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एक और एकलव्य (लघु कथा) कांटेस्ट

Posted On: 30 Jan, 2014 Others में

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आज रजत की जिन्दगी में वो स्वर्णिम पल आया था जिसका स्वप्न वह सदा  देखता था. भौतिक विज्ञान में उसकी रिसर्च को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली थी और  एक बड़े समारोह में उसको विशिष्ठ  प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किये जाने  की घोषणा की गयी थी . खुशी से पागल था वह . बधाई मिलने का क्रम टूट नहीं रहा था.फोन काल्स,मेल्स ,सन्देश और व्यक्तिगत रूप से भेंट करने वाले.

.पितृविहीन  रजत को उसकी  अनपढ़  माँ ने बर्तन चौका कर पढ़ाया था.  माँ का एक ही सपना था उसका रज्जू बहुत बड़ा आदमी बने .मेधावी रजत  भी अपने परिश्रम ,मेधा और माँ के परिश्रम के बल पर निरंतर सफलता के सोपान चढ़ रहा था.. अब उसका  सपना था रिसर्च के क्षेत्र में ही कुछ विशिष्ठ करना . दुर्भाग्य से  जीवन के इस सफ़र में रजत को अकेला छोड़ गयी माँ भी .

रजत की हार्दिक इच्छा थी   प्रोफ़ेसर भट्टाचार्य  जी के निर्देशन में शोध करने की.विद्वान् होने के साथ धीर -गभीर और अन्तर्मुखी स्वभाव वाले भट्टाचार्य सर उसके आदर्श रहे थे. रजत ने प्रोफ़ेसर भट्टाचार्य से निवेदन किया कि वह उसको निर्देशित करें. रजत को बहुत दुःख हुआ जब उन्होंने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया ,साथ ही किसी भी प्रकार का सहयोग देने से  मना कर दिया था .  अंततः उन्होंने एक और आघात करते हुए रजत को कहा, तुम्हारे जैसे लोगों के बस की बात नहीं है रिसर्च करना,कहीं नौकरी खोज कर अपनी रोजी रोटी की चिंता करो

.प्रोफ़ेसर की बात से रजत को दुःख तो बहुत हुआ. दृढ निश्चयी उस शिष्य का  मनोबल नहीं टूटा. उसका अहर्निश परिश्रम रंग लाया .उसको रिसर्च के लिए छात्रवृत्ति  भी मिली..और उसका शोधप्रबंध पूर्ण हुआ.

रजत का दोस्त संचित उसको बधाई देने आ पहुंचा .कमरे में रजत के मातापिता के अतिरिक्त  भट्टाचार्य सर का फोटो और एक बड़ा सा पोस्टर  देख कर वो चौंक गया. जिस पर लिखा था रिसर्च करना तुम जैसों का काम नहीं . रजत से कहा जानता है ये वही सर हैं जिन्होंने तेरा मजाक उड़ाया था. रजत शान्ति से बोला ,”हाँ जानता हूँ पर उनका ये हतोत्साहित करना ही मुझको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा जब मैं निराश होता यही वाक्य मुझको आगे बढ़ने को प्रेरित करता .

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vijay के द्वारा
February 12, 2014

Adarniye mata ji namaste bahut hi sunder laghu katha sahitye protiyogita mai chayan hone PR hardik badhai

sadguruji के द्वारा
February 11, 2014

आदरणीया निशा मित्तलजी,साहित्य सरताज प्रतियोगिता में विजेता बनने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.नववर्ष २०१४ ऐसे ही आपको सम्मान और सफलता प्रदान करता रहे.

meenakshi के द्वारा
February 7, 2014

निशा जी “सच में कभी बोले गये किसी के द्वारा तीखे शब्द – बाण इंसान केलिये प्रेरणास्रोत बन जाते हैं ” एक शिक्षाप्रद – प्रेरणादायी लघु कथा के लिये बहुत -2 धन्यवाद एवम शुभकामनायें ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    nishamittal के द्वारा
    February 7, 2014

