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विश्व गुरु बने मेरा भारत

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आईये अपनी हिंदी को जन जन तक पहुंचाएं (हिंदी दिवस पर

Posted On: 11 Sep, 2016 में

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बधाई हिंदी भाषा के इस शिखर को छूने के लिए

गर्वोन्नत मस्तक हो जाता है हर देशभक्त भारतीय का जब वह यह आनन्ददायक समाचार सुनता या पढता है. कि हमारी भाषा विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बन गयी है .सच में हिंदी का वैश्विक पटल पर बढ़ता महत्व बहुत ही सुखद है,,अन्तराष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध,अध्ययन ,कार्यशालाएं ,सेमिनार्स ,गोष्ठियों ,हमारे हिंदी प्रेमी विद्वानों के प्रयासों  के कारण ही यह सुखद अवसर आया .

हमारे देश में भी हिंदी ब्लागिंग आदि के माध्यम से हिंदी का महत्व अंतर्जाल के माध्यम से बुलंदियां छू रहा है. परन्तु परन्तु इतना सब कुछ होते हुए भी आप अग्रलिखित मेरे विचारों को पढ़कर बताएं मैं कहाँ गलत हूँ और आज भी हमारी प्रिय हिंदी देशवासियों के ह्रदय की रानी नही बन पायी

थाली में खाना उसी में छेद करना मुहावरा उन अधिसंख्यक देशवासियों पर लागू होता है ,जो हिंदी में सोचते हैं, ,हिंदी सीख कर ही पलते बड़े होते हैं,हिंदी के माध्यम से अपने दैनिक व्यवहार करते हैं,हिंदी गाने सुनते हैं,हिंदी फिल्में देखते हैं ,हिंदी समाचार सुनते हैं,टी वी के हिंदी कार्यक्रम हिंदी के देखते हैं,हिंदी बिछाते ओढ़ते और हिंदी में स्वप्न देखते हैं,लेकिन स्वयम को हिंदी भाषी कहलाने में अपमान मानते हैं,अपने बच्चों को हिंदी सिखाना नहीं चाहते,उन स्कूल्स में बच्चों को प्रवेश दिलाकर स्वयम को आधुनिक मानते हैं जहाँ हिंदी शब्द बोलने पर दंड मिलता है.बड़े गर्व से कहते है हमारे बच्चों को हिंदी की गिनती नहीं आती,हमारे बच्चों को हिंदी वर्णमाला याद नहीं आदि आदि ………….

जब संस्कार ऐसे मिलेंगें घुट्टी में तो कैसे सीखे नई पीढी  अपनी माँ का सम्मान करना ?हिंदी हर भारतवासी के लिए माँ के समान ही है, वही हिंदी जो हिंदी हर भारतीय के माथे की बिंदी होनी चाहिए,जो हिंदी में विश्व में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख भाषाओं में एक है, हिंदी को प्रोत्साहन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिल रहा है तथा वहाँ पढाई भी जा रही है , परन्तु दुर्भाग्य से उस माँ का हर कदम कदम पर अपमान होता है.

>,हिंदी के प्रति कुलीन परिवारों में तो हीन भावना है ही ,निर्धन वर्ग भी अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने बच्चों को भूखा रह कर भी अंग्रेजी स्कूल में पढाने की कामना रखता और यथासंभव पूरा करता है .स्कूल अंग्रेजी माध्यम का हो भले ही  वो गली मौहल्लों में घर घर खुले हुए स्कूल ही हों.उनमें पढ़ाने वाली शिक्षिकाएं 1000 रुपए मासिक वेतन पर पढ़ा रही हो अप्रशिक्षित हों.बस बच्चा अंग्रेजी के टूटे फूटे शब्द बोल ले गलत या सही का तो न उनको पता न बच्चों को .वो प्रसन्न हैं   कि बच्चा अंग्रेजी सीख रहा है.

