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अपनी भूमि पर पराई बनी हिंदी (हिंदी दिवस १४ सितम्बर पर विशेष )

Posted On: 11 Sep, 2014 Others में

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हिंदी दिवस पर हिंदी की वास्तविक स्थिति  कुछ  भिन्न स्वरूप में

किसी संयोगवश हिंदी और अंग्रेजी को साथ साथ भ्रमण करते हुए साथ रहने का अवसर मिला.अंग्रेजी जहाँ भारतवर्ष में अपनी गर्वोन्नत ग्रीवा के साथ इतराती हुई चल रही थी,तो संतोषी हिंदी कुछ अवसादग्रस्त दिख रही थी.,अचानक ही कुछ विशिष्ठ स्थानों पर  हिंदी आज अपना नाम सुनकर कुछ ठिठकीं .कुछ अजनबी से कुछ साहबी से लगने वाले सजे धजे पंडाल ,तम्बू ,हाल आदि में  में उसकी  जय जय कार हो रही थी ,पहले तो वह समझ ही नहीं पायी कि आज उल्टी गंगा कैसे बह रही है, कौन सा उत्सव है.परन्तु अचानक ही उसको याद आ गया कि 14  सितम्बर है अतः हिंदी दिवस मनाया जा रहा है .साथ चलती अंग्रेजी ने कुछ व्यंग्यात्मक शैली में दृष्टि उठाई और बोली ,बधाई हो आज तुम्हारा ही दिन है.ये लोग तुम्हारे ही कारण यहाँ एकत्र हुए हैं.तुम्हारी जय जय कार कर रहे हैं तुम्हें अपनाने की कसमें खा रहे हैं.हिंदी कुछ विचार ही नहीं कर पा रही थी कि कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करे .,
हिंदी की ख़ुशी अधिक देर नहीं टिक सकी जब अंग्रेजी बोली ज्यादा इतराओ मत ,तुम्हारे साथ इनका प्रेम बस एक दिन का होता है,वो भी आधा अधूरा .अभी देखना ये तुमको अपनाने की कसमें खायेंगें परन्तु उसमें भी मेरा ही असर इन पर दिखेगा, वैसे जय जयकार तो आज ये तुम्हारी करेंगें ,परन्तु उसका क्या, कल को मीडिया में इनकी फोटो दिखानी है न बस इसलिए..अंग्रेजी फिर बहुत जोर से खिलखिलाई और बोली वैसे तुम्हारी याददाश्त है बहुत कमजोर .अरे भई ये एक दिन तो तुमको हर साल ही याद कर लेते हैं ,असलियत में तो तुम्हारे देशवासियों की चहेती तो मैं हूँ ,हूँ तो विदेशी परन्तु इनके दिलो दिमाग पर मैं सदा छाई रहती हूँ. मुझको अपनाकर ये स्वयं को धन्य समझते हैं ,जिसने मुझको पा लिया वो तो स्वयं को बहुत बड़ा समझने लगता है. मेरी कीमत इस देश में इतनी अधिक है,कि अमीर गरीब सब अपनी हैसियत से अधिक मुझको अपनाना चाहते हैं,यहाँ तक कि तुम्हारे नाम की माला जपने वाले और तुम्हारे नाम का खाने वाले अपने बच्चों को मेरी छत्रछाया में भेजते हैं.इनको मुझसे एक तरफा प्यार है कि जो कोई मेरी भाषा में बोलता है उसको बहुत महान और पढ़ा लिखा समझा जाता है,भले ही ज्ञान के नाम पर वो जीरो हो.
अब हिंदी को सब ध्यान आगया और उसकी सारी खुशी उड़ गयी.हिंदी कुछ देर के लिए अंग्रेजी से विदा लेकर एकांत में बैठ गयी .इस समय वह बहुत उदास थी ,अब वो अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही थी.उसको याद आ रहे थे अपने वो दिन  जबकि अपने देश में अन्य भाषाओँ के साथ वह खुश थी क्योंकि सम्पूर्ण देश में अधिकांश देशवासियों को वही प्रिय थी.दुर्भाग्य से इन अंग्रेजों ने  देश  पर कब्ज़ा कर दास बना लिया और इस गुलामी के काल में भारत को आर्थिक ,व्यापारिक तथा तकनीकी रूप से तो कंगाल बना दिया.
हिंदी को याद आया वह काला दिन जब फरवरी 1835  में भारतीय संस्कृति के सबसे बड़ा शत्रु लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश संसद में अपने विचार व्यक्त करते हुए अपना मन्तव्य स्पष्ट किया ,और कहा कि, मैंने भारत के कोने-कोने की यात्रा की है और मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो या चोर हो। मैंने इस देश में ऐसी संपन्नता देखी, ऐसे ऊंचे नैतिक मूल्य देखे कि मुझे नहीं लगता कि जब तक हम इस देश की रीढ़ की हड्डी न तोड़ दें, तब तक इस देश को जीत पायेंगे और ये रीढ़ की हड्डी है, इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, इसके लिए मेरा सुझाव है कि इस देश की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को इसकी संस्कृति को बदल देना चाहिए। यदि भारतीय यह सोचने लग जाए कि हर वो वस्तु जो विदेशी और अंग्रेजी, उनकी अपनी वस्तु से अधिक श्रेष्ठ और महान है, तो उनका आत्म गौरव और मूल संस्कार नष्ट हो जाएंगे और तब वो वैसे बन जाएंगे जैसा हम उन्हें बनाना चाहते है – एक सच्चा गुलाम राष्ट्र । लार्ड मैकाले ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपनी शिक्षा नीति बनाई, जिसे आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली का आधार बनाया गया ताकि एक मानसिक रूप से गुलाम कौम तैयार किया जा सके, क्योंकि मानसिक गुलामी, शारीरिक गुलामी से बढ़कर होती है।
अंग्रेजों को तो यही चाहिए था और उनके स्वप्नों को पूरा करते हुए मैकाले ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था लागू की कि भारतीयों की सोच बदल गयी,अपनी संस्कृति और सभ्यता उनको गंवारू और पिछड़ी हुई लगने लगी और अंग्रेजी सभ्यता,अंग्रेजी भाषा उनके मनोमस्तिष्क पर छा गयी.
हिंदी की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी क्योंकि उसकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि जब 1947  में अंग्रेज चले गये तब भी हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में मान्यता क्यों प्रदान नहीं की गयी. गाँधी बापू ने तो कहा था कि आज़ाद भारत में हिंदी को ही अपनाया जाएगा,फिर क्यों व्यवहारिक कठिनाईयों के नाम पर हिंदी को पराया ही बनाये रखा. यहाँ तक कि भारतीय संविधान में 26 जनवरी 1950 को जो संविधान इस देश में लागू हुआ उसके अनुच्छेद 343 के अनुसार तो व्यवस्था ही निर्धारित कर दी गयी कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी इस देश में संघ (Union) सरकार की भाषा रहेगी,राज्य सरकारों को भी छूट दे दी गयी कि वो चाहे हिंदी  अपनाएं या अंग्रेजी को.अति तो तब हुई जबकि इस घोषणा के बाद भी कि 15 वर्ष पूरा होने पर अर्थात 1965  में एक विधेयक लाकर अंग्रेजी को हटा दिया जाएगा तथा उसके स्थान पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ को स्थापित किया जायेगा.ऐसा नहीं हुआ और कुछ राज्यों में हुए हिंदी के विरोध के नाम पर हिंदी के साथ धोखा चलता रहा.
अब हिंदी को धीरे धीरे अपने ही देश में बेगानी बनने की कहानी समझ में आ रही थी कि संविधान में ही ये भी अनुच्छेद 343 में ये प्रावधान करते हुए तीसरे पैरा ग्राफ में लिखा गया कि भारत के विभिन्न राज्यों में से किसी ने भी हिंदी का विरोध किया तो फिर अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा |
संविधान निर्माताओं ने तो अनुच्छेद 348  में स्पष्ट कर दिया कि भले ही हिन्दुस्तान में सबसे अधिक हिंदी बोली जाती हो परन्तु उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी..इस प्रकार अंग्रेजी का आधिपत्य न्यायिक क्षेत्र में छाया रहा.

