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अनोखी वसीयत (पर्यावरण दिवस 5जून पर लघु कथा)

Posted On: 4 Jun, 2014 Others में

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विकास की बयार में राघव प्रसाद का छोटा हराभरा गाँव परिसीमन के कारण शहरी सीमा में आ गया था. जीवन के अंतिम प्रहर की ओर अग्रसर , राघव प्रसाद प्रसन्न थे ,अपने गाँव के विकसित होने के समाचार से, परन्तु उनको चिंता थी कि हरे-भरे गाँव का पुरस्कार जीत चुका उनका गाँव अब कंक्रीट का जंगल न बन जाए

. .गाँव में बहुत अधिक जमीन - जायदाद के स्वामी राघव प्रसाद सिद्धांतो के कट्टर  थे.,चिंता का एक समाचार ये भी था कि उनकी सम्पत्ति में से एक बड़े भूखंड पर लगे बहुत सारे पेड़ ,जिनको बेच कर उनके  दोनों पुत्र वहाँ एक  शोपिंग माल बना कर और अधिक धनी होने के स्वप्न देख  रहे थे.  उन  पेड़ों को  राघव प्रसाद संतान  तुल्य ही मानते थे अतः पेड़ों को काटना ! ये पाप , उनका अंतर्मन स्वीकार नहीं का रहा था. इसका कारण था उनके संस्कारों की गहरी और मजबूत जड़ें .poudhaa

धनी परिवार के चिराग राघव का जन्मदिन प्रारम्भ से ही  बड़े धूमधाम से मनता था प्रतिवर्ष ,गरीबों को अन्न-वस्त्र वितरण , ब्राह्मणों द्वारा पूजन,यज्ञ और दान दक्षिणा देना और सामूहिक भोज .कक्षा पांच के विद्यार्थी थे, जब उनको उनके वृद्ध  गुरु जी  ने उनके जन्मदिवस पर उपहार स्वरूप एक  आम का पौधा उपहार में दिया था ,अपने गुरु जी का   का बहुत सम्मान करते थे .बालक राघव ने  गुरु जी से पूछा “मुझको इसका क्या करना है “,गुरु जी ने उनको समझाया “इसको मेरा आशीर्वाद और अपना मित्र मानो प्रतिदिन पानी स्वयम दो  और इसका पूरा ध्यान रखो ,तुम इसकी ही भांति सदा फूलो फलोगे”.
ये सूत्र राघव के जीवन का सूत्र बन गया .धीरे धीरे पौधा बड़ा हो गया और राघव के पिता ने उसको घर के पीछे जमीन में लगवा दिया. परन्तु राघव निरंतर उसका ध्यान रखते .उसको बढ़ता देख कर उनको अत्याधिक प्रसन्नता मिलती.
कुछ समय पश्चात राघव के प्रिय गुरु जी का देहांत हो गया,राघव दुखी हुए परन्तु अब एक नियम बना लिया प्रतिवर्ष जन्मदिन पर एक पेड़ लगाने का.इस प्रकार आज घर के पीछे स्थित उस भूखंड पर बहुत सारे वृक्ष थे .
राघव जी ने पुत्रों को बुलाकर बहुत समझाया कि जमीन का उपयोग इस प्रकार करो कि उसका लाभ तो मिले पर पेड़ न कटें.अनमने मन से पुत्रों ने हाँ तो कर दी पर पिता आश्वस्त नहीं हुए .इसी उधेड़ बुन में खोये सारी रात सो नहीं सके. .अंततः अपने वकील को बुला कर उन्होंने एक वसीयत तैयार की जिसके अनुसार उस बड़े भूखंड को अपने गुरु जी की स्मृति में एक सुन्दर उद्यान बना कर निगम को भेंट कर दिया,शेष सम्पत्ति पुत्रों के नाम कर दी और उद्यान की व्यवस्था की जिम्मेदारी निगम +पुत्रों को सौंप दी   .

