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एक नहीं दो दो मात्राएँ नर से बढ़कर नारी

Posted On: 10 Mar, 2014 Others में

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“एक नहीं दो दो मात्राएँ नर से बढ़कर नारी” सुनने में कुछ सुखद और  विचित्र सा लगता है . हमारे देश के संदर्भ में तो ऐसा ही प्रतीत होता है,क्योंकि  शक्ति स्वरूपा , नारी शक्ति ………हमारे देश के अधिकांश भागों में घर घर पूजी जाती है,जिसके दर्शन करने के लिए सभी  दुर्गम बाधाओं को पार करते हुए भक्तजन ऊंचे पहाड़ों पर पहुँचते हैं,पैरों में छाले ,नंगे पैर, कड़ी धूप ,वर्षा ,और भयंकर शीत कोई भी  तो राह नहीं रोक पाते भक्तों को ,  घर घर ,कन्या पूजन किया जाता है, माँ को  प्रसन्न करने के लिए व्रत उपवास किये जाते हैं.नारी शक्ति की महानता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि राधा कृष्ण,लक्ष्मीपति विष्णु जी,उमापति महादेव,गौरी पुत्र ,अंजना सुत आदि नामों से पुकारा जाता है प्रभु को .यज्ञ में पत्नी की उपस्थिति अनिवार्य मानी गयी थी  हमारे देश में अतः ,पत्नी की अनुपस्थिति में स्वर्ण प्रतिमा रखवानी पड़ी प्रभु राम को. इतना ही नहीं विवाह में स्वयम्वर के रूप में पति चुनने का अधिकार ,युद्ध में पति के साथ सशस्त्र युद्ध में भाग लेने के उदाहरण भी हमको  इतिहास में मिलते हैं.(भले ही ये व्यवस्था कुलीन या राजपरिवारों में रही हो )लेकिन जन सामान्य के भी नकारात्मक उल्लेख नहीं मिलते इस संदर्भ में .

व्यवहार में भी विदुषी नारियों को शास्त्रार्थ का अधिकार दिया गया, पुरुषों को  विदुषी नारियों ने पराजय स्वीकार करने को विवश कर दिया .  कालिदास को महाकवि बनने की प्रेरणा देने वाली उनकी पत्नी विद्योत्मा ही थी तो रत्नावली की प्रेरणा से तुलसीदास रामचरितमानस  रच सके.


समय  तो कभी स्थिर नहीं रहता  , अतः  हमारी  अपनी दुर्बलताओं के कारण हमारे  देश पर मुस्लिम आक्रमणकारियों  का अधिकार हुआ और  हमको वो दुर्दिन देखने पड़े,जब सुन्दर स्त्रियों को बलात या विवशतावश उन शासकों या उनके प्रमुख सिपहसालारों के साथ विवाह बंधन में बंधना पड़ा. स्वयम को शक्तिशाली मानने वाले राजाओं को अपनी बेटियां आततायियों को सौपनी पड़ी, उन क्रूर शासकों की अपमानजनक मांगों को पूर्ण करना पडा अपनी बहिन,बेटी या पत्नी के संदर्भ में . वीर क्षत्राणियों को  अपनी आनबान शान की रक्षार्थ  जौहर करते हुए जलती चिता में कूदना पड़ा.

इतिहास साक्षी है कि बाल विवाह,बेमेल विवाह पर्दा प्रथा नारी शिक्षा पर प्रतिबन्ध आदि समाज के लिए कलंक स्वरूप कुप्रथाओं को निरंतर  बढावा मिला. अभी एक दासता हमारे गौरवमय अतीत को कलंकित करने हेतु पर्याप्त नहीं रही और हमारा देश ब्रिटिश आधीनता को भुगतने को विवश हुआ. हर क्षेत्र में शोषित रहते हुए भी अंग्रेजी शासन में कुछ  महान समाज सुधारकों स्वामी दयानन्द ,स्वामी श्रद्धानन्द,ईश्वरचन्द्र विद्यासागर,राजा राम मोहन राय ,स्वामी विवेकानन्द,महात्मागांधी,भगिनी निवेदिता,सरोजिनी नायडू आदि के प्रयासों से इन कुप्रथाओं पर कुछ नियंत्रण लगा .

