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कदम कदम पर दुशासन है आज (जागरण जंक्शन फोरम)

Posted On: 18 Jul, 2014 Others में

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नारी की सबसे बड़ी विडंबना बलात्कार ,जिस पर मैं अपना आक्रोश व्यक्त करने से स्वयम को  रोक नहीं पाती और विवश हो जाती हूँ लिखने को. बलात्कार एक ऐसा घातक (वर्तमान में )राज रोग जो पीडिता को   शारीरिक  रूप से ही नहीं ,मानसिक रूप से भी यंत्रणा पहुंचाता है उसका जीवन ही अभिशप्त बना डालता है..उसका व्यक्तित्व उपहास का विषय बन जाता है बच्चे बच्चे के लिए ,मीडिया उसको मसालेदार कहानी के रूप में प्रस्तुत करता है ,और पीडिता को  या तो दरिन्दे ही मार डालते हैं,अन्यथा वो जीते जी रोज मरती है जिन्दा रहने तक .

अभी बदायूं का काण्ड ,चार साल की बच्ची का रेप काण्ड,मुज़फ्फरनगर की वृद्धा  ,बिहार ,दिल्ली के काण्ड ही टीस पहुंचा रहे थे, कि फिर खून खौल उठा ,लखनऊ के इस  बर्बर काण्ड के विषय में सूचना मिलते ही.मीडिया की सुर्खियाँ बनने का एक और विषय,राजनीति की चाले खेलने का अवसर नारी संगठनों की चीख -पुकार ! पर कब तक बस कुछ ही दिन ,कोई नियंत्रण नहीं लगेगा,नारी न कभी सुरक्षित रही ,न आज है और न हो सकेगी.

नारी पाशित
आसुरी भुजपाश
मुक्ति की आस

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ का समाचार पढ़ा ऊफ सच में कैसे दरिन्दे भरे पड़े हैं ,दिल्ली की निर्भया काण्ड की पाशविकता को भी मात करती घटना.अभी बदायूं की लटकती लाशों ने ये प्रमाणित किया था ,सच में जिन्दा लाश ही तो  बन रही है  नारी .दिन -रात,सुबह-शाम,घर-बाहर स्कूल,कार्यस्थल कहाँ नारी स्वयम को सुरक्षित मान सकती है.

कहाँ तक गिनेंगें ,उन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का क्या   जिनकी जानकारी भी नहीं मिलती चुप्पी साध ली जाती है ,मुहँ पर पट्टी बाँध ली जाती है. आखिर इज्जत का सवाल है ,कौन सी इज्जत और किसकी इज्जत .क्या भविष्य है निश्चित रूप से कितनी ही शिक्षित ,आत्मनिर्भर हो जाय नारी इस विषैले दंश से उसकी रक्षा करने वाला कोई कृष्ण नहीं है.

दुशासन तो समाज में सदा ही रहे हैं वो दुशासन भी कोई गैर नहीं था ,पांचाली का देवर ही था और समाज मूक दर्शक बना रहा था. आज ये दुशासन घर घर हैं और कृष्ण  कोई नहीं. नारी कैसे मुक्त हो दरिंदों से .

एक अबोध बालिका जो शायद इस जघन्य,क्रूर कर्म बलात्कार के शब्दार्थ को समझती भी नहीं,कोई वहशी,विकृत मानसिकता वाला पापी,कदाचारी उसका जीवन नष्ट कर दे तो क्या होगा उसका भविष्य?,बलात्कार ऐसा निकृष्ट दुष्कर्म,है, जो हैवानियत की पराकाष्ठा है. एक युवती जिसके माता-पिता उसके विवाह के स्वप्न संजो रहे हों,ऑफिस से लौटती कोई लडकी ,विवाहित महिला जो ट्रेन में यात्रा कर रही हो खेतों में काम करती ,पहाड़ों पर लकड़ी या घास काटने जाती महिला ,प्रौढ़ा जो स्वयं को सुरक्षित समझती हो परन्तु इन नराधमों के चंगुल में फंस दुष्टों को हंसने और स्वयं नारी के जीवन को अभिशाप बनाकर घुट घुट कर जीने को विवश कर देता है ? क्या हम आदिम युग में जी रहे हैं?

