chandravilla

विश्व गुरु बने मेरा भारत

309 Posts

13192 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2711 postid : 1904

अब तो पहिचानें अनमोल जल का मोल (अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस पर एक सन्देश)

Posted On: 22 Mar, 2017 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

विश्व जल दिवस प्रतिवर्ष २२मार्च को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है.इसी दिवस पर छोटा सा प्रयास हम सभी के जाग्रत होने के लिए …………. Water-3
धरती माता की यह दुर्दशा !  कोई आश्चर्यजनक ,अद्भुत नहीं.सांस्कृतिक ,भौगौलिक विविधताओं के देश भारत में शस्य-श्यामला धरती तथा इसके विपरीत उपरोक्त स्थिति सामान्य  है.सूखे या दुर्भिक्ष के कारण भुखमरी,मृत्यु का तांडव ,कृषक भाइयों द्वारा आत्महत्याएँ आदि समाचार हम सभी सुनते हैं.विशाल क्षेत्रफल से युक्त राजस्थान के हिस्से में मात्र १% पानी बताया जाता है.पानी का मोल शायद हम सभी जानते हैं.पानी के महत्त्व को जानने के लिए एक छोटे से उदाहरण से बात प्रारम्भ करती हूँ. ! हम सभी ऩे भिश्ती का नाम सुना होगा,फिर भी संभवतः स्थानीय भाषा की विविधता के कारण समझने में कठिनाई न हो,अतः. स्पष्ट कर दूं भिश्ती एक कर्मचारी होता था जिसकी पीठ पर एक चमड़े का थैला होता है,जिसमें पानी भरा होता है.अधिक नहीं थोड़ी ही पुरानी बात है,जब कि भिश्ती लोग उस थैले के पानी से छिडकाव करते थे, छोटे बच्चे खेलते समय उसकी नक़ल भी करते थे.अब संभवतः वो परम्परा शहरों में समाप्तप्राय है.ये संदर्भ देने का कारण यह है कि मानव शरीर भी ऐसी ही पानी एक थैली है,शरीर में पानी ७५% के लगभग है ,अर्थात शरीर की जटिल संरचना में जल की भूमिका का अनुमान हम लगा सकते हैं.जीवन के लिए प्रमुख अत्यावश्यक तत्वों में वायु,जल व भोजन हैं परन्तु जल व वायु के बिना जीवन कुछ क्षण भी व्यतीत करना असंभव है
जल की जीवन में अनिवार्यता का अनुमान तो तब लगाया जाता है,जब कंठ सूख रहा हो और पानी की बूँद-बूँद के लिए हम तरस रहे हों,कंठ से नीचे पानी की बूँद पहुँचते ही जो राहत प्राप्त होती है,उसका अनुमान हम सबको है.राजस्थान में तपती बालू पर चलते समय व्यक्ति सबसे पहले पानी की व्यवस्था करके चलता है.कहा जाता है रेगिस्तान के जहाज ऊँठ के शरीर में पानी की थैली होती है,जिसके कारण वह भीषण ग्रीष्म में अपनी पीठ पर वजन लादे मंथर गति से दुष्कर और प्राण हारिणी यात्रा पर जाता है.कहानियों में विवरण आता है कि प्राचीन काल में जब रेगिस्तान में चलते चलते पानी नहीं मिल पता था तो ऊँठ को मारकर उसके तन से पानी की थैली निकाल कर काम चलाया जाता था.
.पानी के इस महत्त्व के कारण समस्त प्राचीनतम सभ्यताओं का विकास नदियों के तट पर हुआ और प्राय उन सभ्यताओं का नामकरण नदियों के नाम पर है.जल के ही माध्यम से यात्रायें,व्यापार ,भोजन ,विविध उद्योग ,विध्युत तथा सभी प्रकार का विकास संभव है,तो हमारी भौगौलिक परिस्थितियों  का मूल जल है.आंकड़ों के अनुसार पृथ्वी का ७० .७८% भाग जल से आच्छादित है शेष २९.२२%भाग स्थलीय या शेष संरचनाओं से युक्त है.परन्तु क्या विडंबना है कि जल का ही सर्वाधिक अभाव है या कहा जा रहा है कि अगले विश्व युद्ध का मूल कारण जल होगा ,जल के लिए तरसेगी मानवता ,अर्थात जल का भीषण अभाव,प्रदूषित जल……….
water prob
जल के घटते स्तर का प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग को बताया जाता है,वनों का सफाया,वर्षा का अभाव या आवश्यकता से कम होना या फिर अतिवृष्टि के कारण विनाश.बढ़ती आबादी,उपलब्ध संसाधनों का अनियोजित दोहन या उपलब्ध साधनों का  प्रयोग ही न होना.
सरकार द्वारा जल के समुचित प्रयोग ,संरक्षण पर योजनायें बनती हैं,पानी की तरह धन बहाया जाता है,योजनाओं के निर्माण में, परन्तु सब निरर्थक.कारण? सरकारी प्रयासों से भी अधिक हमारी स्वार्थपरता तथा देश व मानवता के प्रति अपना कर्तव्य न समझना ,असलियत हम सभी लोग प्राय एक ही मानसिकता से ग्रस्त हैं,”जब तक संकट अपने सर पर नहीं चेतने की कोई जरूरत नहीं,” समय समय पर जापान सदृश  त्रासदियाँ हम देखतें हैं,परन्तु कुछ समय वो विषय जीवंत रहते हैं और फिर वही  ढर्रा ………..

