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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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वादे जो तोड़ोगे विश्वास कैसे जीत पाओगे (जागरण जंक्शन फोरम)

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यथा राजा तथा प्रजा” राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है.इसीलिये कहा गया है कि राजा को  सत्चरित्र.नैतिक मूल्यों का अनुसरण करने वाला होना चाहिए. नागरिकों का उज्जवल चरित्र किसी  भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है,  | जनता का चरित्र बल जितना ऊंचा  होता है ,राष्ट्र की उन्नति होती है और इसके सर्वथा विपरीत जनता का चरित्र बल क्षीण होते ही राष्ट्र का पतन अवश्यम्भावी होता है. |व्यक्ति के संदर्भ में चरित्र धर्म का पर्याय होता है,तो राष्ट्र और समाज के संदर्भ में वही नैतिकता का बाना धारण कर लेता है.

       धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह: ।
       धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌ ।। (मनुस्‍मृति ६.९२)

धर्म और नैतिकता की ये आधारशिलाएं तो बस अब धर्मग्रंथों तक ही सीमित  हैं.शासक और शासित नैतिकता के मानदंड सभी के लिए बदलते जा रहे हैं.नैतिकता का शाब्दिक अर्थ है, नीति के अनुरूप आचरण .राजनीति में नैतिकता का अर्थ भी राज्य को  नीति के अनुरूप संचालित करना है,परन्तु आज राजनीति में नीति की परिभाषाएं बदल चुकी हैं.येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाना और अपने और अपनी भावी पीढ़ियों के लिए राजसी सुखों का प्रबंध करना (भले ही उसके लिए देश को बेचना पड़े ) ही धर्म और लक्ष्य बन चुका है.,अंतरात्मा तो राजनीतिज्ञों में है ही नहीं.

पिता के वचन का मान रखने वाले मर्यादापुरुषोत्तम राम और वृहत साम्राज्य को ठोकर मार चरण पादुकाओं को सिंहासनासीन कर राज्य की सेवा करने वाले कैकयी नंदन भरत,पंच ग्राम मिलने पर राज्य को अपने भाईयों के लिए छोड़ने वाले धर्मराज के उदाहरण तो सदा ही हमारी प्रेरणा के स्रोत रहे हैं,परन्तु सुईं की नोक के बराबर भी भूमि  न देने की कसम खाने वाले दुर्योधन ,और पुत्र -मोह में पति की काल बनी कैकयी सदृश उदाहरण यही शिक्षा देते रहे हैं कि सत्ता का मोह.लोभ कोई नवीन अवधारणा नहीं .हाँ,अंतर है तो जहाँ ऐसे उदाहरण अँगुलियों पर गिने जाने योग्य थे, अब दुर्योधन,कंस ,दशानन ,भस्मासुर ………………..गिनते गिनते थक जायेंगें पर गणना पूर्ण नहीं होगी.इतिहास के पन्ने पलटने पर सत्ता और धन के लोभ ने न जाने कितनों को डिगाया है.वर्तमान में भी  नैतिक मूल्यों की धज्जियां  ही  उडती दिख रही हैं.

राजनीति में नेताओं .राजनैतिक दलों ने सदा ही जनता के विश्वास को ठगा है.इसका एक ताजा उदाहरण है आम आदमी पार्टी नेता मेगसेसे पुरस्कार विजेता  श्री  अरविन्द केजरीवाल, जो वर्षों से  सुविख्यात तो रहे, ईमानदारी का प्रतीक माने गये ,अन्ना के आन्दोलन में जिम्मेदारी अपने कन्धों पर संभालने वाले और देश के प्रमुख राजनैतिक दलों कांग्रेस और बी जे पी की  निरंतर आलोचना करते हुए इन दलों से मुक्त भारत निर्माण का आह्वान कर रहे थे.बहुत थोड़े समय में ही ईमानदारी का डंका बजाते हुए ,कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर निरंतर प्रहार करते हुए और निरंतर कोसते हुए नया इतिहास बनाने में सफल हुए ,उन्होंने वो कर दिखाया जिसकी कल्पना भी प्रमुख राजनैतिक दल नहीं कर पाए थे .अरविन्द केजरीवाल को भले ही हल्के में न लिया गया हो पर टक्कर तो बी जे पी और कांग्रेस की ही मानी जा रही थी ,पर ये क्या ! कांग्रेस का तो पत्ता ही साफ़ हो गया ,न सोनिया का करिश्मा काम आया और राहुल गाँधी  भी चेहरा दिखाने योग्य प्रत्यक्ष में नहीं रहे

भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ा दल के रूप में शिखर पर तो रही स्थान प्राप्त करने में परन्तु सत्ता प्राप्त करने योग्य बहुमत से दूर रही और अरविन्द केजरीवाल के रूप में त्रस्त दिल्ली वासियों को एक नेता मिला  जिन्होंने सभी आकलनों को मिथ्या सिद्ध किया ,परन्तु  बहुमत से दूर रहने के कारण सत्ता मोह में वो कदम उठा लिया, जिसने उनको अवसर वादी और सत्ता का भूखा आदि विशेषणों से विभूषित कर दिया.

कैसा विचित्र सा खेल और विरोधाभास है सत्ता ,सर्वप्रथम तो वो सदा कहते रहे कि वो सत्ता में नहीं आयेंगें फिर उन्होंने सत्ता में आने का निर्णय लिया (लेकिन ये कदम आलोचना करने के योग्य नहीं.)दुखद तो है ……….

अरविंद केजरीवाल ने चुनाव से पहले कहा था, ‘मैं अपने बच्चों की कसम खाकर कहता हूं कि कांग्रेस और बीजेपी से कोई गठबंधन नहीं करूंगा। और दिल्ली वासियों को उनके बच्चों की कसम खिलाई थी कि वो कांग्रेस को वोट नहीं देंगें .

परन्तु जहाँ त्रस्त जनता ने अपने बच्चों की कसम का मान रखा और कांग्रेस को वोट न देते हुए उसको  धूल चाटने को विवश कर दिया ,दूसरी और केजरीवाल के   बच्चे सत्ता के मोह के सामने महत्वहीन हो गये जब उन्होंने उसी कांग्रेस की शरण ली जो उनको सबसे घटिया ,भ्रष्ट,लुटेरी और चोर पार्टी दिख रही थी.

यद्यपि नाक बचाने के लिए कहा जा रहा है कि वो समर्थन बाहर से ले रहे हैं ,जबकि उनकी तथाकथित प्रतिद्वंदी पूर्व मुख्य मंत्री शीला दीक्षित स्पष्ट शब्दों में बार बार दोहरा रही है कि उनका समर्थन बिन शर्त नहीं ,साफ़ है कि वो जिन वादों के आधार पर सत्ता पा सके हैं उनको कांग्रेस पूरा नहीं होने देगी .अपने पांव पर कुल्हाड़ी कौन मूर्ख मारेगा ?

राजनीति एक पंकिल दरिया है, जिसमें स्वच्छ जल की आशा करना आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त कुछ नहीं ,राजनीति में  कोई भी स्थायी शत्रु और मित्र नहीं होते,परन्तु  एक ऐसा व्यक्ति जो निरंतर जिस आधार पर सत्ता हासिल कर पाया ,उसका  और इतने शीघ्र चोला बदल लेना! कुछ जमता नहीं.

बच्चों की सौगंध खाना सार्वजनिक रूप से  और उसको तोडना ,ऐसा कार्य तो शायद कोई पतित पिता भी नहीं कर सकता और वो तो एक छोटे से आदर्श परिवार के सदस्य हैं,फिर इसको सत्ता मोह के अतिरिक्त क्या संज्ञा देंगे आप ?

अतः मेरे विचार से क्षणिक लाभ की आशा  में अरविन्द का ये कदम उनकी प्रतिष्ठा को धूल धूसरित करने के समान ही है .राजनीति के इस दुश्चक्र में पहले भी बहुत से उदाहरण हैं जिनमें अवसरवादिता खुले आम सामने आई है सभी प्रमुख दलों की और फिर उन्होंने मुहं की खायी है. अतः अरविन्द का कथन कि आम आदमी की सरकार बनेगी और वो भ्रष्ट लोगों को दंड देंगें , कैसे मान लें जब बैसाखी उस कांग्रेस की है जिसके विरुद्ध अरविन्द का मोर्चा था.

