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इतिहास की स्वर्णिम तिथि 10 मई 1857

Posted On: 8 May, 2017 Others में

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भारतवर्ष की ही नहीं विश्व की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं में एक है  1857 की क्रान्ति.विश्व की घटनाओं में एक कहने का कारण ये है कि जिस देश के विरुद्ध इस संग्राम का श्रीगणेश हुआ ,यह देश था ग्रेट ब्रिटेन ,जिसके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, साम्राज्यवादी नीति का पोषक होने के कारण जिसका ध्वज विश्व के प्रत्येक कोने में लहराता था.कभी व्यापार के माध्यम से तो कभी देशों के विवाद सुलझाने के नाम पर गोरों ऩे पहले एक कदम रखा और धीरे धीरे वहां के स्वामी बन बैठे निरंकुश सत्ताधारी.
मुग़ल सम्राट जहाँगीर के काल में १६१२ में एक फैक्ट्री के माध्यम से भारत में सूरत में व्यापार की अनुमति लेने वाली अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी हमारी अधिष्ठाता बन बैठी.लोक भाषा की कहावत है,”अंगुली पकड़ कर पाहेंचा पकड़ना.” इस संदर्भ में सटीक है.सूरत के बाद मद्रास , बम्बई और फिर कलकत्ता.व्यापार फलता फूलता रहा और धीरे देसी राजाओं की दुर्बलता,पारस्परिक फूट का लाभ उठाते हुए आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और १७५७ में प्लासी की हार के बाद १७६४ में बक्सर के युद्ध ऩे अंग्रेजों के पैर मजबूती से जमा दिए.मुग़ल सम्राट शाह आलम के काल में कम्पनी के अधिकारों में वृद्धि होती गयी कम्पनी का अधिकार क्षेत्र बढ़ता रहा..देश का धन लूटा जाता रहा सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश कंगाल बनता रहा और शासकों की विलासिता ,फूट,अकर्मण्यता का परिणाम दासता के रूप में सामने आया ब्रिटिशकम्पनी की साम्राज्यवादी नीति के कारण देश के सभी राज्य धीरे धीरे इनकी अधीनता स्वीकारते रहे.हमारी सेना के जांवाजों के दम पर ब्रिटिश साम्राज्य बढ़ता गया और बढ़ते गये,आमानुषिक अत्याचार.गोरी कौम को श्रेष्ठ मानेवाले अंग्रेज अब हमारे स्वामी थे और हम थे निरीह दास.जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर विरोध करने का साहस करता ,उसको कुचल दिया जाता.
भारत की हस्तकला,सूती,रेशमी वस्त्र ,मसाले तथा सूखे मेवे और अन्य वस्तुओं की विदेशों में बहुत मांग थी परन्तु हमारे अशिक्षित तथा भोले उत्पादकों से सस्ते दामों पर सामान खरीद कर कई गुनी कीमतों पर उस सामान को विक्रय कर विदेशी विशेष रूप से अंग्रेज धनी बनते रहे,और फिर अंग्रेजी सत्ता ऩे ऐसे क़ानून बना दिए कि अपने देश में यहाँ के बुने वस्त्र खरीदने पर प्रतिबन्ध लगाते हुए,बहुत भारी अर्थदंड लगाने की घोषणा कर दी.परिणाम वस्त्र बिकने बंद हो गये तथा शिल्पी बेरोजगार हो गये उनको .कृषि क्षेत्र में मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ा.परन्तु गोरों की रग रग में शोषण करने की प्रवृत्ति थी. अपनी नस्ल को श्रेष्ठ मानने वाले अंग्रेज सदा दूसरों को निरीह देखना चाहते थे,चाहे उसके लिए किसी भी सीमा का अतिक्रमण करना पड़े.उन्होंने मालगुजारी व कृषि के क्षेत्र में भी ऐसी दमनकारी नीति बनायीं कि कृषकों को भी पाई पाई का मोहताज बना दिया.मालगुजारी इतनी बढ़ा दी गयी कि इस मद में १७६४-६५ में जो राशि एकत्र हुई थी ,१७६५-६६ में वो दोगुने से भी अधिक हो गयी.
वास्तव में अधिकांश अंगेरजी गवर्नर जनरल की नीति हड़पने की थी,अर्थात देसी जागीरदारों द्वारा राजस्व नहीं चुकाया गया तो जागीर हड़प ली गयी,,इसी प्रकार रियासतों को भी कभी उतराधिकारी न होने के नाम पर,कभी उत्तराधिकारी अवयस्क होने के नाम पर तथा कभी शासक अयोग्य होने का बहाना बनाकर अपनी साम्राज्यवादी नीति का परिचय देते हुए ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया.ऐसे में विवश जागीरदारों तथा रियासतों के स्वामियों में असंतोष बढ़ रहा था.१७५७ से १८५७ के मध्य कम्पनी की सेनाओं ऩे २० से अधिक युद्ध लड़े और मैसूर,महाराष्ट्र,कर्नाटक,तंजौर ,बुंदेलखंड रूहेलखंड ,हरियाणा पंजाब आदि राज्यों को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया.
ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार करते हुए अंग्रेज अधिकारियों ऩे घोषणा की ,कि ईसाई धर्म अपनाने पर उनकी छिनी हुई जागीर वापस कर दी जायेंगी.धर्मपरायण हिन्दुओं तथा मुस्लिमों के लिए यह सह्य नहीं था कि धर्म पर आघात हो.और ये प्रत्यक्ष रूप से धर्म के मामले में हस्तक्षेप किया जा रहा था उनको ईसाई बनाने का षड्यंत्र था.

