chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

309 Posts

13192 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2711 postid : 901

पर्यावरण संरक्षण सबका दायित्व (पर्यावरण दिवस पर विशेष आग्रह )

Posted On: 3 Jun, 2016 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Save-The-Environment विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक निवेदन अपने सभी साथियों व पाठकों से.(पूर्व प्रकाशित लेख )

तन को जला डालने वाली दाहक गर्मी,भीषण ठण्ड, नवम्बर दिसंबर में भी चलते पंखे वो भी उत्तर भारत में, अतिवृष्टि ,बाढ़ों का प्रकोप,पूर्णतया सूखा,आग उगलती धरती ! कभी कभी तो लगता है जो हमने भूगोल पढ़ते समय प्रकृति की देन मनोहारी ऋतुओं ,कलकल करती नदियों, हिमाच्छादित पहाड़ों, हरित वन्य प्रदेशों के विषय में पढ़ा था वो आज पूर्णतया परिवर्तित रूप में हमारे समक्ष है.क्या प्रकृति का चक्र गड़बड़ा गया है?आज वैज्ञानिक , मौसम विज्ञानी सब चकित हैं,नित नवीन आकलन होते हैं,परन्तु प्रत्यक्ष रूप में परिणाम कुछ दूसरे ही रूप में दृष्टिगोचर होता है..यदि नयी पीढी को ये कहा जाय कि अभी कुछ ही समय पूर्व की बात है,कि मसूरी,नैनीताल तथा शिमला आदि पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर पंखें,कूलर होते ही नहीं थे,तो क्या वो विश्वास कर सकेंगें.विश्व में किसी स्थल पर सुनामीभूकंप,,कभी जंगलों में लगती आग का भयावह दृश्य,वन्य पशु-पक्षियों की लुप्त होती या घटती प्रजातियाँ,, अनिष्ट की आशंकाएं जो आज पंडितों द्वारा नहीं अपितु आधुनिकतम विज्ञानं वेत्ताओं द्वारा की जा रही हैं.

वर्षा कब और कितनी होगी ,गर्मी कितनी पड़ेगी ,शीत कम रहेगा या अधिक ,कभी घाघ भड्डरी कवि अपने आकलनों से ही बता देते थे,कब क्या बोना चाहिए ,फसल काटने का सही समय आदि.प्रकृति का रूप इतना सरल था कि स्वयं निरक्षर कृषक प्रकृति के रूप को पहचान कर अपना कर्म पूर्ण करता था,और आज मौसम विभाग जहाँ पूर्ण शिक्षित व विषय विशेषज्ञ उपस्थित हैं ,को अपनी गणनाओं तथा अनुमानों पर भरोसा नहीं जाता पाता.मौसम विभाग घोषणा करता है अति वृष्टि की, पता चला मानसून राह में ही अटक गया और वर्षा हुई नहीं.ग्रीष्म ऋतु में गर्मी न हो कर बाद में होती है,अर्थात अनिश्चितता .इस सब परिवर्तन के लिए कोई और नहीं हम ही उत्तरदायी हैं.. carbon-emissions-fuelling-atmosphere_5106-28kn1rs

पर्यावरणविद अध्ययन कर ,अनुसन्धान के रूप में नित नूतन निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं,परन्तु कभी सत्य तो कभी मिथ्या उनके अनुमान, तथ्य निराशाजनक चित्र प्रस्तुत करते हैं.पर्यावरण अर्थात हमारे चंहूँ ओर का आवरण हमारी कृत्यों के कारण हमारे लिए विपदाजनक बन गया है.हमारी ओजोन परत जो हमारी रक्षक है स्वयं उस पर खतरा मंडरा रहा है.

