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सशक्त नारी सशक्त संसार (सशक्त नारी को नमन)

Posted On: 8 Mar, 2014 Others में

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MAHILA

सर्वप्रथम तो  सभी  को बधाई अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस की  परम्परा के अनुसार .

नारी का कार्यक्षेत्र पुरुष की तुलना में बहुत व्यापक है.वर्तमान परिवेश में तो आर्थिक उत्तरदायित्व भी है उसके कंधों पर.तथापि नारी की वास्तविक और व्यवहारिक स्थिति क्षोभनीय ही कही जायेगी. आज महिला दिवस मनाते हुए स्थान स्थान पर आयोजन हो रहे हैं.भाषण,विविध कार्यक्रम,सम्मान समारोह आदि.  लेकिन   8  मार्च को वर्ष में एक दिन महिला दिवस  मना लेने से क्या दायित्व पूर्ण हो जाता है समाज का? ऐसे विविध  आयोजन कर महिला दिवस मनाने वाले संगठनों से विशेष विनम्र अनुरोध ,,,,,,,,,,,

सर्व प्रथम तो हमको ये स्मरण रखना होगा कि समाज रूपी रथ के ये दोनों ही पहिये एक दूसरे के पूरक हैं विरोधी नहीं. नारी  की  दोयम दर्जे की स्थिति के लिए दोषी केवल पुरुष ही नहीं,स्वयम नारी भी है. अतः दोनों से ही मेरा अनुरोध

पुरुषों से ……………….. सर्वप्रथम तो आप महिलाओं को दोयम दर्जे की नागरिक या केवल आवश्यकतानुसार उपभोग की वस्तु न मानें , जिस प्रकार आपका अपना सम्मान,है,उसी प्रकार महिलाओं का भी.

गृहणियों के कार्य को सम्मान दें उसका महत्व समझें.

स्वयम भी समझ लें और अपने सुपुत्रों को समझाएं ,जिस प्रकार आपको  आपकी बेटी,बहिन,माँ या पत्नी  की इज्जत की चिंता है उसी प्रकार शेष सभी महिलायें,लड़कियां,किसी के साथ ऐसे ही रिश्तों से जुडी हैं.यदि आप बचपन से ही लड़कों को ऐसे संस्कार दें अपने व्यवहारिक उदाहरण के साथ, तो निश्चित रूप से उनके हृदयों में ऐसे संस्कार जन्म लेंगें .

महिलाओं के अधिक योग्य होने पर उसको  अपनी प्रतिष्ठा या अहम् पर चोट  का प्रश्न न बनाएं .

महिला यदि कार्यरत है तो परिस्थिति के अनुसार उसको सभी कार्यों में यथेष्ठ  सहयोग दें.

कन्या भ्रूण हत्या से बड़ा पाप कोई नहीं ,ये सदा गाँठ बाँध लें और समझ लें कि आपका अस्तित्व भी महिला के कारण ही है .

दहेज़ देने और लेने से घृणा करें .

अब स्वयम नारी जगत से …………..

सर्वप्रथम तो नारी अपना महत्व स्वयम समझे  मेरा क्या ,मैं तो ऐसे ही काम चला लूंगी , इस धारणा  को सदा सदा के लिए अपने शब्दकोश से बाहर कर दें.अपने स्वास्थ्य,मानसिक और शारीरिक दोनों पर ध्यान देना आवश्यक है.जिस प्रकार परिवार में सभी के स्वास्थय ,वस्त्रों आदि का ध्यान आप रखती हैं उसी प्रकार स्वयम का  ,क्योंकि परिवार के लिए भी कुछ  करना तभी संभव है जब आप पूर्ण रूपेण स्वस्थ हैं.अपनी उपेक्षा स्वयम करने पर परिवार में कोई भी आपका ध्यान नहीं रख सकता.