कम्पनी की सेनाओं को कुछ युद्धों में पराजय का सामना करना पड़ा तो भारतीय सैनिकों में यह भावना उत्पन्न हुई कि अंग्रेज अपराजेय नहीं और उनको यह भी अनुभव हो रहा था कि अंग्रेज अपने हितों के लिए भारतीय सैनिकों को मृत्य के घाट उतरवा रहे हैं.

आर्थिक,राजनैतिक,सामजिक धार्मिक तथा सैन्य सभी क्षेत्रों में अंग्रेजों की दमन नीति के शिकार भारतीय जनता व नरेशों,कृषकों,जागीरदारों की भावनाओं में उफान आ ही रहा था कि कारतूसों वाली घटना के रूप में चिंगारी भड़क उठी.
विद्रोह का सन्देश स्थान स्थान पर पहुंचाने के लिए रोटी व कमल को प्रतीक के रूप में विविध रूप धरे हुए लोगों ऩे गुप्त रूप से दूर दूर तक पहुँचाया.गुप्त बैठकों में कार्यवाही तय हुई तथा ३१ मई १८५७ को विद्रोह की तिथि को तय किया गया.तैयारी ३१ मई की तारीख के हिसाब से चल रही थी.
सही कहा गया है “होई है वही जो राम रची राखा”कलकत्ता के दमदम में बैरकपुर छावनी में क्रांतिवीर मंगल पाण्डेय ऩे इस क्रान्ति का श्रीगणेश कर दिया. तथा कट्टर ब्राहमण होने का परिचय दिया अंग्रेज अधिकारी की अवेहलना करते हुए .मंगल पाण्डेय ऩे कारतूसों को मुंह से खोलने को मना कर दिया सेना ऩे उसका साथ दिया तथा बौखलाए गोरों ऩे उसपर शक्ति प्रदर्शन करना चाह तो उसने दो अंग्रेज अधिकारीयों पर आक्रमण कर दिया.मंगल पाण्डेय झुका नहीं और अंग्रेजों को उसका प्राणांत करना ही एक मात्र उपाय दिख रहा था,अतः उसको फांसी की सजा सुनायी गयी.कायर अंग्रेजों ऩे फांसी भी निर्धारित तिथी से पूर्व ही दे दी क्योंकि उनको विद्रोह भड़कने की चिंता सता रही थी.
६ मई १८५७ को ९० भारतीय सैनिकों को ये कारतूस मेरठ में प्रयोग करने के लिए दिए गये ,परन्तु जोशीले सैनिकों को मंगल पाण्डेय के बलिदान की लाज रखनी थी उनका स्वाभिमान जागृत हो गया था.अतः उन्होंने आदेश मानने से मना कर दिया,अंग्रेज दमनकारी नीति अपना रहे थे सैनिकों के धर्म का अपमान किया जा रहा था.,भारतीयों सैनिकों को कड़ी सजा देने की घोषणा की गयी . १० मई १८५७ की ऐतिहासिक तिथि को सैनिकों ऩे विद्रोह कर दिया. अंग्रेज अफसरों को मार दिया गया “मारो फिरंगियों को “के नारे के साथ विप्लव बढ़ता गया तथा विद्रोही दिल्ली पहुँच गये.मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र को अपना नेता घोषित कर दिया क्रान्तिकारियों का जोश पूर्ण ज्वार पर था उनके स्वाधीनता संग्राम में उनका साथ देने के लिए आम नागरिक भी उनके साथ जुट गये.दिल्ली के किले पर क्रांतिवीरों का अधिकार हो गया,.अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अंग्रेज इस किले को सितम्बर में ही मुक्त करा सके.
कानपुर में नेतृत्व के लिए नाना साहब कमर कसे हुए थे,अंग्रेज जनरल को पराजय का सामना करना पड़ा ,उनके परिवारों को बंदी बना लिया गया,उदारवादी नैतिकता के पोषक क्रान्ति नेता परिजनों को सुरक्षित निकालना चाहते थे परन्तु जनरल नील के द्वारा इलाहाबाद व बनारस में भारतीयों के नरसंहार का समाचार पाकर विद्रोही आक्रोशित हो गयेऔर नेताओं की इच्छा के विरुद्ध अपना आक्रोश उन परिजनों को मार कर ही निकाला. अंग्रेजों ऩे भारी सैन्य सहायता से कानपुर पर कब्ज़ा पुनः कर लिया और नाना साहब को वहां से नेपाल जाना पड़ा.तांत्या टोपे,वीरतापूर्वक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे और अंग्रेज तथा भारतीय वीरों के मध्य इसी प्रकार जीत-हार चलती रही.
