे वह छोटी हो या बड़ी को ही समझौता करना सिखाया जाता है . भाई को नहीं . यही वजह है कि आज भी समाज में नारी को अपने माँ पिता या भाई से उतना सम्मान नहीं मिल पाता जितना मिलना चाहिए

    nishamittal के द्वारा
    October 23, 2013

    बिलकुल सही कहा मनीषा जी आपने आभार


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