प्रत्यक्ष उदाहरण है अरविन्द का वादा …………….

जनलोकपाल का वादा पूरा करने पर केजरीवाल ने हाथ खड़े किए………

गौरतलब है कि ‘आप’ ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में रामलीला मैदान में विशेष सत्र बुलाकर 29 दिसंबर को जनलोकपाल बिल पास कराने का वादा किया था। बाद में सरकार गठन को लेकर हो रही देरी के मद्देनजर उन्होंने कहा था कि 29 को जनलोकपाल बिल पास कराना संभव नहीं है। हालांकि, अब यह बात सामने आ रही है कि इसमें महीनों लग सकते हैं।

अरविंद जी….. आशा है कि अन्य वादों को घोषणा पत्र मे शामिल करने से पूर्व आपने उनकी व्यावहारिकता की पूर्ण जांच की हो…… और शायद दिल्ली की जनता को आपके घोषणा पत्र के अन्य वादों पर ऐसी विवशता न सुननी पड़े….और आप जनता के विश्वास तोड़ने के गुनाहागार न बने फिर जनता न छली जाय.

(अंतिम पेराग्राफ जानकारी स्त्रोत्र इन्टरनेट )

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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
January 5, 2014

अरविन्द केजरीवाल का राजनीती में आना ही एक बहुत बड़ी चुनौती है और इस चुनौती को कांग्रेस पार्टी ने ही दिया है क्यूंकि आपको भी याद होगा जब जनलोकपाल बिल के लिए आंदोलन हो रहा था उस समय इसी कांग्रेस पार्टी ने कहा था कानून सड़कों पर नहीं बनते संसद में बनते हैं और अगर कानून बनाना है तो चुनाव जीतकर् संसद में आईये और कानून बनाईये अब जब केजरीवाल कि आम आदमी पार्टी को बहुमत नहीं मिला फिर और क्या जरिया था, उन वायदों को पूरा करने का जो उन्होंने देश और दिल्ली कि जनता के साथ किया है अतः आज यह जानने समझने कि बात है कि सरकार में आकर अरविन्द केजरीवाल अपने वायदों को पूरा करने में कितना समर्थ होते हैं और इसी बात पर उनकी भावी राजनीती निर्भर है क्यूंकि अब तो ‘आप ‘पूरे देश में अपने उम्मीदवार खड़े करनी वाली है उनका यह सपना उनके ३ महीने में दिल्ली में किये जानेवाले काम पर निर्भर करेगा क्यूंकि देश को दोनों राष्ट्रिय पार्टी ने छला है अतः मेरी राय में अरविन्द केजरीवाल द्वारा कांग्रेस का समर्थन लेकर सरकार बनाना जनहित में है राजनीती में बदलाव लाने का एक मौक़ा है देश कि गन्दी राजनीती को साफ़ करने कि ओर एक कदम है एक शुरुआत है

योगेन्द्र चौबे के द्वारा
January 4, 2014

आदरणीय निशा जी ! आप का आलेख बहुत हीं बढ़िया लगा. मेरे मन में भी कुछ ऐसे हीं सवाल चल रहें थे कि आखिर जिन मुद्दों का सहारा लेकर केजरीवाल सत्ता में आये, जो जो वादे किये, कसमें खाए अब उसके विपरीत सब कर रहें हैं. अब तो लोगों को समझाना चाहिये कि सत्ता लोभ व्यक्ति से कुछ भी करवा सकता है.

    nishamittal के द्वारा
    January 4, 2014

    सहमती हेतु और प्रथम प्रतिक्रिया हेतु आभार

sanjay kumar garg के द्वारा
December 31, 2013

आदरणीय मेम ! सादर नमन! बढ़िया आलेख, आँखे खोलने वाला!

