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बाल श्रम-------- एक कलंक सभ्य समाज पर (बाल श्रम निषेध दिवस पर)

Posted On: 12 Jun, 2015 Others में

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बाल श्रम निषेध दिवस 12 june  पर  उन अबोध बच्चों का बचपन संवारने की अपील, जिनके स्वप्न हमारे लाडलों जैसे ही होते हैं,परन्तु उनकी विवशता के कारण हम और हमारा समाज  उनका शोषण करते हैं.  फिर वो  भूखे झूठन   खाते,बुझे हुए सिगरेट बीडी के टुकड़ों से धुआं उड़ाते,कुपोषण के शिकार बनकर,अपराधी बन जाते हैं,या असमय   काल के ग्रास बन जाते हैं और हमारे विकास शील क़दमों   के विकसित स्वरूप की ओर बढ़ने पर एक बदनुमा दाग की तरह हमें हमारी वास्तविकता के दर्शन   कराते हैं.

एक घटना जो  ,जो वास्तविक है और सोचने के लिए विवश करती है ,उन माता-पिता की विवशता के दर्शन कराती है जिनको स्वार्थी कहना हमारे ही मुख पर तमाचा है .
ग्रीष्मावकाश में परिवार के साथ पर्वतीय पर्यटन के लिए जा रहे थे.रमणीय दृश्य,हिमाच्छादित पर्वत शिखर ,सुन्दर जल प्रपात ,पहाडी नदियाँ ,सीढ़ीदार खेत ऊंचे पेड़,भेड़ बकरियां देखते हुए सब मगन  थे.एक स्थान पर भीड़ और कुछ अप्रिय सा दृश्य दिखाई दिया तो टैक्सी रूकवाई.पता चला एक छोटे से पहाडी होटल पर भीड़ लगी थी,कारण पूछने पर ज्ञात हुआ सात-आठ वर्ष के एक लड़के की पिटाई होटल मालिक ने की थी, क्योंकि ग्राहकों को Child-Labour-In-India-01चाय देने जाते समय ठोकर लग जाने के कारण वह बच्चा गिर गया.गर्म चाय तो उस पर गिरनी ही थी ,कप गिलास  भी फूट गए ..उसके जलने से तो मालिक को फर्क नहीं पड़ा. बर्तनों का नुकसान होने से वह आपा खो बैठा तथा उस मासूम की पिटाई कर दी.ग्राहक तथा आस-पास के लोगों की भीड़ वहां एकत्र हो गयी और होटल मालिक को बुरा भला कहना शुरू कर दिया ,एक दो लोग हाथ भी छोड़ने को तैयार बैठे थे,परन्तु गर्म चाय से जले उस बच्चे की प्राथमिक चिकित्सा करने पर किसी का ध्यान न गया.इससे भी आश्चर्यजनक किन्तु विडम्बनापूर्ण दृश्य वह था.जब कहीं से पता चलने पर उस बच्चे की माँ वहां आ गयी.माँ होटल वाले के समर्थन में खड़ी थी और क्षमा याचना करते हुए उस होटल मालिक से अनुनय- विनय  रही थी कि वह उसके बच्चे को माफ़ कर दे.भीड़ थोड़ी ही देर में तीतर- बितर  हो गयी ,मालिक द्वारा आश्वासन मिलने पर कि वह उसके लड़के को नौकरी से नहीं हटाएगा माँ बच्चे को वहीँ छोड़ चली गयी.
उपस्थित सब लोगों को माँ का रुख स्वाभाविक रूप से अच्छा नहीं लग रहा था परन्तु सब को आगे जाना था अतः अपने मार्ग पर हम और अन्य सभी लोग चल दिए.बहुत देर तक हम परस्पर यही चर्चा करते रहे .मैं भी इसी समस्या के विषय  में मंथन कर रही थी क्या वास्तव में माँ दोषी थी ,अपने बच्चे से प्यार नहीं था,स्वार्थी थी,?कभी उस मासूम का पिटाई व जलन से प्रभावित चेहरा घूम रहा था.माँ का बच्चे के कष्ट से दुखी होना तो स्वाभाविक था, परन्तु बीमार माँ,नशे के लत से पीड़ित पिता तथा और २-३ छोटे बहन भाई का पेट पालने की समस्या के बोझ तले बच्चे का दर्द दब गया था.