हिंदी को याद आया जब 1968  में तो हिंदी के अरमानों पर चोट करते हुए यही घोषणा कर दी गयी कि यदि एक भी राज्य अंग्रेजी के  पक्ष में हुआ ,तो भी अंग्रेजी  को ही  मान्यता दी जायेगी  उसका  और उसी का परिणाम है कि भारत के ही राज्य नागालैंड ने अंग्रेजी को ही भाषा घोषित कर दिया.
हिंदी को सर्वाधिक शिकायत तो देशवासियों से है जो जन्म हिंदी भाषी परिवार में जन्म लेते और पलते हैं,हिदी उनकी रगों में होती है परन्तु दीवानगी अंग्रेजी के प्रति इतनी अधिक है कि भले ही अंग्रेजी के माध्यम से समझने में कई गुना समय लगे अपनाता अंग्रेजी ही हैं.न जाने ये बात क्यों भूल जाते हैं कि किसी भी राष्ट्र का सम्पूर्ण विकास अपनी भाषा में ही सम्भव है.उपयोगिता की दृष्टि से भी यदि देखा जाय तो संस्कृत को कम्प्यूटर के लिए महत्वपूर्ण माना गया है , आधुनिक युग में भी सभी कार्य हिंदी में संभव है ,परन्तु देशवासियों का अंग्रेजी के प्रति मोह अपरम्पार है.हिंदी की लोकप्रियता का अनुमान तो इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि आज हिंदी धारावाहिक,हिंदी  फ़िल्में,हिन्दी फ़िल्मी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों विश्व में देखे और  सराहे  जाते हैं,विदेशी फ़िल्में हिंदी में डब की जाती हैं.


