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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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आओ लिखें मिलकर आजादी की नयी कहानी (जागरण जंक्शन)

Posted On: 14 Aug, 2014 Others में

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स्वाधीनता दिवस मनाने का उत्साह मुझको बचपन से ही रहा है  अपने विद्यार्थी जीवन से ही सदा ही इन उत्सवों में भाग लिया . तद्पश्चात भी  बच्चों को यही बताया कि आज के दिन .हमारा देश आजाद हुआ था अंग्रेजों से ,और हम आज़ादी का बर्थडे मना  रहे हैं ऐसा कहकर उनमें  भी यही भावना व संस्कार विकसित किये …”ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम ,सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं,ऐ मेरे वतन के लोगों “आदि देश भक्ति के गीत सभी देशवासियों के ह्रदय में ,देश के लिए मर मिटने का जोश पैदा करते हैं.आज जब इसी स्वाधीनता दिवस की 67 वी वर्षगाँठ हम मनाने जा रहे हैं,तो उत्साह तो है,पर कुछ ज्वलंत प्रश्न भी स्वर्गीय श्री राजीव दीक्षित के व्याखानों को पढकर मन में उत्पन्न हुए जिनका कोई संतोषजनक  उत्तर मुझको नहीं मिला.आप के समक्ष उन विचारों का कुछ अंश प्रस्तुत कर रही हूँ. जो राजीव जी के किसी मित्र द्वारा शेयर किये गए हैं ……………………..

“आपने देखा होगा कि परम सम्मानीय भाई राजीव दीक्षित जी बराबर सत्ता के हस्तांतरण के संधि के बारे में बात करते थे और आप बार बार सोचते होंगे कि आखिर ये क्या है ? परम सम्मानीय भाई राजीव दीक्षित जी के अलग अलग व्याख्यानों में से इन सब को जोड़ के आप लोगों के लिए सत्ता के हस्तांतरण के संदर्भ में लेख प्रस्तुत है ,आशा है सभी इन विचारों से प्रभावित होंगें

सत्ता के हस्तांतरण की संधि (Transfer of Power Agreement)
( Transfer of Power Agreement ) अर्थात भारत की आज़ादी की संधि ।ये इतनी खतरनाक संधि है की अगर आप अंग्रेजों द्वारा सन 1615 से लेकर 1857 तक किये गए सभी 565 संधियों या कहें साजिश को जोड़ देंगे तो उस से भी ज्यादा खतरनाक संधि है ये 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई बल्कि ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट हुआ था पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में ।Transfer of Power और Independence ये दो अलग चीजे है ।स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग चीजे है ।और सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ? आप देखते होंगे क़ि एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में हार जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है, आप लोगों में से बहुतों ने देखा होगा, तो जिस रजिस्टर पर आने वाला प्रधानमन्त्री हस्ताक्षर करता है, उसी रजिस्टर को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की बुक कहते है और उस पर हस्ताक्षर के बाद पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है ,और पुराना प्रधानमंत्री निकल कर बाहर चला जाता है ।

यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात को 12 बजे । लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया ।कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ? अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ?और हमारे लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? ये भी समझ लीजिये ।अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया, माने अंग्रेजों ने अपना राज तुमको सौंपा है ताकि तुम लोग कुछ दिन इसे चला लो जब जरुरत पड़ेगी तो हम पुनः आ जायेंगे । ये अंग्रेजो का interpretation (व्याख्या) था ।और हिन्दुस्तानी लोगों की व्याख्या क्या थी कि हमने स्वराज्य ले लिया ।और इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए और भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं ।ये Dominion State का अर्थ हिंदी में होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य, ये शाब्दिक अर्थ है और भारत के सन्दर्भ में इसका असल अर्थ भी यही है ।अंग्रेजी में इसका एक अर्थ है “One of the self-governing nations in the British Commonwealth” और दूसरा “Dominance or power through legal authority “।Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है ।मतलब सीधा है क़ि हम (भारत और पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं।