आन्दोलन का चरम दिखाई दिया अवध में.जनता,जागीरदार,सेना ,जाती धर्म का भेद भुला कर एकजुट हो कर लड़े और अंग्रेजों को जीवित नहीं निकलने दिया.अंग्रेज अधिकारी मारे गये निरंतर सेना के बल पर लड़ते हुए अंग्रेज लखनऊ को मार्च १७५८ में ही दोबारा अपने नियन्त्रण में ले सके.पूर्णतया त्रस्त व बौखलाए अंग्रेजों ऩे निरीही ग्रामीणों व अन्य देशवासियों को फांसी देकर अपना रोष उतारा.
झांसी और ग्वालियर में भी रानी लक्ष्मीबाई तथा तांत्या टोपे ऩे अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए ,यद्यपि देशद्रोहियों के कारण झांसी महारानी के हाथ से निकल गयी परन्तु वह स्वयं उनकी पकड़ में नहीं आयीं.
इसी प्रकार बिहार में कुंवर सिंह तथा फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्लाह ऩे अंग्रेजों को खूब छकाया. इंदौर में भी आन्दोलन का रंग चरम पर था, देश के अन्य भागों में भी कहीं कम तो कहीं अधिक विद्रोह अग्नि धधकती रही और अपनी सैन्य शक्ति व छल बल के सहारे गोरे उसको दबाते रहे और अंततः यह संग्राम कुछ विशिष्ठ उपलब्धियों के साथ दब गया
इस महत्वपूर्ण क्रांति को अंग्रेज जहाँ अपनी श्रेष्ठता के दम्भ में मात्र सिपाही विद्रोह mutiny, मानते हैंपरन्तु अग्रांकित मानचित्र दर्शाता है कि देश के बड़े भाग में इस क्रान्ति का प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव था. हमारी दृष्टि में यह घटना, यह क्रान्ति, यह आन्दोलन बहुत महत्वपूर्ण है.यह सत्य है कि आन्दोलन अंग्रेजों को बाहर खदेड़ने में सफल न हो सका परन्तु अंग्रेज शासकों ऩे यह स्वीकार किया कि अब भारत को सदा के लिए अपना गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता.
आन्दोलन ऩे भारतीय जनमानस के मस्तिष्क में एक आशा किरण जगा दी कि संगठित हो कर गोरों को देश से बाहर निकालना असम्भव कार्य नहीं.समय तो लगा परन्तु स्वाधीनता की भूख जगाने में सफल रही क्रान्ति और अंतत १९४७ में अंग्रेजों को भारत से बाहर भागना पड़ा.
उपरोक्त सफलता के साथ क्रान्ति ऩे हमें ये भी दिखा दिया कि भाइयों ऩे ही भाईयों को मरवाया और अंग्रेजों का साथ देने वाले हमारे भाई थे,जिनके सहयोग से अंग्रेज इतने लम्बे समय यहीं जमे रहे.अपने क्षुद्र स्वार्थों , कुछ विलासी,अकर्मण्य व निष्ठुर मुग़ल राजाओं से परेशान हो कर सिखों के एक वर्ग ऩे गोरखों और कुछ अन्य लोगों ऩे अंग्रेजों का साथ दिया.
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपनी कुछ कमियों के बाद भी आन्दोलन एक मील का पत्थर था तत्कालीन परिस्तिथियों में इतना व्यापक नेटवर्क बनाना एक या दो दिन का काम नहीं हो सकता था.आन्दोलनं और अधिक सफल होता यदि अपनी पूर्व निर्धारित तिथि ३१ मई को ही प्रारम्भ होता.परन्तु केवल एक ही नेता न होना इस तर्क को भी प्रमाणित करता है कि विद्रोह की अग्नि स्थान स्थान पर प्रज्वलित हो चुकी थी.और यह देश के किसी छोटे भाग में घटित घटना नहीं थी. .
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55 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
May 16, 2017