स्वाधीनता संग्राम में भी महारानी लक्ष्मी बाई,बेगम हज़रत महल, मैडम कामा  ,विजय लक्ष्मी पंडित,दुर्गा भाभी ,एनी  विसेंट ……….सरीखी विदुषी नारियों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया .नारी कहीं भी पीछे नहीं ये प्रमाणित किया (इतिहास के पन्नों में भले ही अधिक नामों की सूची अपना योगदान देने वाली महिलाओं की न हो परन्तु जिन्होंने अपना सबकुछ लुटा कर भी देश को मुक्त करने में योगदान दिया,उनको भुलाना कृतघ्नता ही होगी.)

स्वाधीनता प्राप्ति के उपरान्त भी यद्यपि संविधान ने सबको लिंग भेद के बिना  समानाधिकार दिए  गये हैं,अनुच्छेद 14,15,16 के अनुसार सबको समान अवसर प्रदान किये गये हैं ,बालिकाओं की शिक्षा की समुचित व्यवस्था  है,कार्यरत महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश की तथा शिशु देखभाल के लिए अवकाश की  व्यवस्था है, गर्भ के समय लिंग परीक्षण दंडनीय अपराध है. महिलाओं के लिए पंचायतों में स्थान आरक्षित हैं.महिला थानों की व्यवस्था है,स्त्री –पुरुष को नौकरी में समान अधिकार हैं,कुछ तकनीकी संस्थानों में तो लड़कियों के लिए स्थान आरक्षित हैं.

1990 में महिलाओं के लिए विशेष आयोग के गठन की व्यवस्था के लिए अधिनियम पारित किया गया है.1992 -1993 में नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी के महत्व को समझते हुए संविधान में 73वां  74 वां संशोधन कर पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं में स्थान आरक्षित कर दिए गये हैं.महिलाओं के सशक्तिकरण को प्रधानता देते हुए 2001 को महिला वर्ष घोषित करते हुए उनके कल्याण की विशिष्ठ व्यवस्थाएं की गयी हैं.

राष्ट्राध्यक्ष,प्रधानमन्त्री . कांग्रेस अध्यक्षा,मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष,प्रमुख न्यायाधीश,सैन्यधिकारी,सर्वोच्च पुलिस अधिकारी(के रूप में वर्तमान या पूर्व में ),हिमालय की चोटी पर विजय प्राप्त कर भारतीय ध्वज फेहराने वाली,ऑटो रिक्शा से लेकर वायुयान तक उड़ाने वाली,घर,खेत खलिहानों ,में,,प्रबंधन ,चिकित्सा,तकनीक,अन्तरिक्ष आदि क्षेत्रों में अग्रणी तथा , मेहनत -मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण करने वाली अर्थात सभी क्षेत्रों में भारतीय  नारी अग्रणी है. भारतीय महिला प्रोफेशनल्स भी भारत तथा भारत से बाहर बहुत बड़ी संख्या में हैं .

कितना गौरवपूर्ण है नारी के सशक्त होने के सम्बन्ध में हमारे आंकडें और इतिहास ! परन्तु दूसरा चित्र उतना ही भयावह है ,और निष्पक्ष विचार करने हेतु दोनों पहलुओं पर विचार करना जरुरी है .

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आज भी समस्त सरकारी प्रतिबंधों के पश्चात भी लिंग परीक्षण होते हैं और लड़कियों के जन्म ग्रहण करने से पूर्व ही उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी जाती है.

ग्रामीण व सुदूर स्थानों पर हमारी बालिकाएं स्कूल जाती ही नहीं और यदि जाती  भी हैं तो स्वयम उनके और उनके मातापिता के  शिक्षा का  महत्त्व न समझ पाने के कारण प्राथमिक शिक्षा से पूर्व हो पढ़ाई छोड़ देती हैं, बाल मजदूरी करने को विवश हैं वो बच्चियां ,उनका बचपन परिवार में आर्थिक योगदान देने पर भी उपेक्षित ही रहता है,उनको  बचपन से ही  परिवार का पेट पालने के लिए हाड़तोड़ परिश्रम करना पड़ता है और मिलते हैं आधे चौथाई रुपए और यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है.