मध्यमवर्गीय परिवारों में भी ये रोग बहुत गहराई से पैठ बनाये हुए है. बस बच्चा अंग्रेजी कविता  सुना दे ,जिसको    रटने में उसका और स्वयम मातापिता का सम्पूर्ण समय बीत जाता हो , मातापिता का मस्तक गर्वोन्नत हो जाता है .बच्चों पर दोहरी मार को लेकर झींकना मंज़ूर है,स्कूल्स द्वारा लागू मनचाही फीस और अन्य व्यय को लेकर अपने बजट को बिगाड़ना पड़े  परन्तु स्कूल का  माध्यम अंग्रेजी ही हो. दूसरे शब्दों में यदि कहा जाय कि हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले वो बच्चे हैं जिनके पास बिलकुल ही साधन नहीं हैं तो अतिश्योक्ति नहीं ,( साधन होते हुए भी बच्चों को केवल अंगेजी माध्यम का दास न बनाना अपवाद स्वरूप ही है.)

गृहणियां भी जो हिंदी का प्रयोग बचपन से अपने घरों में देखती सुनती  हैं, गलत बोले या सही हिंदी शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर ही स्वयम को स्मार्ट समझती हैं.एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ,दुकानदार,रिक्शे वाला  के सामने भी अंग्रेजी के शब्द बोलने वाला ग्राहक  वी आई पी होता है.(जबकि उसको  स्वयम  उन शब्दों का अर्थ नहीं पता  )

औरों को क्या कहा जाय हमारे नेता अंग्रेजी में भाषण देकर स्वयम को विद्वान् समझते हैं,ये बात मैं दक्षिण भारतीय नेताओं की नहीं कर रही हूँ अपितु उत्तर भारतीय नेताओं की भी यही मनोवृत्ति है. युवा पीढी के रोल माडल कहलाने वाले फ़िल्मी अभिनेता अभिनेत्रियाँ  जिन हिंदी फिल्मों से प्रसिद्धि प्राप्त कर स्टार बनते हैं,धनकुबेर बनते हैं (अपवाद स्वरूप श्री अमिताभ बच्चन जी तथा चंद  अन्य अभिनेता ) ,किसी भी समारोह में अंग्रेजी में ही बोलेंगें.इन सबसे बढ़ कर प्रशासनिक अधिकारी जो कहलाते जनसेवक हैं लेकिन हिंदी में व्यवहार नहीं करते अंगरेजी जानते हुए भी हिंदी में बोलने वाले नेता,अभिनेता ,अधिकारी अपवाद स्वरूप ही हैं. हमारे पूर्व प्रधानमंत्री जननायक श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी (जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में सर्वप्रथम हिंदी में संबोधित कर हिंदी को उसका स्थान दिलाने का प्रयास किया ,तदोपरांत मोदी जी ने वहां उपस्थित भारतीयों को तथा अन्य विशेष सभाओं में हिंदी में उद्बोधन के माध्यम से इस क्रम को आगे बढाया )

मेरे विचार से आम आदमी की इस मानसिकता पर यदि विचार करें तो इसका कारण है हमारी गुलामी की मानसिकता जो हमारे मनोमस्तिष्क पर छायी है .लम्बे समय तक दासता की जिन्दगी जीते हुए हमारी शिक्षा प्रणाली लार्ड मैकाले के सिद्धांत के आधार पर तैयार हुई .दुर्भाग्य से स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी नीति निर्माताओं की आँखों पर दासता का ही पर्दा रहा और उसी शिक्षा प्रणाली को जारी रखा गया. तद्पश्चात भी कठोर निर्णय शक्ति न होने और राजनीति के दुश्चक्र ने हिंदी को अपने ही देश में बेगाना बनाये रखा.