प्रिय निशा जी आप सदैव देश के गोरव शाली दिनों की याद दिलाती है धन्यवाद उत्तम एवं स्मरणीय लेख

yamunapathak के द्वारा
May 15, 2017

आदरणीया निशाजी सादर नमस्कार दस मई ऐतिहासिक दिवस पर लिख यह ब्लॉग बहुत ही जानकारी भरा है.रोटी और कमल प्रतीक …की यह क्रान्ति ही हमारी आज़ादी की नींव है .बहुत अच्छा लगा . साभार

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
May 12, 2017

व्यंग्य आदरणीय निशा जी सुन्दर इतिहास पुनरावलोकन हेतु अभिनन्दन ,किन्तु १९४७ मैं भारत आज़ाद हुआ और १९५३ मैं पापी हरिश्चंद्र का उदय हुआ जो अब सर्वव्यापी हो चूका है | यानि 47 *५३ =१०० ….सत्य है किन्तु अपने पाप स्वरुप मैं .ॐ शांति शांति का नया अवतार ,५३ वां comments

rameshagarwal के द्वारा
May 8, 2017

जय श्री राम आदरणीया निशाजी बहुत सुन्दर लेख के लिए बढ़ाई.राजीव दीक्षित जी ने इस पर बहुत विस्तार से लिखा था और हमने पढ़ा था .इस संग्राम का परिणाम ने आज़ादी दिलाने और दुसरे लोगो को उत्साहित करने में बहुत मदद की लेकिन कांग्रेस ने इस सब को नज़र अंदाज़ कर केवल गांधीजी के आन्दोलन को ही केवल एक कारन आज़ादी के लिए मन जो गलत था,लार्ड मैकॉले ने ब्रिटिश विदेश समिति के सामने जो कहा था वह भारत की असली तस्बीर थी देश इतने संपन्न था जबBUHकि ब्रिटेन भूक से मर रहा था.केवल लार्ड क्लाइव ९०० पानी के जहाजों में सोने चांदी हीरे से भर कर ले गया था.अंग्रेजो ने कूटनीति अपनाई और हमारे लोगो की आपसी लडाई और लालच का फायेदा उठाया लेकिन यही तो आज़ादी के बाद भी चलता रहा मुस्लिम तुस्टीकरण के नाम पर.ऍसुन्दर विस्तृत लेख के लिए प्रशंसा के लिए शब्द नहीं है.

    nishamittal के द्वारा
    May 8, 2017

    आपका हार्दिक आभार आदरनीय अग्रवाल साहब ,लेख पसंद करने के लिए

DHEERAJ PAWAR के द्वारा
May 20, 2011

हमारी एक अनुशाशान्हीनता हमारी असफलता का कारन बनी जो क्रांति ३१ मई को होनी थी वो हमने १० मई को ही आरंभ की …. नहीं तो देश अज कुछ और ही होता …

    nishamittal के द्वारा
    May 20, 2011

    धन्यवाद धीरज जी,आपकी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए.परन्तु आपके इस कथन से सहमत नहीं मै की ये अनुशासन हीनता थी.उस काल में जब सम्पर्क साधन न के बराबर थे,अंग्रेजों का इतना सख्त पाबंदियां अतः ऐसा होना कुछ अस्वाभाविक नहीं हाँ इतिहास का स्वरूप सम्ब्व्हाव्तः कुछ और होता यदि समय पर क्रान्ति का श्रीगणेश होता.