परन्तु उदारमना हिंदी देशवासियों की इस विवशता को समझते हुए कि आज केवल न्यायिक ही नहीं प्रशासकीय,प्रतियोगी परीक्षाओं ,किसी भी अच्छी नौकरी के लिए अंग्रेजी के वर्चस्व वाले ही आगे रहते हैं.(अतः अंग्रेजी के पीछे भागना तो उनकी विवशता है,)बुझे मन से उनको क्षमा करने के लिए विवश थी.

हिंदी इसी चिंतन मनन में खोयी थी कि क्या भारत में अपनी खोयी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर सकेगी .तो वो इतना ही समझ सकी जब तक कुछ देशभक्त इस अभियान को प्राथमिकता देते हुए  उसको राष्ट्र भाषा की मान्यता दिलाते हुए मैकाले के प्रभाव से बाहर नहीं निकलेंगें ,कुछ भी सकारात्मक संभव नहीं.
हिंदी जानती है कि उसका दुःख कभी कम नहीं होगा क्योंकि उपरोक्त वर्णित आंकडें सरकारी प्रयासों और मंशाओं को स्पष्ट करने के  लिए पर्याप्त हैं.आज जब कि  भले ही वह जनसंख्या के दृष्टिकोण से व्यवहार में आने वाली  विश्व की दूसरे नम्बर की भाषा है, बस ऐसे ही यदाकदा उसको स्मरण करते हुए उसको सांत्वना दी जायेगी.
(प्रदत्त आंकडें साभार नेट से लिए गये हैं.)

(वैसे तो ये हिंदी की मनोदशा का चित्रण है जो स्वयं को उपेक्षित अनुभव करते हुए बहुत दुखी है कि  अपने ही देश में उसकी दुर्दशा है,परन्तु मैं एक हिंदी
प्रेमी होने के नाते इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि देशवासियों का दृढ निश्चय हिंदी को पुनः सम्मान दिला सकता है,कुछ अपवाद स्वरूप उदाहरण हमारे यहाँ उपलब्ध हैं,जो विदेश में रहते हुए भी हिंदी की सेवा कर रहे हैं.भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी बाजपेयी , यदि संयुक्त राष्ट्र संघ को अपनी ओजपूर्ण शैली में हिंदी में संबोधित कर सकते हैं,वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी   अपने उद्बोधन हिंदी में दे  सकते हैं ,प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी माध्यम से सफलता प्राप्त की जा सकती है तो हिंदी का दुःख दूर क्यों नहीं हो सकता.)

(कुछ संशोधन सहित एक पूर्व लिखित लेख एक सन्देश के साथ ……………..