नारी होते हुए भी स्वयम नारी का शत्रु होना नारी के उत्थान में सबसे बड़ी बाधा है,अतः कन्या भ्रूण ह्त्या,बाल विवाह,दहेज़ आदि का  सबसे पहले मन से विरोध करना जरुरी है .,

घर में आने वाली  बधू को बेटी ,बहिन की तरह  प्यार दुलार ,सम्मान देकर अपना बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए .

जैसे बेटियों को शिक्षा दी जाती है परिवार में वैसे बेटों को भी समझाएं और बहिन के प्रति जिम्मेदारी का अहसास कराए.साथ ही थोड़ी बहुत गृह कार्य की भी शिक्षा जरुर दी जानी चाहिए .यदि पुरुष पत्नी का सहयोग करता है गृह कार्य में तो उसको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए .

महिलायें अपने अधिकारों और साथ ही कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहें

स्वयम को बाजारवाद का शिकार न होने दें महिलायें .,महिलाओं के प्रति बढ़ते यौन अपराधों का एक बहुत बड़ा कारण मेरे विचार से विज्ञापनों ,धारावाहिकों और फिल्मों में  अश्लीलता और नग्नता ही है,जिसका अवसर स्वयम महिलायें देती हैं .

अतः जागिये और प्रकृति  ने आपको विशेष क्षमताएं दी हैं ,उनका सदुपयोग कर अपना सम्मान हासिल करिए .

