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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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राजनीति में शुचिता की आशा बेमानी है .

Posted On: 3 Mar, 2014 Others में

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कितना विचित्र सा तथ्य है कि आज  व्यक्ति कहीं भी ईमानदार नहीं . व्यक्ति स्वयम  तो ईमानदार  नहीं और सबसे अपेक्षा की जाती है ,ईमानदारी,नैतिकता की.परिवार जैसी छोटी सी इकाई से लेकर राजनीति तक सभी स्तरों पर कथनी और करनी में कहीं भी एक रूपता नहीं    ( इस पोस्ट में मेरा उद्देश्य आंकडें प्रस्तुत करना नहीं बस एक तथ्य पर ध्यान आकर्षित करना है कि हम विचार करें कि सर्वत्र वातावरण विकृत क्योँ है )

प्रारम्भ करते है परिवार से ……सभी माता-पिता अपनी संतान से अपेक्षा रखते हैं,संतान परिवार के प्रति निष्ठावान हो  आदर -सम्मान,आज्ञापालन ,उत्तरदायित्व  और नैतिकता की भावना  हो अर्थात सभी रूप में आदर्श हो,जबकि स्वयम उन्ही बच्चों को झूठ बोलना सिखाते हैं,फोन पर ये बोल कर कि वो घर से बाहर हैं,या द्वार पर ही ये कहलवाकर कि वो घर में नहीं हैं,किसी अतिथि  के जाने के पश्चात उसकी निंदा कर ,स्वयम अपने बुजुर्गों के प्रति अनुचित व्यवहार करके ,मिथ्याभाषण करके .भ्रष्ट उपायों से धन संचित कर(रिश्वत ,झूठे मेडिकल बिल्स ,अन्य भ्रष्ट उपायों के माध्यम से )  उनके एडमिशन के लिए ,उनको सफलता दिलाने के लिए उन बच्चों को ऐसी  सुख सुविधाओं का आदि बना कर(जो उनके लिए मूलभूत आवश्यकताएं बन जाती हैं )
कार्य क्षेत्र की स्थिति भी कुछ भिन्न नहीं,स्वयम काम के प्रति घोर लापरवाही और उदासीनता का प्रदर्शन और  उसी  स्थिति के लिए अधीनस्थों को कोप भाजन  बनाना.झूठे मेडिकल अवकाश पर मौज करना और  कार्यालय तथा घर में कार्य करने वाले सेवकों का वेतन काट लेना, अधिक अवकाश लेने पर .,उनको प्रताड़ित करना.
समाज में विविध सामाजिक समस्याओं ,व्यवहार क्रियाकलापों के सम्बन्धित व्यक्तियों की   निंदा की जाती है और जब उन्ही कार्यों को  को स्वयम किया जाता है तो  फिर कुतर्कों के माध्यम से उचित ठहराया  जाता है.शादियों में दिखावा  हो,दहेज़ हो,प्रेम विवाह या कोई भी सामाजिक समस्या.
राजनीति में  यद्यपि स्वच्छ वातावरण और नैतिकता की आशा करना तो वैसे भी कपोल कल्पना है,क्योंकि कहा गया है, राजनीति तो सदा ही वेश्या की भांति नित नवीन रूप धरती है.राजनीति में कोई स्थायी शत्रु -मित्र नहीं होता ,राजनीति में साम-दाम-दंड-भेद आदि सभी साधनों का आश्रय लिया जाता है .
वर्तमान परिस्थितियों में ये सब परिदृश्य चरम पर हैं.जिन नेताओं ,राजनैतिक दलों को  पानी पी कर कोसा जाता है वही अगले ही पल  अभिन्न  मित्र बन जाते हैं.उनके सभी कार्य घोर अपराध होते हैं तब तक जब तक कि वो विरोधी दल से जुड़े होते हैं, परन्तु गंगा तीरे गंगा दास और जमुना तीरे जमुना दास के सिद्धांत पर चलते हुए अपने साथ जुड़ने पर उनके सात नहीं असंख्य खून क्षम्य होते हैं.स्वार्थ पूरे होने तक देश द्रोह जैसे अपराध भी या तो दीखते नहीं और या फिर देख कर अनदेखे कर दिए जाते हैं.राजनीति में ऐसे उदाहरण चुनाव के समय तो चरम पर होते हैं.
” तिलक तराजू और तलवार ,इनको मारो जूते चार ” का नारा देने वाली सवर्ण और दलितों में दीवार को मजबूती देने वाली  बहिन मायावती जी को कोसने वाले सभी जूते खाकर भी उन्ही के चरण स्पर्श करते हैं.
मुलायम सिंह को मुल्ला मुलायम सिंह संबोधित कर अपना कट्टर शत्रु मानने  कल्याण सिंह और मुलायमसिंह की मैत्री ,फिर शत्रुता.  भा ज पा द्वारा  शिबू सोरेन, की कड़ी  निंदा फिर समर्थन ,नीतीश कुमार से  दोस्ती ,फिर उन्ही नीतीश कुमार के बदले तेवर ,वर्तमान में फिर पासवान,करुना निधि  ओहो! कहाँ तक गिनें .