यद्यपि 2011  की जनगणना के अनुसार महिलाओं का साक्षरता अनुपात बढ़ा है,परन्तु नारियों का जीवन आज भी  पूर्णतया असुरक्षित है, बस,ट्रेन,हवाई यात्रा,कार्यस्थल,यहाँ तक की परिवारों में भी .लड़कियों को छेड़छाड़ का शिकार होना पड़ता है. बलात्कार और घरेलू  हिंसा या अन्य शोषण के कारण उनका जीवन नरक बन रहा है..

कुपोषण,दहेज़ ,स्वास्थय,की समस्याएँ,घरेलू हिंसा,कार्यस्थलों पर शारीरिक,मानसिक उत्पीडन,आर्थिक परतंत्रता ,वेश्यावृत्ति बाल विवाह (देश के कुछ भागों),आदि समस्याओं के कारण हमारे नारी सशक्तिकरण के दावों पर प्रश्नचिंह लग जाता है.आज इतनी प्रगति के पश्चात भी नारी दोयम दर्जे की नागरिक ही बनी है.यदि किसी कार्यालय में बॉस नारी है तो योग्य होने पर भी उसको स्वीकारने में पुरुष अधीनस्थों को कष्ट होता है.

ऑनर किलिंग के नाम पर स्वेच्छा से विवाह कर लेने या मात्र प्रेम कर लेने पर भी फांसी पर लटका दिया जाता है या मानवता को भी अन्दर तक हिला देने वाली सजायें दी जाती हैं. प्राय ऐसी घटनाएँ सुनने को मिलती हैं.


प्रश्न उत्पन्न होता है कि नारी शिक्षा में प्रगति,सरकारी प्रयासों, पूर्व की तुलना में शिक्षित परिवारों में परिवर्तित सोच के बाद भी वांछित परिवर्तन महिलाओं की स्थिति में क्यों नहीं हो पा रहा है. नारी उत्पीडन की घटनाएँ होने पर एक ही स्वर सुनाई देता है,अकेली क्यों गयी थी,रात को क्यों घूम रही थी .इसको नारी का सशक्त होना कैसे माना जा सकता है.
व्यापक दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो एक ही मूलभूत तथ्य पर आकर विषय ठहर जाता है और वो है सोच.आज भी परिवार में लडकी का जन्म उस उत्साह से  स्वीकार नहीं किया जाता,जितना पुत्र जन्म.       कितना ही पढ़ा-लिखा परिवार हो पुत्र दूसरा उत्पन्न हो तो चलेगा परन्तु पुत्री के जन्म के समय विषाद की रेखाएं चेहरे पर अवश्य दिखेंगीं.(अपवाद सर्वत्र हैं),दहेज़ के दानव से मुक्ति कठोर से कठोर क़ानून बनने पर भी नहीं हुई है.
नारी मुक्ति आन्दोलन मेरे विचार से कोई हल नहीं हैं, . महिला दिवस मना लेना महानगरों में रैली निकाल लेना ,कोई भाषण आदि आयोजित कर लेना,पत्रक वितरित कर देना मात्र दिखावा है.सरकार के प्रयास तभी रंग ला सकते हैं जब क़ानून कागजी न रहें, उनके क्रियान्वयन में कोई ढिलाई न हो. महानगरीय सभ्यता में परिवारों में  बालिकाओं की उच्च शिक्षा,तकनीकी शिक्षा और प्रोफेशनल्स हो जाने के कारण परिवारों में कुछ छूट अवश्य मिली है.परन्तु वो आम परिवारों में नहीं है.