nishamittal के द्वारा
May 14, 2011

जितेन्द्र जी,आपको लेख अच्छा लगा तो अपना परिश्रम अच्छा लगता है,उत्साहवर्धन होता है.आपने सही कहा है आज देश को एक बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है,परिवर्तन या नेतृत्व ऐसा जो देशहित को प्राथमिकता पर रखे न की व्यक्तिगत स्वार्थों को.प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.समय मिलने पर मनमोहन सिंह जी पर आलेख पढ़ें मनमोहन जी को विशिष्ठ…………

omprakash के द्वारा
May 14, 2011

निशाजी, एक अच्छा गवेश्नात्मक लेख दिया है आपने भारत के प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम पर. मेरा साधुवाद .

    nishamittal के द्वारा
    May 14, 2011

    धन्यवाद आपका prtikriya  हेतु.

jitendra73 के द्वारा
May 14, 2011

nishaji namaste, such kaha aapne ki 1857 ka gadar bhartiya aajadi ke ladayi ka mil ka pathar ,tha,ha safal nahi hua ,iske tamam karan hai jaisa ki aapne hi kaha kuch gaddaro ,deshdrohiyo, gairatmand logo ne hi ha=amare pith me chura bhoka ,aur angrejo ko hum per raaj karne ka mouka diya.thik aaye aaj bhi hai wahi nit ,wahi kanoon, kiss mod per khade hai hum, ek aur kranti ki jarurat hai ,bahut dhanyawad

satya sheel agrawal के द्वारा
May 14, 2011

nisha ji , deri ke liye kshama prarthi hoon apne itihs ka achha adhyayan kiya hai. apki mehnat ko salam karta hoon. aise hi hame jankariya uplabdh krate rahen .

    nishamittal के द्वारा
    May 14, 2011

    धन्यवाद सत्यशील जी क्षमा वाली कोई बात नहीं समय की उपलब्धता पर ऐसे कार्यों को समय दिया जा सकता है.समय मिले तो मनमोहन जी के पुरस्कार वाला लेख अवश्य पढ़ें.पुनः धन्यवाद.

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 12, 2011

आदरणीय निशा जी …सादर अभिवादन ! आज ही पता चला की कल की कलास का विषय है मेरठ लेकिन प्रश्न क्लास के बाद ही पूछूँगा …. धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :|

    nishamittal के द्वारा
    May 13, 2011

    राजकमल जी मैंने ये नहीं लिखा की कल की क्लास का विषय मेरठ है,अपितु कहा है की मेरठ पर अलग से लिखूँगी आज कका टोपिक जागरण द्वारा आयोजित विषय पर है.वैसे भी एडक ही टोपिक पर दो दिन लगातार लिखना एकरसता सी उत्पन्न करता है,परन्तु कुछ लोगों को नाराजगी है अतः लिखूँगी अवश्य. रही बात आपके प्रश्नों के उत्तर देने की इतनी मेरी सामर्थ्य कहाँ?जो पता है,शेष पढ़कर लिखूँगी,अभी आपने दहेज़ पर जो कमेन्ट किया था वो भी लिखना है सम्माप्त नहीं हुआ टॉप प्राथमिकता पर ही है.धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए.

Aakash Tiwaari के द्वारा
May 12, 2011

आदरणीया निशा जी, इतिहास की इतनी विस्तृत जानकारी देना कोई मामूली काम नहीं है … आपने हमें कुछ अनछुए पहलुओं से अवगत कराया इसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया…. आकश तिवारी

    nishamittal के द्वारा
    May 12, 2011

    धन्यवाद आकाश जी आपकी प्रतिक्रिया+प्रोत्साहन हेतु.

mudit के द्वारा
May 12, 2011

कृपया मेरठ का विवरण विस्तृत दें.