अपने पुत्रों को उन्होंने कहा कोई पिता संतान का सौदा नहीं कर सकता अतः उन पेड़ों को कटवाने की अनुमति मैं नहीं दे सकता.तुम्हारे लिए शेष सम्पत्ति पर्याप्त है, शेष परिश्रम करो और कमाओ.मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम और सच्ची श्रद्धांजली यही होगी कि उस उद्यान में प्रतिवर्ष मेरी पुण्य तिथि  और विशिष्ठ अवसरों पर  पेड़ लगाते रहो और उद्यान की देख-रेख करो .mn

अपनी वसीयत वकील को सौंप कर राघव जी को लगा कि अब वो शांति से अंतिम श्वास ले सकेंगें .

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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jyoti के द्वारा
July 18, 2014

काश ऐसी वसीयत हर कोई करे !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 7, 2014

उन्होंने एक वसीयत तैयार की जिसके अनुसार उस बड़े भूखंड को अपने गुरु जी की स्मृति में एक सुन्दर उद्यान बना कर निगम को भेंट कर दिया,शेष सम्पत्ति पुत्रों के नाम कर दी और उद्यान की व्यवस्था की जिम्मेदारी निगम +पुत्रों को सौंप दी . सुन्दर सन्देश ,,,,, लोग अगर ऐसा ध्यान रखें तो हरित क्रांति हो ही जाए पर्यावरण क्यों सब के लिए आपदा लाये आइये पेड़ बचाएं पेड़ लगाएं आजकल तो बाहर घूमते हम भी पेड़ नहीं लगा पा रहे पहले बाग़ बगीचे तैयार किये थे भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    June 8, 2014

    आभार शुक्ल जी वृक्षारोपण का अभियान जारी रखिये

Abhsihek के द्वारा
June 6, 2014

अति सुन्दर बधाई

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2014

    धन्यवाद अभिषेक जी

deepak pande के द्वारा
June 6, 2014

MUJHE TO IS KAHANI ME SACHCHAI NAJAR AATI HAI SUNDER RACHNA ADARNIYA NISHA JEE

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2014

    आभार दीपक पाण्डेय जी

June 6, 2014

bahut mushkil hai aisee vasiyat kyonki aadmi putr-moh se nikal nahi pata kintu agar aisa ho jaye to hamara paryavaran bach jayega .nice story .thanks nisha ji .

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2014

    धन्यवाद शालिनी जी सही कहा आपने पुत्रमोह के चलते मातापिता कठोर कदम नहीं उठाते परन्तु अपवाद सर्वत्र हैं

sadguruji के द्वारा
June 5, 2014

बहुत प्रेरक और उपयोगी रचना.आपको बहुत बहुत बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    June 5, 2014

    आभार आपका

yogi sarswat के द्वारा
June 5, 2014

ये एक नयी सोच है ! संभव है आपकी कहानी एक कल्पना मात्र हो किन्तु ये जो सन्देश देती है वो बहुत ही सार्थक और विशिष्ट है आदरणीय निशा जी मित्तल ! लोग धन दौलत की वसीयत करते हैं एक भूखंड की , वृक्ष की , बाग़ की इससे बेहतर केयर नही हो सकती ! ये एक नया विचार दिया है आपने , अनुकरणीय !

    nishamittal के द्वारा
    June 5, 2014

    धन्यवाद लघु कथा पसंद करने के लिए योगी जी

Ravinder kumar के द्वारा
June 4, 2014

निशा जी, नमस्कार. बेहतरीन लघुकथा के लिए आपको बधाई. ऐसी शिक्षाप्रद कथाएं लिखते रहिये.

    nishamittal के द्वारा
    June 5, 2014

    जी धन्यवाद रविन्द्र जी

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 4, 2014

अत्यंत रोचक एवं शिक्षाप्रद लघु कथा आदरणीय निशाजी ,हार्दिक बधाई .

    nishamittal के द्वारा
    June 5, 2014

    आभार निर्मला जी

meenakshi के द्वारा
June 4, 2014

निशा जी आने वाले ‘ पर्यावरण दिवस ‘ पर आपने सुन्दर और प्रेरक लघु कथा लिखी ..बहुत बहुत बधाई ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    nishamittal के द्वारा
    June 5, 2014

    धन्यवाद आपका


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