दुःख तो ये होता है की उस समय के सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे या आप कह सकते हैं क़ि पूरे होशो हवास में इस संधि को मान लिया या कहें जानबूझ कर ये सब स्वीकार कर लिया ।और ये जो तथाकथित आज़ादी आयी, इसका कानून अंग्रेजों के संसद में बनाया गया और इसका नाम रखा गया Indian Independence Act यानि भारत के स्वतंत्रता का कानून ।और ऐसे धोखाधड़ी से अगर इस देश की आजादी आई हो तो वो आजादी, आजादी है कहाँ ? और इसीलिए गाँधी जी (महात्मा गाँधी) 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं आये थे ।वो नोआखाली में थे ।और कांग्रेस के बड़े नेता गाँधी जी को बुलाने के लिए गए थे कि बापू चलिए आप ।गाँधी जी ने मना कर दिया था ।क्यों ? गाँधी जी कहते थे कि मै मानता नहीं कि कोई आजादी आ रही है ।और गाँधी जी ने स्पष्ट कह दिया था कि ये आजादी नहीं आ रही है सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हो रहा है |और गाँधी जी ने नोआखाली से प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी ।उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी जी ने ये कहा कि मै हिन्दुस्तान के उन करोड़ों लोगों को ये सन्देश देना चाहता हूँ कि ये जो तथाकथित आजादी आ रही है, ये मै नहीं लाया ।ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है ।मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है ।और 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी जी दिल्ली में नहीं थे नोआखाली में थे । भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था ।क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे ।(नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था असल बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही था) और 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई …. ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में ।

अब शर्तों की बात करता हूँ , सब का जिक्र करना तो संभव नहीं है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की जिक्र जरूर करूंगा जिसे एक आम भारतीय जानता है और उनसे परिचित है ……………

· इस संधि की शर्तों के मुताबिक हम आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं ।वो एक शब्द आप सब सुनते हैं न Commonwealth Nations ।ये Commonwealth का मतलब होता है समान सम्पति ।किसकी समान सम्पति ? ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति ।आप जानते हैं ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वो आज भी भारत की नागरिक है और हमारे जैसे 71 देशों की महारानी है वो ।Commonwealth में 71 देश है और इन सभी 71 देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को वीजा की जरूरत नहीं होती है क्योंकि वो अपने ही देश में जा रही है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ब्रिटेन में जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है क्योंकि वो दूसरे देश में जा रहे हैं।

· मतलब इसका निकाले तो ये हुआ कि या तो ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक है या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है इसलिए ब्रिटेन की रानी को पासपोर्ट और वीजा की जरूरत नहीं होती है अगर दोनों बाते सही है तो 15 अगस्त 1947 को हमारी आज़ादी की बात कही जाती है वो झूठ है ।और Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है न क़ि Independent Nation के रूप में।इस देश में प्रोटोकोल है क़ि जब भी नए राष्ट्रपति बनेंगे तो 21 तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अलावा किसी को भी नहीं ।लेकिन ब्रिटेन की महारानी आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? और पिछली बार ब्रिटेन की महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन की महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था मतलब हमारे देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक नहीं है ।ये है राजनितिक गुलामी, हम कैसे माने क़ि हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं ।एक शब्द आप सुनते होंगे High Commission ये अंग्रेजों का एक गुलाम देश दूसरे गुलाम देश के यहाँ खोलता है लेकिन इसे Embassy नहीं कहा जाता ।एक मानसिक गुलामी का उदहारण भी देखिये …….
भारत का नाम INDIA रहेगा और सारी दुनिया में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा और सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा ।हमारे और आपके लिए ये भारत है लेकिन दस्तावेजों में ये इंडिया है ।संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है “India that is Bharat ” जब क़ि होना ये चाहिए था “Bharat that was India ” लेकिन दुर्भाग्य इस देश का क़ि ये भारत के जगह इंडिया हो गया ।ये इसी संधि के शर्तों में से एक है ।अब हम भारत के लोग जो इंडिया कहते हैं वो कहीं से भी भारत नहीं है ।कुछ दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था अब किसका था याद नहीं आ रहा है उसमे उस व्यक्ति ने बताया था कि इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा और ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा अब उस शख्स के बात में कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जब तक भारत था तब तक तो दुनिया में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है ।

भारत के संसद में वन्दे मातरम नहीं गया जायेगा अगले 50 वर्षों तक यानि 1997 तक ।1997 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को संसद में उठाया (राजीव दीक्षित के कहने पर) तब जाकर पहली बार इस तथाकथित आजाद देश की संसद में वन्देमातरम गाया गया ।50 वर्षों तक नहीं गाया गया क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है ।और वन्देमातरम को ले के मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था ।इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के दिल को ठेस पहुचाये ।

