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दोगला चेहरा (लघु कथा)

Posted On: 24 Mar, 2014 Others में

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Untitled-3r-jpgक्रोध में जलते हुए सिन्हा घर में घुसे ,तो पत्नी लता भी घबरा गयी .”क्या हुआ चेहरा क्योँ तमतमा रहा है”.

“तुम्हारी बेटी ने सारी सीमायें पार कर दी हैं ,आज फिर उसी लफंगे निखिल के साथ कार में बैठ कर कहीं जा रही थी “

“अरे कुछ काम होगा जब लड़के लडकियाँ साथ साथ काम करते हैं तो जाना भी पड़ता है” श्रीमती सिन्हा ने बेटी का पक्ष लेते हुए कहा “

“नहीं ,कल को कुछ ऊंच -नीच हो गयी तो समाज में मुहं दिखाने लायक भी नहीं रहेंगें हम “

बहुत देर से स्वयम पर नियंत्रण रखे हुए मिसिज सिन्हा के सब्र का बाँध आखिर टूट गया ,”और जब तुम दो जवान बच्चों के पिता हो कर भी ऑफिस में अपनी सेक्रेटरी के साथ पिकनिक और पिक्चर जा सकते हो ?  वो लडकी भी तो विवाह योग्य है  और किसी की बेटी भी .और तुम! अधेढ़ हो कर भी …………

सिन्हा साहब को काटो तो खून नहीं

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
March 31, 2014

सीख देती लघु कथा आदरणीय निशा मित्तल जी !

    nishamittal के द्वारा
    March 31, 2014

    धन्यवाद योगी जी

Rajesh Dubey के द्वारा
March 31, 2014

सुन्दर लघु कथा.

    nishamittal के द्वारा
    March 31, 2014

    आभार राजेश जी

Ravinder kumar के द्वारा
March 30, 2014

निशा जी, नमस्कार. इस दुनिया में हर वस्तु जैसी दिखाई देती है वैसी है नहीं. इंसान भी वैसा ही है. आपकी लघु कथा इसी इंसानी फितरत को दिखाती है. आपकी कथा तो लघु है लेकिन जो सत्यता है उससे कथा बड़ी हो गई है. आपको बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    March 31, 2014

    बहुत बहुत आभार आदरनीय रविन्द्र जी

R K KHURANA के द्वारा
March 30, 2014

प्रिय निशा जी, समाज का आईना दिखाती एक बेहतरीन कथा ! राम कृष्ण खुराना

    nishamittal के द्वारा
    March 30, 2014

    आभार आदरनीय खुराना जी

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 29, 2014

ये लघु कथा बड़ी बात कह गयी निशा जी …पुरुष और नारी दोनों को सामान दृष्टि से देखना और सम्मान करना तो चाहिए ही … सुन्दर भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    March 29, 2014

    आभार शुक्ल जी

abhishek shukla के द्वारा
March 29, 2014

प्रणाम मैम! हमेशा कि तरह बेहतरीन अभिव्यक्ति…..सादर

    nishamittal के द्वारा
    March 29, 2014

    आभार अभिषेक जी

OM DIKSHIT के द्वारा
March 28, 2014

निशा जी, नमस्कार. बहुत सुन्दर और यथार्थ.

    nishamittal के द्वारा
    March 29, 2014

    आभार दीक्षित जी

yamunapathak के द्वारा
March 28, 2014

ऐसे प्रश्न ज़ायज़ हैं तभी समाज की दिशा सही तय होगी. निशा जी बहुत सुन्दर ब्लॉग

    nishamittal के द्वारा
    March 28, 2014

    धन्यवाद यमुना जी

meenakshi के द्वारा
March 27, 2014

विचारणीय और शिक्षाप्रद रचना. निशा जी बहुत – २ धन्यवाद !

    nishamittal के द्वारा
    March 28, 2014

    धन्यवाद मीनाक्षी जी

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 27, 2014

यथार्थ चित्रण सीख देती कथा

    nishamittal के द्वारा
    March 28, 2014

    धन्यवाद मदन जी

sanjay kumar garg के द्वारा
March 25, 2014

चिंतन योग्य लघु कथा ! आदरणीया निशा जी, आभार!

    nishamittal के द्वारा
    March 25, 2014

    धन्यवाद संजय जी

sadguruji के द्वारा
March 25, 2014

लघु परन्तु वृहद् विचारणीय और शिक्षाप्रद रचना.इस लघुकथा को पढ़कर बहुत अच्छा लगा.आप को बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    March 25, 2014

    आभार महोदया सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु

jlsingh के द्वारा
March 25, 2014

ऑंखें खुली या खुली रह गयी, मिस्टर सिन्हा की? वही तो! बहुत ही उपयुक्त लघुकथा आदरणीया!

    nishamittal के द्वारा
    March 25, 2014

    आभार सिंह साहब

March 24, 2014

SAHI JAWAB DIYA SHRIMATI JI NE .NICE

    nishamittal के द्वारा
    March 25, 2014

    धन्यवाद शालिनी जी

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 24, 2014

आदरणीया निशा जी, ये लघु नहीं अति लघु कथा अथाह अर्थो को खुद में समेटे हुए थी..एक ऐसा विषय जिसपर बहुत बड़ा लेख लिखा जा सकता था..मगर बहुत ही सुन्दर तरीके से आपने चंद लाइनों में ही सब कह दिया.. 5 point =आकाश तिवारी=

    nishamittal के द्वारा
    March 25, 2014

    धन्यवाद आकाश जी एक विडंबना है समाज की उसी को लघु कथा के माध्यम से अभिव्यक्त किया है


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