    nishamittal के द्वारा
    May 12, 2011

    मेरठ पर इसी में जोड़ने में कठिनाई है अतः प्रिथाक्रूप से लेख लिखने का प्रयास करती हूँ./

    nishamittal के द्वारा
    May 12, 2011

    पृथक रूप पढ़ें ,हिंगलिश की गलती और मेरे पुनरवलोकन की

ravi के द्वारा
May 12, 2011

क्रांति पर सटीक जानकारी

    siddhish के द्वारा
    May 12, 2011

    कृपया देश से सम्बद्ध अन्य विषयों पर भी जानकारी प्रस्तुत करें

    nishamittal के द्वारा
    May 12, 2011

    धन्यवाद प्रथम प्रतिक्रिया के लिए.

rachna varma के द्वारा
May 11, 2011

आदरणीय निशा जी , अपने देश के गौरवशाली इतिहास को यदि हम सब याद भर रखे तो बहुत कुछ बदला जा सकता है | धन्यवाद |

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    धन्यवाद रचना जी आपके कमेन्ट के लिए.

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 10, 2011

आदरणीय निशा जी …सादर अभिवादन ! आपकी इतिहास की क्लास में दाखिला लेना है ….. नियम और शर्ते बता दे …. धन्यवाद :) ;)

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    राजकमल जी आप सदृश विद्वान् जन को मैं क्या पढ़ा सकती हूँ?धन्यवाद प्रतिक्रिया हेतु.

razia mirza listenme के द्वारा
May 10, 2011

निशाजी अपने देश की गौरवमयी क्रान्ति १० मई १८५७ के इस विशिष्ट लेख पर आपको नमन |

    nishamittal के द्वारा
    May 10, 2011

    धन्यवाद रज़िया` जी सुखद प्रतिक्रिया हेतु.

R K KHURANA के द्वारा
May 10, 2011

सुश्री निशा जी, बहुत सुंदर लेख ! जानकारी से भरपूर लेख देने के लिए धन्यवाद राम कृष्ण खुराना

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    आके द्वारा प्रदत्त प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ,खुराना जी.

    nishamittal के द्वारा
    May 12, 2011

    कृपया आपके पढ़ें.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
May 10, 2011

निशा जी अभिवादन, जानकारी भरी रचना है. ये सच है की हमारे देश का भला तभी हो सकता है, जब हम एक हो कर कोशिश करें. कुछ लोगों ने स्वतंत्रता का गलत इस्तेमाल किया है. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    सिद्दीकी जी,आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

narayani के द्वारा
May 10, 2011

नमस्कार निशाजी बहुत अच्छी रचना के लिए बधाई . हमारा देश तभी स्वतंत्र हो सका हे .अब इसे बचाने की पुरजोर कोशिश हमारी होनी चाहिए नारायणी

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    आपका धन्यवाद प्रतिक्रिया हेतु

jagojagobharat के द्वारा
May 10, 2011

दीदी, १८५७ की क्रांति से रूबरू करवाने के लिए हार्दिक धन्यवाद आशा है आगे भी इस तरह के लेखो से ज्ञानवर्धन करती रहेगी .

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    आपके स्नेहिल संबोधन व prtikriya ke liye dhnyvad

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    आपके स्नेहिल संबोधन व प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

s.p.singh के द्वारा
May 10, 2011

निशा जी आपने ज्ञान वर्धक लेख बहुत से लोग कुछ जानकारियां तो लेंगे पर आपके कथन कि ——– \",भारतीयों सैनिकों को कड़ी सजा देने की घोषणा की गयी . १० मई १८५७ की ऐतिहासिक तिथि को सैनिकों ऩे विद्रोह कर दिया. अंग्रेज अफसरों को मार दिया गया “मारो फिरंगियों को “के नारे के साथ विप्लव बढ़ता गया तथा विद्रोही दिल्ली पहुँच गये.मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र को अपना नेता घोषित कर दिया\" — आपने मेरठ का जिक्र नहीं किया जबकि इस क्रांति कि शुरुआत मेरठ के क्रांतिकारी धर्ति से ही हुई थी उसके बाद ही दिल्ली पहुंचे थे क्रांतिकारी फौजी चूँकि मैं मेरठ वासी हूँ इस लिए मुझे तो निराशा ही हुई — बाकि आपका लेख बहुत अच्छा है उसके लिए बधाई

    nishamittal के द्वारा
    May 10, 2011

    आदरनीय सिंह साहब आपकी भावनाओं को मेरे द्वारा शब्द छूट जाने से ठेस पहुँची,इसके लिए क्षमा करें.जिन वाक्यों को आपने उद्धृत किया है उनमें से मेरठ शब्द छूट गया है,मैं प्रयास करती हूँ कि ये वाक्य जोड़ सकूं.वैसे मेरठ १० मई की तिथि से दिल्ली तक पहुँचने का विवरण मेरठ का ही है,एक छोटा वाक्य जो इसके प्रारूप में है,छूट गया है.आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ.सर्वप्रथम आपकी ही प्रतिक्रिया का उत्तर दे रही हूँ.