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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
September 25, 2014

शुरुआत जिस तरह से करी है आपने ! वो एक अद्वितीय बात है ! परन्तु अचानक ही उसको याद आ गया कि 14 सितम्बर है अतः हिंदी दिवस मनाया जा रहा है .साथ चलती अंग्रेजी ने कुछ व्यंग्यात्मक शैली में दृष्टि उठाई और बोली ,बधाई हो आज तुम्हारा ही दिन है.ये लोग तुम्हारे ही कारण यहाँ एकत्र हुए हैं.तुम्हारी जय जय कार कर रहे हैं तुम्हें अपनाने की कसमें खा रहे हैं ! लेकिन क्या हम दूसरे पक्ष को देख रहे हैं ? पॉजिटिव सोच से अगर सोचा जाए तो मुझे लगता है की हिंदी के इतने बुरे दिन नहीं हैं ! टीवी , बॉलीवुड , गाने , और मोदी ने हिंदी को अगर उसका उचित स्थान नहीं दिला पाया है तो भी एक सम्मानित स्थान जरूर दिलाया है ! बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय निशा जी मित्तल , बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए ! भगवान से प्रार्थना है की आप सदैव यूँ ही लिखती रहें !

Rajesh Dubey के द्वारा
September 23, 2014

हिंदी की दुर्दशा से हिंदी प्रेमी दुखी हैं. देश की गरिमा की भाषा हिंदी के लिए एक जोरदार अभियान की जरुरत है.

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2014

    धन्यवाद राजेश जी

sangeeta nagi के द्वारा
September 22, 2014

हिंदी दिवस पर साभार, एक दिन तो चली हिंदी की पतवार. जनमानस के ह्रदय में रहेगी हमारी प्रिय भाषा बनकर तलवार, हर बाधा हम कर जायेंगे धीरे धीरे इसी तरह पार हर बाधा हम कर जायेंगे धीरे धीरे इसी तरह पार

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2014

    आभार संगीता जी सुन्दर प्रतिक्रिया

Dr S Shankar Singh के द्वारा
September 22, 2014

आदरणीया निशा जी, सादर नमस्कार. हिंदी भाषा के राजभाषा या राष्ट्रभाषा के स्वरुप को लेकर हम सभी चिंतिति हैं. आप का लेख अत्यंत उत्कृष्ट है. मैं स्वयं हिंदी की समस्यापर लिखना चाहता था लेकिन जबसे आपका लेख पढ़ा मुझे लगा इतना अच्छा लिख पाना मेरी क्षमता से बाहर है. या कारण कुछ छोटी छोटी बातें लिख रह हूँ. मेरी युवावस्था में जब मैं बीएससी का छात्र (सं डा लोहिया का कहना था की देश में १९६०-६१ ) था तब सौभाग्यवश मुझे डाक्टर राम मनोहर लोहिया के संपर्क में आने का सुअवसर मिला .डा लोहिया का कहना था की देश में इंग्लिश जानने वालों की संख्या ३ % के अस पास थी. लेकिन ये ३ % इंग्लिश जानने वाले लोग ही देश के ९७ % IAS, IPS पदों पर कब्ज़ा किये हुए थे. ऐसी स्थिति में गांवों का किसान मजदूर का बीटा कहीं पहुँच नहीं सकता था. . यही स्थिति आज भी है. डा लोहिया चाटे थे की शिक्षा का माध्यम हिंदी और राजयबाषाएं हो. . भारत में हिंदी का विरोध जो राजनितिक कारणों से था अब कम होने लगा है हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है. विदेशों में भी मैं रहा हूँ. मैनें पाया की पाकिस्तानियों, बांग्लादेशियों, नेपालियों तथा कई अन्य देशवासियों से हिंदी में बात करना सहज लगता है. हिंदी का प्रचार प्रसार BADH रहा है. यह हिंदी साहीत्यिक, अखबारी हिंदी से अलग होगी. हिंदी एक NAYA SWARUP AKHTIYAAR KAREGI. यही बात इंग्लिश के SATH भी है LANDAN में BOLI JANEWALI इंग्लिश BBC और QUEEN’S इंग्लिश से अलग है. बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर बहुत बहुत बधाई.

OM DIKSHIT के द्वारा
September 22, 2014

आदरणीया निशा जी, बेस्ट ब्लागर की बधाई. आप ने सही कहा हिंदी का अपमान हिंदी वाले ही अधिक करते हैं.मोदी जी हिंदी के सम्मान में अटल जी का अनुकरण कर रहे हैं, यह अच्छी बात है.लेकिन चीनी राष्ट्रपति के आगमन पर …बैंनरों से हिंदी का गायब (गुजराती,चीनी के साथ अंग्रेजी ) होना खल गया.