पर्यावरण के सम्बन्ध में यूँ तो चिंता विश्वव्यापी है परन्तु आज हम अपने देश के संदर्भ में विचार करें तो स्थिति बहुत अधिक विस्फोटक दिखाई देती है.कारण हमारी निरंतर बढ़ती जनसँख्या और सीमित साधन.आज जब हम दुनिया में जनसँख्या के दृष्टिकोण से बस चीन से पीछे हैं और अनुमान है कि २०५० तक हमारा देश विश्व में जनसँख्या का दृष्टिकोण से शीर्ष पर होगा. विश्व के क्षेत्रफल का मात्र २.४% और विश्व की जनसँख्या का १८%!………… संसाधनों के मामले में हम आज भी विकासशील हैं.इतनी विशाल जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूर्ण करना बहुत दुष्कर है.परिणामस्वरूप हमारे उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर दवाब बढ़ रहा है पेय जल का अभाव,ऊर्जा की कमी,कंक्रीट के जंगलों में परिणित होते हरे-भरे वन्य प्रदेश,भोज्य पदार्थों की कमी तथा उपलब्ध साधनों का समान वितरण न हो पाने के कारण अव्यवस्थाएं बढ़ती जा रही हैं.हमारी कृषि भूमि बंजर बन रही है,मिटटी की उपजाऊ ऊपरी परत १२ अरब टन मिटटी बह कर नष्ट हो रही है मिटटी का ६०% भाग कटान,लवणता,खनिज(हानिकारक)औरजनसँख्या के अनुपात में पेयजल की उपलब्धता संकट में है. . बढ़ते औद्योगीकरण के दुष्परिणाम भी आज प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग आदि के रूप में अपने जौहर दिखा रहे हैं. तूफ़ान,चक्रवात,.बाढ़ें,सुनामी ,भूकम्प आदि धन-जन का जो विनाश करते हैं वो सभी पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन का परिणाम है.

.जल.वायु,मिटटी सभी प्रदूषण की गिरफ्त में हैं ध्वनी प्रदूषण के कारण हमारी श्रवण शक्ति प्रभावित हो रही है.श्वास लेने के लिए महानगरों में ऑक्सीजन चेम्बर्स की व्यवस्था विशिष्ठ प्रभावित लोगों के लिए व्यापार का माध्यम बन रही है,पीने के पानी के लिए मध्यम वर्ग तथा उच्च वर्ग घरों में जल शुद्धिकरण यंत्र का प्रबंध करने या मिनरल जल पीने को विवश है और निर्धन वर्ग वही प्रदूषित आर्सेनिक तथा अन्य विषैले पदार्थ मिश्रित जल पी पी कर घातक रोगों की चपेट में है. .गर्मी व प्रदूषण बढाते वाहन अब कष्टदायक लगते हैं.आग उगलती चिमनियाँ श्वास लेना दूभर बना रही हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार .हमारी पवित्र जीवन दायिनी,मोक्षदायिनी गंगा यमुना आज आचमन के व स्नान के योग्य नहीं रह गयी हैं.पर्यावरण के संतुलन के नियंताओं में प्रमुख “हरित वन” कंक्रीट के जंगलों में बदल रहे हैं,बहुमंजिला इमारतें,शोपिंग माल्स उनका स्थान ले रहे हैं.landfill1

पर्यावरण के लिए सर्वाधिक घातक पोलीथिन को आज हमने अपने लिए अपरिहार्य बना लिया है.इस पोलीथिन के कारण नदी नाले अवरुद्ध हो रहे हैं और यही ,पशुधन के लिए प्राणघातक सिद्ध हो रही है.जिस गौमाता को बचाने के लिए हम पुकार कर रहे हैं,उसका जीवन भी इसी पोलिथीन के कारण संकटग्रस्त हो रहा है.धरती की उर्वराशक्ति को भी यही नष्ट कर रही है.