अंगरेजी के प्रति मोह का एक अन्य कारण है ,श्रेष्ठ पदों पर बैठे अधिकारी या ग्लेमर की दुनिया के वे  लोग ,जिनको व्यक्ति  टी वी, फिल्मों राजनीति या अन्य क्षेत्रों  में सफलता के शिखर पर पहुँचते देखता है और फिर अंग्रेजी रंग ढंग अपनाते देखता है,जिनके बच्चे पंचतारा जिन्दगी जीते हैं. स्वयम को और अपनी आने वाली पीढी को भी सफलता के शिखर पर देखने की कामना हर व्यक्ति का स्वप्न होता है अतः वह अनुसरण करते हुए अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहता है. विदेश गमन की चाह भारतीयों का  एक ऐसा मोह है,जिसके कारण अंगरेजी उनके दिलो दिमाग पर छाई रहती है.और वो ये मान बैठता है कि उनके बच्चे आगे की पढाई अच्छी तरह करके उच्च  पद नहीं प्राप्त नहीं कर सकेंगें.

अपनी भाषा को सीखना सरल होता है जिसके लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता ,परन्तु हमारी मानसिकता दोषपूर्ण हो जाने के कारण आज हमारे  अधिकांश बच्चे रट कर आगे बढ़ते हैं,जिसमें उनका दोगुना समय बर्बाद होता है .

.अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढना प्रवीणता प्राप्त करना कभी भी अनुचित नहीं  अंगरेजी  क्या अपितु  विश्व की जितनी भाषाएं भी सीखी जा सकें सीखनी चाहिए,ज्ञान तो जितना बढाया जाय उतना ही उत्तम है,परन्तु अपनी उस  भाषा को हीन मानते हुए नहीं जिसके कारण हमारा अस्तित्व है.

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भारतेंदु हरीश चन्द्र जी की इन पंक्तियों के साथ इस आलेख को विराम ,जिसमें अपनी भाषा के महत्व पर सुन्दर शब्दों में प्रकाश डाला गया है

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

उन्नति पूरी है तबहि, जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहूँ न ह्यौंहिं सोच।
लाख उपाय अनेक यों, भले करो किन कोय।।

इक भाषा इक जीव इक मति, सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।

तेहि सुनि पावैं लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और मंह, कबहू नाहीं होय।।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

achyutamkeshvam के द्वारा
September 19, 2016

हिन्दी  का  भविष्य उज्ज्वल है  किन्तु अंग्रेजी के दूसरी राजभाषा और कार्यकारी भाषा  होने से ….बच्चों को भविष्य के लिहाज से अंग्रेजी सिखानी पडती  है …इसका कारण भारतीय विविध भाषा-भाषी समुदाय में एकता और प्रकारांतर से हिन्दी की सर्वमान्य और सामान्य स्वीकृति का अभाव है ….जो लोग बच्चों को अंग्रेजी स्कूल भेजते हैं …..उसका कारण अंग्रेजी नहीं ….बल्कि सरकारी शिक्षा केन्द्रों में शिक्षा की दुरावस्था है …मजबूरन निजी स्कूलों में बच्चे भेजने होते हैं ………….जो अंग्रेजी माध्यम हैं…..

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
September 16, 2016

आदरणीय  निशा जी ,।अच्छे दिनों के लिए तडपती हिंदी ,,,,का भविष्य अवस्य सुन्दर होगा । विश्व की सम्पर्क भाषा बनेगी । नाम ही हिन्दी होगा ,बाकी वाक्य मै सब कुछ अंग्रेजी होगी । यही तो विश्व भाषा का स्रवरुप होगा । ओम शांति शांति 

jlsingh के द्वारा
September 16, 2016

बहुत सुन्दर समसामयिक ब्लॉग आदरणीया …आप बीच बीच में खासकर विशेष अवसरों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करती हैं. अच्छा है सादर!

Shobha के द्वारा
September 16, 2016

प्रिय निशा जी अन्य लेखों के समान ही बहुत अच्छा लेख हिंदी भी राजनीती का शिकार हो कर केवल राज्य भाषा बन के रह गयी लेकिन अधिक समय तक नहीं


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