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2014

    निश्चित रूप से अनुचित है प्रादेशिक भाषा के साथ हिंदी अवश्य होनी चाहिए

    nishamittal के द्वारा
    September 23, 2014

    आदरणीय डाक्टर साहब ,आप सदृश विद्वान अग्रज कृपया ये कह कर लज्जित न करें कि आप नहीं लिख सकते ,हम सब आप सदृश अनुभवी जनों से ही सीख पाते हैं और सीखते रहेंगें . विदेशों में हिंदी की स्थिति पर आपने सुखद जानकारी दी निश्चित रूप से यदि हमारे नेता अपना रुख बाजपेयी जी या वर्तमान में मोदी जी जैसा रखें (जो संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित करने जा रहे हैं ) जो असंभव नहीं तो अधिक उपयोगी रहेगा साथ ही कर्नाटक ,तमिल नाडु.केरल तथा अन्य राज्यों में कम से कम प्रमुख साइन बोर्ड्स आदि पर स्थानीय भाषा,अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी लिखना अनिवार्य किया जाय तो सोने में सुहागा होगा साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं में भी विशेष ध्यान रखा जाय.पुनः आभार आपका

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 21, 2014

निशा जी बधाई आपको । बहुत अच्छा लेख है । इसी तरह लिखती रहें । 

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2014

    आभार बिष्ट जी

Bhola nath Pal के द्वारा
September 21, 2014

आदरणीय निशा मित्तल जी ! बहुत अर्थपूर्ण विचार “मानसिक गुलामी शारीरिक गुलामी से बढ़कर होती है …..और अंग्रेजी सभ्यता, अंग्रेजी भाषा देश के मनोमस्तिष्क पर छा गई ” | ऐसा लेख लिखने के लिए आपको राष्ट्रभाषा के सम्मान में देश को जगाने के लिए आपको बधाई | आप वास्तविक प्रशंशा की पात्र है |

brijeshprasad के द्वारा
September 21, 2014

आदरणीय निशा जी, नमस्कार। आप का लेख 14 सितंबर, हिन्दी दिवस के अवशर पर,अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं उत्साह वर्धक है। इस के लिए आभार।

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2014

    आभार महोदय .

jlsingh के द्वारा
September 20, 2014

सप्ताह की सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर चुने जाने पर बधाई, महोदया!

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2014

    हार्दिक आभार सिंह साहब ,सर्वप्रथम सूचित करने और बधाई देने के लिए

DN Tewari के द्वारा
September 20, 2014

हिंदी की दुर्दशा, उपेक्षा या अपमान – जो भी कहना चाहें कह सकते हैं इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है क्योंकि यह एक ही स्थिति के लिए अलग – अलग शब्द हैं, अग्रतर, हम इस सम्बन्ध में चाहे जितने अच्छी भाषा शैली में अपनी बात कह लें कोई लाभ नहीं होने वाला है सिवाय इस आत्म-संतुष्टि के कि हमने अपने विचार अच्छी प्रकार से बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर दिए. अगर शब्दों से काम चल सकता होता तो अब तक हमारे देश से भ्र्ष्टाचार कब का समाप्त हो चूका होता, शिक्षा प्रणाली में सुधार हो चुका होता, राजनैतिक जीवन में शुद्धता आ चुकी होती, चीन से हमें अपनी जमीन वापस मिल चुकी होती आदि-आदि. आज आवश्यकता शब्द रूपी आंसू बहाने से आगे निकल कर कुछ ठोस कदम उठाने की है जिसमें सरकार का सहयोग बहुत आवश्यक है. हालाँकि वर्तमान सरकार हिंदी को बढ़ावा देने की मंशा रखती है लेकिन राजनैतिक स्तर पर हिंदी का इतना विरोध होना शुरू हो जाता है कि सरकार को अपने कदम पीछे खीचने पड़ते हैं. संघ लोक सेवा आयोग, देश में विश्वविद्यालयों में हिंदी को पढ़ाये जाने के निर्णय आदि का कितना विरोध हुआ यह तो सर्वविदित ही है. इससे भी बहुत कड़वा सच यह है कि हम हिंदी भाषी भी हिंदी की काम उपेक्षा नहीं कर रहे हैं. कुछ मुठी भर हिंदी प्रेमी, जिन्हे भाषा का अच्छा ज्ञान है वही ज्यादा चिंतित प्रतीत होते हैं वह भी व्यक्तिगत स्तर पर- उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी हिंदी भाषा से उतना ही लगाव हो यह आवश्यक नहीं. अब तो हिंदी का भवन ही मालिक है- शायद कभी कोई गांधी पैदा हो जो हिंदी को अंग्रेजी की बड़ियों से मुक्ति दिल सके. थोड़ा लिखा, समझना बहुत. नमस्कार