नारी का महत्व स्वयं नारी समझे और जीवन के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने. ., नारी जागृति की सार्थकता तभी है जब गाँव गाँव तक ये सन्देश यथार्थ में पहुंचे कि समाज का ,देश का उत्थान ,विकास तभी संभव है जब आधी आबादी भी तन -मन- धन से देश के विकास में अपना सक्रिय सम्पूर्ण योगदान दे सके शिक्षित नारी ही सुखी,स्वस्थ,नियोजित और शिक्षित परिवार का महत्व समझ सकती है,तथा देश की अधिकांश समस्याओं के समाधान में अपना योगदान दे सकती है सभी का साक्षर नहीं सुशिक्षित होना जरुरी है,.. . और इसके लिए निरंतर प्रयासरत रहना जरुरी है.   .परिवार में भी उसके योगदान  को सम्मान देना होगा.
यद्यपि देश में बहुत से संगठन ,स्वयंसेवी संस्थाएं सक्रिय हैं,परन्तु केवल विदेशों से धन एकत्र करना प्राय इन संस्थाओं का प्रमुख कार्य होता है,महिलाओं का उत्थान बड़े बड़े होटलों,वातानूकूलित कक्षों में(एयर कंडिशंड कक्षों) नहीं होता .उनके मध्य जाकर उनके साथ रहकर उनकी समस्याओं को समझ कर,उनको किताबी शिक्षा के साथ व्यवहारिक शिक्षा प्रदान कर ही जन सेवा हो सकती है. राष्ट्रीय सेवा योजना के अंतर्गत लगाए गये       -2-3 दिन के शिविरों से नारी जाति को सशक्त नहीं बनाया जा सकता.जिन मान्यताओं की जड़ें इतनी गहन हैं उनके समूल विनाश के लिए सभी को प्रयासरत होना होगा.
औपचारिक  शिक्षा कार्यक्रम का एक आवश्यक अंग नारी जागृति व उत्थान का सन्देश व्यवहारिक रूप में जन जन तक पहुँचाने के लिए योजनाबद्ध कार्यक्रम तैयार कर इस कार्यक्रम को मूर्तरूप प्रदान किया जा सकता है.अंतरात्मा की आवाज़ को सुन कर ही कोई कार्य व्यक्ति सफलता पूर्वक करता है,अन्यथा तो बचाव के ढेरों रास्ते निकाल लिए जाते हैं.सकारात्मक उपायों से,संस्कारों के माध्यम से ही सोच में परिवर्तन आ सकता है.

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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 23, 2014

आदरणीया निशाजी हमेशा कि भांति आपका एक और सार्थक और उपयोगी लेख.आपने बिलकुल सही कहा है कि नारी जागृति व नारी उत्थान का सन्देश व्यवहारिक रूप में जन जन तक पहुँचाने योजनाबद्ध कार्यक्रम तैयार कर इस कार्यक्रम को मूर्तरूप प्रदान की जरुरत है.आपको इस सार्थक सृजन के लिए बधाई.

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 19, 2014

आदनिया निशा जी, बहुत ही गंभीर और सोचनीय लेख.. =आकाश तिवारी=

    nishamittal के द्वारा
    March 20, 2014

    आभार आकाश तिवारी जी बहुत बड़े अन्तराल के पश्चात दर्शन हुए आपके

niharika77 के द्वारा
March 15, 2014

बहुत ही सुन्दर कृती।

    nishamittal के द्वारा
    March 15, 2014

    आभार प्रथम कमेन्ट के लिए

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 14, 2014

आदरणीया निशा जी “यत्र नार्र्यन्तु-पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ” | सार्थक आलेख | बधाई |

    nishamittal के द्वारा
    March 14, 2014

    आभार आदरनीय बाजपेयी जी

abhishek shukla के द्वारा
March 14, 2014

जननी,जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

    nishamittal के द्वारा
    March 14, 2014

    धन्यवाद परन्तु आपके कमेन्ट का यहाँ सम्बन्ध नहीं समझी

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 13, 2014

नारी का महत्व स्वयं नारी समझे और जीवन के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने. ., नारी जागृति की सार्थकता तभी है जब गाँव गाँव तक ये सन्देश यथार्थ में पहुंचे कि समाज का ,देश का उत्थान ,विकास तभी संभव है जब आधी आबादी भी तन -मन- धन से देश के विकास में अपना सक्रिय सम्पूर्ण योगदान दे सके शिक्षित नारी ही सुखी,स्वस्थ,नियोजित और शिक्षित परिवार का महत्व समझ सकती है, सार्थक आलेख निशा जी ….ये तो सच है ही विकास अधूरे से नहीं होता चाहे वो पुरुष हो या नारी , नारियों को आगे बढ़ने का,यथोचित सम्मान देने का भरसक प्रयास होना चाहिए ….सुन्दर होली कि अग्रिम रूप से बधाई व् शुभ कामनाएं भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    March 14, 2014