विचार करने पर यही तथ्य सामने आता है कि जल के दुरूपयोग के कारण और उन कारणों के निवारण में ही हल छुपा है.
यदि हमें जलाभाव के संकट से बचने के लिए प्रयास करने हैं तो सरकारी प्रयासों की तो युद्धस्तर पर आवश्यकता है ,नदियों को प्रदूषित होने से बचने के लिए सरकार के द्वारा निर्धारित प्रमुख कार्यक्रम हुए संकट का कोई निवारण नहीं.
इन सबके अतिरिक्त कुछ अन्य आवश्यक तथ्य हैं जो हमारे ही कर्तव्य हैं इनमें  प्रमुख हैं….
जल के दुरूपयोग पर पूर्ण प्रतिबन्ध.इसके लिए हमें जागरूक होना होगा तभी हम परिवार को ,परिचितों को प्रोत्साहित कर सकते हैं.विशेष रूप से सड़कों पर बहती टोंटियाँ(यदि हम समयानुरूप थोडा सा ध्यान  दे सकें , अर्थात उन टोंटियों को बंद कर सकें. जानवरों को धोने,नहलाने ,घर की सफाई,अथवा अन्य घरेलू कार्यों के लिए पेयजल का प्रयोग न किया जाय.गत  कुछ समय से घर घर में सबमर्सिबल पम्प लगाये जा रहे हैं और पानी व्यर्थ बहता है.और हमें कोई दुःख कोई चिंता नहीं होती क्योंकि हमें तो पानी उपलब्ध है वो भी खुला  बिन रोकटोक के.इन पर नियंत्रण सम्बन्धित परिवार स्वयं ही लगा सकते हैं.
नदियों को प्रदूषित करने में हमारा योगदान भी कम नहीं हज़ार चेतावनियों  के बाद भी नदियों में साबुन लगाकर कपडे धुलते हैं, मल -मूत्र के गंदे सीवर मोक्षदायिनी गंगा सदृश पवित्र नदियों में छोड़े जाते हैं,पोलीथिन बेग डाले जाते हैं,उद्योगों का घोर हानिकारक कचरा नदियों में छोड़ा जाता है. .मेरे विचार से स्वयंसेवी संगठनोंका इस क्षेत्र में प्रयास विशेष उपयोगी हो सकते हैं .बच्चों के पाठ्यक्रम का एक अंग जल संरक्षण को बनाया जाना चाहिए,सिद्धांत रूप से नहीं व्यवहारिक रूप से. बच्चों को जागृत करके इस समस्या की गंभीरता का अहसास उनको कराया जा सकता है.जल संरक्षण पर कार्य को अधिकाधिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए.वर्षा-जल संचयन सर्वाधिक उपयोगी उपाय है.परन्तु इनको वृहद् रूप से लागू किया जाना जरूरी है.प्रयुक्त जल को पुनः प्रयोग उपयोगी बना कर जल के संरक्षण का उपाय है.आवश्यकता है संकट को समझने की,पानी का मोल समझते हुए,उसका अपव्यय रोकने की और पानी के संचय की.वृक्षारोपण
और जल संचयन के लिए अग्नि पुराण का ये श्लोक भी प्रस्तुत कर रही हूँ
दश कूप समो वापी, दशवापी समो हृदि, दशहृदि समो पुत्रः,दशपुत्र समो द्रुमाः|अर्थात दश कुए के बराबर एक तालाब,दश तालाब के बराबर एक सरोवर,दश सरोवर के बराबर एक पुत्र और दश पुत्रों के बराबर एक वृक्ष की महत्ता हो गई है,आश्चर्य है कि हमारे जिन शास्त्रीय सिद्धांतों,मान्यताओं को आज रुढिवादी कहा जा रहा है वे ही पर्यावरणीय चेतना के शीर्ष पर दृष्टिगत होते हैं…ग्रीष्म ऋतु में जल के पियाऊ की व्य्वस्था को पुण्य का नाम दिया जाना.शुभ कार्य के अवसर पर कुआं पूजन ,नदी का दर्शन शुभ मानना आदि …………जिन तथ्यों को हमारे शास्त्रों ने उद्धृत किया था,उन्हीं का अनुपालन कर हम मानवता  को विनाश से बचा सकते हैं.
विश्व बैंक द्वारा नदियों विशेष रूप से गंगा यमुना को स्वच्छ करने हेतु प्रारम्भ की हुई योजनाओं पर धन पानी की तरह बर्बाद हुआ परन्तु निरर्थक. सरकार की सक्रियता का अनुमान तो हम गत वर्ष निगमानंद जी की शहादत से ही लगा सकते हैं,परन्तु अब भी नहीं जागे तो वो दिन दूर नहीं जब पेय जल की भांति उपयोग का जल भी कम्पनी की मनमानी शर्तों पर खरीदने को बाध्य होंगें हम और तरसेंगें.