पतितपावनी नदियाँ,सागर सभी को प्रदूषित हम कर रहे हैं.उद्योगों के कारण बड़े छोटे सभी उद्योगों का विषैला उच्छिष्ट ,सीवर पम्प ,दाहसंस्कार के बाद शव भी यही बहाए जा रहे हैं

.जो जल हमारा जीवन है,जिस धरती के बिना हमारा अस्तित्व नहीं है,जो वायु हमारी प्राणदायिनी है,उसका अनुचित दोहन विनाश का दृश्य तैयार कर रहा है और हम हैं कि सो रहे हैं,विपदा अपने विनाशकारी स्वरूप में आती रही है तब जरा हमारी तन्द्रा भंग होती है और हम अपना दोष दूसरों पर डालकर स्वयं को निर्दोष मान लेते हैं. .

सरकारी प्रयास उस सीमा तक नही हो रहे है जितने वांछितहैं.,इन मुद्दों पर सोच-विचार का.योजनायें बनती हैं,कागजों पर बेतहाशा धन पानी की तरह बहाया जाता है,पंचतारा होटलों में मीटिंग्स करते हुए मिनरल वाटर शीतल पेय पीते हुए तथा एयर कंडीशनर्स की हवा खाते हुए.

अब भी समय है,आवश्यकता है,हमारे स्वयं के चेतने की तथा सरकार के सजग होने की.,उचित नीति निर्माण की,और उससे अधिक उन नीतियों के क्रियान्वयन की.प्रयास किये गये हैं यथा दिल्ली में मेट्रो का चलाया जाना,एल पी जी से वाहनों का सचालन आदि.परन्तु भारत केवल दिल्ली में नहीं बसता.और इतने कम प्रयास इतनी भीषण समस्या का समाधान के लिए ऊंट के मुख में जीरे के समान ही हैं .वनों को बचाने के लिए प्रयास सरकारी स्तर पर ही संभव हैं.नदियों में गिरने वाले दूषित पदार्थों को रोकने की व्यवस्था सरकार ही कर सकती है.विशिष्ठ कृषि उत्पादन पद्दतियों को अपना कर उत्पादन की गुणवत्ता तथा मात्रा बढाया जाना जरूरी है.पोलिथींस पर प्रतिबंध लगाया जाना अपरिहार्य बन चुका है.

सरकार द्वारा जनसँख्या वृद्धि को रोकने के लिए सकारात्मक योजना बनाना तथा सभी पूर्वाग्रहों को त्याग कर,वोट राजनीति को छोड़ कर उसको युद्ध स्तर पर लागू करना आवश्यक है.जब तक जनसँख्या वृद्धि पर रोक नहीं लगेगी,संसाधन वृद्धि के सभी प्रयास अपर्याप्त ही सिद्ध होंगें.

सरकारी प्रयासों के साथ स्वयं हमारी जागरूकता बहुत आवश्यक है,यदि हम चाहे तो पोलीथिन के प्रयोग को स्वयं रोक सकते हैं.पेपर बैग या कपडे की थैलियों को साथ रख कर इस समस्या से बचा जा सकता है.ठेले आदि पर बिकने वाले सामानों को पोलिथीन में बेचने से बचाने में हम स्वयं योगदान दे सकते हैं.यदि हम पोलिथीन बेग में सामान नहीं लेंगें तो विक्रेता उसका प्रयोग स्वयं ही बंद कर देगा.

नवीन भवनों के निर्माण के समय पेड़ लगाने की नीति को कठोरता से लागू किया जाना आवश्यक है,.इन पेड़ों के संरक्षण का उत्तरदायित्व समझना भी आवश्यक है.कुछ शहरों में ऐसी व्यवस्था की गई है कि अपना घर बनाते समय   वृक्ष सरकार लगाकर देगी और उनके संरक्षण का दायित्व गृह स्वामी का होगा. ऐसा नियम सभी स्थानों पर कम से कम नए घरों के निर्माण पर कठोरतापूर्वक  लागू  किया जाय तो निश्चय ही धरती हरी भरी हो सकेगी.

बहुमंजिला भवनों के निर्माण के कारण विकास की अंधी दौड़ में  धरती को वृक्ष विहीन बनाने से पूर्व ये अनिवार्य नियम बनाया जाय कि जितने वृक्ष कटेंगें उतने वृक्ष लगाना और उनकी देख रेख का उत्तरदायित्व सम्बन्धित संस्थान का हो.