ऐसा स्वरूप न रहे नारी का ऐसी शुभकामनाएं

ROTEESWROOP PAHICHAANE

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

गुंजेश गौतम झा के द्वारा
March 18, 2014

(राष्ट्र निर्माण में महिलाओं का योगदान) . जब भारतीय ऋषियों ने अथर्ववेद में ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ (अर्थात भूमि मेरी माता है और हम इस धरा के पुत्र हैं।) की प्रतिष्ठा की तभी सम्पूर्ण विश्व में नारी-महिमा का उद्घोष हो गया था। नेपोलियन बोनापार्ट ने नारी की महत्ता को बताते हुए कहा था कि -‘‘ मुझे एक योग्य माता दे दो, मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूँगा।’’ भारतीय जन-जीवन की मूल धुरी नारी (माता) है। यदि यह कहा जाय कि संस्कृति, परम्परा या धरोहर नारी के कारण ही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती रही है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब-जब समाज में जड़ता आयी है नारी शक्ति ने ही उसे जगाने के लिए, उससे जूझने के लिए अपनी सन्तति को तैयार करके, आगे बढ़ने का संकल्प दिया है। कौन भूल सकता है माता जीजाबाई को, जिसकी शिक्षा-दीक्षा ने शिवाजी को महान देशभक्त और कुशल योद्धा बनाया। कौन भूल सकता है पन्ना धाय के बलिदान को पन्नाधाय का उत्कृष्ट त्याग एवं आदर्श इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वह उच्च कोटि की कत्र्तव्य परायणता थी। अपने बच्चे का बलिदान देकर राजकुमार का जीवन बचाना सामान्य कार्य नहीं। हाड़ी रानी के त्याग एवं बलिदान की कहानी तो भारत के घर-घर में गायी जाती है। रानी लक्ष्मीबाई, रजिया सुल्ताना, पद्मिनी और मीरा के शौर्य एवं जौहर एवं भक्ति ने मध्यकाल की विकट परिस्थितियों में भी अपनी सुकीर्ति का झण्डा फहराया। कैसे कोई स्मरण न करे उस विद्यावती का जिसका पुत्र फाँसी के तख्ते पर खड़ा था और माँ की आँखों में आँसू देखकर पत्रकारों ने पूछा कि एक शहीद की माँ होकर आप रो रही हैं तो विद्यावती का उत्तर था कि ‘‘ मैं अपने पुत्र की शहीदी पर नहीं रो रही, कदाचित् अपनी कोख पर रो रही हूँ कि काश मेरी कोख ने एक और भगत सिंह पैदा किया होता, तो मैं उसे भी देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर देती।’’ ऐसा था भारतीय माताओं का आदर्श। ऐसी थी उनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा। परिवार के केन्द्र में नारी है। परिवार के सारे घटक उसी के चतुर्दिक घूमते हैं, वहीं पोषण पाते हैं और विश्राम। वही सबको एक माला में पिरोये रखने का प्रयास करती है। किसी भी समाज का स्वरूप वहाँ की नारी की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि उसकी स्थिति सुदृढ़ एवं सम्मानजनक है तो समाज भी सुदृढ़ एवं मजबूत होगा। भारतीय महिला सृष्टि के आरंभ से अनन्त गुणों की आगार रही है। पृथ्वी की सी सहनशीलता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र की गम्भीरता, पुष्पों जैसा मोहक सौन्दर्य, कोमलता और चन्द्रमा जैसी शीतलता महिला में विद्यमान है। वह दया, करूणा, ममता, सहिष्णुता और प्रेम की पवित्र मूर्ति है। नारी का त्याग और बलिदान भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है। बाल्यावस्था से लेकर मृत्युपर्यन्त वह हमारी संरक्षिका बनी रहती है । सीता, सावित्री, गार्गी, मैत्रेयी जैसी महान् नारियों ने इस देश को अलंकृत किया है। निश्चित ही महिला इस सृष्टि की सबसे सुन्दर कृति तो है ही, साथ ही एक समर्थ अस्तित्व भी है। वह जननी है, अतः मातृत्व महिमा से मंडित है। वह सहचरी है, इसलिए अद्र्धांगिनी के सौभाग्य से शृंगारित है। वह गृहस्वामिनी है, इसलिए अन्नपूर्णा के ऐश्वर्य से अलंकृत है। वह शिशु की प्रथम शिक्षिका है, इसलिए गुरु की गरिमा से गौरवान्वित है। महिला घर, समाज और राष्ट्र का आदर्श है। कोई पुण्य कार्य, यज्ञ, अनुष्ठान, निर्माण आदि महिला के बिना पूर्ण नहीं होता है। सशक्त महिला सशक्त समाज की आधारशिला है। महिला सृष्टि का उत्सव, मानव की जननी, बालक की पहली गुरु तथा पुरूष की प्रेरणा है। यदि महिला को श्रद्धा की भावना अर्पित की जाए तो वह विश्व के कण-कण को स्वर्गिक भावनाओं से ओतप्रोत कर सकती है। महिला एक सनातन शक्ति है। वह आदिकाल से उन सामाजिक दायित्वों को अपने कन्धों पर उठाए आ रही है, जिन्हंे अगर पुरुषों के कन्धे पर डाल दिया गया होता, तो वह कब का लड़खड़ा गया होता। पुरातन कालीन भारत में महिलाओं को उच्च स्थान प्राप्त था। पुरूषों के समान ही उन्हें सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक कृत्यों में भाग लेने का अधिकार था। वे रणक्षेत्र में भी पति को सहयोग देती थी। देवासुर संग्राम में कैकेयी ने अपने अद्वितीय रणकौशल से महाराज दशरथ को चकित कर दिया था। याज्ञवल्क्य की सहधर्मिणी गार्गी ने आध्यात्मिक धन के समक्ष सांसारिक धन तुच्छ है, सिद्ध करके समाज में अपना आदरणीय स्थान प्राप्त किया था। विद्योत्तमा की भूमिका सराहनीय है, जिसने कालिदास को संस्कृत का प्रकाण्ड पंडित बनाने में सफलता प्राप्त की। तुलसीदास जी के जीवन को आध्यात्मिक चेतना देने में उनकी पत्नी का ही बुद्धि चातुर्य था। मिथिला के महापंडित मंडनमिश्र की धर्मपत्नी विदुषी भारती ने शंकराचार्य जैसे महाज्ञानी व्यक्तित्व को भी शास्त्रार्थ में पराजित किया था। लेकिन चूँकि भारत के अस्सी प्रतिशत से अधिक तथाकथित