    s p singh के द्वारा
    May 11, 2011

    आदरणीय निशा जी त्वरित उत्तर के लिए धन्यवाद.

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    आदरनीय सिंह साहब,मैं अपना वायदा पूर्ण नहीं कर पायी एडिट करने का,कुछ तकनीकी समस्या है,यदि उपयुक्त लगे तो अलग से टिप्पणी छोड़ दूं

Alka Gupta के द्वारा
May 10, 2011

निशाजी , विभिन्न जानकारियों से भरपूर उत्कृष्ट ऐतिहासिक रचना के लिए बधाई !

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    धन्यवाद अलका जी.प्रतिक्रिया के लिए.

rajeev dubey के द्वारा
May 9, 2011

निशा जी, अच्छे लेख पर बधाई… राजीव दुबे

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    धन्यवाद दुबे जी,प्रतिक्रिया के लिए.

संदीप कौशिक के द्वारा
May 9, 2011

आदरणीया निशा जी, ऐतिहासिक जानकारियों से परिपूर्ण इस लेख को इस मंच पर साझा करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार !!

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    धन्यवाद संदीप लेख को समय देने के लिए.

preeti के द्वारा
May 9, 2011

निशाजी हम भारतीयों में वह साहस है जिसके दम पर हम दुश्मनों के छक्के छुडा सकते हैं. अच्छी जानकारी से परिपूर्ण रचना. बधाई.

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    सही कहा प्रीती आपने बस अपनी शक्ति का सदुपयोग करने की आवश्यकता है.धन्यवाद.

shuklabhramar5 के द्वारा
May 9, 2011

आदरणीया निशा जी १० मई १८५७ को हमारे वीरों की याद ताजा करायी आप ने -बहुत बहुत धन्यवाद -एक सुन्दर और सार्थक लेख -निम्न आप ने बहुत ही अच्छा कहा भाइयों ऩे ही भाईयों को मरवाया और अंग्रेजों का साथ देने वाले हमारे भाई थे,जिनके सहयोग से अंग्रेज इतने लम्बे समय यहीं जमे रहे.अपने क्षुद्र स्वार्थों , कुछ विलासी,अकर्मण्य व निष्ठुर मुग़ल राजाओं से परेशान निशा जी तब क्या आप भी जितने गोरख धंधे हो रहे उसमे कहीं न कहीं इस तरह के स्वार्थी तत्व शामिल हैं उनके पुरे सहयोग के साथ ही वे मजे ले रहे हैं बाँट रहे हैं लड़ा रहे हैं और हम सब केवल उनका मुह ताकने के सिवा कुछ भी उनका बिगड़ने में सक्षम नही हो रहे – है की नहीं ?? शुक्ल भ्रमर ५

    shuklabhramar5 के द्वारा
    May 9, 2011

    कृपया हिंगलिश की अशुद्धियों हेतु क्षमा करे तब क्या अब भी जितने गोरख धंधे पढ़ें ..

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    शुक्ल जी ये हमारा दुर्भाग्य रहा है कि जहाँ वीरता,साहस आदि गुण हमारी विशेषताएं थीं वहीँ आस्तीन के सर्प भी हमारे देश के कलंक के रूप में रहे हैं.इतिहास के पन्ने पलटे तो ऐसे ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिन्होंने इतिहास ही बदल डाला.राजपूत राजाओं की कहानियां,तो कभी अंग्रेजों का साथ देना मस्तक शर्म से झुक जाता है,यही हालात आज हैं,परन्तु दुर्भाग्य आज हमारा लोकतंत्र है,राजे महाराजे नहीं.

    nishamittal के द्वारा
    May 11, 2011

    आप ऐसी त्रुटियों के लिए क्षमा आदि शब्द प्रयोग न करें.


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