गत वर्ष अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस पर इसी संदर्भ में पोस्ट प्रकाशित की थी ,कुछ नवीन तथ्यों के साथ पुनः प्रयास कर रही हूँ.(आज ही समाचार पत्र में पढ़ा है,कि इस वर्ष हिमपात अधिक होने से मानसून बहुत अच्छा रहने का अनुमान वैज्ञानिक लगा रहे हैं,यदि ऐसा हुआ तो सम्भवतः पर्यावरण की दुश्वारियां कुछ घटें और सूखे और दुर्भिक्ष के रूप में अन्य संकटों से राहत मिल सके मानवता को.) परन्तु अब जागिये और जल की बर्बादी पर अपने अपने स्तर से आज से ही नियंत्रण प्रारम्भ कर दीजिए.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.60 out of 5)
Loading ... Loading ...

51 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harirawat के द्वारा
April 23, 2017

निशाजी नमस्कार, सबसे पहले best bloger चुने जाने पर हार्दिक बधाई ! आपके ब्लॉगों में एक नवीनता एक जागरूकता भाव होता है ! बहुत सारी शुभ कामनाएं ! हरेंद्र

Shobha के द्वारा
March 29, 2017

प्रिय निशा जी आपके अन्य लेखों के समान बेहतरीन लेख

jlsingh के द्वारा
March 26, 2017

अनुपम आलेख को समयानुकूल पोस्ट कर सबको जाग्रत करने तथा बेस्ट ब्लॉगर चुने जाने के लिए हार्दिक आभार आदरणीया निशा महोदया! सादर!

rita singh sarjana के द्वारा
March 24, 2017

निशा जी, नमस्कार , बेस्ट ऑफ़ द ब्लॉगर चुनी जाने पर हार्दिक बधाई

sadguruji के द्वारा
March 23, 2017

आदरणीया निशा मित्तल जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत अच्छा सन्देश ! आपकी यह रचना हमेशा सामयिक और प्रासंगिक रहेगी ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की बधाई ! सादर आभार !

meenakshi के द्वारा
March 22, 2017

महत्वपूर्ण विषय पर हमेशा की तरह बहुत अच्छा लिखा है आपने निशा जी , सचमुच हमें जल के प्रति अब अनिवार्य रूप से चेत जाना चाहिए . बहुत बहुत बधाई !

yamunapathak के द्वारा
April 1, 2012

निशाजी आपका लेख दो कदम तुम ….पढ़ना चाहती हूँ किस तरह पहुंचूं?यह लेख बहुत ज्ञानवर्धक है शुक्रिया.