    DN Tewari के द्वारा
    September 20, 2014

     काम (कम) बड़ियों (बेड़ियों)   भवन (भगवान)

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2014

    आभार तिवारी जी ब्लॉग पर आने के लिए ,गांधी या मोदी कोई भी सम्मान हिंदी को दिला पायेंगें ,उसका गौरव लौटा सकेंगें ,इतना सरल नहीं .जैसा कि लिखा है,हमारी मानसिकता गुलामी सहते सहते ऐसी ही बन चुकी है, स्वाधीनता के बाद भी नेताओं द्वारा राजनीति की चालों ने इस विषय को विवाद के चरम पर पहुंचा दिया है ,स्थिति यहाँ तक है कि आज गरीब व्यक्ति भी अपने बच्चों को कर्जा ले कर भी अंग्रेजी माध्यम में इसलिए शिक्षा दिलाता है कि उसके बच्चे अंग्रेजी बोलें और ये मानसिकता रक्त में समा चुकी है .हमारी मानसिकता ही कुछ सकारात्मक भूमिका का निर्वाह कर सकती है परन्तु आज राष्ट्र के लिए सोचने की फुर्सत कम ही लोगों के पास है.प्रयास जारी रखने होंगें

Ravinder kumar के द्वारा
September 20, 2014

निशा जी, सादर नमस्कार. आपको सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर बनने पर बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    September 21, 2014

    आभार रविन्द्र जी आपका सहयोग सदा मिलता है

Shobha के द्वारा
September 20, 2014

निशाजी बहुत ही सुंदर लेख सम्पूर्ण सार गर्भित बेस्ट ब्लागर बनने की बहुत बधाई डॉ शोभा

sudhir awasthi के द्वारा
September 20, 2014

अच्छी रचना

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2014

    आपका आभार आदरणीया शोभा जी

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2014

    आभार अवस्थी जी

sadguruji के द्वारा
September 20, 2014

आदरणीया निशामित्तल जी ! बहुत सही चुनाव ! जागरण परिवार को धन्यवाद ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की बहुत बहुत बधाई ! बहुत सार्थक,विचारणीय और उपयोगी लेख ! इस लेख की जितनी भी तारीफ की जाये,वो कम है ! बधाई और शुभकामनाओ सहित–सद्गुरुजी !

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2014

    आदरनीय महोदय आपका आभार लेख पसंद करने के लिए .मेरी शुभकामनाएं

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
September 20, 2014

निशा जी आज मैं जवान हो गयी हूँ ,हिंदी की जवानी को देखना आवश्यक है रूप रंग तो निखरता जायेगा यही दर्द बखान करती है हिंदी | अंगरेजी यदि अन्य विश्व की भाषाओँ मैं छा गयी है तो हिन्दी भी अन्य भारतीय भाषाओँ मैं निखार चुकी है क्या  थी आजादी से पहिले  की हिन्दी । अपने रूप पर दुखी होने से अच्रछा अपने यौवन पर इतराना ही उत्साह बर्धक होगा ओम शांति शांति शांति की अनुभूती तभी होगी 

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2014

    आभार हरिश्चंद्र जी

jlsingh के द्वारा
September 19, 2014

बहुत ही सुन्दर आलेख आदरणीया, कुछ ब्यस्तता, कुछ समयाभाव, और कुछ जागरण जंक्शन की तकनीकी अनुपलब्धता और सबसे बड़ा कारन जो है आलेख का लम्बा होना जिसे बिना पूरा पढ़े प्रतिक्रिया देना उचित नहीं था. वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के चलते हिंदी संवाद में बृद्धि हुई है …उम्मीद है आगे भी या सिलसिला जारी रहेगा. न्यायिक कार्य और न्यायिक फैसले अगर हिंदी में होने लगे तो फिर क्या कहने. आप सबका और हमलोगों का हिंदी प्रेम जरूर ही हिंदी को अपनी सम्मान जनक पदवी दिलाएगा …ऐसी संभावना है… आपके सम्पूर्ण आलेख को नमन!