    सही कहा आपने धन्यवाद मीनाक्षी जी

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 7, 2014

बहुत सुन्दर लेख ..निशा जी कभी कभी कोई बातें आदमी को लग जाती हैं और वो यदि धनात्मक रुख रख के कदम बढ़ा गया तो सफल तो हो ही जाना है …जय श्री राधे भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    February 7, 2014

    आभार शुक्ल जी बहुत दिन बाद आपकी सुखद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली

ashokkumardubey के द्वारा
February 6, 2014

निशा जी आपकी यह लघु कथा हर उस विद्यार्थी के लिए प्रेरणाश्रोत है जिनको रजत कि तरह कोई दुर्बुध्धी प्रोफेसर हतोत्साहित करने का कृत्य करेगा .एक प्रेरणादायक आलेख लिखने के लिए आपको बधाई

    nishamittal के द्वारा
    February 6, 2014

    बिलकुल सही कहा आपने आदरणीय दुबे जी ,परन्तु ऐसे सकारात्मक रूप में लेना भी सबके लिए सम्भव नहीं धन्यवाद

yogi sarswat के द्वारा
February 5, 2014

हम्म्म ! कभी कभी ऐसा होता है ! मुझे लगता है ये वाक्य बहुत प्रेरणा का काम करता है कि ये तेरे बस का नहीं है ! ये बात हालाँकि मुझ पर ही लागू होती है ! मेरे पिता जी किसान हैं और चाचा जी बैंक मेनेजर थे उस वक्त ! उनका बड़ा बेटा डिप्लोमा में चुन लिया गया था ! मुझे मैथ पसंद था इसलिए मेरा इरादा आगे बी.एस .सीऔर एम् .एस सी करने का था लेकिन …………एक दिन , जब मेरे चाचा जी शहर से गाव आये हुए थे तब पापा ने उनसे कहा कि सीनो (श्रीनिवास ) , योगेन्द्र अच्छा पढ़ रहा है , मैं चाहता हूँ इसकी तू कुछ मदद कर दे पैसे वैसे के मामले में ! उन्होंने कहा -तुम्हारे बच्चे कुछ करें तो सही ! डिप्लोमा में नंबर लाएं तो मैं सोचूंगा ! मेरा मकसद बदल गया और न चाहते हुए भी इंजीनियर बन बैठा , हालाँकि उधर से मदद कभी नहीं मिली ! लम्बी बात हो जायेगी लेकिन मन हो रहा है कि कुछ कहूं ! असल में आदरणीय निशा जी , हमने बचपन में उनके बच्चों की उतरन ही पहनी थी ! शायद तब तक , जब तक हम समझदार नहीं हुए , शायद हम नहीं मैं समजदार नहीं हुआ ! और जब मैं 10 वीं में आया तो उनका बड़ा बेटा एक दिन मुझे अपनी उतरन देने आया , मैंने पूछा ये क्यूँ ? बोला तुम्हारे पास कपडे नहीं हैं जींस लाया था शायद ! मैंने कहा नहीं , हों या न हों ! मेरे पास जैसे हैं मैं उन्हें ही पहन लूंगा और आगे से मेरे लिए कपडे लाने की जरुरत नहीं है ! मेरे देखा देखि , मेरे बड़े भाई ने भी ऐसा ही किया ! और ये बात यहाँ तक पहुंची कि चाचा जी को ये कहना पड़ा कि तुम्हारे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ! जिंदगी बहुत कुछ सिखा देती है और जिंदगी के थपेड़े उससे भी ज्यादा ! आज भी मैं कोई वीआईपी नहीं हो गया लेकिन भगवान् कि कृपा है कि मुझे या मेरे बच्चों को किसी की उतरन नहीं पहननी पड़ती ! क्या क्या लिख गया मैं भी !

    nishamittal के द्वारा
    February 5, 2014

    सच योगी जी बहुत प्रेरक है आपकी कथा भी.ये एक सच्चाई है परन्तु बहुत कम लोग हैं जो इस सूत्र को लक्ष्य बना लेते हैं और कुछ कर दिखाते हैं .बधाई आपको .धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
February 5, 2014