ये एक घटना है परन्तु विश्व की नहीं केवल भारत की बात करें तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार २ करोड़ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार तो लगभग ५ करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं. इन बालश्रमिकों में से 19 प्रतिशत के लगभग घरेलू नौकर हैं, हैं,ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में तथा  कृषि क्षेत्र से लगभग 80%जुड़े हुए हैं।शेष अन्य क्षेत्रों में.बच्चों के अभिभावक ही बहुत थोड़े पैसों में उनको ऐसे ठेकेदारों के हाथ बेच देते हैं जो अपनी व्यवस्था के अनुसार उनको होटलों,कोठियों तथा अन्य कारखानों आदि में काम पर लगा देते हैं . उनके नियोक्ता  बच्चों को  थोडा सा खाना दे मनमाना काम करातें हैं.१८ घंटे या उससे भी अधिक काम करना,आधे पेट भोजन,और मनमाफिक काम न होने पर पिटाई यही उनका जीवन बन जाता है .केवल घर का काम नहीं इन बालश्रमिकों को पटाखे बनाना,कालीन बुनना,वेल्डिंग करना,ताले बनाना,पीतल उद्योग में काम करना,कांच उद्योग,हीरा उद्योग ,माचिस,बीडी बनाना,खेतों में काम करना( बैल की तरह),कोयले कि खानों में.पत्थर खदानों में,सीमेंट उद्योग,दवा उद्योग में  तथा होटलों व ढाबों में झूठे बर्तन धोना आदि सभी काम मालिक की मर्जी के अनुसार करने होते हैं . इन समस्त कार्यों के अतिरिक्त कूड़ा बीनना,पोलीथिन की गंदी थैलियाँ चुगना,आदि अनेक कार्य हैं जहाँ ये बच्चे अपने बचपन को नहीं जीते, नरक भुगतते हैं परिवार का पेट पालते हैं. इनके बचपन के लिए न माँ की लोरियां हैं न पिता का दुलार,न खिलौने  हैं ,न स्कूल न बालदिवस . इनकी दुनिया सीमित है तो बस काम काम और काम,धीरे धीरे बीडी के अधजले टुकड़े उठाकर धुआं उडाना,यौन शोषण को खेल मानना इनकी नियति बन जाती है.
Child-Labour-In-India-08वेल्डिंग के कारण आँखें अल्पायु में गवां बैठना ,फैक्ट्री के धुंए में निकलते खतरनाक अवशेषों को श्वास के साथ शरीर का अंग बना लेना,जहरीली गैसों से घातक रोगों फेफड़ों का केंसर टी.बी.आदि का शिकार बनना,यौन शोषण के कारण AIDS या अन्य यौन रोगों के कारण सारा जीवन होम कर देना भरपेट भोजन व नींद न मिलने से अन्य शारीरिक दुर्बलताएँ ,कहाँ तक इनकी समस्याओं को गिना जाए ये तो अनगिनत हैं.Child labor 02
ऐसा नहीं कि केवल लड़के ही बाल श्रमिक हैं लड़कियां भी इन कार्यों में लगी है.घरों में ऐसे लड़के लड़कियां आपको प्राय मिल जायेंगे जो घरेलु कार्य करते हैं उत्पीडन उनका भी होता है.विभिन्न प्रकार के उद्योग धंधों में लड़कियां कार्यरत हैं बाकी सभी समस्याओं के साथ यौन उत्पीडन उनकी दिनचर्या का एक अंग बन जाता है.
ऐसे बाल श्रमिकों से सम्बंधित एक अन्य समस्या है ,बहुत बार इन बच्चों को तस्करी आदि कार्यों में भी लगा दिया जाता है.मादक द्रव्यों की तस्करी में व अन्य ऐसे ही कार्यों में इनको संलिप्त कर इनकी विवशता का लाभ उठाया जाता है.बच्चों को मुस्लिम देशों में बेच देने की घटनाएँ भी होती हैं जहाँ बच्चों को मनोरंजन का साधन मान खिलौने बना दिया जाता है वहां के शेखों के लिए.
हमारी संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप भारत का संविधान (26 जनवरी 1950) मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत की विभिन्न धाराओं के माध्यम से कहता है-