कांग्रेस  तो देशद्रोहियों का समर्थन लेने में ही नहीं चूकी कभी.सत्ता हस्तगत करने के लिए किस प्रकार कांग्रेस के कर्णधारों ने  संवैधानिक व्यवस्थाओं को तोडा मरोड़ा है ,स्वाधीनता पश्चात का इतिहास साक्षी है. कांग्रेस के गत कार्यकाल में हुए घोटालों ने तो सारे कीर्तिमान ही ध्वस्त कर दिए ,उन सबको प्रश्रय दिए रखना देश के प्रति निष्ठा का परिचायक कैसे माना जा सकता है.हाँ उन्ही लोगों के कहीं अन्यत्र जुड़ते ही उनमें सारे दोष नजर आ जाते हैं. उनके विरुद्ध जांच बैठा दी जाती है.वोट बैंक की खातिर विवादित और देश द्रोह को बढावा देते बयान दिए जाते हैं.

आम आदमी पार्टी ,का  तो उदय  ही विवादित रहा .पार्टी के नीति नियंताओं को उसी कांग्रेस से हाथ मिलाने में तनिक भी संकोच न रहा जिससे समर्थन ने लेने के लिए श्री अरविन्द केजरीवाल ने अपने बच्चे की शपथ ली थी.ईमानदारी की कसमें खाते हुए ऐसे लोगों को जिम्मेदारी सौंप दी जिनकी ईमानदारी पर प्रश्न चिन्ह लगे थे .  सम्पूर्ण कार्यकाल केवल नौटंकी ही दिखाई दिया.
समाज वादी पार्टी हो ,कम्युनिस्ट हों  सभी दल का उद्देश्य सत्ता के लिए कुछ भी करेगा ही दिखाई देता है.
इतना ही नहीं चुनाव से पूर्व जिन विरोधी  दलों और नेताओं के दोष गिनाते ,उनके सही गलत वीडियो आडियो दिखा कर विजय प्राप्त कर सकते हैं उन्ही के साथ अवसर वादिता का परिचय देते हुए  सत्ता संभालते हैं.
जैसा कि कहा गया है राजनीति में सब कुछ उचित है , तो फिर अनुचित क्योँ ?  निश्चित रूप से ये समस्त क्रिया कलाप अनुचित न होते यदि  इसके मूल में देश हित हो ,.महाभारत के युद्ध में  कूटनीतिक उपायों का आश्रय भगवान श्री कृष्ण ने भी लिया था,परन्तु उसके मूल में देश हित और सत्य का साथ  देना था, वैसा तो आज कहीं भी दीखता ही नहीं ,सत्ता और केवल सत्ता , स्वार्थ ,पद का दुरूपयोग और धनार्जन बस यही उद्देश्य शेष रह गया है राजनैतिक दलों का ..
.
अब प्रश्न ये है कि इकाई तो व्यक्ति ही है परिवार,समाज देश विविध संगठन व्यक्ति से ही बनते हैं,परिवार सदृश छोटी सी इकाई में भी जब कथनी और करनी में समरूपता नहीं तो इतने विशाल स्तर पर स्वच्छता की कल्पना ख्याली पुलाव ही हो सकती है . अतः स्वयम को सुधारते हुए ,कथनी और करनी में एक रूपता ला कर ही विश्व गुरु भारत के स्वप्न देख सकते हैं

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
March 11, 2014

राजनीति में यद्यपि स्वच्छ वातावरण और नैतिकता की आशा करना तो वैसे भी कपोल कल्पना है,क्योंकि कहा गया है, राजनीति तो सदा ही वेश्या की भांति नित नवीन रूप धरती है.राजनीति में कोई स्थायी शत्रु -मित्र नहीं होता ,राजनीति में साम-दाम-दंड-भेद आदि सभी साधनों का आश्रय लिया जाता है . जब से लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई है तब से लेकर आज तक (आप तक नही) नए नए ड्रामे देखने को मिल रहे हैं , शायद भारतीय राजनीती का यही सच है ! सार्थक लेखन आदरणीय निशा जी !