विद्वान गौतमबुद्धोत्तरकालीन भारत को ही जानते पहचानते हैं और उनमें भी प्रतिष्ठा की धुरी पर बैठे लोग, पाश्चात्य विद्वानों द्वारा अंग्रेजी में लिखे गं्रथों से ही, भारत का अनुभव एवं मूल्यांकन करते हैं, अतः नारी विषयक आर्ष-अवधारणा तक वे पहुँच ही नहीं पाते। उन्हें केवल वह नारी दिखाई पड़ती है जिसे देवदासी बनने को बाध्य किया जाता था, जो नगरवधू बनती थी अथवा विषकन्या के रूप में प्रयुक्त की जाती थी। महिमामयी नारी के इन संकीर्ण रूपों से इंकार तो नहीं किया जा सकता। परंतु हमें यह समझना चाहिए कि वे नारी के संकटकालीन रूप थे, शाश्वत नहीं । हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि रोमन साम्राज्य (इसाई जगत, इस्लाम जगत) तथा अन्यान्य प्राचीन संस्कृतियों में नारी की जो अवमानना, दुर्दशा एवं लांछना हुई है- जिसके प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध हैं, वैसा भारतवर्ष मंे कम से कम, मालवेश्वर भोजदेव के शासन काल तक कभी नहीं हुआ। इस्लामिक आक्रमणों के अनन्तर भारत का सारा परिदृश्य ही बदल गया। मलिक काफूर, अलाउद्दीन तथा औरंगजेब-सरीखे आततायियों ने तो मनुष्यता की परिभाषा को ही झुठला दिया। सल्तनत-काल के इसी नैतिकता-विहीन वातावरण में नारियों के साथ भी अपरिमित अत्याचार हुए। उसके पास विजेता की भोग्या बन जाने अथवा आत्मघात कर लेने के अतिरिक्त और उपाय ही क्या था? फलतः असहाय नारियाँ आक्रांताओं की भोग्या बनती रही। लेकिन यह ध्यान रहे कि यह भारत की पराधीनता के काल थे, स्वाधीनता के नहीं। अब हम स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड को देखें तो हम देखते हैं कि भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में महिलाओं ने जितनी बड़ी संख्या में भाग लिया, उससे सिद्ध होता है कि समय आने पर महिलाएँ प्रेम की पुकार को विद्रोह की हुंकार में तब्दील कर राष्ट्रीय अखण्डता को अक्षुण्ण बनाने में अपना सर्वस्व समर्पित कर सकती हैं। रानी लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू, मादाम भिखाजी कामा, अरुणा आसफ अली, एनी-बेसेन्ट, भगिनी निवेदिता, सुचेता कृपलानी, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, दुर्गा भाभी एवं क्रांतिकारियों को सहयोग देने वाली अनेक महिलाएँ भारत में अवतरित हुईं, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इतिहास साक्षी है जब-जब समाज या राष्ट्र ने नारी को अवसर तथा अधिकार दिया है, तब-तब नारी ने विश्व के समक्ष श्रेष्ठ उदाहरण ही प्रस्तुत किया है। मैत्रेयी, गार्गी, विश्ववारा, घोषा, अपाला, विदुषी भारती आदि विदुषी स्त्रियाँ शिक्षा के क्षेत्र में अपने बहुमूल्य योगदान के लिए आज भी पूजनीय हैं। आधुनिक काल में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चैहान, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम आदि स्त्रियों ने साहित्य तथा राष्ट्र की प्रगति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। कला के क्षेत्र में लता मंगेश्कर, देविका रानी, वैजयन्ती माला, सोनाल मानसिंह आदि का योगदान वास्तव मे प्रशंसनीय है। वर्तमान में महिलाएँ समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र-उत्थान के अनेक कार्यों में लगी हैं। महिलाओं ने अपनी कर्तव्य परायणता से यह सिद्ध किया है कि वे किसी भी स्तर पर पुरूषों से कम नहीं हैं। बल्कि उन्होंने तो राष्ट्र निर्माण में अपनी श्रेष्ठता ही प्रदर्शित की है। शारीरिक एवं मानसिक कोमलता के कारण महिलाओं को रक्षा सम्बन्धी सेवाओं के उपयुक्त नहीं माना जाता था, किंतु भारत की पहली महिला ‘आई0पी0एस0’ श्रीमती किरण बेदी ने ही अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया। अत्यंत ही हर्ष का विषय है, कि अब महिला जगत का बहुत बड़ा भाग अपनी संवादहीनता, भीरूता एवं संकोचशीलता से मुक्त होकर सुदृढ़ समाज के सृजन में अपनी भागीदारी के लिए प्रस्तुत है। समस्त सामाजिक संदर्भों से जुड़ी महिलाओं की सक्रियता को अब न केवल पुरूष वरन् परिवार, समाज एवं राष्ट्र ने भी सगर्व स्वीकारा है। वर्तमान में नारी शक्ति का फैलाव इतना घनीभूत हो गया है कि कोई भी क्षेत्र इनके सम्पर्क से अछूता नहीं है। आज नारी पुरूषों के समान ही सुशिक्षित, सक्षम एवं सफल है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, साहित्य, चिकित्सा, सेना, पुलिस, प्रशासन, व्यापार, समाज सुधार, पत्रकारिता, मीडिया एवं कला का क्षेत्र हो, नारी की उपस्थिति, योग्यता एवं उपलब्धियाँ स्वयं अपना प्रत्यक्ष परिचय प्रस्तुत कर रही है। घर परिवार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक उसकी कृति पताका लहरा रही है। दोहरे दायित्वों से लदी महिलाओं ने अपनी दोगुनी शक्ति का प्रदर्शन कर सिद्ध कर दिया है कि समाज की उन्नति आज केवल पुरूषों के कन्धे पर नहीं, अपितु उनके हाथों का सहारा लेकर भी ऊँचाईयों की ओर अग्रसर होती है। उन्नत राष्ट्र की कल्पना तभी यथार्थ का रूप धारण कर सकती है, जब महिला सशक्त होकर राष्ट्र को सशक्त करें। महिला स्वयं सिद्धा है, वह गुणों की सम्पदा हैं। आवश्यकता है इन शक्तियों को महज प्रोत्साहन देने की। यही समय की माँग है। नाम -गुंजेश गौतम झा राजनीति विज्ञान विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी- 221005, उ0 प्र0 सम्पर्क:- 09026028080