    nishamittal के द्वारा
    January 2, 2014

    आभार संजय जी

Rajesh Dubey के द्वारा
December 31, 2013

केजरीवाल को जनता से किये वायदे को पूरा नहीं करने की स्थिति में आप भी अन्य पार्टियों की तरह हो जायेगी. हालाकि अभी सब कुछ ठीक-ठाक हैं

    nishamittal के द्वारा
    January 2, 2014

    ईष्वर करे सब शुभ और देश हित ,में रहे

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 30, 2013

श्रद्धेया निशा जी, सादर ! बात चाहे जो भी हो फिलहाल तो सारे अगर-मगर -चुनान्चे- लेकिन को छोड़कर केजरीवाल साथ देना चाहिए ! इस अकेले शख्स ने राजनीति की दिशा ही मोड़ दी ! सारे पार्टियों में कुछ करने की होड़ सी लग गई है ! आज ही पटने के अशोक राजपथ पर कॉंग्रेस के अध्यक्ष सहित बड़े-बड़े नेताओं को झाड़ू लगाते देखा गया जिसकी तस्बीर आज के अखबारों में है ! यह परिवर्तन नहीं तो और क्या है ? एक राजा के लिए राष्ट्रधर्म से बढ़कर कुछ भी नहीं होता , प्रजा उसकी संतान होती है और संतान के हित में काम करना उसका धर्म होता है | पुनश्च !

    nishamittal के द्वारा
    January 2, 2014

    आशावान होना बहुत अच्छा है कठिनाई ये है कि हम पल भर में ही सबको ईशवर बना देते हैं और फिर स्वयं ही उसका परिणाम भुगतते हैं

abhishek shukla के द्वारा
December 27, 2013

आदरणीया मैम, इस विषय में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, भविष्य से हर कोई अनभिज्ञ है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के गठबंधन स्थायी है या अस्थायी या अरविन्द केजरीवाल और कांग्रेस का समझौता सिर्फ स्वार्थपूर्ति के लिए है या जनता के हित में यह मैं नहीं जनता, लोकतंत्र में गठबंधन वाली सरकार अपने वायदे पूरे कर सकती है यदि वो करना चाहे तो अन्यथा हज़ारों बहाने हैं जनता के शोषण के. क्षमा चाहता हुँ मैं सटीक उत्तर नहीं दे पा रहा हूँ क्योंकि मेरे मन में भी आशंकाएं अधिक हैं, ऐसे में सही उत्तर दे पाना असम्भव सा है, एक उम्मीद है आम आदमी पार्टी से जो न टूटे तो बेहतर होगा…..

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2013

    अभिषेक जी , निश्चित रूप से कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी ,अतः अधिक आशावान होना उसी कहानी को दोहराया जाना होगा जो सदा होता आया है अतः अभी यही कहना उचित है तेल देखो तेल की धार देखो.मेरे द्वारा भी केवल आक्षांकाएं ही व्यक्त की गयी हैं.यदि देश के हित में कुछ होगा तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है धन्यवाद

abhishek shukla के द्वारा
December 27, 2013

हम हिंदुस्तानी वर्षों से आजमाते रहे हैं नेताओं को एक बार आम आदमी को आजमाते हैं, भाजपा और कांग्रेस दोनों कि भ्रष्टता किसी से छिपी नहीं है.दिल्ली में भाजपा को बहुमत मिली फिर भाजपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके सरकार क्यों नहीं बनाई? अपना दामन बचने के लिए अरविन्द केजरीवाल को सलाह देने लगी कि आप सरकार बनाइये, और न बनाने कि स्थिति में केजरीवाल पर जनता को परेशान करने का आरोप भी लगाई. एक तरफ भाजपा का कहना है कि आप सरकार बनाइये( जबकि भाजपा कि सीटें अधिक हैं तो सरकार बनाने कि जिम्मेदारी भी भाजपा पे ही है) और जब सरकार बनाने चले अरविन्द तो ”बच्चों कि कसम” याद दिलाने लगी. वास्तव में इन राजनीतिक पार्टियों ने देश को नरक बना दिया है. इतनी गन्दी राजनीति सिर्फ भारत में होती है. किरण बेदी जी ने ठीक कहा था कि अरविन्द केजरीवाल के लिए सरकार बनाना ”आगे कुआं पीछे खाई” जैसा है..