    nishamittal के द्वारा
    September 22, 2014

    निश्चित रूप से यदि देशवासियों में राष्ट्र के प्रति प्रेम बना रहे तो कुछ भी असंभव नहीं.आपका आभार

yamunapathak के द्वारा
September 15, 2014

आदरणीय निशा जी नमस्कार यह बहुत ही सुन्दर व्यंग है मैंने इसे पिछले वर्ष भी पढ़ा था .वर्त्तमान परिदृश्य में हिन्दी के प्रति आशावादिता बाद रही है प्रधान मंत्री जी के साथ ही राष्ट्रपति जी भी इस दिशा में अग्रसर हैं कल ही उन्होंने अपने सम्बोधन में हिन्दी दिवस और इंदिरा गांधी पुरस्कार वितरण समारोह में कहा,”इंटरनेट और मोबाइल पर हिन्दी का प्रयोग काफी बढ़ चूका है संघ के सभी कार्यालयों की वेबसाइट हिन्दी में भी तैयार कर ली गई है.” साभार

    nishamittal के द्वारा
    September 16, 2014

    जी यमुना जी फिर भी बहुत अधिक प्रयास की जरुरत है और उससे अधिक जरुरत मानसिकता बदलने की,आभार पुनः समय देने के लिए

sajal srivastava के द्वारा
September 15, 2014

आदरणीय निशा जी, आपका यह लेख वर्तमान में प्रत्येक भारतवासी को यह सोचने को मजबूर करता है कि बिना हिंदी को उचित सम्मान दिए हुए हम अपनी संस्कृति को कैसे सहेज सकेंगे? मुझे अभी तक यह गुमान था कि हिंदी हमारे देश कि राष्ट्रभाषा है, मुझे ही क्या देश के बहुत से लोगो को यही गलतफहमी थी. आश्चर्य हुआ मुझे कल यह ज्ञात हुआ कि हमारे देश में तो कोई राष्ट्रभाषा है ही नहीं. हमारे सविधान में राष्ट्रभाषा का कहीं उल्लेख ही नहीं है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि कुछ नेताओं की राजनीतिक लालसा ने देश को न केवल राष्ट्रभाषा अपनाने से वंचित कर दिया वरन हमारी संस्कृति को हमारी पहचान को भी मिटने की कोशिश करने का काम किया है. आज जब सच्चाई हमारे सामने है एकजुट होकर अपनी संस्कृति को बचाने के लिए हमें हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाना ही होगा. सभी पाठकों से अनुरोध है कि वे माननीय प्रधान मंत्री जी को इस सम्बन्ध में पत्र लिखें.

    nishamittal के द्वारा
    September 16, 2014

    सजल जी ,                     धन्यवाद पोस्ट को समय देने के लिए तथा प्रथम बार समय देने के लिए .आपको भी हार्दिक बधाई सम्मान की

Akhilesh kumar के द्वारा
September 14, 2014

प्रिय दोस्तों हिंदी दिवस की ढेरो सारी शुभकामनाये, हिंदी दिवस के अवसर पर मै उन लोगो के बिरुद्ध आवाज उठाना चाहता हूँ जो हिंदी सिनेमा के नाम पर करोडो रुपया कमाते है लेकिन सिनेमा के पोस्टर अंग्रेजी में छपवाते है| हिंदी सिनेमा के एक्टर जब दूरदर्शन पर आते है तो अंग्रेजी को गले लगाने लगते है ऐसा क्यों ….?आज हिंदी सिनेमा के अधिकांश एक्टर अपना स्क्रिप्ट अंग्रेजी में मांगते है क्या ये हमारे लिए शर्म की बात नहीं है| आज हिंदी के उत्थान के लिए ये जरुरी है की हिंदी सिनेमा में वैसे एक्टर को लिया जाये जो हिंदी पढ़ना लिखना जनता हो …..जय हिन्द जय भारत |

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2014

    बिलकुल सही कहा आपने अखिलेश जी वही अभिनेता हिंदी फिल्मों में काम कर सेलिब्रिटी बनते हैं और स्वयम को अंग्रेज समझते हैं.धन्यवाद आपकी प्रथम प्रतिक्रिया हेतु

amitmit1983 के द्वारा
September 14, 2014

कहीँ हिँदी रो रही है, कहीँ हिँदू रो रहा है… ना जाने हिँदुस्तान मेँ, ये क्या क्या हो रहा है… _अमित ‘मीत’