एक निवेदन और यदि बच्चों के जन्मदिवस आदि पर या विशिष्ठ अवसरों पर बच्चों में वृक्ष लगाने की भावना को जागृत किया जाय साथ ही किसी एक वृक्ष का उत्तरदायित्व यदि एक परिवार ले सके तो निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान होगा.इसी प्रकार किसी की मृत्यु के पश्चात भी उसकी स्मृति में पेड लगाने का निश्चय हम लें और उसकी देख भाल परिवार के सदस्य के रूप में करें.उपहार आदि देने में भी परिस्थिति के अनुसार पेड पौधे उपहार में दे. और इस अभियान से जुड़े रहें  और  उसका परिणाम सामने अवश्य आएगा.स्कूल्स आदि में यद्यपि पर्यावरण को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का कार्य किया गया है.परन्तु स्कूल्स में अध्यापक तथा विद्यार्थी सभी उसको मात्र औपचारिकता समझते हैं.इसी प्रकार खानापूर्ति के लिए कभी कभी माननीयों द्वारा भी वृक्षारोपण किया जाता है,परन्तु शायद कुछ दिन बाद वही पौधा कूड़े में ढूँढने से भी नहीं मिलता.इसी प्रकार “राष्ट्रीय सेवा योजना” आदि के शिविरों में भी वृक्षारोपण कार्यक्रम को कभी कभी सम्मिलित किया जाता है,परन्तु लगाने के बाद उसकी देखभाल का उत्तरदायित्व किसी का नहीं होता.अतः पौधे लगाने के कार्यक्रम में व्यय हुआ धन व्यर्थ हो जाता है.

नीति निर्धारण में हम पीछे नहीं बस आवश्यकता है,उन नीतियों के क्रियान्वयन की.

इसी प्रकार बहुत तीव्र आवाज़ में संगीत आदि नहीं बजायेंगें ऐसा निश्चय हम सभी को लेना हमारे लिए ही फलदाई होगा.अतः आईये हम इस पर्यावरण दिवस पर हम सभी शपथ लें पर्यावरण के संरक्षण की.शपथ कागजी नहीं वास्तविक रूप में.अपने स्तर पर पोलिथीन के प्रयोग को बंद करने व करवाने की,वृक्षों की देखभाल की,तथा ध्वनी प्रदूषण से बचने की.यदि यह निश्चय कर हम उसका पालन कर सकें तो स्वयं को तथा आगे आनेवाली पीढ़ियों को जीवन प्रदान करने में सक्षम होंगें.

दिए गए आंकडें व चित्र नेट से साभार.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.83 out of 5)
Loading ... Loading ...

27 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ravi1992 के द्वारा
June 4, 2016

बहुत ही सही ….आज पर्यावरण के प्रति हमें न केवल जागरूक होना होगा बल्कि इस दिशा में अतिशीघ्र कार्रवाई भी करनी होगी

    nishamittal के द्वारा
    June 5, 2016

    धन्यवाद आपका

sadguruji के द्वारा
June 4, 2016

आदरणीया निशा मित्तल जी ! सादर अभिनन्दन ! अच्छे लेख के लिए बहुत बहुत बधाई ! लेख पुराना है, किन्तु आज भी प्रासंगिक और सामयिक है ! समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है ! आपकी बात से सहमत हूँ कि कमी निति निर्धारण में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन में है ! पॉलीथिन पर रोक लगी थी, किन्तु फिर शुरू हो गई ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2016