Santosh Kumar के द्वारा
March 4, 2014

आदरणीया ,..सादर प्रणाम सदा की तरह सुन्दर संतुलित निष्पक्ष आलेख के लिए हार्दिक अभिनन्दन !….किसी महापुरुष ने कहा है आत्मसुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है ,….लेकिन हम मूर्ख यह काम भी भगवान् के जिम्मे छोड़ किनारे खड़े देखते हैं !……दोगली मूर्खता का चालू तर्क भी ठीक है ,..हम सेवा करने वाले कौन होते हैं ,… संसार उनकी रचना है !…..वो अपना काम पूर्णता से करते हैं !….हर जीव में वही हैं ,….वो सब जगह मिलते हैं ,…इधर भी जरूर मिलेंगे …हरहाल में मिलेंगे ….जल्दी मिलेंगे !…..मंच से गुमशुदगी के लिए पुनः क्षमाप्रार्थी हूँ …..जल्दी नियमित लेखन का पुराना राग बजाता हूँ …..हा हा हा ……पुनः सादर प्रणाम !

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2014

    नमस्कार संतोष जी,आज लम्बे समय बाद आपको मंच पर देखा ,निश्चित रूप से ईष्वर के कार्यों में तो दकलहल कोई नहीं दे सकता परन्तु प्रारम्भिक स्तर से सुधार के अभाव में राजनीति के सुन्दर संस्करण की कल्पना यथार्थ में कैसे बदलेगी धन्यवाद .सक्रिय होने के लिए समय तो चाहिए ही

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 4, 2014

बहुत खूब अच्छा लिखा है .आपकी लेखनी को नमन आभार मदन

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2014

    नमस्कार मदन जी आभार

दिनेश प्रजापति के द्वारा
March 4, 2014

सत्य वचन।

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2014

    धन्यवाद दिनेश जी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए

jlsingh के द्वारा
March 3, 2014

आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! कैफे दिनों बाद आपका राजनीतिके ऊपर आलेख पढ़ रहा हूँ. आपने बड़ी बेबाकी से सभी दलों का विश्लेषण किया है. आज मैं टी वी बहस में सुन रहा था ब्यवस्था का दोष है और ब्यवस्था परिवर्तन के लिए घर से शुरुआत करनी होगी हर एक को बदलना होगा. राजनीति में अच्छे लोगों को आना पड़ेगा …गंगा को साफ रखने से पहले गंगोत्री को साफ करना होगा ..मेरा मत ऐसा ही है … सादर! (आपने महाभारत का उदाहरण दिया – धर्म और देश के हित के लिए वहाँ भी राजनीति की गयी थी. पर सचमुच देश हित हुआ क्या? अंत में पांडव जन भी वैराग्य को प्राप्त हो गए और बर्फ में जा कर अपनी लीला समाप्त कर ली!)

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2014

    आदरनीय सिंह साहब सहमती हेतु आभा आपने कहा है  पर सचमुच देश हित हुआ क्या? अंत में पांडव जन भी वैराग्य को प्राप्त हो गए और बर्फ में जा कर अपनी लीला समाप्त कर ली!)  हिन्दू संस्कृति और धर्मग्रंथों में आस्था रखने वाले आपका ये तर्क कुछ विचित्र सा लगा .सत्य का साथ देने से अभिप्राय  है  उन पांडवों का साथ देना जिनके साथ पुत्र मोह में अंधे धृतराष्ट्र तो अन्याय कर ही रहे थे साथ ही स्वयम भगवान् कृष्ण के समझाने पर भी ,सुईं की नोक के बराबर भूमि ने देने की बात करने वाले दुर्योधन पांडवों को उनका अधिकार देने को तैयार नहीं था.ऐसे में क्या भगवान् कृष्ण को अंत क्या होगा ये सोच कर  सत्य का साथ नहीं देना चाहिए था .

Rajesh Dubey के द्वारा
March 3, 2014

यह सत्य हैं भ्रष्टाचार का बीज तो बचपन में ही घर से बच्चों को मिल जाता है. बच्चों के सामने बड़े जो गलत करते हैं, बच्चे सिख लेते हैं.

    nishamittal के द्वारा
    March 4, 2014

    धन्यवाद आदरणीय दुबे जी


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