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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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व्यथित धरती माता (विश्व पृथ्वी दिवस २२ अप्रैल पर )

Posted On: 19 Apr, 2016 में

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पृथ्वी दिवस पर आप सभी को शुभकामनाएं ,साथ ही पढ़ें अपनी माता धरती माता की करुण पुकार

अभी किसी धार्मिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला ,समाप्ति के समय नारे लगाये जा रही थे,धरती माता की जय ,गौ माता की जय.नारे सबने लगाये ,परन्तु जय जय कार का क्या अर्थ जब हम उसका महत्व न समझे .आज धरती माता की व्यथा पर ………….

धरती कहे पुकार कर,

,हे निर्दयी,कृतघ्न ,स्वार्थी मानव तुझसे श्रेष्ठ तो पशु-पक्षी हैं.तू गुणहीन होने के साथ बुद्धिहीन भी है, क्योंकि जिस पृथ्वी और उसके संसाधनों के कारण तेरा अस्तित्व है उनको ही विनष्ट कर तू खिलखिला रहा है ,आनंद मना रहा है स्वयम को जगत  का सबसे बुद्धिमान मानने वाले जीव, तेरी मूढमति पर तरसआता है  मुझको .तू जिस अंधाधुन्ध  लूट खसोट की प्रवृत्ति का शिकार हो स्वयम को समृद्ध और अपने आने वाली पीढ़ियों का भविष्य स्वर्णिम बनाना चाह रहा है , उनकी राहों में ऐसे गड्ढे खोद रहा है ,जिसके लिए वो तुझको कभी क्षमा नहीं करेंगें.विकास की दौड़ में भागते हुए तू  ये भी भूल रहा है कि आगामी पीढियां तेरे प्रति कृतज्ञता का  अनुभव नहीं करेंगी अपितु तुझको कोसेंगी कि तेरे द्वारा  उनका जीवन अन्धकारमय बना दिया ,उनको कुबेर बनाने के प्रयास में , उनको जीवनोपयोगी वायु,जल से वंछित कर दिया.सूर्य के  प्रचंड ताप को सहने के लिए विवश कर उनको कैंसर ,तपेदिक जैसे रोगों का शिकार बना डाला.  हे मानव मत भूल ,तेरे  कृत्यों के ही कारण गडबडाया  समस्त ऋतु चक्र  न जाने कब अति वर्षा  बाढ़,सुनामी ,चक्रवात के रूप में (विभिन्न नामों से)जल थल एक बनाते हुए पल में उनको तेरी सौंपी गई धन संपदा  के साथ आने वाली संतति को  असमय ही काल का ग्रास बना डाले .

तुझको सिखाया गया था…

क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच तत्व से बना शरीरा

हे मानव मेरी गोद में तूने  जन्म लिया , मेरे द्वारा प्रदत्त अन्न ,जल,फल -सब्जी और दूध से अपना शरीर पाला पोसा ,मेरे आभूषण वृक्षों ने तुझको प्राण दायिनी वायु प्रदान की, स्वयम जहरीली गासों के रूप में विषपान किया.मस्तक के रूप में मेरे पर्वतों ,उनसे निकली नदियों , फिर सागर ने  तेरे जीवन को सुगम बनाया.और तूने क्या किया ,पेड़ों को काट डाला,नदियों को प्रदूषित कर दिया ,सागर पर भी अपनी तानाशाही चलाते हुए जलचरों,वनस्पतियों, पर्वतों की शोभा को विनष्ट कर डाला .अपनी रक्षक ओजोन परत में  भी अपने लोभ से  छिद्रित कर दिया. मेरे दिव्य  गुण सहनशीलता के  कारण   मै तेरे सभी अपराधों को  क्षमा करती रही पर तेरे द्वारा उसका दुरूपयोग किया गया.
आ तुझको दिखाती हूँ कुछ दृश्य                                                         (विनष्ट होते  पेड )
.

deforestation-2 बंजर होती सूखी धरती

sookhaa जल के लिए तरसते लोग

ganda

29_05_2012-nadi क्या क्या देखेगा,तुने पर्वतों को नग्न कर दिया,वनीय पशुओं के आश्रय स्थल वनों को उजाड अपनी अट्टालिकाएं खड़ी कर ली .

समय समय पर मै अपने रौद्र रूप को दिखा कर तुझको चेतावनी भी दे चुकी ,विनाश झेलते हुए स्वय, को सर्वशक्तिमान मानते हुए तुने सब कुछ अनदेखा कर दिया.परस्पर दोषारोपण करते हुए अपने  अनुचित जूनून पर नियंत्रण नहीं किया .परन्तु कब तक आखिर कब तक झेलूंगी मै ये सब.

अब भी चेत मानव,  रोक दे अंधाधुंध वन विनाश.अपने बच्चों को संस्कार दे कि वो महत्व समझे वृक्षारोपण का ,उनके संरक्षण का.इन अमृत दायिनी सरिताओं पर अत्याचार रोक दे.इनके महत्व को समझ,वर्षाजल संचयन का महत्व समझ ,जल का दुरूपयोग रोक दे इसके लिए बच्चों को ही संस्कारित करना होगा कि वो इसका मूल्य समझें  , नदियों को गंदे पानी का घर बनाना बंद कर, सागर से मत खेल  ,पर्वत तेरे रक्षक हैं उनका क्षरण रोक .इस विनाशकारी पोलिथिन को सदा सदा के लिए विदा कर दे.पशु -पक्षियों के घरोंदे उजाडकर उनको जीवन से वंछित मत कर.