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2014

    सही कहा है पर जो हो रहा है वो आज नहीं हुआ और उसके लिए सभी दोषी हैं

Ravinder kumar के द्वारा
September 13, 2014

निशा जी, सादर नमन. हिंदी को लेकर तमाम चिंताएं हम प्रकट कर चुके हैं. लेकिन प्रश्न ये है के हिंदी को उसका हक़ आखिर मिलेगा कैसे ? अंग्रेजी का वर्चस्व कम होने के बजाये बढ़ता ही जा रहा है. जब हम माध्यमिक स्तर के विद्यार्थी थे तो अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने वाले विद्यालयों की संख्या ना के बराबर थी. पर आज हिंदी माध्यम से पढ़ाने वाले विद्यालय ना के बराबर हैं. ये दृश्य तो मध्यम दर्जे के नगरों की है. बड़े नगरों में तो अंग्रेजी का ही बोलबाला है. निशा जी, मैं अक्सर सोचता हूँ के क्या कभी ऐसा होगा के चिकित्सक हिंदी में परचा लिखे. न्यायालयों के निर्णय हिंदी में हों. हमारे फ़िल्मी नायक हिंदी में बोलें. लेकिन ये भी सत्य है के अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी की ताकत भी बढ़ी है. निशा जी, हिंदी को उसका हक़ दिलाने के लिए हम सभी को ये प्रण लेना होगा के जहाँ तक सम्भव हो काम हिंदी में करें. तभी हिंदी बढ़ेगी. बेहतरीन लेख के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं.

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2014

    रविन्द्र जी ,आपसे सहमत हूँ जन जन की भाषा तो हिंदी तभी बन सकती है जब हम सब मन से अपनाएँ ,यदि क्षेत्रीय भाषाओँ में देश के विभिन्न भागों में साइन बोर्ड्स हैं तो wahan हिंदी में भी likha होना अनिवार्य हो मैं आजकल बंगलौर में हूँ और प्राय सभी सूचनापटों पर या तो कन्नड़ या अंग्रेजी यदि महानगर का यह हाल है तो छोटे शेरोन या गाँव में तो गैर कन्नड़ के अतिरिक्त कोई नहीं रह सकता इस प्रकार अन्य कुछ कड़े अनिवार्य कदम उठाये जाने जरुरी हैं धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
September 11, 2014

“परन्तु उदारमना हिंदी देशवासियों की इस विवशता को समझते हुए कि आज केवल न्यायिक ही नहीं प्रशासकीय,प्रतियोगी परीक्षाओं ,किसी भी अच्छी नौकरी के लिए अंग्रेजी के वर्चस्व वाले ही आगे रहते हैं.(अतः अंग्रेजी के पीछे भागना तो उनकी विवशता है,)बुझे मन से उनको क्षमा करने के लिए विवश थी.” ये पंक्तियाँ आपके उत्कृष्ट लेख का सार लगीं ! आदरणीया निशा मित्तल जी,इस सार्थक,शिक्षाप्रद और उपयोगी जानकारियों से भरे लेख के सृजन के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! पूरा लेख मैंने बहुत ध्यान से पढ़ा ! बहुत अच्छा लगा ! हिंदी के विकास और उसे अपनाने का ऐतिहासिक और यथार्थ चित्रण ! इस बार जागरण जंक्शन परिवार हिंदी दिवस के अवसर पर खामोश है ! आप की जागरूकता और हिंदी के प्रति प्रेम अनुपम है ! इस मंच पर आपकी शिक्षाप्रद वैचारिक उपस्थिति हम सभी ब्लागरों को अच्छा और उपयोगी साहित्य लिखने के लिए प्रेरित करती है ! इस अनुपम रचना को मंच पर प्रस्तुत करने लिए सादर आभार !

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2014

    आदरणीय महोदय आपकी सकारात्मक सुखद प्रतिक्रिया हेतु आभार

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 11, 2014

निशा जी, वाह हिँदी पर क्या अच्छा लेख लिखा है आपने । इतिहास के पन्नोँ पर की गई गलतियां, हमारा राजनीतिक प्रपंच और स्वयं समाज का अंग्रेजी के प्रति आकर्षण सब्कुछ बहुत ही खूबसूरती से समेटा है आपने इस लेख में । कुछ नई जानकारियां भी प्राप्त हुई । लेखन की इस शैली पर लिखा गया यह लेख इसे और अधिक रोचक बनाता है । इस लेख के लिए आप नि:संदेह बधाई की पात्र हैं ।

    nishamittal के द्वारा
    September 14, 2014

    बिष्ठजी लेख पढ़ कर सुन्दर प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद आपका


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