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2013

    मान्यवर अभिषेक जी ,                                          आपका आक्रोश पढ़ कर बहुत सुखद लगा काश हर युवा के मन में ऐसी व्यग्रता ,चिंता देश के लिए हो तो देश का बेडा पार हो .                                         मेरा भी यह आक्रोश ही है और वो आक्रोश है केजरीवाल द्वारा कांग्रेस का समर्थन लेने पर ,क्या आप मेरे एक प्रश्न का उत्तर देने का कष्ट करेंगे जो मुख्य है कि आपने  या केजरीवाल ने सबसे अधिक आलोचना की है कांग्रेस के भ्रष्टाचार की और शायद कांग्रेस शासित त्रस्त  दिल्ली की जनता ने उसी से मुक्त होने के लिए उनको समर्थन दिया .अब जब कांग्रेस की बैसाखी पर आप की सरकार टिकी है तो क्या कांग्रेस आप को अपने वादे जो सभी कांग्रेस के भ्रष्टाचार,निकम्मे प्रशासन के विरुद्ध जाते हैं पूर्ण करने देगी मेरे विचार से ऐसी संभावना की कोई कल्पना नहीं कर सकता .    रही बात बी जे पी की उन्होंने भी ये अनुचित कार्य किया था तो उनकी आलोचना करते हुए मैंने लिखा था ,परन्तु यदि वही कार्य आम आदमी पार्टी को भी करने है तो फिर?

yogi sarswat के द्वारा
December 27, 2013

एक समर्थक के नाते अगर मैं कुछ लिखूंगा तो गलत होगा ! लेकिन अगर अरविन्द ने ये गलत किया है (मैं भी मानता हूँ गलत किया है ) तो इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है किन्तु उन्होंने स्पष्ट किया है और ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि ये सब ड्रामा अरविन्द को नौसिखिया होने कि वजह से फ़साने के लिए किया गया है कांग्रेस के द्वारा ! खैर ! लेकिन एक बात स्पष्ट है -ये अरविन्द का लिटमस टेस्ट है अगर वो सफल होते हैं तो ये सन्देश भारत की राजनीती की दिशा और दशा बदलेगा ! एक नए जोश का संचरण करेगा और अगर वो असफल होते हैं तो विश्वास , ईमानदारी , भरोसा सब कुछ टूट जाएगा ! इसलिए अभी सिर्फ इतना कहना काफी होगा कि इंतज़ार करिये और उम्मीद करिये कि नया खून , नयी सोच एक नए भारत का निर्माण करे !

    nishamittal के द्वारा
    December 27, 2013

                         ड्रामा कांग्रेस का कैसा योगी जी ., ये तो स्वयं अरविन्द केजरीवाल के शब्द हैं शेष देश के हित में सब कल्याण हो ऐसी मेरी या आपकी नहीं हर देशभक्त भारतवासी की होनी चाहिए.हाँ आप आप बन गये और पलों में बदल गये वाह क्या चमत्कार है !

    yogi sarswat के द्वारा
    December 27, 2013

    आदरणीय निशा जी मित्तल सादर ! ये सर्व विदित है कि हर नयी चीज के लिए हमारे मन में ढेरों आशंकाएं हो सकती हैं , रहती ही हैं ! ये एक ह्यूमन नेचर है ! सवाल उठते ही हैं , उठने भी चाहिए ! क्यूंकि अगर कुछ स्पष्ट निकलकर आता है तो आलोचनाओं से ही निकलकर आता है ! एक बार को मान के चलिए कि अरविन्द असफल होता है तो क्या होगा -हम गाली देंगे , भरा बुला कहेंगे ! और उसे भूल जायेंगे ! लेकिन अगर वो सफल होता है तब ? शायद हम, उसे एक बेहतर प्रशाशक के तौर पर देखेंगे ! एक उम्मीद के तौर पर देखेंगे ! बिजली का ही मामला देखें ! अगर वो बिजली सस्ती करता है तो इसका मतलब और जगहों पर भी बिजली सस्ती हो सकती है ? इस बात का दबाव बनेगा कि और लोग भी इस विषय में सोचें ! तो मुझे लगता है कि हमारे लिए ये बहुत कठिन विषय है कि हम नए विचारों का स्वागत करें और फिर अभी अगर सरकार चलती है तो उसकी परफॉरमेंस देखने को मिलेगी इन ५-६ महीनों में ! और अगर अरविन्द सफल होता है तो नए रास्ते खुलेंगे , लोगों के ऊपर , अन्य पार्टियों के ऊपर एक दबाव भी रहेगा कि या तो ईमानदार और शुचिता अपनाना शुरू करें या फिर गर्त में जाने को तैयार रहे ! ये एक बेहतर कदम है ! आज जो भी कुछ कांग्रेस का हाल हो रहा है , वो लोगों कि सोच की वजह से ही तो है , वो बदल रहे हैं और नया सिस्टम चाहते हैं !