    आभार महोदय लेख पसंद करने के लिए

Shobha के द्वारा
June 4, 2016

प्रिय निशा जी पर्यावरण का सम्मान न करने का असर देख रहे हैं छोटे – छोटे बच्चे अस्थमा से पीड़ित है खिन म क्र बरसात कहीं सूखा आँखे जलती है की रोग बढ़ रहे हैं जिनका सडक पर घर है उनसे पूछिए जैसे हम काला धुँआ गले में जमता रहता है अति उपयोगी लेख |

    nishamittal के द्वारा
    June 4, 2016

    आदरणीया शोभा जी ये मेरा पुराना लेख है परन्तु पर्यावरण समस्या ज्यों की त्यों अपितु और भी विकराल होती जा रही है अतः पुराना ही पोस्ट किया आभार

rameshagarwal के द्वारा
June 3, 2016

जय श्री राम निशाजी हमारे पुराणों में पर्यावरण बचाने के लिए बहुत सुझाव दिए थे.कहा जाता की यदि हम प्रकर्ति की इज्ज़त करेंगे तो प्रकर्ति हमारे ऊपर मेहरबान होगा लेकिन आधुनिकता की राह में सब भूल गए और अब परिणाम भुगत रहे आज जागरण में पढ़ा के १५० सालो में पह्ली बार पेरिस में एफेल टावर बाढ़ की वजह से बंद रहा.सब जगह अनहोनी हो रही यदि अभी नहीं चेते तो परिणाम के लिए तैयार रहे,इतने अच्छे और सार्थक के लिए साधुवाद

nishamittal के द्वारा
June 8, 2011

रौशनी इतना परिश्रम कमेन्ट देने के लिए? समझ में नहीं आरहा खुश होना चाहिए या तुम्हारा कष्ट देखकर दुखी .आशा है जागरण सभी यूजर्स की समस्या का समाधान अवश्य करेगा.विशेष आभार

roshni के द्वारा
June 8, 2011

निशा जी आखिर रात के १२.३० बजे मै कमेन्ट करने में सफल हुई … jj वालों ने सच में परेशान ही कर दिया है ……… आपका लेख बहुत ही अच्छा है पर्यावरण को बचाना हर आम नागरिक की जिमेवारी है और उसे छोटे छोटे उपाए करके इसमें हिस्सा लेना चहिये .. सुंदर आलेख के लिए बधाई

rajeevdubey के द्वारा
June 6, 2011

निशा जी , लेख पर साधुवाद… अभी हाल ही में हिमालय क्षेत्र में भारत तिब्बत सीमा तक गया था और प्रकृति एवं पर्यावरण से सम्बद्ध प्रश्नों से साक्षात् होने का अवसर मिला था… आपके लेख में उठाये गए मुद्दे सभी के लिए चिंतन और क्रियान्वयन के योग्य हैं.

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    आदरणीय दुबे जी,बहुत लम्बे अन्तराल के पश्चात आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त करना अच्छा लगा.दुर्भाग्य कि चिंतन व चिंता के अतिरिक्त हम कुछ नहीं कर पाते.आभार.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
June 5, 2011

निशा जी अभिवादन दो बार कमेन्ट कर चूका हु पर बार बार इनवैलिड दे रहा है जागरण की ये नै सिक्योरिटी कोड व्यवस्था बहुत असहज कर रही है परेशां कर रही है … आपका लेख बहुत ही व्यवस्थित तार्किक और आंकड़ो से सुसज्जित है . बहुत अच्छा लगा पढके … मैंने स्वयं कुछ नियम बनाये क्योकि शुरुआत स्वयं से की जाये तभी ऐसे विषयो पर कुछ सकारात्मक किया जा सकता है मै जब भी सब्जी लेने जाता हु कपडे का झोला प्रयोग करता हु . अपने लिए मैंने ए. सी . का प्रयोग नहीं कर्ण एक निश्चय किया है .इसके अतिरिक्त पौधे लगाना भी एक कार्य है .. आज पालीथीन के विरुद्ध एक कार्यक्रम था पर कल से राष्ट्रीय घटनाक्रम कुछ इस तरह से चला की पतंजलि पीठ के कार्यक्रम में ही रह गया .. और वह नहीं जा सका . खैर मूल बात ये है की हम सभी को अपने स्तर से ही कदम उठाने पड़ेंगे भौतिक आवश्यकताओ पर नियंत्रण रखना सबसे जरुरी है और पर्यावरण के प्रति मित्रवत व्यवहार करना जरुरी है .. विजेंद्र जी की बेहतरीन कविता के रूप में जवाब पढ़कर अच्छा लगा .. सार्थक लेख के लिए शुभकामनाये