उपरोक्त विचार सुने तो पूर्व में भी थे परन्तु उनपर मंथन नहीं किया था .आज जागरण द्वारा प्रस्तुत विषय पर ·मैं अपने ज्ञान वर्धन के लिए आपके समक्ष स्वाधीनता दिवस से सम्बद्ध विचार रख रही हूँ ,इनमें अनुचित क्या है? कुछ बंधु सहमत होंगे ,कुछ नहीं   क्यों इन विचारों से सत्ताधीश सहमत नहीं होते .इनमें जो कुछ भी गलत है कृपयामुझको अवश्य बताएं .

अब हमें वास्तविक आज़ादी चाहिए जहाँ कोई भूखा नग्न न रहे ,सबकी मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण हों,किसी किसान को आत्महत्या न करनी पड़े देश का धन देश के विकास में लगे और हम सिर उठाकर जी सके और दुनिया  में हम शीर्ष पर हों और मार्ग दर्शन करें एक सुन्दर ,सुखद भविष्य के लिए .

अमर उजाला  से  पूर्व में मिली एक जानकारी के अनुसार 15 अगस्त ,26 जनवरी ,2 अक्टूबर जिनको हम आज तक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते आ रहे हैं से सम्बन्धित कोई भी अभिलेख सरकार के पास नहीं है कि इन दिवसों को स्वतंत्रता दिवस ,गणतंत्र दिवस तथा महात्मा गाँधी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मान्यता कब से और कैसे मिली.

VIVISHVGURU2





अंत में मेरा कहना यही है कि जो पूर्व में हुआ उस पर हमारा कोई वश नहीं लेकिन अब जबकि सत्ता अपने हाथ में है तो और हम इस समस्त घटनाक्रम को दुर्भाग्य पूर्ण भी मानते हैं तो क्या अब इस दिशा में प्रयास करके कुछ सुधार तो कर सकते हैं
अपनी भाषा का सर्वमान्य समाधान सर्व सहमति से निकालना
अपने क़ानून के अनुसार न्याय
अपने महापुरुषों ,क्रांतिकारियों से परिचित कराना ,उनके विषय में बिना किसी राजनीती के जानकारी पाठ्क्रमों में सम्मिलित कर आने वाली पीढ़ियों में उनके प्रति सम्मान उत्पन्न करना .

अपनी गौरवशाली संस्कृति के प्रति सम्मान और उनकी कमियों से शिक्षा ग्रहण करना उदाहरणार्थ बांटो और राज करो की नीति,जिसको हमने अंग्रेजों से सीखा और आज उसी का अनुसरण कर रहे हैं. आगे बढना है तो इस दुश्चक्र से बचना होगा तभी हम वास्तव में आज़ाद होंगे,.आर्थिक,राजनैतिक,सामाजिक सभी क्षेत्रों में .
अतः निवेदन सभी से कि इस 15 अगस्त को हम इतना तो सुनिश्चित कर ही सकते हैं कि अब  पीछे लौटना तो सम्भव नहीं पर आगे तो  ऐसी राह पर चलने का निश्चय करें जो हमारे अपने परिवेश,संस्कृति के अनुरूप हो,देश त्वरित गति से विकास करें और शीर्ष पर पहुँच सके.और देश विश्व गुरु का गौरव पा सके
(उपरोक्त विचार नेट से लिए गये हैं मैं अपनी जानकारी बढानी चाहती हूँ विज्ञजन कुछ सुझाव आज़ादी को साथक बनाने के लिए दें ,उपरोक्त लेखआवश्यक संशोधन के साथ पुनःप्रकाशित कर रही हूँ .)