    nishamittal के द्वारा
    April 1, 2012

    आपने स्वयं ही ढूंढ लिया है यमुना जी ,धन्यवाद पुराना लेख पढ़ने के लिए

Sumit के द्वारा
March 25, 2012

जल ही जीवन है ,,,,,,पल पल शुद्ध जल विलुप्त हो रहा है,,,,ऐसे में कुछ करना तो hoga ही …… http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/03/22/आखिर-क्यों/

    nishamittal के द्वारा
    March 25, 2012

    धन्यवाद सुमित जी.

yogi sarswat के द्वारा
March 23, 2012

आदरणीय निशा मित्तल जी सादर नमस्कार ! आपने सही वक्त पर सही लेख दिया है इस मंच को ! आपने पुराने समय में भिस्तियों की बात करी तो अपना बचपन सा याद आया ! खैर मुद्दा वो नहीं , बात जल संरक्षण की चल रही है ! आपने बहुत बेहतरीन लेख लिखा है लेकिन एक महत्वपूर्ण बात शायद आप भूल गए हैं ? अटल बिहारी वाजपई के समय में शुरू हुआ नदियों को जोड़ने का कार्यक्रम दोबारा सर्वोच्च न्यायलय के आदेश से शुरू हो रहा है जो निश्चित ही इस दिशा में बड़ा कदम होगा ! आपके विचारों की सराहना करता हूँ !

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    योगी जी,आपको लेख अच्छा लगा ,धन्यवाद आपने बाजपेयीजी वाली योजना के क्रियान्वयन के विषय में बताया है,निश्चितरूप सेये एक महत्वपूर्ण कदम होगा,परन्तु बढ़ती जनसंख्या और प्राकृतिक संसाधनों के अनावश्यक बर्बादी और नदियों का पर्दूषण रोका जाना भी बहुत आवश्यक है.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 23, 2012

बहुत सुन्दर एवं सारगर्भित आलेख,आदरणीया निशा जी.कहा जाता है कि जल ही जीवन है.जल के घटते स्त्रोत और स्तर का नीचे चला जाना निश्चित ही सोचनीय है.

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद राजीव जी.

Harish Bhatt के द्वारा
March 23, 2012

आदरणीय निशा जी सादर प्रणाम, जल की उपयोगिता पर सार्थक लेख के लिए हार्दिक बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद हरीश जी.

vinitashukla के द्वारा
March 23, 2012

जल-संरक्षण के लिए जागरूक करने वाला, उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक लेख. बधाई निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    आभार विनीता जी.

March 23, 2012

सादर प्रणाम! सार्थक और अर्थपूर्ण आलेख …….सामाजिक मानसिकता को क्या कहूँ……मैं देखता हूँ …एक तरफ पानी गिरता रहता है और दूसरी तरफ लोग साबुन लगते रहेंगे, बरतन और कपडे साफ करते रहेंगे…यदि किसी को समझिए तो लोग कहते हैं कि जब ५ और 50 लीटर पानी यूज करने का बिल एक ही देना पड़ता है तो क्यों न करूँ. अनपढ़ और गवारों को बात छोडिये जो पढ़े-लिखे और चारों वेदों का ज्ञानियों का भी वही हाल है….भारत देश की महानता का वर्णन कहने को कह दीजिये तो ऐसी-ऐसी डींगे मारेंगे कि शक होने लगता है कि यह भारतीय संस्कृति के हितैशी है या विनाशक. जहाँ तहा सडको के किनारे लोग नल चालू करके छोड़ देते हैं. और हमारे जैसे पागल और मुर्ख घूम-घूम कर नल और रोड लाइट बंद किया करते हैं. जिसे देखकर यही महान संस्कृति वाले हँसते हैं और पीछे से कमेन्ट करते है कि पगला गया……

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    अनिल जी आपके विचार से शतप्रतिशत सहमत हूँ मैं.यही हमारा सबसे बड़ा दोष है,की हम बात तो देश प्रेम की करते हैं परन्तु देश के संसाधनों को प्रयोग करने में उसपर अपना अधिकार तो मानते हैं परन्तु उसके प्रति कर्तव्यों को नहीं इस मनोवृत्ति के बदले बिना देश प्रेम की भावना निरर्थक है.