प्राय पढ़ते हैं कि ५ वर्ष से भी कम की बच्ची को किसी वहशी ऩे अपनी हवस का शिकार बना लिया.कितना लज्जास्पद और घृणित होता है,यह सुनना, पढना या पता चलना कि रक्षक ही भक्षक बन बैठे. शराब के नशे में पिता या पितृवत चाचा,भाई,मामा ,श्वसुर,ज्येष्ठ अपने कलेजे के टुकड़े को ,,अपनी गोदी में खिलाकर अपनी ही बच्ची ,छोटी बहिन,भतीजी,वधू का जीवन बर्बाद करने वाले बन गये.

यद्यपि कोई भी सजा,कोई भी आर्थिक सहारा किसी पीडिता का जीवन तो नहीं संवार सकता,तथापि    बलात्कार के अपराधी को जिस  कठोर दंड की संस्तुति की जाती है,वह है,फांसी, या फिर उसका जीवन भी अभिशप्त बना दिया जाय. (यद्यपि वर्तमान स्थिति में )फांसी से अपराध तो खत्म होगा नहीं ,क्योंकि  हमारे देश में फांसी की सजा लागू होने में वर्षों व्यतीत हो जाते हैं,और इतने समय पश्चात तो आम आदमी की स्मृति से वो घटनाएँ धूमिल होने लगती हैं. अतः क़ानून कठोरतम हो और उसका अनुपालन सुनिश्चित किया जाय बिना भेद भाव के.

कठोरतम क़ानून ,त्वरित न्याय,जिसके अंतर्गत ऐसी व्यवस्था हो कि न्याय अविलम्ब हो. सशस्त्र महिला पुलिस की संख्या में वृद्धि,अपनी सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले पुलिस कर्मियों का निलंबन ,सी सी  टी वी कैमरे ,निष्पक्ष न्याय मेरे विचार से सरकारी उपाय हो सकते हैं.जब तक हमारे देश में न्यायिक प्रक्रिया इतनी सुस्त रहेगी अपराधी को कोई भी भय नहीं होगा,सर्वप्रथम तो इस मध्य वो गवाहों को खरीद कर या अन्य अनैतिक साधनों के बल पर न्याय को ही खरीद लेता है .अतः न्यायिक प्रक्रिया में अविलम्ब सुधार अपरिहार्य है., अन्यथा तो आम स्मृतियाँ धूमिल पड़ने लगती हैं और सही समय पर दंड न मिलने पर पीडिता और उसके परिवार को तो पीड़ा सालती ही है,शेष  कुत्सित मानसिकता सम्पन्न अपराधियों को भी कुछ चिंता नहीं होती.दंड तो उसको मिले ही साथ ही उस भयंकर दंड का इतना प्रचार हो कि सबको पता चल सके

महिलाओं की आत्मनिर्भरता ,साहस और कोई ऐसा प्रशिक्षण उनको मिलना चाहिए कि छोटे खतरे का सामना वो स्वयम कर सकें ,विदेशों  की भांति उनके पास मिर्च का पावडर या ऐसे कुछ अन्य आत्म रक्षा के साधन अवश्य होने चाहियें.

मातापिता को भी ऐसी परिस्थिति में लड़की को संरक्षण अवश्य प्रदान करना चाहिए.साथ ही संस्कारों की घुट्टी बचपन से पिलाई जानी चाहिए,जिससे  आज जो वैचारिक पतन  और एक दम माड बनने का जूनून जो लड़कियों पर हावी है,उससे वो मुक्त रह सकें.

ऐसे पुत्रों का बचाव मातापिता द्वारा किया जाना पाप हो अर्थात मातापिता भी ऐसी संतानों को सजा दिलाने में ये सोचकर सहयोग करें  कि यदि पीडिता उनकी कोई अपनी होती तो वो अपराधी के साथ क्या व्यवहार करते ,साथ ही सकारात्मक संस्कार अपने आदर्श को समक्ष रखते हुए बच्चों को  दिए जाएँ..