सुन्दर प्रेरक लघु कथा निशा जी

    nishamittal के द्वारा
    February 5, 2014

    आभार रेखा जी

sadguruji के द्वारा
February 5, 2014

आदरणीया निशा मित्तलजी,बहुत प्रेरणादायी,उपयोगी और शिक्षाप्रद रचना.मुझे संत कबीर साहिब की ये वाणी याद आ गई-”शब्द का मारा गिर पड़ा,शब्द ने छोड़ा राज, जिन जिन शब्द विवेक किया,उनका हो गया काज. लागी लागी सब कहें,लागी बुरी बलाय, लागी सोई ज्ञान दे,जो आर पार होई जाय.” आपको बहुत बहुत बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    February 5, 2014

    सुन्दर उद्धरण सहित प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद महोदय

harirawat के द्वारा
February 4, 2014

अति सुन्दर, एक मार्ग दर्शन निशा जी ! कभी कभी ये चुभन इंसान को उसके उद्देश्य पूर्ती में सहायक हो जाती है ! बहुत सारी बधाई ! हरेन्द्र जागते रहो !

    nishamittal के द्वारा
    February 4, 2014

    आभार आदरणीय रावत जी

RaJ के द्वारा
February 2, 2014

inspiring

    nishamittal के द्वारा
    February 3, 2014

    आभार महोदय

Rajesh Dubey के द्वारा
February 2, 2014

रजत का चुनौती को स्वीकार करना काबिले-तारीफ है. लड़ने वाले की जीत होती है. सुन्दर लघु कथा, वधाई.

    nishamittal के द्वारा
    February 3, 2014

    धन्यवाद राजेश जी

Madan Mohan saxena के द्वारा
January 31, 2014

प्रेरक लघु कथा , आभार!

    nishamittal के द्वारा
    January 31, 2014

    आभार आदरनीय मनमोहन जी

sanjay kumar garg के द्वारा
January 31, 2014

आदरणीया, निशाजी! नमस्कार! प्रेरक लघु कथा लिखी है, आपने, आभार!

    nishamittal के द्वारा
    January 31, 2014

    धन्यवाद संजय जी

yamunapathak के द्वारा
January 30, 2014

आदरणीया निशाजी नमस्कार सच है आलोचनाओं में भी गज़ब की शक्ति होती है आपकी यह लघु कथा बहुत ही प्रेरक है. साभार

    nishamittal के द्वारा
    January 31, 2014

    धन्यवाद यमुना जी

alkargupta1 के द्वारा
January 30, 2014

प्रेरणास्पद लघु कथा निशाजी

    nishamittal के द्वारा
    January 31, 2014

    धन्यवाद अलका जी

jlsingh के द्वारा
January 30, 2014

आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! बहुत अच्छा उदाहरण पेश किया आपने शायद आपने भी सुना/पढ़ा हो ‘श्री कामता प्रसाद गुरु’ के बारे में — उन्हें भी फटकार मिली थी – तुम व्याकरण नहीं सीख सकते – बड़े दुखी मन से वे भी कक्षा से बाहर आ गए थे …बाद में उन्होंने व्याकरण की पुस्तक लिखी, जो आज भी पढ़ाई जाती है उच्च कक्षाओं में … कभी कभी उलाहने भी सही निशाने पर लग जाते हैं तुलसीदास, कालिदास आदि भी उदाहरण हैं…

    nishamittal के द्वारा
    January 31, 2014

    जी हाँ आपने सही कहा विद्योत्मा ने कालिदास को मूर्ख कहा था और रत्नावली ने पति के अपने प्रति प्रेम पर उनको फटकार लगाई थी अस्थिचर्म मय देह मम …………. परन्तु थोडा सा प्रसंग भिन्न है यहाँ,और उस को सकारात्मक रूप में बदलना अत्यंत शुभ सिद्ध हुआ .धन्यवाद सिंह साहब


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