  • 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा (धारा 24)।
  • राज्य अपनी नीतियां इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके और बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो तथा वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रवेश करें (धारा 39-ई)।
  • बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में  विकास के अवसर तथा सुविधाएं दी जायेंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जायेगा (धारा 39-एफ)।
  • संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)।
  • बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं। दोनों स्तरों पर कई कानून बनाये भी गये हैं।
  • अन्य प्रयास जोइस संर्भ में समय समय पर हुए हैं  उनमें


  • बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को  किसी भी अवैध पेशों  और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशों और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है।
  • फैक्टरी कानून 1948 – यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तय की गयी है और रात में उनके काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
  • भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करनेवाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने यह आदेश भी दिया था कि एक बाल श्रम पुनर्वास सह कल्याण कोष की स्थापना की जाये, जिसमें बाल श्रम कानून का उल्लंघन करनेवाले नियोक्ताओं के अंशदान का उपयोग हो।
  • प्रावधानों और नीतियों की हमारी व्यवस्था में कोई कमी नहीं होती कमी होती है उसके क्रियान्वयन में और यही विडंबना है.

इन समस्त समस्याओं पर विचार करने के बाद देखते हैं की समस्या का समाधान क्या है?निर्विवाद रूप से निर्धनता उन्मूलन इसका एकमात्र समाधान और प्रमख उपाय है.इस क्षेत्र में तो भूमिका सरकार की ही हो सकती है.कठोरतम नियमों का पालन कर कुछ सीमा तक उत्पीडन को कम किया जा सकता है परन्तु गरीबी के रहते पेट पालने के लिए इन बच्चों या इनके मात-पिता के पास अन्य कोई विकल्प नहीं.
.स्वयं सेवी संगठनों “प्रथम” “चेतना” ” क्राई “‘ बचपन’”आदि द्वारा किये प्रयासों को अधिक सफलता न मिलने का कारण भी यही होता है.भूखे पेट की आग जब तक शांत नहीं होगी ,इनका बचपन कभी नहीं मुस्कुरा सकता मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति  हुए बिना सब नियम क़ानून व्यर्थ की कवायद है.
हम विकास शील होने का भी दावा कैसे कर सकते हैं जब तक हमारा भविष्य,हमारे नौनिहाल पेट पालने के लिए मजदूरी करने को विवश हैं.अतः सभ्य समाज के अंग होने के कारण हम सभी का दायित्व है कि इनके साथ न्याय हो
मेरे विचार से तो प्रधान  भूमिका सरकार की  ही हो सकती है,परन्तु बुद्धिजीवी समाज से मेरा विनम्र आग्रह है कि देश की भावी पीढ़ी का बचपन बचाने के उपाय सुझाएँ और अपने बच्चे की तरह उन बच्चों का भविष्य संवारें.

(काफी समय पूर्व ये आलेख  जागरण पर प्रकाशित किया था कुछ और आंकडें इसमें सम्मिलित कर पुनः प्रकाशित किया है,आंकडें नेट व समाचार पत्रों से लिए गए हैं, यदि कोई त्रुटि किसी को मिले तो कृपया सुधार करने का कष्ट करें )

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
June 17, 2015

प्रिय निशा जी बहुत अच्छा बहुत मेहनत से लिखा गया लेख समाज अपराधी है जो बच्चों से श्रम कराता है लेकिन वह अपराधी नहीं है जो बच्चों को जन्म दे रहे हैं और देते ही जा रहे हैं जिसने जन्म दिया है व्ही उनका पालक है हाँ यदि वह दो बच्चे पैदा करे उसके बाद बच्चे पैदा न करने की कसम खाएं तब उन बच्चों के प्रति समाज का दायित्व बनता है हमारे घर के पास झुग्गी बना कर एक परिवार रहता है उसके नौ बच्चे है वह सरिये से अपने बच्चों को पीटते है जरूरी नहीं है परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया जाए आज लोगों की बुरी हालत है उनमें अपने ही बच्चे को पालने की हिम्मत नहीं है कोई नहीं किसी को पाल सकता हाँ दुःख कर सकते है


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