    आभार शुक्ल जी .होली मंगल मय हो

vaidya surenderpal के द्वारा
March 13, 2014

बहुत ही सुन्दर, सारगर्भित, सार्थक और विचारणीय आलेख,  आपके विचारों से पूरी तरह सहमत निशा मित्तल जी, बधाई।

    nishamittal के द्वारा
    March 14, 2014

    आभार सुरेन्द्रपाल जी शुभकामनाएं होली की

Pk Roy के द्वारा
March 13, 2014

बहुत ही अच्छा और सच्चा लेख लिख दिया निशा जी. बधाई की हकदार.

    nishamittal के द्वारा
    March 13, 2014

    आभार रॉय साहब बहुत दिन बाद दर्शन हुए आपके

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 12, 2014

बिलकुल नए सिरे से और प्राणपन से इस यज्ञ की सम्पूर्णता में सबों को लगना होगा ! हार्दिक आभार श्रद्धेया निशा जी !!

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    आभार आदरनीय आचार्य जी

meenakshi के द्वारा
March 11, 2014

“सकारात्मक उपायों से,संस्कारों के माध्यम से ही सोच में परिवर्तन आ सकता है “.- बड़ी सटीक और उचित बात कही ,अंतिम पंक्ति में पूरा सार समाया है . बहुत बहुत बधाई निशा जी . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    nishamittal के द्वारा
    March 12, 2014

    आभार मीनाक्षी विशेष प्रयास के साथ लेख पढने व कमेन्ट देने के लिए

yogi sarswat के द्वारा
March 11, 2014

नारी का महत्व स्वयं नारी समझे और जीवन के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने. ., नारी जागृति की सार्थकता तभी है जब गाँव गाँव तक ये सन्देश यथार्थ में पहुंचे कि समाज का ,देश का उत्थान ,विकास तभी संभव है जब आधी आबादी भी तन -मन- धन से देश के विकास में अपना सक्रिय सम्पूर्ण योगदान दे सके शिक्षित नारी ही सुखी,स्वस्थ,नियोजित और शिक्षित परिवार का महत्व समझ सकती है,तथा देश की अधिकांश समस्याओं के समाधान में अपना योगदान दे सकती है सभी का साक्षर नहीं सुशिक्षित होना जरुरी है,.. . और इसके लिए निरंतर प्रयासरत रहना जरुरी है. .परिवार में भी उसके योगदान को सम्मान देना होगा.आदरणीय निशा जी मित्तल , हमेशा की तरह सारगर्भित लेख. नर और नारी में तार्किक विश्लेषण सटीक है.! महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ! काश ! कोई पुरुष दिवस भी मनाता !

    nishamittal के द्वारा
    March 11, 2014

    अरे भई पुरुष दिवस ही तो मनता है रोज हा हा हा

ashokkumardubey के द्वारा
March 11, 2014

निशा जी हर बार कि तरह इस बार भी आपका आलेख अति महत्वपूर्ण, शिक्षाप्रद,प्रेरणादायी है .आपने समस्या से लेकर समाधान तक सभी पहलुओं को क्रमबद्ध तरीके से बताया है जो सराहनीय है आपका लेख पढ़कर बहुत कुछ जानने समझने का अवसर मिला आभार .