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    निखिल जी,पर्यावरण के संरक्षण के प्रति आपकी जागरूकता व दृढ़ता जान कर बहुत सुखद लगा.विजेयेंद्र जी की कविता बहुत अच्छी लगी.व्यक्ति का संवेदनशील मुद्दों के प्रति जागरूक होना उसके चरित्र की दृढ़ता ,बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है.प्रतिक्रिया के प्रति आभार.

narayani के द्वारा
June 5, 2011

नमस्कार निशाजी हमारा योगदान पर्यावरण को सुरक्षित रखने में ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए .सत्य कथन है की अधिकारों से ज्यादा हमे अपने कर्तव्य का अहसास होना चाहिए .बहुत अच्छा लेख है .आपका धन्यवाद नारायणी

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    प्रतिक्रिया व लेख पसंद करने के लिए आभारी हूँ.

VIJENDER PAUL के द्वारा
June 5, 2011

वेदों ओर पुरानों ने हमें एक बात बताई ब्रह्मा जी ने बड़ी मेहनत से ये सृष्टि रचाई साथ ही सुंदर पृथ्वी भी उतपति मैं आई नौ ग्रहों के साथ मिलकर सूर्य की परिकर्मा लगाई तभी ब्रह्मा जी को जीवन का ख्याल आया हमारी पृथ्वी को इसके लिए उपयुक्त पाया अग्नी, जल, वायु, मिटटी ओर आकाश बनाया तभी तो पेड़, पौधे, पहाड़, नदियों रूपी चक्र छाया हरी भरी हरियाली, समुद्र व् नदियाँ जब छाये तो एक कौशीय जीव प्रथम उत्पति में आये किर्यास्वरुप भांति भांति के जीव व् पक्षी कहलाये डार्विन जी अपनी खोज से हमें एक बात हैं समझाए लाखों वर्षों बाद ही हम बंदर से मानव बन पाए जब इस सुंदर सृष्टि की रचना पूरी हो आई तो विष्णु जी ने पालनकर्ता की जिम्मेवारी खूब निभाई चोदह बार अवतार लेकर धरा पर आये भाई स्वयं राम ओर कृष्ण के रूप मैं मानवता सिखाई एक बार मानव जब अस्तित्व मैं आया वह इस कुदरत पर कहर बनकर छाया जंगल काटे, पहाड़ तोड़े समुन्द्र में भी समाया उन्नति के नाम कुदरत को दिया प्रदुषण का साया पर दुसरे जीवों की पीड़ा को कभी समझ न पाया हे मानव! सुन इस प्रकृति की है ललकार भूकंप, सुनामी, बाढ़ आदि की लगा चुकी फटकार इस संकेत को समझ, बन इतना तो समझदार बंद कर कुदरत के कानून को करना दरकिनार वरना अपने हाथों धव्ष्ट कर जायेगा सपनों की मीनार ये संसाधन एक धरोहर हैं ना की तेरा खजाना कृत्व्य है तेरा इसे सुंदर व् स्वच्छ बनाना अगली पीढ़ी तक इस धरोहर को पहुँचाना ना की प्रदुषण फैला कर इसे मिटाना आओ हम सब मिलकर एक कसम खाएं ये बात स्वयं सीखें व सबको सिखाएं हमारी इस पृथ्वी को स्वर्ग सी सुन्दर बनायें इसकी जरुरत अब हम सबको समझाएं सब मिलकर पेड़ पौधे लगायें व उगायें प्रदुषण फैलने से वातावरण को बचाएं प्लास्टिक आदि को उपयोग में ना लायें echo friendly सुन्दर सा संसार बसायें विजेंदर पाल, (INDIAN NAVY ) VISAKHAPATNAM विशव पर्यावरण दिवस पर आपके लिए सन्देश (स्वलिखित )

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    विजेन्द्र जी,सादर अभिवादन.आपकी कविता बहुत ही प्रेरनादायी है.जो बात लेख के रूप में प्रस्तुत करने में मुझको इतना समय लगा आपने बहुत ही रोचक व बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया .बधाई विचारों के लिए भी और प्रतिभा के लिए भी.