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajeev Varshney के द्वारा
August 25, 2014

आदरणीय निशा जी आपका आलेख आज़ादी की वास्तविकता से देश को रूबरू करने वाला है. डोमोनिक लेपियर एवं लेरी कोलिन्स द्वारा लिखित पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट के अनुसार बंगाल में विभाजन के उपरान्त फैले दंगो को रोकने के लिए नेहरु और माउन्ट बेटन के आग्रह पर गाँधी जी वहां गए थे. हो सकता है की ट्रान्सफर ऑफ़ पावर एग्रीमेंट पर गाँधी जी कोई विरोध ना करे इसलिए नेहरु और माउन्ट बेटन ने उन्हें वहां भेज दिया हो.  श्री लंका जैसे छोटे से देश ने अंग्रेजों के दिए नाम सीलोन से मुक्ति पा ली किन्तु हम अभी भी इंडिया से पीछा नही छुड़ा पा रहे.  देश को वास्तविक आज़ादी तब मिलेगी जब देशवासी देश के प्रति अपने कर्तव्य जानेंगे.  गंभीर एवं विचारशील आलेख के लिए साधुवाद. सादर राजीव वार्ष्णेय

    nishamittal के द्वारा
    August 26, 2014

    आभार राजीव जी जानकारी में वृद्धि करने के लिए

चर्चित चित्रांश के द्वारा
August 23, 2014

साधुवाद्…!!!

    nishamittal के द्वारा
    August 26, 2014

    धन्यवाद चर्चित जी

deepak pande के द्वारा
August 21, 2014

अमर उजाला से पूर्व में मिली एक जानकारी के अनुसार 15 अगस्त ,26 जनवरी ,2 अक्टूबर जिनको हम आज तक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते आ रहे हैं से सम्बन्धित कोई भी अभिलेख सरकार के पास नहीं है कि इन दिवसों को स्वतंत्रता दिवस ,गणतंत्र दिवस तथा महात्मा गाँधी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मान्यता कब से और कैसे मिली. aadarniya nisha jee in panktiyon par kahna chahunga kya jaroori hai sabka likhit roop me vivran ho kya kewal janta kaa atoot vishwas kaafi nahee hone ko to lihit me itna bada samvidhan aur kanoon hai par manane wale nahee isse achchha to england ka संविधान है jo likhit to nahee पर desh kee samprabhuta पर अटूट vishwas karne walo kee kamee nahee

yogi sarswat के द्वारा
August 21, 2014

भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था ।क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे ।(नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था असल बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही था) और 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई …. ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में । इतिहास भी उसी तरह से लिखा गया या ये कहा जाये की लिखवाया गया ! तो फिर सच कैसे सामने आ सकता था और किसी में उनकी सरकार के रहते इतनी हिम्मत भी नही हुई की प्रमाणित रूप से कोई ये कह सके की नेहरू ने सिर्फ प्रधानमन्त्त्री बन्नने के लिए इतना बड़ा खेल खेला था ! वन्देमातरम वाली बात बहुत नयी जानकारी देती है ! बहुत ही सटीक और ज्ञानवर्धक आलेख आदरणीय निशा जी मित्तल !

    nishamittal के द्वारा
    August 21, 2014

    योगी जी हार्दिक आभार सदा की भांति लेख को समय देने के लिए

Ravinder kumar के द्वारा
August 15, 2014

निशा जी, स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं. निशा जी, राजीव जी, के विचार हर भारतीय को सोचने के लिए विवश करते हैं. लेकिन जो बातें आपने राजीव जी की यहाँ रखी हैं, उनका ये अर्थ निकालना के भारत को पूर्ण आजादी नहीं मिली उचित नहीं होगा. जब कोई व्यक्ति ये दुनिया छोड़ कर जाता है तो उससे पहले वह कोशिश करता है के वो कोई निशानी इस दुनिया में छोड़ जाए. इसका मतलब ये तो नहीं के वो दुबारा हमारे बीच आ जाएगा. इसी प्रकार अंग्रेजों के लिए भारत छोड़ना एक कठिन निर्णय था. ये उनकी भारत में मौत थी. ऊपर जो भी चिंताएं राजीव जी ने रखी हैं वो एक मर चुके शासन की निशानी मात्र हैं. उनके होने और न होने से भारत की स्वतंत्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. भारत सरकार यदि चाहे तो इन्हें कभी भी समाप्त कर सकती है. ये भारत की इच्छाशक्ति के ऊपर है. बेहद विचारणीय लेख के लिए आपको बधाई. “अक्षर” पर भी आपकी प्रतीक्षा रहेगी.