    nishamittal के द्वारा
    March 11, 2014

    आदरनीय दुबे जी आभार ,आप सभी विद्वान् है मैं क्या समझाऊंगी आंकडें एकत्र कर अपनी बात को स्पष्ट करने का प्रयास किया है बस

sumit के द्वारा
March 10, 2014

बधाई मेम

    nishamittal के द्वारा
    March 10, 2014

    धन्यवाद सुमित

jlsingh के द्वारा
March 10, 2014

औपचारिक शिक्षा कार्यक्रम का एक आवश्यक अंग नारी जागृति व उत्थान का सन्देश व्यवहारिक रूप में जन जन तक पहुँचाने के लिए योजनाबद्ध कार्यक्रम तैयार कर इस कार्यक्रम को मूर्तरूप प्रदान किया जा सकता है.अंतरात्मा की आवाज़ को सुन कर ही कोई कार्य व्यक्ति सफलता पूर्वक करता है,अन्यथा तो बचाव के ढेरों रास्ते निकाल लिए जाते हैं.सकारात्मक उपायों से,संस्कारों के माध्यम से ही सोच में परिवर्तन आ सकता है. आदरणीया, सर्वप्रथम दैनिक जागरण में इस आलेख के मुख्यांश छपने पर बधाई! आपका आलेख अपने आप में सम्पूर्ण है ..एक और आंकड़े बताते हैं कि महिला अधिकारी या कर्मचारी कम लोलुप, या कम भ्रष्ट होती हैं (अपवाद हर जगह है), सेवा भवन इनके संस्कार में होता है …चाहे वे नर्स हों या विमान परिचारिका, रेस्पसनिस्ट हों या कॉल सेंटर में काम करने वाली, बैंकों में भी इनका कार्य और सेवा संतुष्टि प्रदान करता है. बाकी आपने सब कुछ लिख ही दिया है सादर अभिनन्दन!

    jlsingh के द्वारा
    March 10, 2014

    सेवा भवना इनके संस्कार में होता है …चाहे वे नर्स हों या विमान परिचारिका, रिसेप्सनिस्ट हो या काउंटर पर सेवा प्रदान करने वाली….. हिज्जे की अशुद्धि टंकण दोष समझ, भाव को समझें!

    nishamittal के द्वारा
    March 10, 2014

    सिंह साहब,आभार सर्वप्रथम सूचना देने हेतु.मैंने ये नहीं कहा कि महिला अधिकारी या कर्मचारी कम लोलुप, या कम भ्रष्ट होती हैं (अपवाद हर जगह है), .अपितु मेरा मानना है कि नारी का कार्यक्षेत्र तुलनात्मक रूप से व्यापक है और उसने अपनी क्षमता का प्रदर्शन भी किया है परन्तु उसकी दूसरी तस्वीर जो ब्लॉग के उत्तराद्ध में है बहुत अपमानजनक है .

    nishamittal के द्वारा
    March 10, 2014

    जी हाँ आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 10, 2014

नारी के सम्पूर्ण अस्तित्व ,(प्राचीन काल से वर्तमान काल तक )का,पूज्या से प्रताडिता तक की यात्रा का क्रमानुगत उल्लेख एवं समस्या एवं समाधान पर निष्पक्ष अभिव्यक्ति ,आपके विचारों से सहमत ही नहीं अतिशय प्रभावित भी हूँ ,उत्कृष्ट आलेख निशाजी ,सादर आभार

    nishamittal के द्वारा
    March 10, 2014

    निर्मला जी आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ .आपकी रचना सदा सराहनीय और भावपूर्ण होती है.

Rajesh Dubey के द्वारा
March 10, 2014

हमेशा की तरह सारगर्भित लेख. नर और नारी में तार्किक विश्लेषण सटीक है.

    nishamittal के द्वारा
    March 10, 2014

    धन्यवाद मैंने यही प्रयास किया है दुबे जी ,सैद्धांतिक रूप से नारी सशक्त है पर व्यवहार में यथेष्ठ सशक्त नहीं

yamunapathak के द्वारा
March 10, 2014

आदरणीय निशा जी नमस्कार बहुत दिनों बाद आपका ब्लॉग मंच पर मिला आप का विश्लेषण और विषय की सर्वांगीण व्याख्या दोनों ही प्रभावित करती है निष्कर्ष से पूर्णतः सहमत हूँ साभार

    nishamittal के द्वारा
    March 10, 2014

    आभार आपका मेरी साईट में जागरण वाली कुछ गड़बड़ है वैसे शो ही नहीं हो रहा है अर्थात साईट हेंग है आपके कमेन्ट से आर्टिकल शो हुआ


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