rahulpriyadarshi के द्वारा
March 23, 2012

निशा जी,नमस्कार,आपने समसामयिक और दूरगामी समस्याओं को लेकर अद्यतन लेख लिखे हैं जो बहुत ही उल्लेखनीय प्रयास है,इस आलेख में भी आपने जल संकट का बखूबी चित्रण किया है,मैं खुद जल की प्राचुरता वाले भूभाग में रहता हूँ,किन्तु यात्राओं के दौरान किसी किसी जगह पर पेयजल संकट से जूझना ही पड़ता है,यह शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता ही है की अक्सर मज़बूरी में यात्राओं में कॉरपोरेट पानी (मिनिरल वाटर) ही पीना पड़ता है,निश्चित तौर पर यदि जल संकट से पार पाने के लिए किसी सार्थक दूरदर्शी पहल की अनिवार्य आवश्यकता नजर आती है :)

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    राहुल जी,पहले हमने अपने संसाधनों का दुरूपयोग किया और आज भी उनको बर्बाद करने से नहीं रुके तो मिनरल वाटर नहीं पता नहीं क्या क्या संकट झेलने पड़ेंगें.धन्यवाद प्रतिक्रिया हेतु.

Ravindra K Kapoor के द्वारा
March 23, 2012

निशाजी जल के महत्व को जिन सुन्दर शब्दों और अनेक उधारणों के साथ जिस जन मानस के उपयोग हतु लिखा है उसकी जितनी भी प्रशंशा की जाय कम है. काश इस देश का जन मानस हमारी पुरानी परम्पराओं में निहित उन मूक संदेशों को भी समझ पाती जिन इस देश की संस्कृत और सभ्यता को जन्म हुआ. दुःख और विचार करने की बात ये और भी है कि इस देश कि नै पीढ़ी ने तो लिखना पढना ही छोड़ दिया है या केवल कोर्से की किताबों के अलावा शायद उनके पास मोबाइल चाटिंग के अतिरिक्त किसी चीज के लिए समय ही नहीं है. अच्छे लेख के लिए मेरी सुभकामना. …रवीन्द्र

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद कपूर साहब,देश के प्रति ,मानवता के प्रति यहाँ तक की स्वयं अपने भविष्य के प्रति हम विचार नहीं करते तो कैसे आशा की जा सकती है,उज्जवल भविष्य की.

akraktale के द्वारा
March 23, 2012

निशा जी सादर नमस्कार, जल संव्रक्षण पर आपकी सुन्दर प्रस्तुति. सिर्फ एक बार नहीं प्रतिवर्ष वर्षा ऋतू और ग्रीष्म काल में प्रस्तुत करने योग्य है. क्योंकि प्रायः देखने में यही आता है की अधिक पानी उपलब्ध होने पर हम उसका दुरुपयोग शुरू कर देते हैं बिना कल की परवाह किये. सार्थक.साधुवाद.

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद अशोक जी,आपके सकारात्मक प्रत्युत्तर हेतु.

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 23, 2012

आदरणीय निशा जी सादर प्रणाम, ज्ञानवर्धक और विचार करने योग्य लेख. मेरी एक प्रार्थना है…..मेरा एक स्वार्थ है…. …..कभी-कभार मेरा भी मार्ग-दर्शन कर दिया कीजिये.

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद अजय जी.आपका लेख पढ़ा था अपनी प्रतिक्रिया मैंने दे दी है.

March 22, 2012

जल होगा, तो ही भविष्य होगा. नहीं तो दुनिया आज में ही सिमट जाएगी. हर बार की तरह, इस बार भी इस संतुलित प्रस्तुती को देखकर प्रसन्नता हुई. सच कहूँ, तो मुझे हर्ष है, की हम इतने गंभीर विचारक के निकट हैं. बहुत-बहुत बधाई! सादर.

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    टिमसी जी धन्यवाद आपके विचारों हेतु.

vaidya surenderpal के द्वारा
March 22, 2012

आदरणीय निशा जी नमस्कार , जल दिवस पर बहुत जानकारी युक्त सुन्दर रचना के लिये बधाई…

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद सुरेन्द्रपाल जी.

