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शार्टकट जिन्दगी में ! ,शार्ट बनी जिन्दगी

Posted On: 7 Apr, 2016 में

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विश्व स्वास्थय दिवस 7 अप्रैल पर शुभकामनाएं , जिन्दगी में शार्टकट अपनाकर जिन्दगी से मत खेलिए

बालिका वधू  की कलाकार ( आनंदी) प्रत्युषा बनर्जी की असामयिक मौत विडंबना पूर्ण है.और ग्लेमर की दुनिया में शीर्ष पर पहुँचने के लिए आतुर तथा अति महत्वाकांक्षा के जेट विमान पर आरूढ़  युवा पीढी  का एक अन्य उदाहरण. पूर्ववर्ती युवा रूपसियों , दिव्या भारती ,अनुराधा बाली (फिजा) ,गीतिका ,भंवरी देवी,मधुमिता शुक्ल ,नैना साहनी,शहला मसूद आदि आदि की सूची में जुड़ता एक नया नाम. अनेक फिल्म अभिनेत्रियां,माडल्स,खिलाड़ी  और ऐसी ही अन्य अनाम परिचित या अपरिचित युवतियां जिनको हत्या,आत्महत्या का शिकार बनना पड़ता है, गंभीर यौन रोगों से ग्रस्त होकर नारकीय पीडाएं झेलनी पड़ती हैं,या फिर वेश्यावृत्ति और उसका वर्तमान स्वरूप कालगर्ल आदि अनैतिक कार्यों में सदा के सदा के लिए अपने जीवन को होम करना पड़ता है का ये जीवन क्रम सदा ही चलता आ रहा है.

दिग्गज फिल्मकार महेश भट का कहना है कि फिल्मों और टी वी की शीर्ष अभिनेत्रियाँ की निजी जिन्दगी घरेलू नौकरों से भी बदतर होती है,साथ ही यौन शोषण का शिकार प्राय होना पड़ता है उनको.   यदि सम्पूर्ण परिदृश्य पर . विचार करें तो…………………

प्राय किसी भी राह पर अग्रसर होते समय दो विकल्प व्यक्ति के समक्ष ,सीधा रास्ता,और शार्टकट  अर्थात  छोटा या खतरों से पूर्ण.शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार प्राय शीघ्र  पहुँचने की इच्छा से शार्टकट  ही अपनाया जाता है. वैष्णो देवी की यात्रा पर जाते समय एक बार (बहुत पुरानी घटना है )एक परिवार की युवा पीढ़ी ने शार्टकट  से भैरव देव पर जाने का निर्णय हठपूर्वक लिया और दुर्भाग्य से पैर फिसलने के कारण  उनमें से एक प्राणघातक गंभीर चोट लगने से घायल रहा लंबे समय तक.

ऐसी घटनाएँ प्राय होती हैं और सब परिचित  भी होते हैं परिणामों से परन्तु शार्टकट  अपनाना कोई छोड़ता नहीं.उपरोक्त समस्त प्रयास तो जोश ,उत्साह तथा उमंग आदि का परिणाम होते हैं परन्तु …………………….जब जान बूझकर अग्नि कुंड में छलांग लगाई जाय ,ये जानते हुए भी कि एक से बढ़कर एक भयंकर परिणाम झेलने पड़ सकते हैं ,और परिणाम भी स्वयं को ही झेलने हैं,दूसरे पक्ष का कुछ भी बाल बांका नहीं होने वाला और वो भी साधन सम्पन्न लोगों का,जो  अपने साधनों के दम पर एक दम साफ़ बच जाते हैं.(अपवाद स्वरूप कुछ केसेज को छोड़कर)

इस प्रकार की अधिकांश घटनाओं का विश्लेषण किया जाय तो पूर्ण सच तो सामने आता ही नही,आरोपों,प्रत्यारोपों का क्रम चलता रहा है,उसी के आधार  पर कभी एक पक्ष के समर्थन में अनुमान लगाये जाते हैं,तो कभी दूसरे के. यथार्थ तो ये है कि सच की मौत  तो  जाने वाले के साथ ही हो जाती है,और अपराधी  पक्ष सामने आने नही देता.

इतना ही नही शार्टकट अपनाते हुए चढ़ते सूरज को सलाम करते हुए  मित्रों की भरमार रहती है, कुछ समय बाद परिदृश्य बदलने पर  इनका   अवसाद में चले जाना,अत्याधिक शराब या नशीले पदार्थों का सेवन,एकाकी जीवन और फिर घातक रोगों से ग्रस्त होते हुए आर्थिक,शारीरिक और सामाजिक समस्याओं को झेलते हुए मौत की प्रतीक्षा करनी पड़ती है.

