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लघु कथाः श्राद्ध कांटेस्ट

Posted On: 14 Jan, 2014 Others में

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“अरे बहू,जरा एक कप चाय ही  दे दो बहुत ठंड लग रही है और भूख के कारण चक्कर आ रहे हैं.” बूढ़ी शकुन्तला ने कमजोर स्वर में पुकारा.

“अभी देर लगेगी अम्मा ,पता नहीं आपको श्राद्ध है पंडित जी आने वाले हैं,उनको खिलाये बिना कुछ नहीं दे सकती, आप तो बड़ी बूढ़ी हो नियम कायदे आपको ज्यादा पता हैं”.

भूख की आग  और  ठंड से  कांपती बूढी हड्डियों ने शकुन्तला को विवश कर दिया था झुंझलाने के लिए. दूसरी और पुत्रवधू बडबडा रही थी,”सठिया गयी हैं अम्मा तो जरा भी तो सब्र  नहीं, पता नहीं कितनी भूख लगती है.”

लाचार बूढ़ी अम्मा  की पुकार का प्रभाव बहू पर नहीं पड़ा. ,आँखों में आंसू भरे थे,रजाई और कसके लपेट ली थी,किसी को आंसू न दिखें अतः चेहरे पर भी रजाई ओढ़ ली थी.. ,सोच रही थी पुरखों के श्राद्ध की चिंता तो है,पर मुझ अपाहिज बूढ़ी की नहीं .ये कौन सा नियम है कि पंडित को खिलाये बिना कुछ नहीं मिलेगा. हे राम मुझको उठा ही ले ,रोज मांगती हूँ मौत पर मेरे लिए वो भी नहीं तेरे पास…

नन्हा बबलू माँ और दादी की बात सुन रहा था स्कूल जाने को तैयार था, समझ नहीं पा रहा था,माँ ने मेरा टिफिन बना दिया,दीदी अपना टिफिन लेकर स्कूल गयी तो दादी को पंडित जी के खाने से पहले क्यों नहीं.मिलेगा खाना . माँ से कारण पूछा तो डांट कर चुप कर दिया उसको.

स्कूल की वैन आने वाली थी, बबलू चुपचाप दादी के कमरे में गया और अपना टिफिन  रजाई के अन्दर दादी के  कांपते हाथ में पकड़ा कर स्कूल के लिए भाग गया. दादी की आँखों में आंसू आ गये अपनी भूख भूल कर पोते की चिंता सताने लगी, कोस रही थी खुद को मैंने खाना क्यों माँगा नन्ही सी जान सारा दिन भूखा रहेगा और मैं बुढिया……………….आंसू थम नहीं रहे थे, पर उसको लगा उसकी आत्मा तो पोते ने जीते जी ही  तृप्त कर दी…

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 16, 2014

आदरनीय निशा जी ,,सम्मान के लिए बहुत बधाई ,श्राद्ध लघु कथा पढ़ी ,बहुत गहरी भाव अनुभूति ,सार्थक एवं क्रिस्प लेखन ,अद्वतीय . सादर , निर्मल

    nishamittal के द्वारा
    February 16, 2014

    आभार निर्मला जी आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए .

umashnkar rahi के द्वारा
February 11, 2014

दीदी प्रणाम बहुत दिनों के बाद आज आपको पढ़ा बहुत अच्छा लगा आपको तो स्थान पर रहना ही था बहुत बहुत वधाई स्वीकार करें

R K KHURANA के द्वारा
February 10, 2014

प्रिय निशा जी, प्रथम पुरस्कार के लिए आपको आपको लाख लाख बधाई हो ! राम कृष्ण खुराना

vijay के द्वारा
January 27, 2014

आदरणीय माता जी नमस्ते ,बहुत ही ह्रदयस्पर्शी ,भावुक कथा यही आज कल का रवया बन गया है हम परम्पराओं का पालन तो करते है पर उनके मर्म को नहीं समझते

yamunapathak के द्वारा
January 19, 2014

आदरणीय निशाजी नमस्कार बच्चे हमेशा संवेदनशील सच्चे और सही होते हैं बहुत ही मार्मिक लघु कथा है.

    nishamittal के द्वारा
    January 19, 2014

    सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार यमुना जी

alkargupta1 के द्वारा
January 18, 2014

बहुत अच्छी हृदय स्पर्शी लघु कथा

    nishamittal के द्वारा
    January 18, 2014

    धन्यवाद अलका जी

vaidya surenderpal के द्वारा
January 18, 2014

हृदय को छूने वाली सुन्दर लघुकथा।

    nishamittal के द्वारा
    January 18, 2014

    धन्यवाद सुरेन्द्रपाल जी

meenakshi के द्वारा
January 17, 2014

मार्मिक व दिल को छूने वाली लघु कथा के लिए निशा जी आपको बधाई . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    nishamittal के द्वारा
    January 17, 2014

    धन्यवाद मीनाक्षी जी

aman kumar के द्वारा
January 16, 2014

उसकी आत्मा तो पोते ने जीते जी ही तृप्त कर दी… आपकी कथा ने मानव मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण है … आभार

    nishamittal के द्वारा
    January 16, 2014

    आभार

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
January 15, 2014

सुन्दर लघुकथा निशा जी

    nishamittal के द्वारा
    January 16, 2014

    आभार रीता जी

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
January 15, 2014

दिल को छू लेने वाली लघुकथा निशा जी , बधाई l

    nishamittal के द्वारा
    January 16, 2014

    धन्यवाद आपका

Rajesh Dubey के द्वारा
January 14, 2014

मार्मिक व दिल को छूने वाली लघु कथा के लिए वधाई.

    nishamittal के द्वारा
    January 16, 2014

    धन्यवाद राजेश जी

malkeet singh के द्वारा
January 14, 2014

आदर्णीय ह्रदय को छू लेने वाली रचना देने हेतु आभार

    nishamittal के द्वारा
    January 16, 2014

    आभार जीत जी


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