एक महत्वपूर्ण तथ्य और ऐसे अपराधी का केस कोई अधिवक्ता न लड़े ,समाज के सुधार को दृष्टिगत रखते हुए अधिवक्ताओं द्वारा  इतना योगदान आधी आबादी के  हितार्थ देना एक योगदान होगा.

जैसा कि ऊपर लिखा भी है पतन समाज के सभी क्षेत्रों में है,अतः आज महिलाएं भी  निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर या चर्चित होने के लिए  कभी कभी मिथ्या आरोप लगती हैं,ऐसी परिस्थिति में उनको भी सजा मिलनी चाहिए.

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
July 24, 2014

आजकल समाज के अवांछनीय तत्वों को पुलिस और कानून का कोई डर नहीं ,पुलिस और कानून ही गंदा है आज का | वर्दीधारी और सफेदपोश भी इसमें लिप्त हैं | गुनहगारों की संख्या बहुत अधिक है और सभ्य लोगों की बहुत कम | इन पहलुओं पर बड़े -बड़े लोग भी मौन होकर,मूर्खवत् आचरण कर रहे | इस देश के आध्यात्मिक गुरु ,योग गुरु ,कथाकार ,जगद्गुरु,पीठाधीस्वर सब इन अपराधों पर कुछ बोलने में असमर्थ हैं | बस अच्छा खाओ और अच्छे से सोओ | राज्यपाल और मंत्रियों के बंगलों से लड़कियाँ निकलती हैं,उनकी वाणी में इतनी सामर्थ्य कहाँ,कुछ कह सके ऐसे गंभीर अपराध के ऊपर |

    nishamittal के द्वारा
    July 24, 2014

    सही कहा विकृत मानसिकता और नारी अपमानित पल पल

sudhajaiswal के द्वारा
July 23, 2014

आदरणीया निशा जी, बहुत ही सार्थक और विचारणीय लेख| आपके विचारों से पूर्ण सहमत हूँ|

    nishamittal के द्वारा
    July 24, 2014

    धन्यवाद सहमती के लिए

yogi sarswat के द्वारा
July 22, 2014

एक सामान्य व्यक्ति , ऐसे घिनोने कुकृत्यों को पढता है , सुनता है तो वो ये नहीं समझ पाता की वो क्या करे ? ये इक्कीसवीं नहीं शायद छथि सातवीं सदी है , जहां न कोई कनून का डर है और न समाज का !

    nishamittal के द्वारा
    July 22, 2014

    कौन से क़ानून का डर योगी जी जो अंधा बहरा है जो सच के सा,मने होते हुए भी बिक जाता है हाँ असमंजस की स्थिति सबके सामने है

sadguruji के द्वारा
July 22, 2014

दुशासन तो समाज में सदा ही रहे हैं वो दुशासन भी कोई गैर नहीं था ,पांचाली का देवर ही था और समाज मूक दर्शक बना रहा था. आज ये दुशासन घर घर हैं और कृष्ण कोई नहीं. नारी कैसे मुक्त हो दरिंदों से ! आदरणीया निशा मित्तल जी ! एक बहुत बड़ी सच्चाई आपने बयान की है ! आपके लेख की जितनी भी तरफ की जाये वो कम है ! आज के समय में सरकार,पुलिस और अदालतों को ही कृष्ण की भूमिका निभानी होगी !

    nishamittal के द्वारा
    July 22, 2014

    आभार आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए

निःशब्द :(

    nishamittal के द्वारा
    July 21, 2014

    आपका बहुत बहुत आभार

sanjay kumar garg के द्वारा
July 20, 2014

बिलकुल सही लिखा है, मैं आप की बात से पूरी तरह सहमत हूँ! आदरणीया निशा जी!