प्राय इन समस्त घटनाओं के पश्चात विरोध का स्वर बुलंद करने पर क्या उपलब्ध होता है,सिवा बदनाम चर्चा के ? ऐसा नहीं कि शार्टकट का उपयोग केवल महिलाएं करती हैं,करते तो पुरुष भी हैं भुगतना उनको भी पड़ता है परन्तु ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण विडंबनाओं का शिकार सदा नारी को ही  पड़ता है

जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर भी चाहे वो शिक्षा हो,नौकरी ,व्यवसाय ,पदोन्नति,खेलकूद,या कोई भी अन्य करियर विषयक विकल्प या फिर स्वास्थ्य विषयक समस्याएं सभी क्षेत्रों में शार्टकट अपनाना आज एक फैशन बन चुका है.भागमभाग, आपा धापी के कारण आज सभी आगे आने की दौड़ में सम्मिलित हैं चाहे इस प्रयास में भ्रष्टतम उपायों का सहारा लेना पड़े ,जान जोखिम में डालनी पड़े, उद्देश्य ………………बस  रातों रात बुलंदियां छू लें,चर्चित हो जाएँ .

परीक्षा में सफलता परिश्रम से मिल तो सकती है,परन्तु अपेक्षित समय तो लगेगा ही,नक़ल अथवा  अन्य नम्बर दो के उपाय अपनाकर “हींग लगी न फिटकरी.” वाली चाल कभी कामयाब हो जाती हो पर सदा तो नही . खेल को करियर बनाने वाले खिलाड़ी शीर्ष पर पहुँचने के लिए अनेक अनैतिक उपायों को तो अपनाते ही हैं, चाहे वो मैच फिक्सिंग हो, (जिसके कारण भेद खुलने पर , उनका करियर ही चौपट हो जाता है, इसी प्रकार  शक्तिवर्धक दवाओं का सेवन करना , ये जानते हुए भी कि  स्टेरॉयड आदि लेकर वो अपने शरीर को तो पंगु बना सकते हैं ,यहाँ तक कि जीवन से भी हाथ धोना पड़ सकता है. ,भले ही सच सामने आने पर प्रतिबंधित होना पड़े

आज  सभी क्षेत्रों में शार्टकट का बोलबाला है.हमारे सत्ताधीश ,डाक्टर्स ,अधिवक्ता ,शिक्षक ,सरकारी  अधिकारी -कर्मचारी अपने अपने क्षेत्र में  और स्वयं हम हर पल शार्टकट  की तलाश में रहते हैं.और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं.

ये शार्टकट बस मानवीय  असीम महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने का छोटा व जटिल मार्ग है, जिस पर चलते हुए कोई बिना किसी आपदा का शिकार हुए ही अपने बड़े बड़े स्वप्नों को पूर्ण कर लेता है,और कुछ का अंत वही होता है न घर के रहे  और न घाट के .

इन स्वप्नों या महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के प्रयास में यह सत्य कोई स्वीकार नहीं कर पाता कि अपने  जिस  जीवन को सुखी बनाने के लिए,क्षणिक वैभव के लिए स्वयम को,परिवार तथा अपने जीवन को ही दाँव पर लगा रहे हैं जब वही नहीं रहा तो इन सबका क्या उपयोग.

उपरोक्त रहस्य को समझे बिना इन विडंबनाओं से मुक्ति कभी नहीं मिल सकती

(अपवाद सर्वत्र होते हैं )

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
April 16, 2016

आदरणीया, मैंने आज इस ब्लॉग को पूरा पढ़ा. देखा तो पहले भी था, पर पूरा नहीं पढ़ पाया था. आपने हर क्षेत्र में शॉटकट की अच्छी विवेचना की है. कभी कभी लगता है, ऊपर से मुस्कुराने वाले, प्रसिद्ध सितारे अंदर से बड़े कमजोर होते हैं. प्रत्युषा मेरे शहर की लड़की थी, साथ ही उसका बालिका वधु में रोल मुझे पसंद था मैंने उस सीरयल को काफी दिनों तक देखा था. अच्छा लगता था. पर क्या कहूं मैंने भी उसकी सहानुभूति में लेख लिखा था. और हम कर ही क्या सकते हैं. आपके ब्लॉग से सीख लेनी चाहिए हर कोई को. सादर!