    jlsingh के द्वारा
    December 27, 2013

    जी योगी जी, मैं भी आपके विचारों से सहमत हूँ, लोकपाल बिल संसद में तभी पास हुआ जब ‘आप’ २८ सीटें लेकर उभरी. आज राहुल गांधी अपने लोगों को महंगाई और भ्रष्टाचार रोकने की नसीहत दे रहे हैं…. पिछले दिनों कांग्रेस कहा करती थी मंहगाई और भ्रष्टाचार कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं रहा है.आज दिल्ली के भ्रष्ट ऑफिसर अपना तबादला करवा रहे हैं या बचने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ तो परिवर्तन होगा …अरविंद केजरीवाल और उसके टीम में जूनून है!… कुछ समय देकर तो देखिये नैतिक समर्थन तो करिये! मेरी यही राय है बाकी सब अपनी अपनी राय व्यक्त करने को स्वतंत्र हैं! आदरणीय निशा जी से भी यही निवेदन करना चाहूंगा … हम सब जो भाजपा से उम्मीद लगाये बैठे हैं, उसका कुछ प्रतिशत आम आदमी पार्टी दे रही है तो हर्ज ही क्या है! सादर!

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2013

    योगी जी ,जैसा कि मैंने कहा मात्र आक्षांकाएं हैं कोई पूर्वाग्रह लेकर नहीं चल रही हूँ.हाँ मेरे लेख में अरविन्द केजरीवाल ने जो अपने वाडे तोड़े हैं उनको याद दिलाया है कि यदि आप वादे तोड़ोगे तो विश्वास कैसे जीतोगे.मेरी शुभकामनाएं सदा देश हितचिंतकों के साथ हैं

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2013

    सिंह साहब ,नैतिक समर्थन सदा साथ है हर देश चिंतक के साथ.हाँ अति आशावाद पर आश्चर्य अवश्य है.और हाँ मैंने केवल इतना याद दिलाया है कि बार बार वादे तोड़ने से विश्वास भंग होता है ,धन्यवाद कांग्रेस का समर्थन लेकर अरविन्द कैसे कांग्रेस सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के विरुद्ध अपने वचन को निभाएंगें

sumit के द्वारा
December 26, 2013

आगे आगे देखिये होता है क्या ????

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2013

    सही कहा सब कुछ भविष्य के गर्भ में है धन्यवाद सुमित

sk jaiswal के द्वारा
December 26, 2013

good points though…

    nishamittal के द्वारा
    December 28, 2013

    धन्यवाद

vijay के द्वारा
December 26, 2013

नमस्कार माता जी ये तो सही है की अरविन्द को कांग्रेस का समर्थन नहीं लेना चाहिए था पर जनता व परिस्थति के चलते उन्होंने निर्णय लेना पड़ा मैं उनका समर्थक नहीं हू उन्हें अभी बहुत कुछ सिद्ध करना है उन्होंने अभी तक अपनी आर्थिक विचारधारा भी नहीं बताई है चलिए देखते है क्या होता है उनका स्वराज कहा तक जाता है

    nishamittal के द्वारा
    December 29, 2013

    विजय जी ,आपके विचार जानकार अच्छा लगा आशावादी बने रहना आवश्यक है ,ईश्वर करे त्रस्त जनता की शिकायतें दूर हों और देश का कल्याण हो


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