atharvavedamanoj के द्वारा
March 13, 2014

संतुलित, सुगठित और व्यवस्थित आलेख..बधाई हो आदरणीया निशा जी

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 13, 2014

आदरणीया निशा जी आपकी रचनाये ससक्त तो होती ही है सदा सार्थक भी रही है | बहुत ही उत्कृष्ट रचना | बधाई

    nishamittal के द्वारा
    March 13, 2014

    लम्बे समय बाद आपकी सुखद प्रतिक्रिया पाकर अच्छा लगा .स्वागत आभार

deepak pande के द्वारा
March 12, 2014

SAHEE KAHA AAPNE JAB NAARI SWAYAM KE MAHATVA KO SAMJHEGI SAMAJ ME USKA MAHATVA APNE AAP HEE BAD JAYEGA PAHLE SWAYAM KEE IZZAT KARO PHIR AURON KEE AADARNIYA NISHA JEE KHOOBSURAT LEKH AAJ HUM BHEE TO AAP JAISI NAARI SE HEE LEKHAN KE VISHAY ME BAHUT KUCHH SEEKH RAHE HAIN

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    नमस्कार दीपक पांडे जी आपकी सुन्दर और प्रथम प्रतिक्रिया हेतु आभार

abhishek shukla के द्वारा
March 12, 2014

समझौता को नारी का पर्यायवाची शब्द कहा जाए तो कहीं से भी अनुचित नहीं होगा. घर से लेकर समाज तक हर जगह समझौता ही करती हैं, लेकिन अब ये समझौता जरा कम हुआ है जागरूकता और शिक्षा का प्रभाव दिख रहा है, शीघ्र ही परिस्थितियां बदलेंगी….