    nishamittal के द्वारा
    April 16, 2016

    सिंह साहब धन्यवाद लेख पूरा पढने के लिए .प्रत्युषा या अन्य ऐसे सभी व्यक्तित्व जो ऐसी विडम्बनाओं के शिकार होते हैं ,सहानुभूति हर संवेदनशील व्यक्ति को होगी ,मुझको भी है.आपके राज्य,जिले से उसका सम्बन्ध था,उसका अभिनय आपको पसंद था तो जुड़ाव स्वाभाविक ही है. मेरा कथन मात्र इतना है,यदि आप प्रत्युषा के ही केस को देखें तो प्राप्त जानकारी के अनुसार शराब का सेवन करना विवाहित अविवाहित बॉय फ्रेंड्स की कतार, उनके साथ झगड़े शीश पर पलों में पहुँचने की अति महत्वाकांक्षा,हताशा,अवसाद आदि आदि कारण ही उसकी दुखद मौत के मूल में है,चाहे वो हत्या थी या आत्महत्या ये तो सदा रहस्य ही बने रहते हैं.रुपहली ग्लेमर की दुनिया के सच प्राय बहुत विडम्बनापूर्ण ही होते हैं

sadguruji के द्वारा
April 11, 2016

“ये शार्टकट बस मानवीय असीम महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने का छोटा व जटिल मार्ग है, जिस पर चलते हुए कोई बिना किसी आपदा का शिकार हुए ही अपने बड़े बड़े स्वप्नों को पूर्ण कर लेता है,और कुछ का अंत वही होता है न घर के रहे और न घाट के.” जी.. आपने बिलकुल सही कहा है ! आदरणीया सार्थक और विचार लेखन हेतु बधाई ! मुझे इनके आत्महत्या करने की ये भी वजह लगती है कि ये लोग परदे की काल्पनिक जिंदगी को अपने वास्तविक जीवन में ढूंढने लगे और नहीं मिला तो आत्महत्या कर लिए ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    nishamittal के द्वारा
    April 11, 2016

    आभार आपका सकारात्मक सुंदर प्रतिक्रिया के लिए

rameshagarwal के द्वारा
April 8, 2016

जय श्री राम शोर्ट कट ख़राब है लेकिन देश में अभी भी इसी का बोलबाला हम तो भुगत चुके है आजादी के बाद कोइ नीति इससे छुटकारे के लिए नहीं बनी एक अपना काम अच्छी तरह करता दूसरा बॉस की हां हजूरी क्या आको लगता पहले वाले का भला होगा भगवान् पर विश्वास रख कर बहुत लोगो को धैर्य नहीं वेस्ट अमेरिका में शायद शोर्ट कट नहीं है कम से कम पब्लिक सेवाओ और नौकरियो में सुन्दर लेख. नव रात्रों और नव वर्ष २०७३ सौरभ की शुभकामनाये.

    nishamittal के द्वारा
    April 8, 2016

    आपको भी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं न,धन्यवाद आपका

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 7, 2016

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति निशा जी काश ये सब भी पढ़ कर दिमाग की बत्ती जले और अच्छे बुरे की चिंता करें लोग ..परिणाम शार्ट कट में अधिकतर दुःख ही देता है बाद में या फिर विकास आगे रुक जाता है .. सार्थक लेख बधाई भ्रमर ५

    nishamittal के द्वारा
    April 7, 2016

    आभार सहमती पूर्ण प्रतिक्रिया हेतु

Shobha के द्वारा
April 7, 2016

प्रिय निशा जी आपके लेख ने कई कहानियां याद दिला दी आज की जेनरेशन सॉर्ट कट में सब कुछ पाना चाहते हैं पढ़ाई से भी विमुख हो क्र ग्लैमर की दुनिया की और मुतासिर हो रहे हैं

    nishamittal के द्वारा
    April 7, 2016

    आदरनीया शोभा जी ,कई दिन से दो पोस्ट लिखना चाह रही थी ,पर लगभग 10- १२ दिन से जागरण की साईट नही खुल रही थी,कल शाम कुछ कृपा दृष्टि हुई. ग्लेमर की दुनिया की ओर रुख करना चलिए उनकी पसंद हो सकती है,परन्तु शीर्ष पर पहुँचने के लिए सीढ़ियों के स्थान पर ऐसी लिफ्ट का सहारा लेना गलत है जो कभी भी धोखा दे सकती है.धन्यवाद आपकी त्वरित प्रतिक्रिया के लिए


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