    nishamittal के द्वारा
    August 15, 2014

    रविन्द्र जी अंग्रेज गये ,मेरा मानना है कि जिन परम्पराओं को हम आज तक ढो रहे हैं वो हमारी मानसिक गुलामी का प्रतीक होने के अतिरिक्त और क्या हैं.अब हम जब आज़ाद हैं तो क्योँ उन प्रतीकों को बदला नहीं गया ,बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले मैंने स्वयम अंत में लिखा है अंत में मेरा कहना यही है कि जो पूर्व में हुआ उस पर हमारा कोई वश नहीं लेकिन अब जबकि सत्ता अपने हाथ में है तो और हम इस समस्त घटनाक्रम को दुर्भाग्य पूर्ण भी मानते हैं तो क्या अब इस दिशा में प्रयास करके कुछ सुधार तो कर सकते हैं

jlsingh के द्वारा
August 15, 2014

आदरणीया, सादर अभिवादन और जय हिन्द! जय भारत ! आपका यह आलेख और श्री राजीव दीक्षित के विचार समीचीन हैं. आपके अंतिम अनुच्छेद से पूर्ण सहमति! अपनी गौरवशाली संस्कृति का विद्वतापूर्ण इस्तेमाल और समुचित विकास, संसाधनों का समुचित बटवारा, ,महिलाओं का,, गरीबों का, यथोचित सम्मान अत्यंत ही जरूरी है. पाश्चात्य सभयता का अंधानुकरण अंग्रेज़ी मानसिकता की ही गुलामी है …हमरे एक हिंदी शिक्षक ने भारत का अर्थ बताया था – भा में रत यानी भारत भा यानी चमक, प्रतिष्ठा,यश आदि! आपको (अभाशी) स्वतंत्रता दिवश की ढेर सारी बधाइयाँ!..सादर!

    nishamittal के द्वारा
    August 15, 2014

    अति सुन्दर प्रतिक्रिया सिंह साहब आभार उद्देश्य एक ही देश की उन्नति ,बस मार्ग भिन्न हो सकते हैं

Shobha के द्वारा
August 14, 2014

निशा जी मैं समझ सकती हूँ आपने बहुत मेहनत और अध्धयन के बाद यह लेख लिखा है पूरा लेख क्या नोलेज है मेने दो बार पढ़ कर समझा आखिर में आपने अपने लेख की विषय वस्तु को पाठकों पर उछाला है आपने अपने लेख को उदाहरण के साथ वास्तविकता से जोड़ा हैं मेरी भाषा और अभिव्यक्ति बहूत अच्छी नहीं है मेरी हर बात को आप ज्यादा में लें यह लेख स्टूडेंट्स के लिए बहूत लाभकारी हैं डॉ शोभा

    nishamittal के द्वारा
    August 15, 2014

    आदरणीया शोभा जी ,आपको अपनी अभिव्यक्ति के लिए संदेह क्योँ.आप सुन्दर लिखती हैं,सबमें सुधार निरंतरता से ही होता है,उसके लिए ये मंच सर्वथा उपयुक्त है.धन्यवाद आपका

sadguruji के द्वारा
August 14, 2014

” इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा और ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा ! ” ये बात सही लगती है ! “Bharat that was India ” ये सही वाक्य दर्ज करने के लिए सरकार संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करे ! यथार्थ जानकारी से भरा बहुत विचारणीय लेख ! मैंने भी स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के कई लेख पढ़ें हैं ! वे देश में स्वदेशी भावना का जागरण करने वाले एक बड़े क्रन्तिकारी थे ! देश का दुर्भाग्य है कि उन्हें सरकार द्वारा कोई महत्व नहीं दिया गया ! यदि सरकारी स्तर पर उनकी बात सुनी गई होती तो देश में एक बहुत बड़ी स्वदेशी क्रांति हो गई होती ! ये लेख स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी को एक श्रद्धांजलि अर्पण भी है ! बहुत बहुत धन्यवाद !

    nishamittal के द्वारा
    August 15, 2014

    आपका आभार आदरणीय दीक्षित जी पर पूर्व में लिख चुकी हूँ मैं.प्रतिक्रिया के लिए आभार आपका

pkdubey के द्वारा
August 14, 2014

राजीव दीक्षित जी को मैंने भी आस्था चॅनेल पर पतंजलि योगपीठ से सुना | अवश्य ही इन सब बातों को उन्देखा नहीं किया आज सकता,वर्तमान सरकार को यह सब सुधार अवश्य करना चाहिए |सादर आदरणीया |

    nishamittal के द्वारा
    August 15, 2014

    धन्यवाद दुबे जी


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