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    समझौता की परिभाषा आपकी दृष्टि में क्या और कहाँ है इस पर निर्भर करता है उत्तर तभी दे सकूंगी जब आपका कमेन्ट स्पष्ट हो धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
March 12, 2014

आदरणीया,सर्वप्रथम रचना और रचनाकार का सादर अभिनन्दन ! बहुत सार्थक और शिक्षाप्रद लेख.आपको बहुत बहुत बधाई.आपने बहुत सही कहा है-सर्वप्रथम तो नारी अपना महत्व स्वयम समझे मेरा क्या ,मैं तो ऐसे ही काम चला लूंगी , इस धारणा को सदा सदा के लिए अपने शब्दकोश से बाहर कर दें.अपने स्वास्थ्य,मानसिक और शारीरिक दोनों पर ध्यान देना आवश्यक है.जिस प्रकार परिवार में सभी के स्वास्थय ,वस्त्रों आदि का ध्यान आप रखती हैं उसी प्रकार स्वयम का ,क्योंकि परिवार के लिए भी कुछ करना तभी संभव है जब आप पूर्ण रूपेण स्वस्थ हैं.अपनी उपेक्षा स्वयम करने पर परिवार में कोई भी आपका ध्यान नहीं रख सकता.

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    आभार सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु महोदय

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    आकभार योगी सारस्वत जी सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु

Dr S Shankar Singh के द्वारा
March 11, 2014

स्त्री अगर शक्ति i है तो पुरुष सहनशक्ति है. .

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    क्षमा करिए डाक्टर साहब कुछ विरोधाभासी सा लगा पुरुष में सहन शक्ति ?

    Dr S Shankar Singh के द्वारा
    March 12, 2014

    माफ़ करियेगा निशा जी, स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक होने चाहिए. इसके लिए शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय दोनों द्वारा सहनशक्ति का उपयोग करना ज़यादा उचित होगा.

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    शत प्रतिशत सहमत हूँ आपसे ,मेरा ये सदा से विश्वास है कि पूरक होने के कारण संतुलन आवश्यक है.पुनः कष्ट हेतु आभार

jlsingh के द्वारा
March 10, 2014

आदरणीया, कहाँ हैं वो पंक्तियाँ जो आज दैनिक जागरण में आपके नाम से छपा है ‘नर से भारी नारी …

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    पढ़ चुके हैं आप ?

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 9, 2014

श्रद्धेया निशा जी , सादर ! काफी दिनों बाद यहाँ आप से मुलाक़ात हो रही है ! सर्वप्रथम महिला-दिवस पर आप को मेरा शत-शत नमन !! आलेख पर….. किं बहुना , इत्यलम् !!

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    धन्यवाद आचार्य जी

jlsingh के द्वारा
March 9, 2014

आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन! यथेष्ठ, उपयुक्त, सटीक आलेख.

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    धन्यवाद सिंह साहब

Rajesh Dubey के द्वारा
March 9, 2014

समाज में नारी कि भूमिका पुरुष से ज्यादा सकारात्मक है. बेटी अगर पढ़ी-लिखी है तो समझिये कि पूरा परिवार पढ़ा लिखा है. आपका कथन सही है “सशक्त नारी सशक्त संसार”

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    सहमति हेतु आभार राजेश दुबे जी

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 8, 2014

निशा जी महिला दिवस पर आपने अपने लेख से स्त्री एवं पुरुष दोनों को बहुत अच्छी हिदायतें दी हैं , सादर आभार , Happy women’s day

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    धन्यवाद निर्मला जी


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