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    मेरे आलेख पर आपकी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए आभार.

alkargupta1 के द्वारा
June 5, 2011

निशाजी, दिए गए आंकड़ों के साथ सचित्र आलेख बहुत ही महत्त्वपूर्ण है व विचारणीय है ! क्योंकि पर्यावरण के संरक्षण की ज़िम्मेदारी हर आम नागरिक की ही है तभी यह प्रदूषण रहित व संरक्षित रह सकता है ! अति उत्तम लेख के लिए बधाई !

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    अलका जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ.

संदीप कौशिक के द्वारा
June 5, 2011

आदरणीया निशा जी, हरियाली से परिपूर्ण आपका ये सामयिक आलेख पढ़कर अच्छा लगा | पर्यावरण के नित्य-प्रति बदलते समीकरणों के कारण आज इस वैश्विक समस्या पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी हो गया है | चूंकि समस्या वैश्विक है तो हल खोजने के प्रयास एवं कोई इस दिशा में कोई कदम भी विश्व-स्तरीय ही होना चाहिए | लेकिन निराशाजनक बात ये है कि इसके लिए हर व्यक्तिगत प्रयास बिल्कुल नगण्य-सा है लेकिन अगर यही प्रयास लोगों को जागरूक करते हुए बड़े स्तर पर किए जाएँ तो निश्चय ही फलदायी हो सकते हैं | आलेख के लिए आपके द्वारा चुने गए रंग-संयोजन के लिए आपको बधाई | बहुत अच्छा लगा आपका ये प्रयास दोनों अर्थों में…..रंग-संयोजन में भी और पर्यावरण के प्रति जागरूकता के लिए भी | :)

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    धन्यवाद संदीप लेख व रंग संयोजन पसंद करने के लिए.हम सबको पर्यावरण के प्रति अपना दायित्व समझना जरूरी है.

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 4, 2011

आदरणीय निशा दीदी जी….. सादर नमस्कार ….. यह देख कर हैरानी होती है की आप कितनी मेहनत करती है आप ….. वैज्ञानिकों के आंकलन देख कर हैरानी होती है , पिछले साल उन्होंने कहा था की सारी बर्फ पिघल जायेगी , लेकिन उनके कहने के सिर्फ दो महीने के बाद ही इतनी ज्यादा तादाद में बर्फ पड़ी की सभी हैरान रह गए …… कुदरत के आगे सब फेल है ….. बेहतरीन लेख

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    धन्यवाद नए संबोधन के लिए तथा परिश्रम को मान्यता देने के लिए.प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का वैज्ञानिकों का दावा १००% सत्य नहो हो सकता

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
June 4, 2011

आदरणीय निशा जी….. सादर नमस्कार ….. जिस तरह से हम लोग अपने पर्यावरण के प्रति उपेक्षा का रुख अपनाए हुए हैं…. वो दिन दूर नहीं है जब की हम सारे संसाधन लगा देने के बाद भी इस प्रकृति के हाथो पराजित हो जाएंगे…. बेहतर यही है की हम अभी से अपने पर्यावरण को बचाने की पहल करें ……. सरकार क्या करती है उस पर निर्भर न रहें……… अच्छा लेख….

    nishamittal के द्वारा
    June 6, 2011

    पियूष जी,आपका कथन वास्तविकता दर्शा रहा है.अपनी करनी आपे भरनी वाली स्थिति वर्तमान में है और सम्भवतः एक समय ऐसा हो जब हमारे हाथ में कुछ भी शेष न हो.प्रतिक्रिया के लिए आभार.


topic of the week



latest from jagran