Santosh Kumar के द्वारा
March 22, 2012

आदरणीय निशाजी ,.सादर प्रणाम जल दिवस पर बहुत सार्थक आलेख के लिए हार्दिक आभार आपका …सादर

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    संतोष जी धन्यवाद

krishnashri के द्वारा
March 22, 2012

महोदया , बहुत ही सुन्दर ,ज्ञानवर्धक और उपयोगी आलेख . धन्यवाद

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    मान्यवर महोदय धन्यवाद

yamunapathak के द्वारा
March 22, 2012

kitnaa suchnaaparak hai yah lekh xtremely informative

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद यमुना जी.

minujha के द्वारा
March 22, 2012

बहुत अच्छा आलेख ,जानकारीयुक्त व संग्रहणीय

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद मीनू जी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए.

vikramjitsingh के द्वारा
March 22, 2012

निशा जी, सादर, ”जल ही जीवन है, और ‘बिन पानी सब सून’ अर्थात पानी के बिना, जिंदगी और प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन धरती पर मौजूद जल की कद्र करने से हम सदा बचते आ रहे हैं, और अगर यही हालात रहे तो वो दिन दूर नहीं, जब हम जल की एक-एक बूँद के लिए तरसेंगे……..” पानी के महत्त्व को और पुख्ता तरीके से उजागर करने के लिए हार्दिक धन्यवाद….. बहुत सुन्दर रचना………….

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    आपकी सटीक व विचारपूर्ण प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद विक्रम जी.

satish3840 के द्वारा
March 22, 2012

नमस्कार निशा मैडम / जल वाकई एक अमूल्य हें / परन्तु आज जल संकट का कारण परम्परागत जल संग्रह को समाप्त करना हें / मेरे गावं ( जो तहशील रूडकी , हरिद्वार मैं हें ) में बचपन के समय ५-६ बड़े बड़े तालाब थे जिनमें वर्षा का जल इकठ्ठा होता था जो वर्ष भर पशुओं की साथ साथ कुम्हारों को चिकनी मिट्टी देता था / ये ही बात जिला सहारनपुर , मुजफ्फरनगर जिले के गावों की थी , ये तालाब प्रथ्वी में जल स्तर ऊपर रखता था / परंतू आज एक भी तालाब नहीं / सब में या तो खेती हो रही हें या घर बना लिए गए हें / जल तो बहुत हें पर उसका प्रबंधन नहीं हो रहा है / वर्षा के समय पानी या तो समुद्र में चला जाता हें या भाप बन कर उड़ जाता हें / इस प्रकार परम्परागत भंडारण ख़त्म करने से ही भूमि में जल स्तर व् पानी की कमी हो गयी हें / रही नदियों में गंदगी की तो इस बारे में ये भी विचार करना चाहिए की गंगा , यमुना पर डेम बनाने से वर्षा / बर्फ पिघलने से मिला जल इन डेमों में एकत्रित होता हें व् नदी में केवल शहरी नदी नाले ही गिरते हें / इसी लिए वर्षा के समय को छोड़ नदी गंदी रहती हें / दिल्ली में यमुना को देखा जा सकता हें / जब नदी में वर्ष भर पहाड़ का पानी नहीं छोड़ा जाएगा तो भला वो कैसे साफ़ रहेगी / लेकिन ऐसा करना जरुरत हें / डेम में एकत्रित पानी से पीने का पानी ( जैसे दिल्ली में गंगा नाहर से पानी की पूर्ती की जाती हें , बिजली , नहरें आदि चलती हें / अतः कह सकते हें कि वर्षा जल को एकत्रित करने का इंतजाम होना कहिये / तभी पानी का सही प्रबंधन किया जा सकता हें / शहर हो या गावं सब जगह कुछ कच्चा छोड़ा जाना चाहिए ताकि वर्षा के समय जल नदी में जाकर धरती द्वरा शोख कर उसके अन्दर जा सके / बहुत ही अच्छा आलेख / बधाई / वास्तव जल ही जीवन हें

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    महत्वपूर्ण कारक जिनके कारण जल संकट उत्पन्न होता है,या बढ़ता है,आपने बहुत अच्छी प्रकार से बताएं हैं,धन्यवाद.इन सबके साथ नागरिक में जागरूकता की महती आवश्यकता है.

mparveen के द्वारा
March 22, 2012

निशा जी नमस्कार, सार्थक सन्देश देती आपकी रचना … धन्यवाद… SAVE WATER = SAVE ENERGY , SAVE LIFE , SAVE ENVIRONMENT !!

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद सुन्दर प्रतिक्रिया और सुन्दर सन्देश हेतु.

dineshaastik के द्वारा
March 22, 2012

सुन्दर , सटीक,  सार्थक एवं संदेश देती हुई प्रस्तुति के लिये बधाई……

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद दिनेश जी.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 22, 2012

अत्यंत उपयोगी लेख. अनुपालन सब से अपेक्षित है. बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    March 24, 2012

    धन्यवाद कुशवाह जी.


topic of the week



latest from jagran