सदा लिया ही है  मानव तूने सभी से .  कुछ तो उपकारों का बदला चुका ,किस किस का ऋण लादे रहेगा अपने सिर पर.बचा ले अपने को अपनी भावी संतति को

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rafe के द्वारा
April 26, 2016

Very Nice!!!

    nishamittal के द्वारा
    April 27, 2016

    धन्यवाद

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
April 25, 2016

आदरणीय निशा मित्तल जी , धरती के दर्द को आपने बखूबी शब्दों मे ब्यक्त किया है । बहुत ही अच्छा लिखा है लेकिन सवाल यही है कि आखिर इंसान धरती के इस दर्द को कब समझेगा ? हो सकता है तब तक बहुत देर हो जाए।

    nishamittal के द्वारा
    April 25, 2016

    आपका हार्दिक आभार बिष्ट जी अपने विचारों से अवगत कराने के लिए

Dr S Shankar Singh के द्वारा
April 24, 2016

aadarneeyaa, saadar namaskar. ek atyant saarthak evam upyogi lekh ke liye bahut bahut badhaai. maanaw jaati nen dharati maataa ka bahut shoshan kiya hai. dharati maataa apna pratishodh awashy legi. ham abhi bhi chet jaayen to theek hai. ek mahatwpoorn Vishay ki or dhyan aakarshan ke liye aap badhaai ki patr hain. aj mere kampyutar men transliteration suwidha kaam nahin kar rahi hai. is kaaran zyaadaa likh panaa sambhaw nahin hai. saabhaar

    nishamittal के द्वारा
    April 24, 2016

    आपका हार्दिक आभार,बहुत अन्तराल के पश्चात आपको पोस्ट पर देख कर सुखद लगा.

sadguruji के द्वारा
April 23, 2016

सदा लिया ही है मानव तूने सभी से ! कुछ तो उपकारों का बदला चुका ! किस किस का ऋण लादे रहेगा अपने सिर पर ! बचा ले अपने को अपनी भावी संतति को ! आदरणीया निशा मित्तल जी, बहुत सार्थक और प्रभावी संदेशपरक लेख व चित्र ! बहुत अच्छी और अतयन्त विचारणीय प्रस्तुति हेतु बहुत बहुत अभिनन्दन और सादर आभार !

    nishamittal के द्वारा
    April 23, 2016

    आभार लेख की सराहना हेतु आपका

jlsingh के द्वारा
April 23, 2016

आदरणीया, सादर अभिवादन! आपके आलेख को पूरा सम्मान देते हुए मैं यही कहना चाहता हूँ, की अगर विकास चाहिए तो प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण होगा. हमें सुख, चैन, आराम चाहिए तो जंगल कटेंगे, नदियों की धाराएं प्रदूषित होंगी.प्रकृति भी संतुलन बनाना जानती है तभी तो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रहा है,मौसम में बदलाव आ रहा है. कहीं अनावृष्टि तो कहीं अतिवृष्टि…. या तो हम जन संख्या पर नियंत्रण करें या फिर गांव जंगलों की और कदम बढ़ाएं …क्या यह सम्भव है….?

    nishamittal के द्वारा
    April 23, 2016

    बिलकुल सही कहा आपने सिंह साहब,विकास चाहिए तो विनाश तो होगा क्योंकि हमारे यहाँ जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है और साधन उस अनुपात में नही बढ़ सकते ,परन्तु जहाँ चाह वहाँ राह,.जिस प्रकार रेजिडेंशियल बिल्डिंग्स का जंगल बढ़ रहा है,उसमें यदि ये मानक तय किये जाएँ कि उसके एक निश्चित क्षेत्र में पेड़ लगाना ,उनकी देखभाल करना आवश्यक है.मेरी एक मित्र ने बताया था कि पंजाब में जालन्धर शहर में कोई भी मकान का नक्षा पारित करवाते समय ये अनिवार्य शर्त है.वहां हर मालिक को निश्चित जगह छोडनी अनिवार्य है ,जहाँ पेड़ प्रशासन लगा कर देता है,और उसको हर भरा रखने का उत्तरदायित्व मालिक का होता है,ऐसे नियम अन्यत्र होंगे भी साथ ही बनाये जा सकते हैं,और उससे भी अधिक आवश्यक है जागरूकता .जनसंख्या नियंत्रण जिस दिन लागू होगा उसी दिन यहाँ साम्प्रदायिकता का मुद्दा पुनः बोतल से बाहर निकलेगा और रुदालियाँ विलाप करने लगेगी

    nishamittal के द्वारा
    April 21, 2016

    आभार आलेख को सम्मिलित करने के लिए

    nishamittal के द्वारा
    April 21, 2016

    हार्दिक आभार पोस्ट को सम्मिलित करने हेतु सेंगर साहब

Shobha के द्वारा
April 20, 2016

प्रिय निशा जी आपका लेख पढना मेरे लिए सबसे रुचिकर विषय है लेख पढ़ा आँखों में पानी आ गया यदि इसी तरह जनसंख्या बढती रही पानी हवा कुदरत की देन भी ईश्वर की बनाई सृष्टि के लिए कम पड़ जायेगी |लगातार पेड़ काटे जा रहे हैं बारिश कैसे हो आप ऐसे ही सबके लिए ज्ञानवर्धक लेख लिखती रहें |

    nishamittal के द्वारा
    April 21, 2016

    आदरणीया शोभा जी आपकी स्नेहासिक्त विचारपूर्ण प्रतिक्रिया अभिभूत करती है,आभार


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