    nishamittal के द्वारा
    July 21, 2014

    सहमति हेतु आभार

Anuj Kumar Karonsia के द्वारा
July 19, 2014

निशा मेम, किसी कारणवश JJ पर बहुत दिनों बाद आया हूँ. प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से आये दिनों घिनोने अपराध सुनने को मिलते है. आपने अपने लेख में इसके सामाजिक, मानशिक एवं क़ानूनी पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है. मै तो बस ये सोचता हूँ की कोई चमत्कार हो और मानव विकृति की ये अवस्था अचानक से गायब हो जाये…. http://anujkaronsia.jagranjunction.com/2014/07/16/%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%B0/

    nishamittal के द्वारा
    July 19, 2014

    आभार अनुज जी आपने अपना समय दिया आपके शोध के महत्वपूर्ण कार्य के लिए मेरी शुभकामनाएं

BHANWAR के द्वारा
July 19, 2014

जब तक महिलाएं खुद आत्म- रक्षा के लिए हथियार नहीं उठाएगी,यही सच है और तभी समाज बदलेगा | जब जब महिला ने शस्‍त्र उठाया हैं, समाज ने उनके आगे शीश झुकाया हैं,,,

    nishamittal के द्वारा
    July 19, 2014

    आभार महोदय

BHANWAR के द्वारा
July 19, 2014

बलात्‍कार जैसे घृणित कृत्‍यों के अपराधियों को कठोर से कठोर और जल्‍दी से जल्‍दी सजा मिलनी चाहिए, ऐसे घृणित कार्य करने वालो को फांसी की सजा आम चौराहों पर देनी चाहिए, साथ ही महिलाओं को आत्मनिर्भरता और साहस के साथ ऐसे दुराचारियों को सामना करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए, कि ऐसे खतरों का सामना वो स्वयं कर सकें, तथा महिलाओं को भी डटकर उनका विरोध करना चाहिए, किसी व्‍यक्ति द्वारा ऐसे अपराधियों को बिलकुल भी सहयोग नहीं करना चाहिए फिर चाहे वो कोई भी रिश्‍तेदार ही क्‍यों न हो। कभी कभी आरोप मिथ्‍या भी लगते हैं, ऐसी परिस्थ्‍ितियों में उनको भी सजा मिलनी चाहिए । साथ ही बच्‍चो को सकारात्मक संस्कार भी दिए जाएँ ।

    nishamittal के द्वारा
    July 19, 2014

    विचार सहित प्रतिक्रिया पढ़ कर अच्छा लगा धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
July 18, 2014

दुशासन तो समाज में सदा ही रहे हैं वो दुशासन भी कोई गैर नहीं था ,पांचाली का देवर ही था और समाज मूक दर्शक बना रहा था. आज ये दुशासन घर घर हैं और कृष्ण कोई नहीं. नारी कैसे मुक्त हो दरिंदों से . तब भीष्म पितामह, गुरु द्रोण आदि धृष्टरात्र बने हुए थे आज हम सभी धृतराष्ट बने हुए हैं … ज़ी न्यूज़ ने विभिन्न शहरों में ऑपरेशन धृष्टराष्ट्र चलाया और पता चला की हर कोई ही धृतराष्ट है ऐसे समाज में सुधर की आशा कैसे की जा सकती है जबतक महिलाएं खुद आत्म- रक्षा के लिए हथियार नहीं उठाएगी …न्यायालय को भी हम सभी देख रहे हैं … बहरहाल हम सबको सोचने और कुछ करने की जरूरत है…. सादर

    PKDUBEY के द्वारा
    July 19, 2014

    जबतक महिलाएं खुद आत्म- रक्षा के लिए हथियार नहीं उठाएगी,यही सच है और तभी समाज बदलेगा |

    nishamittal के द्वारा
    July 19, 2014

    आभार सिंह साहब समय देने हेतु नियम क़ानून कितने ही कठोर क्योँ न हों जब तक उनका अनुपालन निष्पक्ष रूप से व्यवहार में नहीं होगा कैसे आशा की जा सकती है.

    nishamittal के द्वारा
    July 19, 2014

    धन्यवाद दुबे जी


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